Friday, December 31, 2010

नए वर्ष की शुभकामनाएं....

            आज एक और साल ख़त्म हो जायेगा...आने वाला साल आपके लिए नयी खुशियाँ और नयी उमंग लाये बस यही कामना करता हूँ...

              

Wednesday, December 29, 2010

तुम कहाँ हो ? ? ?

एक पुरानी कविता पुरानी टिप्पणियों के साथ...
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तुम शायद भूल गए वो पल,
जब उन नन्हे हाथों से
मेरी ऊँगली पकड़कर तुमने चलना सीखा था,
अपने पहले लड़खड़ाते कदम मेरी तरफ बढ़ाये थे.....
तुम शायद भूल गए...
जब मैं तुम्हारे लिए घोडा बना करता था
तुम्हारी हर बेतुकी बातें सुना करता था,
परियों कि कहानियां सुनते सुनते
मेरी गोद में सर रख कर न जाने तुम कब सो जाते थे,
जब मेरे बाज़ार से आते ही
पापा कहकर मुझसे लिपट जाते थे,
अपने लिए ढेर सारे खिलोनों कि जिद किया करते थे.
तुम शायद भूल गए...
जब दिवाली के पटाखों से डरकर मेरी गोद में चढ़ जाया करते थे,
जब मेरे कंधे पर सवारी करने को मुझे मनाते थे,
जब दिनभर हुई बातें बतलाया करते थे...
आज जब शायद तुम बड़े हो गए हो,
ज़िन्दगी कि दौड़ में कहीं खो गए हो,
आज जब मैं अकेला हूँ,
वृद्ध हूँ, लाचार हूँ,
मेरे हाथ तुम्हारी उँगलियों को ढूंढ़ते हैं,
लेकिन तुम नहीं हो शायद,
दिल आज भी घबराता है,
कहीं तुम किसी उलझन में तो नहीं ,
तुम ठीक तो हो न ....

Thursday, December 23, 2010

हाँ मुसलमान हूँ मैं.....

यह कविता मेरे उन मुसलमान भाईयों के लिए है जो उनकी कौम के  चंद गुनाहगारों कि वजह से दुनिया भर में शक की नज़र से देखे जाते हैं.....
क्यूँ इतना तिरस्कृत, इतना अलग,
हर बार यह निगाह मेरी तरफ क्यूँ उठती है....
क्यूँ हर जगह मुझसे मेरा नाम पूछा जाता है..
क्यूँ भूल जाते हैं सब कि इंसान हूँ मैं,
इस देश कि मिटटी का अब्दुल कलाम हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ... हाँ, मुसलमान हूँ मैं...
आतंक फैलाना मेरा काम नहीं,
ये श़क भरी दृष्टि मेरा इनाम नहीं,
इस धरती को मैंने भी खून से सीचा है,
मेरे भी घर के आगे एक आम का बगीचा है,
हँसते हँसते जो इस देश पर मर गया,
वो क्रांतिकारी अशफाक अली खान हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ, हाँ मुसलमान हूँ मैं,
क्या हुआ जो चंद अपने बेगाने हो गए,
गलत रास्ता चुनकर, खून की प्यास के दीवाने हो गए,
यह खूबसूरत वादियाँ हमारी भी जान हैं,
यह देश का तिरंगा हमारी भी शान है,
हरी-भरी धरती से सोना उगाता किसान हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ, हाँ मुसलमान हूँ मैं.....
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एक फिल्म देखी थी शौर्य , उसी को देखने के बाद इसको लिखा था...

Monday, December 20, 2010

भारतीय फिल्म इतिहास के स्तम्भ...

