Friday, February 25, 2011

ममता बनर्जी से मेरी अपील....

========================================================             
आज फेसबुक पर अपना स्टेटस और उसपर कमेन्ट लिखते लिखते लगा कि ये तो एक पोस्ट बन गयी.... तो सोचा यहाँ भी डाल ही दूं.. तो उसमे बिना कुछ जोड़े या घटाए पेश है ये चटपटी पोस्ट....
              मेरे फेसबूकिये दोस्त झेल चुके हैं आप भी झेलिये....
           हमारे पूजनीय नेताओं ने बज़ट सत्र के दौरान कहा कि भारत में भी टूरिस्ट ट्रेन चलनी चाहिए.
अमा यहाँ टूरिस्ट ट्रेन चलानी की ज़रुरत क्या है.. यहाँ तो एक्सप्रेस ट्रेन भी इतनी मस्तानी चाल से चलती हैं कि आप हर स्टेशन की खूबसूरती का मज़ा उठाते हुए अपना सफ़र पूरा कर सकते हैं.
कितनी अजीब बात है, एक तरफ जहाँ विश्व भर में २५०-३५० km की रफ़्तार से रेलगाड़ियाँ दौड़ती हैं वहीँ भारत की सबसे तेज ट्रेन भी बामुश्किल १०० का आंकड़ा छू पाती है.
              केवल ट्रेन की संख्या बढ़ाई जाती है हर बार....कभी गति बढ़ाने के बारे में कोई विचार नहीं होता.... अंग्रेज जैसा छोड़ कर गए थे सब कुछ वैसा ही है...
              आज का रेल बज़ट देखने के बाद ममता बनर्जी से मेरी कुछ गुज़ारिश है....  

१. ममता जी दोमंजिला ट्रेन चला रही हैं... हम तो कहते हैं अपार्टमेन्ट ट्रेन चलायी जाएँ... ताकि लोग अपने बिस्तर और रसोई के साथ सफ़र कर सकें....
२. हरियाणा सड़क परिवहन की तर्ज़ पर ट्रेन को भी हर घर के दरवाज़े से होते हुए पास कराया जाए...
३.बिहार सड़क परिवहन की तरह हर खिड़की के शीशे फोड़ दिए जायें, और सभी सीटों के गद्दे उखाड़ दिए जाएँ...
४.उत्तर प्रदेश बस की तरह देरी होने पर बस ड्राईवर और खलासी(गार्ड) को पीटने की इज़ाज़त दी जाए
५. कोलकाता की बसों की तरह ट्रेन के इंजन भी कम से कम ६० साल पुराने होने चाहिए ताकि उनसे ज्यादा से ज्यादा धुवाँ निकल सके...
६. डीटीसी की बसों की तरह ही ट्रेन को भी किसी को कुचल के आगे बढ़ने की आजादी मिले....
७. पंजाब रोडवेज की तरह ट्रेन ड्राईवर को भी शराब पीकर ट्रेन चलाने की इजाजत दी जाए ताकि गाडी की चाल और मस्तानी हो जाए....
८. बंगाल को इतनी रेलगाड़ियाँ देने के बाद एक ट्रेन आप अपने घर तक भी ले जा सकती हैं....
 =========================================================             Disclaimer :- ये सिर्फ मेरी निजी गुज़ारिश है अगर इससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचती है तो क्षमाप्रार्थी हूँ...
 =========================================================

Friday, February 18, 2011

आतंक के साए में....... राग तेलंग

चश्मा उतारता हूं
धुंधली हो जाती है दुनिया

ऐसा लगता है

बारूदी धुएँ से अटा पड़ा है सब कुछ

चीज़ें साफ़ नज़र नहीं आतीं

जैसे अभी-अभी हुआ है विस्फोट
क्षत-विक्षत लाशें चलती हुईं दिखती हैं

स्त्रियों-बच्चों के भय से स्वर मिलाकर

जो कहना चाहता हूं अटक जाता है गले में ही

बेरहम तंत्र

मेरे सामने जो नोट फेंक जाता है
उसमें से बाहर निकलकर आता है
एक बूढ़ा क्रांतिकारी
झुककर देता है मुझे मेरा चश्मा
कहता है
`सत्यमेव जयते को फिर से पढ़ो और नया कुछ गढ़ो´ ।

.....रचनाकार
            राग तेलंग.. 

