Saturday, September 29, 2012

एकांत-रुदन...

ज़िन्दगी में दोस्तों का होना कितना ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी... कोई फोर्मलिटी वाले दोस्त नहीं, दोस्त ऐसे जिन्हें दोस्ती की बातें पता हो... मोनाली की भाषा में कहूं तो "गंवार" (अच्छे लोगों को वैसे भी गंवार ही कहा जाता है आज कल), जिसके लिए दोस्ती कोई समझौता नहीं... एक ऐसी जगह जहाँ जाकर आप अपने दिल की सभी बातें कर सकते हैं... एकदम खुल कर के  बिना मन में ये डर रखे कि कहीं वो किसी बात का कोई गलत मतलब न निकाल ले या फिर किसी और के सामने आपकी बातें डिस्कस न करे (अच्छी या बुरी कोई भी)... मुझे हमेशा से ही ऐसे किसी दोस्त का साथ चाहिए होता है, पता नहीं क्यूँ... शायद मैं कमज़ोर हूँ, खुद को खुद तक समेट कर नहीं रख पाता... हर इंसान की अपनी एक आवाज़ होती है, लेकिन एक अच्छा दोस्त अपने साथ आवाजों का पूरा लश्कर लेकर आता है... लेकिन आज कल आस पास ऐसा कोई भी नहीं दिखता जिससे ढेर सारी बातें कर सकूं... अपने मन की बातें... सब व्यस्त हैं... हालांकि ये उम्र ही ऐसी है, जहाँ मेरे सारे हमउम्र कहीं न कहीं व्यस्त तो होंगे ही...

कल रात बहुत देर तक यूँ ही पार्क में बैठा रहा, आस पास के लोगों को देखता रहा... ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी सड़क के डिवाईडर पर खड़ा हूँ जिसके दोनों तरफ तेज़ी से भागती हुयी गाड़ियां हों और जिसके अन्दर पसरा हुआ सन्नाटा... जैसे कहीं फंस कर रह गया हूँ... वहां खड़े खड़े एक गर्द सी जम जाती है, न जाने कितनी गर्द... जब काफी देर तक किसी से खुल कर बात न करो तो अजीब सी घुटन होने लगती है अन्दर ही अन्दर... जैसे ये अवसाद, ये अकेलापन, ये घुटन, ये आंसू सब एक दूसरे के समानुपाती हो गए हैं...

बस बेवजह ही उदास हुआ जा रहा हूँ, मेरी ये बेवजह की उदासी शायद मेरे अन्दर कहीं न कहीं तह लगाकर बैठ चुकी है... ये एक अवसाद की तरह है मेरे लिए, ऐसे जैसे किसी ने जख्म दिए और उसपर कई सारी जिद्दी मक्खियाँ छोड़ दी हों ... मेरे अन्दर ये किसी अंधे कुवें की तरह उतर आया है.. हर वक़्त एक अजीब सी खलिश, अजीब सा अकेलापन...सच में कभी कभी छुट्टी बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती ऐसा लगता है कोई काम ही नहीं, इससे अच्छा तो ऑफिस ही खुला रहा करे...

ये कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं है ये बस एक रुदन है, एकालाप है... इसे एकालाप ही रहने दें... कमेन्ट बक्सा बंद है क्यूंकि कभी कभी हमदर्दी भी कांच की किरचों की तरह चुभन देती है...

कुछ दिनों पहले ऐसे ही कुछ लिखा था...
वो खामोश रहता था,
ख़ामोशी बहने लगी थी
उसके खून के साथ
उसकी कोशिकाओं में समा गयी थी जैसे....
कभी कभी उसका दिल करता था
अपने हाथ के नाखूनों से
खुरच दे सारा बदन
महसूस करे उस दर्द को
और उस बहते खून के साथ
आज़ाद हो जाए उसकी खामोशियाँ भी....

Wednesday, September 26, 2012

तुम जो नहीं हो तो... आ गए बताओ क्या कर लोगे...