                    आपका ये चहेता ब्लॉग मित्र शेखर सुमन हाज़िर है पहचान कौन चित्र पहेली :- ८ के उत्तर के साथ | कल तो सही जवाबों की बरसात हो रही थी जैसे | 


                    ये तस्वीर है महान फिल्मकार सत्यजित रे की | विजय कर्ण जी ने इनके बारे में जैसे एक पूरी किताब ही भेज दी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद...प्रस्तुत है इनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां...
                   सत्यजित राय (२ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) एक भारतीय फ़िल्म निर्देशक थे, जिन्हें २०वीं शताब्दी के सर्वोत्तम फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है।
                   इनका जन्म कला और साहित्य के जगत में जाने-माने कोलकाता (तब कलकत्ता) के एक बंगाली परिवार में हुआ था। इनकी शिक्षा प्रेसिडेंसी कॉलेज और विश्व-भारती विश्वविद्यालय में हुई। इन्होने अपने कैरियर की शुरुआत पेशेवर चित्रकार की तरह की। फ़्रांसिसी फ़िल्म निर्देशक ज़ाँ रन्वार से मिलने पर और लंदन में इतालवी फ़िल्म लाद्री दी बिसिक्लेत (Ladri di biciclette, बाइसिकल चोर) देखने के बाद फ़िल्म निर्देशन की ओर इनका रुझान हुआ।
                 राय ने अपने जीवन में ३७ फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें फ़ीचर फ़िल्में, वृत्त चित्र और लघु फ़िल्में शामिल हैं। इनकी पहली फ़िल्म पथेर पांचाली  को कान फ़िल्मोत्सव में मिले “सर्वोत्तम मानवीय प्रलेख” पुरस्कार को मिलाकर कुल ग्यारह अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले। यह फ़िल्म अपराजितो और अपुर संसार के साथ इनकी प्रसिद्ध अपु त्रयी में शामिल है। राय फ़िल्म निर्माण से सम्बन्धित कई काम ख़ुद ही करते थे — पटकथा लिखना, अभिनेता ढूंढना, पार्श्व संगीत लिखना, चलचित्रण, कला निर्देशन, संपादन और प्रचार सामग्री की रचना करना। फ़िल्में बनाने के अतिरिक्त वे कहानीकार, प्रकाशक, चित्रकार और फ़िल्म आलोचक भी थे। राय को जीवन में कई पुरस्कार मिले जिनमें अकादमी मानद पुरस्कार और भारत रत्न शामिल हैं।

                "हालाँकि इनके बारे में कई सारी जानकारियाँ है देने के लिए लेकिन एक महत्वपूर्ण जानकारी जो शायद बहुत कम लोगों को मालूम है सत्यजित राय पहले भारतीय हैं जिन्हें विश्वप्रसिद्ध ऑस्कर पुरस्कार मिला | १९९१ में उन्हें यह पुरस्कार फिल्म जगत में उनके अपूर्व योगदान के लिए दिया गया | "
             1967 में राय ने एक फ़िल्म का कथानक लिखा, जिसका नाम होना था द एलियन (The Alien, दूरग्रहवासी)। यह इनकी लघुकथा बाँकुबाबुर बंधु पर आधारित थी जिसे इन्होंने संदेश पत्रिका के लिए 1962 में लिखा था। इस अमरीका-भारत सह-निर्माण परियोजना की निर्माता कोलम्बिया पिक्चर्स नामक कम्पनी थी। पीटर सेलर्स और मार्लन ब्रैंडो  को इसकी मुख्य भूमिकाओं के लिए चुना गया। राय को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उनके कथानक के प्रकाशनाधिकार को किसी और ने हड़प लिया था। ब्रैंडो बाद में इस परियोजना से निकल गए और राय का भी इस फ़िल्म से मोह-भंग हो गया।  कोलम्बिया ने 1970 और 80 के दशकों में कई बार इस परियोजना को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया लेकिन बात कभी आगे नहीं बढ़ी। राय ने इस परियोजना की असफलता के कारण 1980 के एक साइट एण्ड साउंड (Sight & Sound) प्रारूप में गिनाए हैं, और अन्य विवरण इनके आधिकारिक जीवनी लेखक एंड्रू रॉबिनसन ने द इनर आइ (The Inner Eye, अन्तर्दृष्टि) में दिये हैं। जब 1982 में ई.टी. फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो राय ने अपने कथानक और इस फ़िल्म में कई समानताएँ देखीं। राय का विश्वास था कि स्टीवन स्पीलबर्ग की यह फ़िल्म उनके कथानक के बिना सम्भव नहीं थी  |
                १९८३ में फ़िल्म घरे बाइरे पर काम करते हुए राय को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनके जीवन के बाकी ९ सालों में उनकी कार्य-क्षमता बहुत कम हो गई। घरे बाइरे का छायांकन राय के बेटे की मदद से १९८४ में पूरा हुआ। १९९२  में हृदय की दुर्बलता के कारण राय का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, जिससे वह कभी उबर नहीं पाए। मृत्यु से कुछ ही हफ्ते पहले उन्हें सम्मानदायक अकादमी पुरस्कार दिया गया। २३ अप्रैल १९९२ को उनका देहान्त हो गया। इनकी मृत्यु होने पर कोलकाता शहर लगभग ठहर गया और हज़ारों लोग इनके घर पर इन्हें श्रद्धांजलि देने आए।
               "इनके बारे में आप विस्तृत जानकारी मेरी पिछली पोस्ट में विजय कर्ण जी की टिप्पणियों से प्राप्त कर सकते हैं |"