         साथ में एक ख़ूबसूरत सी प्रार्थना, आप भी सुनिए...

Tuesday, February 8, 2011

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते ---राही मासूम रज़ा

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते , मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
में बुहत देर तक यूँही चलता रह, तुम बहुत देर तक याद आते रहे।.

ज़हर मिलता रह ज़हर पीते रहे , रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,

ज़िंदगी भी हमे आजमाती रही , और हम भी उसे आजमाते रहे।

ज़ख्म जब भी कोई जहन
-ओ-दिल पे लगा , ज़िंदगी की तरफ एक दरीचा खुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं , चोट खाते रहे गुन-गुनाते रहे।

कल कुछ ऐसा हुआ में बहोत तक गया, इस लिए सुने के भी अनसुनी कर गया,

कितनी यादों के भटके हुआ कारवाँ , दिल के ज़ख्मों के दर खट-खटाते रहे। 

 
सख्त हालात के तेज़ तूफानों, गिर गया था हमारा जुनूने वफ़ा
हम चिराग़े-तमन्ना़ जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे ।। 


                                                                          शायर-- राही मासूम रज़ा ...

साथ में एक प्यारा सा गीत जो मुझे बहुत पसंद है आप भी सुनिए....

Tuesday, February 1, 2011

क्या हमारे सांसद इतने गरीब हैं....The Parliament Canteen...

                     आवश्यक वस्तुओं की महंगाई के इस जमाने में क्या आप 12.50 रुपये में शाकाहारी थाली या 1.50 रुपये में एक कटोरी दाल या एक रुपये में एक रोटी मिलने की कल्पना कर सकते हैं। जी हां संसद भवन की कैंटीन में यह संभव है, भले ही भोजन देश में गरीबों की पहुंच से दूर होता जा रहा है।

                     बढ़ती महंगाई के खिलाफ सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने वाले सांसदों को निश्चित रूप से सस्ता खाना मिलता है। परंतु याद रहे यह सुविधा केवल सांसदों के लिए ही नहीं है। संसद के कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी और मान्यता प्राप्त पत्रकार भी इस सुविधा का लाभ उठाते हैं, वहीं आम आदमी इन कीमतों के बारे में सोच भी नहीं सकता।
                   कीमतों का नमूना तो देखिए-
                   दाल, सब्जी, चार चपाती, चावल या पुलाव, दही और सलाद के साथ शाकाहारी थाली                                 12.50 रुपये
                   मांसाहारी थाली ---    22 रुपये
                   दही चावल  ---       11 रुपये 
                   वेज पुलाव   ---    आठ रुपये, 
                   चिकन बिरयानी--- 34 रुपये,
                   फिश करी,चावल ---13 रुपये,
                   राजमा चावल  ---  सात रुपये, 
                   चिकन करी ---20.50 रुपये
                   चिकन मसाला --24.50 रुपये 
                   बटर चिकन --- 27 रुपये
                   चपाती --- १ रुपये
                   एक प्लेट चावल ---२ रुपये
                   डोसा ----४ रुपये
                   खीर ----- 5.50 रुपये कटोरी
                   छोटा फ्रूट केक ---- 9.50 रुपये
                   फ्रूट सलाद ----७.००रुपये 
                                   ध्यान रहे ये कीमत उन लोगों के लिए है जिनकी महीने की तनख्वाह करीब 5०,०००  रुपये है.... और ये तो सफ़ेद कमाई है, काले धन का तो पता ही नहीं....
                  न जाने ये कैसे विडंबना है | ऐसा नहीं कि ये खबर मीडिया से दूर है लेकिन जो पत्रकार यहाँ खुद छककर भोजन करते हैं वो भला क्यूँ इसे मुख्य खबर बनायेंगे | कैंटीन के कर्मचारी बताते हैं कि हाल ही में ख़त्म हुए शीतकालीन सत्र के दौरान प्रतिदिन यहाँ औसत रूप से ३००० लोगों को दिन का खाना परोसा गया |
                 
                 
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...