Thursday, July 29, 2010

प्यार......

                   प्यार को परिभाषित करना कितना कठिन होता है...अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए....वैसे भी परिभाषा का अर्थ ही है की स्थिति या बात को इस तरह गढ़ना कि दूसरों को उसका अर्थ आसानी से समझ में आ जाए | खुद को वह बात समझ में आ चुकी होती है तभी तो हम उसे परिभाषित करने के लायक बनते हैं | पर प्यार आपके लिए क्या मायने रखता है, यह कैसी सुखद अनुभूति है यह बात दूसरों को समझाना कठिन कार्य है खासकर ऐसे लोगों को जिन्होंने इस अनुभूति को छुआ न हो |
                   जबकि स्वयं तो इस एहसास से गुजरने के बाद, इसके छोटे छोटे पर अहम् भावों को महसूस करने के बाद, अपने भीतर इसे इस तरह समा लेते हैं कि वह हमारा ही एक हिस्सा बन जाता है और उसके बाद कोई चीज कोई व्यक्ति मायने नहीं रखता है |
                   लेकिन किसी दूसरे के साथ अपने इन मनोभावों को बांटना _ _या सिर्फ बताना कितना मुश्किल है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.......

तुम ख़याल बनकर,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो,
मेरे मुस्काते लबों से लेकर,
उँगलियों कि शरारत तक,
तुम सिमटे हो मेरी करवट कि सरसराहट में...
कभी बिखरे हो खुशबू बनकर,
जिसे अपने देह से लपेट
आभास लेता हूँ तेरे आलिंगन का,
जाने कितने रूप छुपे हैं तेरे,
मेरी बंद पलकों के कोनो में,
स्वप्न से लेकर..... उचटती नींद तक,
मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा आधिपत्य है....
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