कल रात देवांशु ने पूरे जोश में आकर एक नज़्म डाली अपने ब्लॉग पर, डालने से  पहले हमें पढाया भी, हमने भी हवा दी, कहा मियाँ मस्त है छाप डालो... और तभी से उनकी गुज़ारिश है कि हम उसपर कोई कमेन्ट करें (वैसे सच्चे ब्लॉगर लोग के साथ यही दिक्कत है , उन्हें कमेन्ट भी ढेर सारे चाहिए होते हैं ...) हमें भी लगा, ठीक है चलो साहब की शिकायत दूर किये देते हैं ... कमेन्ट क्या पूरी की पूरी पोस्ट ही लिख मारी ...
ये है उसकी लिखी नज़्म ...
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तुम जो नहीं हो तो...
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चाँद डूबा नहीं है पूरा, थोड़ा बाकी है |

वो जुगनू जो अक्सर रात भर चमकने पर,
सुबह तक थक जाता, रौशनी मंद हो जाती थी,
अभी भी चहक रहा है, बस थोड़ा सुस्त है |


यूँ लगता है जैसे रात पूरी, जग के सोयी है ,
आँख में जगने की नमी है,
दिल में नींद की कमी |
सूरज के आने का सायरन,
अभी एक गौरेया बजाकर गयी है |
अब चाँद बादलों की शाल ओढ़ छुप गया है ,
सो गया हो शायद, थक गया होगा रात भर चलता जो रहा |
मेरी मेज़ पर रखी घड़ी में भी,
सुबह जगने का अलार्म बज चुका है |
गमलों में बालकनी है, डालें उससे लटक रही हैं ,

फूल भी हैं , बस तुम्हारी खुशबू नहीं. महकती ..

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और अब कुछ बातें जो मुझे कहनी है ....
कई सारी बातें हैं जो लेखक (या कवि, जो भी कह लो क्या फर्क पड़ता है... कौन सा उसने नोबेल पुरस्कार मिलने वाला है ...) को बतानी ज़रूरी हैं....
तुम जो नहीं हो तो... (जब नहीं है तो ये हाल है, अच्छा ही है नहीं है.. होता तो ये सब पढ़कर निकल ही लेने में फायदा नज़र आता उसको भी...)
वो जुगनू जो अक्सर रात भर चमकने पर,
सुबह तक थक जाता, रौशनी मंद हो जाती थी,
साला, परेशान तुम हो और उस बेचारे जुगनू को रात भर थकाए दे रहे हो... वो भी सोचता होगा किस आशिक के चक्कर में पड़ गए... हद्द होती है यार.... बेचारा जुगनू.... :-(
यूँ लगता है जैसे रात पूरी, जग के सोयी है ...
बताईये रात को भी जगाकर खुश हो रहे हैं साहब, ज़रा भी नहीं सोचा कि और भी आशिक होंगे जिनको रात को जल्दी से सुला देने में ज्यादा इंटरेस्ट होगा... ऐसे स्वार्थी किस्म के आशिक न खुद भी कुछ नहीं करेंगे दूसरों पर भी रात का पहरा लगा दिया है...
आँख में जगने की नमी है,
दिल में नींद की कमी..

ये तो हमको हार्डवेयर प्रॉब्लम लगता है, देखो बेटा हमारी बात मानो तो हमारे घर के पास एक होम्योपैथी का बहुत अच्छा क्लिनिक है वहां तुमको दिखवाये देते हैं... गंभीर बीमारी लगती है...
सूरज के आने का सायरन,
अभी एक गौरेया बजाकर गयी है..

अबे रात के पौने ग्यारह बजे की पोस्ट में तुमको कौन सा सूरज सायरन दे रहा है, भारी घनघोर समस्या है, हमारे ख्याल से तो तुमको अगल बगल के पडोसी गाली दे रहे हैं, अरे इतनी देर से रात को जगाकर रखा है... और भगवान् के लिए कौवे को गौरैया मत समझा करो यार... :-(
अब चाँद बादलों की शाल ओढ़ छुप गया है ,
सो गया हो शायद, थक गया होगा रात भर चलता जो रहा..