Friday, December 17, 2010

मेरा बचपन तस्वीरों में....

             ऐसी तस्वीरें जो मेरे लिए अनमोल हैं | उम्मीद  करता हूँ आपको मेरी यह तस्वीरें पसंद  आएँगी | और इन्हें देखने के बाद आप भी अपना पुराना अल्बम एक बार ज़रूर पलटेंगे |
               वैसे उस समय कैमरा हम जैसे मध्यम वर्गीय परिवार से दूर ही था फिर भी मेरे जन्म के २ महीने के बाद आखिरकार मेरा पहला फोटो ले ही लिया गया | सब कहते हैं जब पहली बार मेरा फोटो लिया गया तो मैं डर  गया था उस अजीब सी रौशनी से, अरे फ्लैश और क्या ...

                 अब इस तस्वीर को देखिये अपने बड़े भैया की गोद में भी परेशान लग रहा हूँ और भैया तो पोज देने में व्यस्त हैं :) 
                काफी न-नुकुर के बाद यह फोटू अपनी प्यारी ममेरी बहन के साथ खिचवा ही लिया था मैंने :) वो मुझसे २ महीने बड़ी है तभी तो समझदारी दिखाते हुए कैमरे से आँखें बचा ली और मैं ठहरा नादान, इसलिए  एक बार फिर परेशान ....

                  इस लम्बे फोटोसेशन के बाद मुझे ४ महीने इस कैमरे नाम की बला से दूर रखा गया | फिर दूसरा दौर ..उफ्फ्फ..लेकिन तब तक तो थोड़ी हिम्मत आ ही गयी थी...

                   लेकिन एक प्यारा सा पोज देकर मैंने और फोटो लेने से साफ़ मना कर दिया... फिर तो पूछिए ही मत , इस मुए कैमरे और फोटो के चक्कर में मुझे क्या क्या बनाया गया | आप खुद ही देख लीजिये..हालाँकि फोटू की क्वालिटी थोड़ी ख़राब है लेकिन ये सबसे अनमोल है..


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Tuesday, December 14, 2010

वो लम्हें जो याद न हों......

वो पहली बार,
जब माँ ने गले से लगाया,
वो लम्हा जब पापा ने गोद में उठाया,
वो पहली मासूम सी हँसी,
वो पहली नींद की झपकी,
दादी की प्यार भरी पप्पी,
वो पहले लड़खड़ाते से कदम,
वो अनबुझ पहेली सा बचपन...
ढेर सारे खिलौने,
गुड्डों और गुड़ियों की दुनिया,
स्कूल में वो पहला दिन,
वो प्यारे पलछिन,
और भी ऐसा बहुत कुछ......
इस ज़िन्दगी की आपाधापी से,
इन वाहनों के शोर से,
कहीं दूर, कहीं एकांत में,
आओ बैठें, समेटे उन लम्हों को,
वो लम्हे जो बीत गए....
वो लम्हें जो याद न हों......

