Sunday, October 31, 2010

इनको पहचानिए तो ज़रा....

          पिछली पोस्ट की बातों को भूल कर ज़रा ज्ञान की बात हो जाए | क्या आप पहचान सकते हैं इनको ??? कोशिश तो कीजिये |
           जल्दी से पहचानिए और बता दीजिये...और हाँ पोस्ट पर मोडेरेशन लगाया गया है , शाम तक टिप्पणियाँ प्रकाशित कर दी जाएँगी...
एक और तस्वीर दे दी, अब तो कोशिश करें..इनके ऊपर कई चर्चाएं पढ़ी हैं मैंने ब्लोग्स पर | ये बिहार के काफी प्रसिद्ध रचनाकार हैं...

Saturday, October 30, 2010

लानत है ऐसे लोगों पर....

                पिछले दिनों ब्लॉग जगत पर मैंने अजीब सा माहौल देखा | एक दूसरे की निंदा करने की जैसे प्रथा चली हुई थी | ऐसा लग रहा था मानो कोई होड़ लगी हुई है कि सबसे ज्यादा विवादास्पद और नफरत से भरा लेख किसका हो | हिन्दू का ब्लॉग है तो उसपर मुसलमान की बुराई हो रही थी और किसी मुसलमान के ब्लॉग पर हिन्दुओं पर निशाना साधा जा रहा था | कई पोस्ट तो मैंने ऐसी भी पढ़ी जो किसी व्यक्ति विशेष की बुराई करने के लिए ही लिखी गयी थी | ऐसा लग ही नहीं रहा था कि ब्लॉग जगत में पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी लोग रहते हैं | एक दूसरे के प्रति अपने मन में इतनी नफरत भर रखी थी और वो भी बिना किसी उचित कारण के | किसी को अपनी टिपण्णी प्रकाशित नहीं होने का गुस्सा था तो किसी को दूसरे की टिप्पणियाँ अच्छी नहीं लग रही थी |
                चलिए इन व्यक्तिगत हमलों कि बात छोड़ भी दें लेकिन देश के खिलाफ...!!!  जब से अयोध्या का फैसला आया है तब से सांप्रदायिक पोस्ट कुछ ज्यादा ही पढने को मिल रही है | धर्म के पीछे तो जैसे लोग पागल हुए जा रहे हैं |
                अरे लानत है ऐसे लोगों पर जो इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद इतनी संकरी विचारधारा से ग्रसित हैं |
                लानत है ऐसे लोगों पर जिन्हें लिखने के लिए और कोई विषय नहीं मिलता | क्या इनके लिए धर्म इतना महत्वपूर्ण है कि इसके आगे वो इंसानियत के बाकी सारे धर्म भूल जाते हैं |
                लानत है ऐसे लोगों पर जिन्हें इस देश में फैली हुई अशिक्षा नहीं दिखाई देती, वो भ्रष्ट नेता नहीं दिखाई देते जो दिल्ली में हुए खेलों के नाम पर ७०००० करोड़ रुपये खर्च कर देते हैं |
                लानत है ऐसे लोगों पर जिन्हें ऑस्ट्रेलिया में भारतियों पर लगातार हो रहे हमले दिखाई नहीं देते, जिन्हें वो बेरोजगारी नहीं दिखाई नहीं देती जो अन्दर ही अन्दर इस देश को खायी जा रही है |
                लानत है ऐसे लोगों पर जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि कसाब का जुर्म क्या है, और उसे जल्दी से जल्दी सजा मिलनी चाहिए, उन्हें तो बस उसके धर्म को लेकर साम्प्रदायिकता फैलानी है | और कई तो ऐसे समझदार मुसलमान ब्लौगर भी है जो अपनी हर पोस्ट में केवल मज़हबी जिहाद कि बातें करते हैं|
                लानत है ऐसे लोगों पर जो शायद धर्म का असली मतलब ही नहीं समझते और इसके लिए आपस में लड़ने-मरने को आमादा हैं |
                अरे अगर आप प्यार का सन्देश नहीं दे सकते तो कम से कम नफरत तो न फैलाएं....
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PS :- अगर आपने ये पोस्ट नहीं पढ़ी है तो कृपया टिप्पणी देने का कष्ट भी ना करें.

Thursday, October 28, 2010

उदास हैं हम....