अबे दुनिया की ऐसी कोई चीज छोड़ी भी, शाल ओढ़ कर छुप गया है, और नहीं तो क्या... छुपे नहीं तो क्या करे बेचारा... देखो बेटा बाकी सब तो ठीक है, लेकिन चाँद को यूँ परेशान मत किया करो बहुत लोगों की बददुआ लगने का खतरा है... क्यूंकि बच्चों के लिए वो मामा है, शादीशुदा स्त्रियाँ उसी चाँद को देखकर करवाचौथ का व्रत तोडती है (और देखो न करवाचौथ आने भी तो वाला है..) और प्रेमियों के लिए तो चाँद सब कुछ है.. तो बच के ही रहो...
मेरी मेज़ पर रखी घड़ी में भी,
सुबह जगने का अलार्म बज चुका है..

हाँ सही है अब जाग जाओ और दफ्तर को निकलो... खुद तो वेल्ले बैठे रहेंगे और दुनिया को भी परेशान करते रहेंगे... हुह्ह्ह्ह...
गमलों में बालकनी है, डालें उससे लटक रही हैं ,
फूल भी हैं , बस तुम्हारी खुशबू नहीं महकती ...
गमलों में बालकनी ??? फूलों से तुम्हारी (किसकी) खुशबू ??? लो जी अब तो प्रॉब्लम सोफ्टवेयर तक पहुँच चुकी है... जितनी जल्दी हो सके आगरे का रुख करो...
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ये पोस्ट सिर्फ इसलिए ताकि लोग इसी तरह नज़्म लिखते रहे और उनकी सप्रसंग व्याख्या के साथ साथ हमारे ब्लॉग का भी दाना पानी चलता रहे... :) मुझे पता है देवांशु माईंड नहीं करेगा क्यूंकि उसके लिए उसको घुटनों पर जोर डाल डाल के माईंड खोजना पड़ेगा और वो तो मिलने से रहा... कसम से....

Friday, September 21, 2012

प्यार एक सफ़र है, और सफ़र चलता रहता है...

पार्क में बैठना कितना सुकून देता है, बस थोड़ी देर ही सही... मुझे भी अच्छा लगता है बस यूँ ही बैठे रहो और आस-पास देखते रहो... कई तरह के लोग... हर किसी की आखों से कुछ न कुछ झांकता रहता है... ढलती हुयी शाम है, हल्के हल्के बादल है... ठंडी हवा चल रही है... पास वाली बेंच पर कई बुज़ुर्ग आपस में कुछ बातें कर रहे हैं... ऊपर से तो वो मुस्कुरा रहे हैं लेकिन उनकी आखें सुनसान हैं... उस सन्नाटे को शायद शब्दों में उतारना मुमकिन न हो सके.... उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर सभी के जहन में "क्या खोया-क्या पाया...." जैसा कुछ ज़रूर चलता होगा... कितनों के चेहरे पर इक इंतज़ार सा दिखता है... इंतज़ार उस आखिरी मोड़ का... जहाँ के बाद क्या है किसी ने नहीं देखा... किसी ने नहीं जाना...
उसकी ठीक दूसरी तरफ प्ले ग्राउंड में कुछ बच्चे खेल रहे हैं, उनकी दुनिया में कोई परेशानी नहीं है...परेशानियां है भी तो कितनी प्यारी-प्यारी सी... किसी की बॉल किसी दूसरे बच्चे ने ले ली, किसी के पैरों में थोडा सा कीचड लग गया... किसी को आईसक्रीम खानी है... उन छोटे छोटे बच्चों के आस-पास ही तो ज़िन्दगी है... ज़िन्दगी उन्हें दुलार रही है, उन्हें संवार रही है... उन बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी ज़िन्दगी ढूँढ़ते रहते हैं... उनको खेलते हुए देखकर मेरे चेहरे पर बरबस ही मुस्कराहट की कई सारी रेखाएं उभर आती हैं....