Wednesday, December 8, 2010

मेरा नया बसेरा ....

             कल कंप्यूटर के किसी महाज्ञानी ने मेरे पुराने ब्लॉग में सेंध लगाते हुए उसे मिटा दिया | काफी कोशिश करने के बावजूद भी मैं उसे दोबारा नहीं पा सका | पता नहीं किसी को यूँ बेवजह दूसरे की चीजें हैक करने में कितनी ख़ुशी मिलती है...
इस दुःख से उबरने में मेरे कई दोस्तों ने मेरी मदद की, जिसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ | 
             आज फिर से एक नयी उर्जा के साथ अपना नया ब्लॉग आपके हवाले कर रहा हूँ | उम्मीद करता हूँ मेरे उस पुराने आशियाने की तरह ही मेरा ये नया बसेरा भी आपको पसंद आएगा |
             इस ब्लॉग पर रचनाओं का सिलसिला अगले सोमवार यानि १३ दिसंबर से शुरू हो जायेगा... आपसे बस यही गुजारिश है कि जल्द से जल्द मेरे इस नए बसेरे को अपनी उपस्थिति से हरा भरा कर दें....

Tuesday, December 7, 2010

पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के विजेता और एक कविता....

                  आपका ये चहेता ब्लॉग मित्र शेखर सुमन हाज़िर है पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के विजेताओं के साथ | बड़ा ही अफ़सोस है कि इस पहेली का सही उत्तर सिर्फ २ लोगों ने दिया|
                  इस पहेली के विजेता हैं प्रकाश गोविन्द जी.. ( १०० अंक )  

                और उपविजेता हैं वंदना महतो जी ( ९९ अंक )


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            आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई और जिनके जवाब गलत रहे उन्हें अगली पहेली के लिए शुभकामनाएं |
                      चलते चलते आप सबको जयशंकर प्रसाद जी की ये कविता याद दिलाता चलूँ....
                                                         अरुण यह मधुमय देश हमारा ...

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
 

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।


- जयशंकर प्रसाद
       

Monday, December 6, 2010

हिंदी साहित्य के एक महान कवि ...

                    आपका ये चहेता ब्लॉग मित्र शेखर सुमन हाज़िर है पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के उत्तर के साथ |  


                    महाकवि के रूप में सुविख्यात जयशंकर प्रसाद (१८९० -१९३७) हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अपूर्व ऊँचाइयाँ हैं। काव्य साहित्य में कामायनी बेजोड कृति है। कथा साहित्य के क्षेत्र में भी उनकी देन महत्त्वपूर्ण है। भावना-प्रधान कहानी लिखने वालों में वे अनुपम थे। आपके पाँच कहानी-संग्रह, तीन उपन्यास और लगभग बारह काव्य-ग्रन्थ हैं।
                    इनका जन्म ३० जनवरी १८९० को वाराणसी में हुआ । प्रारम्भिक शिक्षा आठवीं तक किंतु घर पर संस्कृत, अंग्रेज़ी,पालि, प्राकृत भाषाओं का अध्ययन किया। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय  |     
                    छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं । एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात रहे। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन किया। इन्होने अपने ४८ वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं की हैं।
१४ जनवरी १९३७ को वाराणसी में इनका निधन हो गया |
                     आप सभी ने इनकी लिखी कविता अरुण यह मधुमय देश हमारा जरूर पढ़ी होगी...