हमें ना समझाओ कि उदास हैं हम
हमें न बुलाओ कि उदास हैं हम,

ज़िन्दगी मेरे करीब से गुज़र गयी
यह भी न देखा कि पास हैं हम,

जिसकी सुबह मोड़ से लौट गयी
ऐसी रात की टूटी आस हैं हम,

और उम्र न दे मुझे ए रब
इस ज़िन्दगी से निराश हैं हम,

ओस की एक बूँद को तरसती रह गयी
इस मैदान की वो सूखी घास हैं हम....

Monday, October 25, 2010

पहचानो तो जाने...

           मेरी पिछली पोस्ट पर काफी गहमा गहमी रही | चलिए इस बहस को यहीं विराम देते हैं | आपके लिए आज एक चित्र पहेली लाया हूँ, क्या आप पहचान सकते हैं यह तीन महापुरुष कौन हैं ?
           जरा मैं भी तो देखूं आपकी यादास्त.....चलिए अब ज्यादा नहीं लिखूंगा बाकी पहचानने के बाद | हाँ इस पोस्ट पर मोडरेशन लगाया गया है, सोमवार शाम को टिप्पणियाँ प्रकाशित की जाएँगी...
        मेरे ब्लॉग सुनहरी यादें पर आज २ पुरानी रचनायें प्रकाशित हुई हैं उनपर भी नज़र डालते जाईयेगा....

Saturday, October 23, 2010

आपसे कुछ सवाल:- धर्म, अंधविश्वास या बेवकूफी ?

              पिछले दिनों मुझे काफी सर्दी-जुकाम था, इसलिए समय से मेरी पोस्ट भी नहीं आ पाई | खैर मैं शाम को यूँ ही छत पर ताज़ी हवा ले रहा था अचानक मुझे जोर की छींक आयी, अब जुकाम है तो यह कोई बड़ी बात तो है नहीं | लेकिन मेरी छींक सुनकर नीचे सड़क पर गुजर रहे एक सज्जन ठिठके उनहोंने मुझे अजीब सी नज़रों से देखा और बुदबुदाते हुए बढ़ गए | मुझे उस समय कुछ समझ नहीं आया फिर एहसास हुआ कि लगता है  इस छींक को उन्होंने अपशकुन मान लिया | अब बताईये इसमें मेरा क्या दोष भला, मैं तो खुद परेशान था |
क्या आप भी इन बातों को मानते हैं ?? चलिए आपसे कुछ सवाल ही पूछ लेता हूँ....


  1. क्या बिल्ली के रास्ता काटने पर आप रुक जाते हैं ?
  2. कहीं जाते समय अगर कोई पीछे से टोक दे तो क्या आप चिढ़ जाते हैं ?
  3. क्या किसी की छींक को अपने कार्य के लिए अशुभ मानते हैं ?
  4. क्या किसी दिन विशेष को बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने से परहेज करते हैं ?
  5. क्या दिन के अनुसार ही मांसाहार करते हैं ?
  6. क्या आप भगवान् के नाम पर तुरंत चंदा देने के लिए तैयार हो जाते हैं ?
  7. क्या अपनी उँगलियों में आप तरह तरह की अंगूठियाँ इसलिए पहनते हैं क्यूंकि आपको लगता है कि ये आपकी ज़िन्दगी पर कोई प्रभाव डाल सकती है ?
  8. क्या आपको लगता है कि तीर्थ घूमने या हज यात्रा करने से आपके सारे पाप धुल जायेंगे ?
  9. क्या आपको लगता है की घर या अपने अनुष्ठान के बाहर नींबू-मिर्च लगाने से बुरी नज़र से बचाव होगा ?
  10. क्या सुबह सुबह आप अखबार में अपना राशिफल देखने से नहीं चूकते ?
            और भी ऐसे कई सवाल हैं लेकिन मेरे ख्याल से इतने सवाल ही काफी हैं आपके बारे में जानने के लिए | अगर इनमे से एक भी सवाल का जवाब हाँ में है तो आप इसे मानते हैं धर्म, अंधविश्वास या बेवकूफी ? और अगर आप इनमे से अलग किसी और चीज को भी मानते हैं तो वो भी बताएं | कारण के साथ उत्तर देंगे तो चर्चा अच्छी रहेगी...