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सामने की तरफ देखता हूँ तो एक प्रेमी जोड़ा हाथों में हाथ डाले धीमे धीमे टहल रहा है... उन्हें लगता है यूँ धीमे चलने से वक़्त भी धीमा हो जायेगा... लेकिन ये तो उसी रफ़्तार से चलता है... वो बड़े प्यार से एक दूसरे की आखों को देख रहे हैं... अपनी अपनी निजी परेशानियों को थोड़ी देर के लिए भूलकर बस एक दूसरे का साथ इंजॉय कर रहे हैं शायद... दोनों में से कोई कुछ नहीं कह रहा है... या फिर ये वो भाषा है जो मैं नहीं सुन सकता... इन खामोशियों के कोई अलफ़ाज़ भी तो नहीं होते... वो बिना कुछ कहे ही हर कुछ सुन सकते हैं, हर कुछ महसूस कर सकते हैं... इस लम्हें को कोई भी चित्रकार या फोटोग्राफर कैद करना चाहेगा... बादल आसमान को धीरे धीरे ढकते जा रहे हैं... हलकी-हलकी बारिश शुरू हो गयी है.... लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं... वो तो कब के प्यार की बारिश को महसूस कर रहे हैं... बादल गरजने की ज्यादा आवाज़ तो नहीं महसूस की लेकिन बिजली का चमकना साफ़ दिख गया अँधेरे में.... अचानक से बारिश तेज़ हो गयी है... बारिश... उफ्फ्फ क्यूँ होती है ये बारिश... पार्क की सारी बेंच गीली हो गयी हैं... मैं अपनी छतरी निकाल कर अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगता हूँ... वो अब भी एक दूसरे का हाथ पकडे एक शेड के नीचे खड़े बारिश के थमने का इंतज़ार कर रहे हैं..

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पार्क की एक बेंच पर बैठा आसमान से बातें कर रहा हूँ कि, दो बेंच छोड़कर बैठे दो थोड़े जाने पहचाने चेहरे दिखे.. पिछली बार की ही तरह कोई कुछ नहीं बोल रहा.. एक लम्बी चुप्पी के बाद लड़की ने कुछ कहा, लड़के ने हामी में सर हिला दिया है... और फिर खामोशियाँ बातें करने लगीं... प्यार करने वालों को देखकर अच्छा लगता है... वैसे भी इस भाग दौड़ में यूँ फुरसत के पल कितने कम रह गए हैं... शुक्र है प्यार के इस रास्ते में दोराहे नहीं होते... इंसान उस साथ को जीता रहता है और खुश रहता है... आज मौसम ठीक है लेकिन मुझे कुछ काम है, मैं पार्क के गेट से बाहर निकलते हुए एक बार पलट कर देखता हूँ... वो दोनों अब भी खामोश हैं... वो शाम बहुत मुलायम सी थी और वो दोनों इसे ओढ़कर बड़े प्यार से बैठे थे....

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आज काफी दिनों बाद पार्क आया हूँ, पर सब कुछ पुराना पुराना सा है... वैसे भी चीजें कहाँ बदलती हैं उन्हें देखने का नजरिया बदलता जाता है... बदलना भी एक अजीब शय है, मैं कभी कभी मज़ाक में अंशु से पूछता हूँ कि पिछले १ साल में तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या क्या बदला, तो वो खिलखिला कर जवाब देती है "तुम जो आ गए..."  और ऐसा कह कर अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया करती है... उस समय उसकी आखों में अजीब सी चमक होती है... फिर मैं ग़र पूछूं कि मेरे अलावा क्या बदला... फिर वो बोलती है "छोडो न कुछ भी बदला हो मुझे क्या.. बदलने दो जो भी बदलता है..." इन्हीं ख्यालों में खोया खोया मैं यूँ ही मुस्कुरा रहा हूँ... तभी मेरी नज़र एक लड़के पर पड़ी, वही जिसे मैं नहीं जानते हुए भी जानता हूँ... वो आज अकेला है, शायद इंतज़ार कर रहा हो उस लड़की का.... लेकिन आखों में इंतज़ार की कोई झलक नहीं... वो सूनी आखों से पास के गमले की मिटटी को देख रहा है... काफी देर तक कोई हलचल नहीं... उसका अकेलापन मुझे परेशान कर रहा है... मन में कई तरह के प्रश्न घुमड़ रहे हैं.. फिर भी बिना उससे कुछ कहे वहां से उठ जाता हूँ...

