Saturday, December 31, 2011

मेरे साथ चलोगी न....

            ये साल बस अब गुज़र ही जाने वाला है, कितना कुछ है लिखने को लेकिन अपने ही शब्दों में उलझ कर रह गया हूँ... ऐसा लगता है जैसे ढेर सारे शब्द इकठ्ठा हो गए हैं और कलम की नीब पर अटक गए हैं...          
             ख्यालों में अजीब सी कम्पन महसूस हो रही है, वो कुछ जो तुम्हारे अपने साथ होने पर महसूस करता हूँ... सच में कभी कभी जी करता है, तुम्हें यहाँ इस भीड़ से कहीं दूर ले चलूँ, एक ऐसे जहाँ की तरफ जहाँ अक्सर तुम मेरे सपनों में आती हो.. एक ऐसी पगडण्डी पर जहाँ तुमने कितनी ही बार बेखयाली में मेरे हाथों में हाथ डालकर मुझे प्यार से देखा है... एक परिधि है जहाँ डूबते सूरज की आखिरी किरण मेरे इस प्यारे से चाँद को देखकर सकुचाते हुए दिन को अलविदा कर देती हैं, और एक हसीं सी शाम मेरे नाम कर जाती हैं... एक ऐसी आजादी है जब कलेंडर की तारीखें नहीं बदलती, जब दिन के गुज़र जाने का अफ़सोस नहीं होता... ये एक ऐसा जहाँ है जहाँ मुझे हमेशा से ही ये यकीन है कि मेरी इस गुज़ारिश का लिहाफ़ ओढ़े हुए एक दिन जरूर मेरे साथ चलोगी...
             कभी कभी अपनी बातों पर खुद ही हंसी आ जाती है, मैं भी न जाने किन ख्यालों में गुम रहने लगा हूँ, लेकिन इन ख्यालों की बेलगाम उड़ान को न जाने कब से तुम्हारी आखों ने कैद कर लिया है... जैसे कुछ और सोचने-समझने की जरूरत ही नहीं हो... तुम्हारा नाम मेरी ज़िन्दगी की किताब के आखिरी हर्फ़ की तरह होता जा रहा है... ज़िन्दगी में अचानक से बहुत से बदलाव आ गए हैं... अपनी खुशियों से संघर्ष करता हुआ मैं न जाने कब से तुम्हारी खिलखिलाहट में सुकून ढूँढने लग पड़ा.... न जाने कब और क्यूँ चांदनी की परछाईं में भी तुम्हारा ही अक्स तलाशने लगा हूँ.... भोर में सूरज की पहली किरण से ज्यादा जब तुम्हारी एक मुस्कराहट का इंतज़ार रहता है... उफ्फ्फ्फ़.... बस जैसे इन्ही छोटी छोटी खुशियों में अपनी ज़िन्दगी बस गयी है... और ऐसे में बंगलौर का ये मौसम, शायद इन हवाओं से होकर गुज़रते हुए मेरी इस गुज़ारिश की चंद बूदें तुम्हारे वजूद पर भी गिर ही गयी होगी न... उन बूदों को संभाल कर रखना, उनमें मेरे बिखरते हुए सपनों का अक्स दिखाई देगा तुम्हें... मैं ये तो नहीं कहता कि तुम्हारे बिना नहीं जी सकूंगा, लेकिन जिस दिन भी तुमसे दूर हो गया उस दिन से हर पल, हर लम्हा बस अपने उस पुनर्जन्म का इंतज़ार रहेगा जब तुम्हारी और मेरी ज़िन्दगी एक ही साथ अठखेलियाँ करेगी...  उस पुकार का इंतज़ार रहेगा, जब अपने इस तार-तार हो चुके वजूद के बंधनों को उतारकर ताउम्र तुम्हारे सपनों को पूरा करने का अधिकार पा लूँगा... 
            सच कहूं तो मुझे डर लग रहा है.. कभी कभी लगता है कि काश तुम आके मेरा हाथ थाम लो, और कह दो कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी... मैं वो इतजार नहीं करना चाहता, जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहूँगा... जाने कितने जन्मों तक अपनी आखों से तुम्हारे इंतज़ार को बहता हुआ देखूँगा...
             कभी मेरे साथ चलना, तुम्हें अपने सपने दिखाऊंगा... वो जो मैंने तुम्हारी यादों को सिरहाने में रखकर देखे थे.. शायद तुम्हें एहसास हो कि तुम्हारे साथ बिताये लम्हों को कितने करीने से संजोते जा रहा हूँ... आगे आने वाले ज़िन्दगी के तन्हा सफ़र में शायद यही लम्हें मेरे साथ होंगे... 
            बस इस जाते हुए साल का शुक्रिया करना चाहता हूँ जिसने मेरे डूबते हुए अस्तित्व को एक बार फिर तुम्हारे होने का एहसास दिला दिया.. मुझे और तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस मुझे ये अधिकार दे दो कि मैं तुम्हें हमेशा खुश रख सकूं... एक सपना, एक गुज़ारिश कि आने वाले सालों और कई ज़न्मों तक तुम मेरे साथ यूँ ही चलती रहोगी, मुस्कुराते हुए, खिलखिलाते हुए... मेरे साथ चलोगी न...