       NOTE:-  कृपया मेरे द्वारा दी गयी टिप्पणियों को भी जरूर पढ़ें, आपके काफी सारे सवालों के जवाब वहां मिल जायेंगे..
        PS:- अगर आपने यह पोस्ट नहीं पढ़ी है तो कृपया टिप्पणी देने का भी कष्ट ना करें....

Wednesday, October 20, 2010

असुरक्षा पुरुषों में भी ...

               कई ब्लोग्स पर अक्सर मैंने स्त्रियों के सन्दर्भ में कवितायेँ या लेख देखे है | हाल में दिव्या जी के ब्लॉग पर पुरुषों पर एक लेख छपा था पढ़कर अच्छा लगा, और इसी बहाने मैं भी पुरुषों का एक पक्ष रख रहा हूँ....
               युगों से सृष्टि में पुरुष को शारीरिक और मानसिक रूप से शक्तिशाली माना गया है | हमारे समाज में पुरुष से शारीरिक और मानसिक रूप दोनों से प्रबल होने की अपेक्षा बहुत आरंभ से ही की जाने लगती है कि " ए तुम तो लड़के हो तुम्हें रोना शोभा नहीं देता |' छिः क्या लड़कियों कि तरह रोते हो ! "
                इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि पुरुषों में भय , विवशता, कमजोरी हताशा की भावना नहीं होती| होती है और उतनी ही होती है जितनी स्त्रियों में, यह बात अलग है कि वह इन भावनाओं से ऊपर उठना जानता है या इन भावनाओं को दबाकर अपना मजबूत हिस्सा ही समाज के सामने रखता है | हालांकि इन भावनाओं को दबाना कई मानसिक असामान्यताओं को जन्म देता है, इसलिए पुरुषों में क्रोध की भावना स्त्रियों से अधिक पायी जाती है | कोई न कोई व्यक्ति पुरुष के दायरे में ऐसा अवश्य होना चाहिए जो कि उसकी असुरक्षा को बाँट सके, या उसकी समस्या को सुन सके | माँ, पत्नी , बहन या कोई महिला मित्र यह भूमिका निभा सकती है क्यूंकि किसी पुरुष का अहम् ऐसा होता है कि वह किसी अन्य पुरुष के समक्ष अपनी कमजोरी का रोना नहीं रो सकता...
      पुरुषों की कुछ आम असुरक्षाएं इस तरह की होती हैं --
                 अस्वीकार किये जाने की असुरक्षा
पुरुष को नाकारा जाना उसके अहम् पर सबसे बड़ी चोट है | इस वजह से कई पुरुष पहल करने से डरते हैं और लम्बे समय तक एकाकी रह जाते हैं |
                 अकेले छूट जाने का दर
उन्हें सदैव परिवार की आवश्यकता महसूस होती है जो विपरीत परिस्थितियों में उसे संबल दे |
                 हारने का भय
आसानी से हार मान लेना तो पुरुष की फितरत नहीं | हमेशा जीत और कामयाबी की चाहत होती है उसे | हार का डर कई बार उसके काम पर असर डालता है |
                संबंधों में छिपे बन्धनों का भय 
बन्धनों से पुरुष सदैव कतराता है | उन्हें बेवजह टोका टोकी या दखलंदाजी पसंद नहीं होती | उनका मानना होता है  इफ यू लव सम वन सेट हिम फ्री ..
                अहम् हर पुरुष में होता है जिस पर चोट वह बर्दास्त नहीं करता या तो आक्रामक हो जाता है या टूट जाता है |
मानवीय कमजोरियां किसमे नहीं होतीं, सहारे की आवश्यकता भी हर किसी को होती है | पुरुष बस इतना चाहता है कि बिना कहे कोई उसकी आवश्यकता समझ जाए....
                 आपकी इस बारे में क्या राय है ?? क्या आप मुझसे सहमत हैं.. कृपया अपने विचार भी अवश्य दें...
               PS :-  अगर आपने यह पोस्ट नहीं पढ़ी है तो कृपया टिप्पणी देने का भी कष्ट ना करें...

Monday, October 11, 2010

एक और आईडिया.......