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पता नहीं क्यूँ आज उस निश्चित समय पर मैं पार्क आने के लिए बहुत बेचैन हूँ... तेज़ क़दमों से मैंने पार्क के अन्दर कदम रखा, फिर घडी की तरफ निगाह डाली तो आज शायद थोडा पहले आ गया... मैंने इधर उधर निगाह दौड़ाई और एक खाली बेंच पर बैठ गया... नज़र पार्क के गेट पर टिकी हुयी है, भला किसका इंतज़ार है मुझे और क्यूँ... वो लड़का आता हुआ दिख रहा है, लेकिन वो आज भी अकेला है... वो आकर अपनी उसी पूर्वनिर्धारित बेंच पर बैठ गया है... थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद मुझसे रहा नहीं जाता और मैंने उसकी तरफ कदम बढ़ा दिए हैं... मैं उसको जाकर हेलो करता हूँ... वो थोड़ी अजीब सी प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखता है..
मे आई सिट हियर ???
या स्योर...
डु यू नो हिंदी .. ? (बंगलौर में ऐसा पूछना पड़ता है....)
हाँ.. (इसका जवाब हाँ में होना ज़रूरी था नहीं तो बाकी की पोस्ट इंग्लिश में हो जाती...)
फिर मैं उसको वो बातें बताता हूँ जो मैंने ओबजर्व की थीं... मेरी बातें सुनते सुनते उसकी आखें और सूनी होती जा रही हैं ... वो इसका कोई जवाब नहीं देता, उठ कर जाने लगता है ...
क्या हुआ ??
कुछ नहीं... मेरी ट्रेन है आज रात को, मैं ये शहर छोड़ कर जा रहा हूँ ....
फिर शायद उसे मेरी आखों में उभर आये ढेर सारे प्रश्न दिखने लग गए... काफी सोच कर रूंधे गले से उसने कहा..
कल रात उसकी शादी हो गयी, उसके पापा हमारी शादी को तैयार नहीं थे... और बिना उनकी मर्ज़ी के वो तैयार नहीं थी...
फिर काफी देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा, मेरे पास उसे कहने के लिए कुछ नहीं था... थोड़ी देर बाद उसने खुद कहा...
इस शहर ने हमें बहुत कुछ दिया.. हम यहीं मिले, यहीं दोस्त बने और फिर यहीं प्यार भी हो गया... आज जब वो मेरे साथ नहीं है तो इस शहर को यूँ ही छोड़ कर जा रहा हूँ, मैं नहीं चाहता कि इस शहर को मैं उदास निगाहों से कभी देखूं... चाहता हूँ पार्क की इस बेंच पर फिर कोई प्यार करने वाले बैठे, यहाँ अपनी उदासी का रंग नहीं बिखेरना चाहता... इस शहर को अपनी तन्हाई से दूर रखना चाहता हूँ... ताकि कल अगर इस शहर को कभी याद करूँ तो बस अच्छी अच्छी यादें ही मिलें... हमें साथ में जितना वक़्त भी भगवान् ने दिया बस उन्ही लम्हों को समेटे एक नए सफ़र पर निकल रहा हूँ... जानता हूँ उतना आसान नहीं होगा मेरे लिए, लेकिन उतना आसान आखिर दुनिया में है भी क्या भला... ये आखिरी इम्तहान भी देना ज़रूरी है न अपने प्यार को निभाने के लिए... ताकि अगर इस इम्तहान में पास हो गया तो फिर अगले जन्म में उसके साथ हमेशा हमेशा रह सकूं....
वो जा रहा है, मैं चाह कर भी कुछ न बोल सका...
बारिश धीमे धीमे अपनी बूँदें धरती पर फैला रही है... पहली बार मिटटी की सोंधी खुशबू मुझे अच्छी नहीं लग रही... आस-पास का माहौल नम हो गया है, सडकें धुंधली दिखने लगी हैं... छतरी होते हुए भी मैं नहीं खोल रहा और भारी कदमो से पार्क से बाहर निकल रहा हूँ, पलट कर देखता हूँ तो एक प्रेमी जोड़ा एक दूसरे का हाथ पकडे उसी शेड के नीचे खड़े बारिश के थमने का इंतज़ार कर रहा है... सच में प्यार जितनी देर भी रहता है हम बस उसी में रहते है... ये सफ़र चलता रहता है और साथ साथ हमारी ज़िन्दगी भी ...

