Wednesday, November 13, 2013

मैं उसका शहर छोड़ आया था...

कभी जब छुट्टियों में
लौटता हूँ उस शहर को
तो वो नुक्कड़ मुझे
बेबस निगाहों से
ताक लिया करता है...
उस पुरानी इमारत पर
पड़ चुकी काई 
मुझे देख फिसल सी जाती है,
वो गलियां अब मुरझा गयी हैं
वो खिड़की भी अब
अधखुली सी ऊँघती रहती है...
दिल करता है कभी
पूछूँ इस खस्ता सी चाँदनी से
क्या अब भी हर शाम
वो खिड़की खुलती है...
क्या झाँकता है कोई
अब भी उस खिड़की से...

 

14 comments:

  1. अबे आखिर का दु लाइन काहे खा गए हो लिखने में .............आवाज त एकदम रेडियो जाकी जईसन लगा बे :)

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    1. ओहह !!! गलती हो गया भैया, दरअसल लिखने समय वो नहीं लिखा था लेकिन रिकॉर्ड करते समय बोल दिया.... अभी जोड़े देता हूँ....

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  2. अरे वाह! ..... कर ही लिया आखिर .... धन्य हुई मैं ... :-P

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  3. अच्छा है!! जिसे पढते थे उसकी आवाज़ सुनना अपने आप में एक एक्सपीरिएंस है!!
    म्यूजिक ज़रा लाउड है!!

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  4. कल 15/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया यशवंत भाई.... :)

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  5. मज़ा आया सुन के ... और हां जरूर झांकता होगा खिड़की से कोई ...

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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  7. वाह गुलज़ार साहब!!!
    बहुत बढ़िया.....
    लिखा भी सुन्दर...पढ़ा और भी सुन्दर.....
    टाइपिंग एरर ठीक कर लो...फिसल "सी" जाती है...
    :-)
    (और हाँ...खिड़की से कोई नहीं झांकता...वो भी तो तुम्हारे शहर चली आयी थी तुम्हारे पीछे पीछे.....)
    सस्नेह
    अनु

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    1. क्या कहूँ.... वो खिड़की तो कब की बंद हो गयी हमेशा के लिए और न ही कोई कोई मेरे पीछे आया... खैर, थैंक यू.... :)

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    2. वैसे संतोष जी के कमेन्ट पर गौर कर लिया जाये.... :)

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  8. बहुत सुन्दर कविता। खिड़कियों का खुलना बंद नहीं होता, हाँ मकान बदल जाते है।

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  9. आज पहली बार आपकी आवाज़ सुनी. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति.
    ये ऑडियो कैसे लिंक करते है? क्या आप बता सकते है, मुझे?

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    1. This comment has been removed by the author.

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