Friday, December 3, 2010

सुनहरी यादें :- ६

                  इस बार सुनहरी यादों में शामिल है ऋचा जी  की रचना ,जो भेजी है रश्मि प्रभा  जी ने | ये रचना उन्होंने २ नवम्बर २००९ को प्रकाशित की थी |
                  इस सप्ताह की हमारे सर्वश्रेष्ठ पाठिका हैं  रश्मि प्रभा जी  | उनकी भेजी और ऋचा जी की लिखी इस प्यारी सी रचना का शीर्षक है  |


                                                              एक टुकड़ा ज़िन्दगी 
 
            ये ज़िन्दगी भी कितनी "अन्प्रेडिकटेबल" होती है... है ना ? अगले ही पल किसके साथ क्या होने वाला है कुछ नहीं पता... सच कहें तो हमें लगता है |

            ज़िन्दगी का ये "अन्प्रेडिकटेबल" होना इसे और भी खूबसूरत बना देता है... ज़िन्दगी के प्रति एक आकर्षण, एक रोमांच बना रहता है... अगर हमें अपने आने वाले कल के बारे में पता हो तो उसकी चिंता में शायद हम अपने आज को भी ठीक से ना जी पायें...
वैसे भी आज ज़िन्दगी के लिये तमाम सुख सुविधाएं जुटाने की जद्दोजहद में हम अपनी ज़िन्दगी को जीना ही भूल गए हैं, जो हर गुज़रते पल के साथ कम होती जा रही है, हमसे दूर होती जा रही है...  पैसों से खरीदे हुए ये बनावटी साज--सामान हमें सिर्फ़ चंद पलों का आराम दे सकते हैं पर दिल का सुकून नहीं... इसलिए भाग-दौड़ भरी इस ज़िन्दगी से आइये अपने लिये कुछ लम्हें चुरा लें... कुछ सुकून के पल जी लें... उनके साथ जो हमारे अपने हैं... आज हम यहाँ है कल पता नहीं कहाँ हों... आज जो लोग हमारे साथ हैं कल शायद वो साथ हों ना हों और हों भी तो शायद इतनी घनिष्टता हो ना हो... क्या पता... इसीलिए आइये ज़िन्दगी का हर कतरा जी भर के जी लें...
ये ज़िन्दगी हमें बहुत कुछ देती है, रिश्ते-नाते, प्यार-दोस्ती, कुछ हँसी, कुछ आँसू, कुछ सुख और कुछ दुःख... कुल मिलाकर सही मायनों में हर किसी की ज़िन्दगी की यही जमा पूंजी है... ये सुख दुःख का ताना-बाना मिलकर ही हमारी ज़िन्दगी की चादर बुनते हैं, किसी एक के बिना दूसरे की एहमियत का शायद अंदाजा भी ना लग पाए...
अभी हाल ही में हुए जयपुर के हादसे ने हमें सोचने पे मजबूर कर दिया... सोचा कि इस हादसे ने ना जाने कितने लोगों कि ज़िन्दगी अस्त-व्यस्त कर दी, कितने लोगों को इस हादसे ने उनके अपनों से हमेशा हमेशा के लिये जुदा कर दिया और ना जाने कितने लोगों को ये हादसा कभी ना भर सकने वाले ज़ख्म दे गया... पर इस हादसे को बीते अभी चंद दिन ही हुए हैं... आग अभी पूरी तरह बुझी भी नहीं है और ये हादसा अखबारों और न्यूज़ चैनल्स कि सुर्खियों से गुज़रता हुआ अब सिर्फ़ एक छोटी ख़बर बन कर रह गया है... शायद यही ज़िन्दगी है... कभी ना रुकने वाली... वक़्त का हाथ थामे निरंतर आगे बढ़ती रहती है... जो ज़ख्म मिले वो समय के साथ भर जाते हैं और जो खुशियाँ मिलीं वो मीठी यादें बन कर हमेशा ज़हन में ज़िंदा रहती हैं...


ग़म की चिलकन, सुख का मरहम

उदासी के साहिल पे हँसी की इक लहर

कुछ उम्मीदें

कुछ नाकामियां

कुछ हादसे

कुछ हौसले

कभी ख़ुदा बनता इंसान

कभी खुद से परेशान

कभी बच्चों की हँसी में खिलखिलाती मासूमियत

कभी दादी-नानी के चेहरों की झुर्रियां

इन सब में है थोड़ी थोड़ी

इक टुकड़ा ज़िन्दगी

-- ऋचा
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