Wednesday, September 12, 2012

चाय का दूसरा कप... (2)

पिछली पोस्ट को पढने के बाद पता नहीं आपको इस किताब ने कितना आकर्षित किया होगा लेकिन मुझे इस किताब को पढ़ते पढ़ते कई बार ये ख्याल आया कि कैसा लगेगा अगर कोई ऐसा जिसके साथ आप हर रोज अपने कई सारे लम्हें जीते हों वो अचानक से कहीं ओझल हो जाए... और अगर वो आपको कोई अपना हो, सोच के ही मन में एक रुदन सा होने लगता है... एक एकाकी पिता के लिए उनके दोस्त जैसे बेटे का लापता हो जाना ... हर बार देवदत्त उसे लापता मानने से इनकार कर देते हैं, क्यूंकि गुमशुदा केतन नहीं वो खुद हो गए हैं उसकी स्मृतियों के बीच... उनके हिसाब से वो लौट आएगा थोड़े वक़्त के बाद... लेकिन तब तक का इंतज़ार देवदत्त जी नहीं पा रहे हैं... उनके हर उस लम्हें में घुट घुट कर जो बेबसी के कांटे उभरते हैं उनको सीधे साफ़ सटीक शब्दों में उतारने में सफल हुए हैं ज्ञानप्रकाश विवेक ...
बहुत दिन पहले देवदत्त बड़ी उम्मीद, भरोसे और विश्वास के साथ पुलिस स्टेशन गए थे, गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने... क्या हश्र हुआ था उनका ? जैसे अपना वजूद गुम कर आये हों... रास्ते में वो ऐसे चलते रहे जैसे बिना पैरों का आदमी... वो चलते रहे.... उनके भीतर कोई खलिश रेंगती रही...पुलिस स्टेशन का ठस्स माहौल उनके पीछे पीछे चलता आया.. वो घबराते रहे.. सोचते रहे-- ऐसा लगता था, वहां इंसान नहीं लोहे के आदमी बैठे है.. ऐसे लोहे के आदमी जो दूसरों के दुःख को भी मखौल में बदल देते हैं... 
          दिन भर देवदत्त सड़कों पर इधर उधर भटककर घर पहुँचते हैं हालांकि वो आना नहीं चाहते... लेकिन उनके बेबस पैर आखिर जाएँ भी तो जाएँ कहाँ... घर पहुंचकर भी उन्हें कुछ समझ नहीं आता तो वो चुपचाप केतन के दरवाजे के पास जाकर खड़े हो जाते हैं, बस टकटकी लगाकर उस दरवाज़े को देखते रहते हैं जैसे अभी केतन उस दरवाज़े से निकल कर उनकी तरफ हाथ बढ़ा देगा... फिर यूँ ही उभें चाय पीने का ख़याल आता है.. वो चाय का कप उठाते हैं, फिर कहीं खो से जाते हैं..