           आज आप लोगों के लिए एक और सरप्राईज है...एक और आईडिया जो आया है मेरे दिमाग में.... आप भी सोच रहे होंगे पता नहीं आजकल मुझे इतने आईडिया कहाँ से आ रहे है, कहीं दिमाग में कुछ केमिकल लोचा तो नहीं हो गया....
अजी क्या कहें इस बेरोजगारी ने सोचने की शक्ति को दोगुना कर दिया है.... अच्छा चलिए हटाईये इन बातों को , आपको अपना आईडिया बताता हूँ....
            आप तो जानते ही हैं मेरे ब्लॉग पर पिछले शनिवार से आपकी पुरानी रचनाओं का प्रकाशन शुरू हुआ है... यह रचनायें मैं खुद चुन रहा हूँ...अब सवाल यह है कि ७ दिनों में, मैं कितनी रचनायें पढ़ पाउँगा भला, और वो भी तब जब मुझे नौकरी भी तलाशनी है....
इसलिए आपसे गुजारिश है कि कुछ चुनिन्दा और पुरानी रचनायें आप मुझे मेल करेंगे......
अरे पूरी बात तो सुनिए....
यह रचनायें आपकी नहीं होनी चाहिए,यानि की आप अपने किसी मित्र ब्लॉगर की कुछ पुरानी रचनायें पढ़ें जो अच्छी लगे मुझे भेज दें... .यह रचनायें २०१० से पुरानी होनी चाहिए....अरे ज्यादा टेंशन में मत आईये,सप्ताह में २-३ रचनायें तो पढ़ ही सकते है ना ???? उनमे से सबसे अच्छी भेज दीजिये...
इतना याद रहे जो रचना आप मुझे भेज रहे हैं वो उन्हें ना बताए, यह तो उनके लिए सरप्राईज होगा .....
यह प्रयास है पाठकों की संख्या बढ़ाने का, उन्हें पढने के लिए प्रोत्साहित करने का...उम्मीद है आप सब मेरा साथ देंगे..... 
जिनके द्वारा भी भेजी गयी रचना प्रकाशित होगी उन्हें सप्ताह का सर्वश्रेष्ठ पाठक/पाठिका घोषित किया जायेगा...
आपकी रचनायें हर शुक्रवार सुबह ७ बजे से पहले पहुँच जानी चाहिए..मैं भी रचनायें पढता रहूँगा और बीच बीच में अपनी पढ़ी हुई रचनायें भी प्रकाशित करता रहूँगा.....
आप मुझे मेल कर सकते हैं
sunhariyadein@yahoo.com पर...
अगर किसी प्रकार की शंका हो पूछ लीजिये ....

Saturday, October 9, 2010

सुनहरी यादें ....

                  बीते हफ्ते ना जाने कितनी रचनायें पढ़ीं , कोशिश थी कि अच्छी से अच्छी रचना आपके लिए लायी जाए... ऐसा लगा जैसे मैंने बहुत ही कठिन कार्य ले लिया हो, लेकिन सच में बहुत अच्छा लगा इतनी खुबसूरत रचनायें पढ़कर...
                  तो वादे के मुताबिक सुनहरी यादों के झरोखे से इस शनिवार मैं आपके लिए लाया हूँ आदरणीय रश्मि प्रभा जी की दो रचनायें...
                  पहली रचना जो उन्होंने 16 जनवरी  2008 को प्रकाशित की थी... माँ बनने के बाद एक स्त्री की सोच और ज़िन्दगी कितनी बदलती है उसका बहुत ही प्यारा सा वर्णन है... कविता का शीर्षक है ....
                                                             " मायने बदल जाते हैं.."
जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
कहाँ थे कंकड़, पत्थर?

कहाँ थी काई ?
वर्तमान में जीवंत हो जाते हैं॥
नज़रिये का पुनर्आंकलन
मासूम ज़िन्दगी से जुड़ जाते हैं...
जो हिदायतें अभिभावकों ने दी थी
वो अपनी जुबान पर मुखरित हो जाते हैं!
हमने नहीं मान कर क्या खोया
समझने लगते हैं
नज़र, टोने-टोटके पर विश्वास न होकर भी
विश्वास पनपने लगते हैं!
"उस वृक्ष पर डायन रहती है...."
पर ठहाके लगाते हम
अपनी मासूम ज़िन्दगी का हाथ पकड़ लेते हैं
"ज़रूरत क्या है वहाँ जाने की?"
माँ की सीख, पिता का झल्लाना
समय की नाजुकता समय की पाबंदी
सब सही नज़र आने लगते हैं!
पूरी ज़िन्दगी के मायने
पूरी तरह बदल जाते हैं |...
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दूसरी रचना कुछ नयी है, उम्मीद आप में से काफी लोगों ने पढ़ी होगी, यह उन्होंने १० जुलाई २००९ को प्रकाशित की थी..इस कविता में उन्होंने ज़िन्दगी में आने वाली परेशानियों का शुक्रिया अदा किया है.... यह कविता उन लोगों के लिए अमृत का काम करेगी जो ज़िन्दगी के दुखों से हताश हैं... कविता का शीर्षक है.....
                                                                   "  शुक्रगुज़ार "