Monday, December 12, 2011

क्यूंकि रद्दी जलाने के लिए ही होती है...

           लिखना कभी भी मेरी प्राथमिकता नहीं रही है, मैं तो ढेर सारे लोगों से मिलना चाहता हूँ, उनसे बातें करना चाहता हूँ...उनके साथ नयी नयी जगहों पर जाना चाहता हूँ.. लेकिन जब कोई आस-पास नहीं होता तो बेबसी में कलम उठानी पड़ती है... ये कागज के टुकड़े जिनपर मैं कुछ भी लिख कर भूल जाता हूँ, मुझे बहुत बेजान दिखाई देते हैं... जब मैं खुश होता हूँ तो वो मेरे गले नहीं मिलते, जब आंसू की बूँदें बिखरना चाहती हैं ये कभी भी मुझे दिलासा नहीं दिलाते... जो कुछ भी लिखता हूँ वो बस मेरा एकालाप है, जिसका मोल तभी तक है जब तक उसको लिख रहा हूँ... उसके बाद वो मेरे किसी काम के नहीं...ऐसा लगता है जैसे डायरी लिखना मेरे लिए ज़िन्दगी से किया गया एक समझौता है... जितनी ही बार कुछ लिखने की कोशिश की है उतनी ही बार खुद की हालत पे रोना आया है... वो ऐसा वक्त होता है जब आसपास तन्हाईयाँ होती हैं, जब सन्नाटे की आवाज़ कानो के परदे फाड़ डालना चाहती है, एक अकेलापन जिससे मैं भागना चाहता हूँ... ऐसे में खुद-ब-खुद कलम हाथ में आ जाती है... उस वक्त मैं अपने हाथ में कागज़ और कलम की छुअन महसूस करता हूँ, शायद कुछ देर के लिए ही सही लेकिन उस एहसास में खुद के अकेलेपन को भूल जाता हूँ...
            अकेला होना या खुद को अकेला महसूस करना इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी ज़िन्दगी में कितने ऐसे दोस्त हैं जो वक्त-बेवक्त आपके पास चले आते हैं और वो सब कुछ जानना चाहते हैं जो कहीं न कहीं कोने में दबा बैठा है... कितने लोग आपकी ज़िन्दगी में वो हक़ जता पाते हैं कि आपकी हर खुशियों को अपने ख़ुशी समझें और हर गम को अपना गम... हर किसी की ज़िन्दगी में कुछ शख्स होते हैं जिनके बस साथ होने से आपको एक सुकून सा महसूस होता है... दोस्ती का रिश्ता सबसे खूबसूरत सा रिश्ता है शायद, जहाँ आप बिना कुछ सोचे बिना किसी झिझक के अपने मन की सारी बातें कर सकते हैं... दोस्ती से ज्यादा वाला रिश्ता तो कोई हो नहीं सकता लेकिन आज की इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में कब दोस्त आगे बढ़ जाते हैं पता ही नहीं चलता... कई बार ऐसा होता है कि जब आप ज़िन्दगी के किसी नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हों और वो दोस्त आपके साथ नहीं होते...
            खैर बात हो रही है इस रद्दी की जो मैं यूँ ही ज़मा करता जा रहा हूँ, बीच बीच में कितनी ही बार इस रद्दी से दिखने वाले पन्नों को ज़ला दिया है मैंने, क्यूंकि ये मुझे किसी काम के नहीं लगते.... वहां से मेरा अतीत झांकता है, एक ऐसा अतीत जहाँ बहुत कम चीजें हैं याद रखने लायक... जो चीजें बीत गयीं उनको क्या याद रखना, उनको क्या पढना... मेरा यूँ रह रह के डायरी जला देना कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता, लेकिन उनको समझाना बहुत मुश्किल है मेरे लिए... मैं यूँ बिखरे हुए अतीत के कचरे के बीच नहीं रह सकता... घुटन होती है, खुद पे गुस्सा आता है... जो बहुत ज्यादा अच्छी या बुरी बातें हैं वो तो पहले ही दिमाग और दिल की जड़ों में चस्प हो गयी हैं... काश वहां से भी निकाल के फेक पाता उन बातों को... 
            मुझे ये डायरी नहीं उन लोगों का साथ चाहिए जिनसे मैं बेइन्तहां  मोहब्बत करता हूँ... अगर हो सके तो मुझे बस वो अपनापन चाहिए जिसके बिना किसी का भी जीना या जीने के बारे में सोचना भी बस एक समझौता है ...
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