बेजान चीजें कई बार कितना तंग करती हैं। जैसे जिंदा होकर सामने आ बैठी हों आपसे जिरह करती हुईं। जैसे कि यह कप, जो देवदत्त के हाथ में है, जिस पर ‘डैड’ लिखा है अंग्रेजी में। इसे केतन लाया था, देवदत्त के बर्थडे पर। पापा के लिए वह महंगे गिफ्ट खरीदता था। एक बार उसकी जेब में पैसे कम थे। उसने इस कप को गिफ्ट के रूप में देवदत्त को पेश किया। देवदत्त खुश हो गया। उन्होंने केतन से हाथ मिलाया। दोस्त हाथ मिलाता है, देवदत्त को याद है। उस दिन केतन ने चाय बनाई। इसी नए कप में, जिस पर डैड लिखा हुआ था, चाय डालकर पापा के सामने, मेज पर कप रखते हुए कहा था, ‘पापा, आप इस कप में चाय पीयेंगे तो मुझे लगेगा यह मेरा मामूली-सा गिफ्ट बहुत बड़ी चीज हो गया है।’ 
एक पिता की खोए हुए बेटे के लिए लाचारी, बेकरारी, यहां बहुत कुछ कह देती है। काव्यात्मक अभिव्यक्ति, बोलचाल की आम शब्दावली, ज्ञानप्रकाश विवेक का नैरेटर के रूप में मिजाज यहां मन मोह लेता है... वक़्त धीरे धीरे बीतता जाता है, हर रोज सुबह देवदत्त इसी उम्मीद में जागते हैं कि शायद आज केतन वापस आ जाये.. हर रोज़ उसके कमरे का दरवाज़ा नॉक करके पूछते हैं "मे आई कम इन".. जबकि वो जानते हैं इसका कोई जवाब नहीं आएगा, फिर भी वो पूछते हैं... हर रोज उसका बिस्तर साफ़ करते हैं, पहले से ही करीने से सजाये कमरे को फिर साफ़ करते हैं ताकि वो जब भी आये उसे कमरा चकाचक मिले...
रैक में रखे केतन के नए जूते उठाकर सूंघने लगे हैं देवदत्त... कोई जूते भी सूंघता है किसी के भला... केतन पुराने जूते पहनकर चला गया, नये जूते छोड़ गया। देवदत्त केतन की गंध को महसूस करना चाहते हैं। चाहे वह पैरों की गंध हो या पसीने की...  कोई शख्स न हो तो.. उसके न होने की भी गंध होती है। देवदत्त शायद उसी गंध को महसूस कर रहे हैं...
हर लम्हें इसी तरह से गुज़रते हैं... इसी इंतज़ार के इर्द-गिर्द कहानी आगे चलती है... देवदत्त जब भी चाय बनाते हैं, दो कप बनाते हैं... कहीं चाय पीते पीते ही केतन आ गया तो... कभी बाहर भी चाय पीते हैं तो दो कप बनवाते हैं... एक कप उठाकर वो पीते रहते हैं और दूसरा कप वहीँ साईड में पड़ा रहता है... केतन के इंतज़ार में रहता है वो "चाय का दूसरा कप" ...