दर्द ने मुझे तराशा है,
दर्द देनेवालों की
मैं शुक्रगुजार हूँ........
यदि दर्द ना मिलता
तो सुकून का अर्थ खो जाता,
खुशियों के मायने बदल जाते,
अपनों की पहचान नहीं होती,
गिरकर उठना नहीं आता,
आनेवाले क़दमों में
अनुभवों की डोर
नहीं बाँध पाती.........
मैं शुक्रगुजार हूँ,
उन क्रूर हृदयों का
जिन्होंने मुझे सहनशील होना सिखाया,
सिखाया शब्दों के अलग मायने
सिखाया अपने को पहचानना ........
तहेदिल से मैं शुक्रगुजार हूँ,
दर्द की सुनामियों की
जिसने मुझे डुबोया
और जीवन के सच्चे मोती दिए...........
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उम्मीद है आपको यह दोनों रचनायें पसंद आयी होंगी... अपने विचार और सुझावों से मुझे जरूर अवगत कराएं....

Tuesday, October 5, 2010

संघर्ष .....

                  पिछले कुछ दिनों से लिखने से ज्यादा पढने में व्यस्त था | इसलिए कुछ लिखना संभव ना हो सका, इसलिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ १९९९ में लिखी मेरी एक कविता | यह कविता यहाँ पहले भी प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन उस समय मेरा ब्लॉग शायद ही कोई पढता था | अगर आपको इसमें कोई त्रुटि लगे तो उसे ज़रूर सुधारेंगे क्यूंकि उस समय की मेरी उम्र के हिसाब से यह रचना शायद थोड़ी भारी भरकम है........
अंतहीन समंदर,
आती जाती तेज़ लहरें,
एक आशंका लिए कि,
मझधार यह कहाँ ले जाएगी,
ज़िन्दगी से लड़ते- लड़ते मौत दे जाएगी,
एक किनारे की तलाश में,
निगाहें समेटना चाहती हैं समंदर,
मायूसी की घटा है चेहरे पर,
बयां करती एक दास्तान,
दरम्यान यह ज़िन्दगी मौत का
एक पल के झरोखे में मिटा जाएगी
डूबना होगा अगर मुकद्दर मेरा,
लाख कोशिश न रंग लाएगी,
एक साहिल की तलाश में
यह ज़िन्दगी बीत
जाएगी...
क्या करूँ ? ? 
मान लूं हार या करूँ संघर्ष
आखिरी क्षण तक, 
क्या होगा अंजाम 
यह तो तकदीर ही बताएगी......

Monday, October 4, 2010

आपकी रचना...

          कल रात यूँ ही बिस्तर पर लेटे लेटे एक ख्याल मन में आया | सभी ब्लॉगर्स दूसरे की रचनायें पढ़ते हैं लेकिन क्या वो अपनी पुरानी रचनाओ को पढ़ते हैं  ? ? ? शायद नहीं |
          इसलिए मेरे ब्लॉग पर हर शनिवार की शाम ऐसी रचनायें प्रकाशित की जायेंगी, जो हैं तो आपकी लेकिन शायद आपने बहुत दिनों से नहीं पढ़ीं.... आप इसे दोबारा यहाँ पढ़ सकते हैं | और हाँ इसका ज़िक्र आप अपने ब्लॉग पर भी कर सकते हैं ताकि आपके वो पाठक और प्रशंसक जिनका शायद मेरे ब्लॉग पर नियमित आना नहीं हैं वो भी इसका आनंद उठा सकें....
तो फिर सोच क्या रहे हैं कृपया अपने विचार जल्दी से जल्दी मुझे भेजें ताकि इसी शनिवार से काम शुरू हो जाए आपकी ही रचना को आपसे ही बांटने का....आपके जवाब के इंतज़ार में.....
## किसी की अनुमति के बिना उनकी रचना यहाँ प्रकाशित नहीं होगी..... इसलिए अपनी हामी जरूर भरें....
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