पहली बार किसी किताब के बारे में लिखा... उम्मीद है आपको पोस्ट अच्छी लगी होगी और ये किताब ज़रूर पढ़ें , किताब भी अच्छी लगेगी ...

  • पुस्तक : चाय का दूसरा कप (उपन्यास) 
  • लेखक : ज्ञानप्रकाश विवेक 
  • मूल्य : रुपये : 150/-.

Sunday, September 9, 2012

चाय का दूसरा कप... (1)

कई दिनों से कोई किताब पढने का सोचते सोचते, आखिर इस वीकेंड में चार किताबें खरीद लाया...
१. कव्वे और काला पानी- निर्मल वर्मा
२. रात का रिपोर्टर- निर्मल वर्मा
३. गृहदाह- शरतचंद्र 
४. चाय का दूसरा कप- ज्ञानप्रकाश विवेक

जो भी किताबों के शौक़ीन हैं अधिकाँश लोगों ने पहली तीन किताबें ज़रूर पढ़ी होंगी... हाँ चौथी किताब थोड़ी नयी है बहुतों के नज़र के सामने से न गुजरी होगी... अभी कुछ दिनों पहले दैनिक ट्रिब्यून में इस किताब का रिव्यू पढ़ा तभी से पढने का मन कर गया.... ट्रिब्यून के अनुसार "देवदत्त और उनके खोए बेटे केतन का वियोग समझाती, धुआं छोड़ती, टीस को गहराती, अपने और आसपास के माहौल को जिंदा बनाती-बताती कहानी है उपन्यास ‘चाय का दूसरा कप' ..."
बस उसी किताब के थोड़े अंश अपनी नज़र से लिखने की कोशिश कर रहा हूँ...
ये उपन्यास पिता-पुत्र के रिश्तों के गलियारों में टहलते हुए कई बार आपके अन्दर तक उतर जाने का माद्दा रखता है...
कहानी शुरू होती है पिता (देवदत्त) के खालीपन से... उनका इस दुनिया में कोई भी नहीं एक पुत्र के सिवा और वो भी ७ दिनों से लापता है.... वो चलते चलते ठिठक जाते हैं, जैसे किसी ने आवाज़ दी हो...
वो पलटकर देखते हैं.. कुछ इस अंदाज़ से जैसे आवाज़ के चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रहे हों... आवाजें.... इतनी सारी आवाजें.... आवाजों का बीहड़.... लेकिन वो आवाज़ जो उन तक पहुंची थी, कहीं नज़र नहीं आती ... दूर तक कोई जानी पहचानी शक्सियत भी नज़र नहीं आती, की जिसने आवाज़ दी हो... शायद आवाज़ किसी ने भी नहीं दी.. शायद वहम हो... शायद कोई लावारिस या भटकी हुई आवाज़ उनके सामने आ गिरी हो... किसी लहू-लुहान अदृश्य परिंदे की तरह.... वो जानते हैं उन्हें आवाज़ देने वाला कोई नहीं.. फिर भी वो चलते चलते कोई सगी सी आवाज़ सुन लेते हैं.... पराई दुनिया में सगी सी आवाज़, जो होती नहीं.... होने का भ्रम रचती है....
मैं भी ये पंक्तियाँ पढ़ते पढ़ते उसी एकाकीपन में उतर जाता हूँ, सच में कैसा लगता होगा देवदत्त को, जब वो यूँ अकेले खोये खोये सड़क पर चल रहे होते हैं... चलते चलते वो बाज़ार से होकर गुज़रते हैं... बाज़ार जहाँ से उन्हें कुछ नहीं खरीदना... न खरीदने वाला मनुष्य, बाज़ार के लिए किसी कूड़ेदान की तरह होता है... सड़क के किनारे लगे मोबाईल कंपनी के बैनरों को देखकर उन्हें याद आता है किसी से बात किये उन्हें कितने दिन गुज़र गए हैं...
ख़ामोशी की कितनी तहें ज़म चुकी हैं उनके अन्दर... जैसे ख़ामोशी का कोई थान हो-- तहाकर रखा गया थान... ख़ामोशी का थान... किसी के साथ न बोलना, अपने अन्दर के बहुत सारे विस्फोटों को सुनने जैसा होता है...
आज केतन के लापता हुए ८ दिन गुज़र गए हैं... देवदत्त बिखरना नहीं चाहते, उम्मीद और संशय के बीच, एक ज़र्ज़र सी खुशफहमी लिए, केतन के घर आने की आस में इधर उधर भटकते हैं...
केतन के लौट आने की जिस बेताबी के साथ देवदत्त प्रतीक्षा करते हैं, वो मारक सिद्ध होती है उनके लिए... देवदत्त इन आठ दिनों में कितने बदल गए हैं... वो इंसान नहीं लगते, कोई पिरामिड लगते हैं--हज़ारों साल पुराना पिरामिड--चुपज़दा पिरामिड ! अपने अन्दर, अकेलेपन की अजीब सी गंध और उदासी की बेतरतीब लिपियों को समेटे हुए एक पिरामिड... जैसे चल न रहा हो रेंग रहा हो... अपने समय की वर्तमानता से पिछड़ा हुआ, डरा हुआ पिरामिड.... देवदत्त...
इसी तरह के ज़ज्बातों से लिपटी हुई कहानी आगे बढती है, लगभग आधा उपन्यास ख़त्म कर चुका हूँ... कहानी में भले ही कोई रोमांच न हो लेकिन कहानी एकदम अन्दर दिल में उतरकर चहलकदमी करती है... कई बार आखों के कोर नम हो जाते हैं... एक पिता के आस पास पसरा ये एकांत.... उफ्फ्फ्फ़...
खैर मैं पढता रहूँगा और आगे की बातें बताता रहूँगा... तबतक अगर हो सके तो आप भी लीजिये "चाय का दूसरा कप"... और बताईये कैसी लगी ये किताब....
आगे की बातें अगली पोस्ट में...

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