Tuesday, October 14, 2014

कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

चाहे जेठ की दुपहरी हो
या फिर पूस की रात
सावन की बारिश में भीगते हुये भी
इंतज़ार बैठा रहता था
ओसारे पर, दरख्तों पर ,

एक झलक माँ की,
लौटा देती थी हलक में जान फिर से...

कई त्योहार आते हैं-बीत जाते हैं,
कुछ पल देते हैं याद रखने को
और दिये जाते है साल भर का इंतज़ार....

तुमसे मिलना भी
अब बस एक त्योहार ही है माँ
साल में एक बार ही आता है,
कुछ देर ही ठहरता है, ज्यादा देर नहीं....

इन सादे लफ्जों में,
कुछ-एक त्योहार और मांगता हूँ,
कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

Monday, October 13, 2014

इस तन्हा शाम का विलोम तुम हो...

इन पेचीदा दिनों के बीच,
आजकल बिना खबर किए ही
अचानक से सूरज ढल जाता है,
नारंगी आसमां भी बेरंग पड़ा है इन दिनों...

इन पतली पगडंडी सी शामों में
जब भी छू जाती है तुम्हारी याद
मैं दूर छिटक कर खड़ा हो जाता हूँ...
क्या करूँ
तुम्हारे यहाँ न होने का एहसास
ऐसा ही है जैसे,
खुल गयी हो नींद
केवल बारह मिनट की झपकी के बाद,
इस बारह मिनट में मैं
तीन रेगिस्तान पार कर आता हूँ,
रेगिस्तान भी कमबख्त
पानी के रंग का दिखता है...

तुम्हारी याद भी एक जादू है,
उन नीले रेगिस्तानों में
मटमैले रंग के बादल चलते हैं....

इससे पहले कि इसे  पढ़ कर
तुम मुझे बावरा मान लो,
चलो इस शाम का
विलोम निकाल कर देख लेते हैं,

इस बारह मिनट की झपकी के बदले
तुम्हारी गोद में मिले सुकून की नींद
जहां बह रहे हैं
ये तीन नीले रेगिस्तान
वहाँ झील हो तुम्हारे आँखों की
और इन मटमैले बादलों के बदले
तुम्हारी उन काली ज़ुल्फों का घेरा हो...

इस तन्हा शाम का विलोम बस तुम हो...
आ जाओ कि,
ज़िंदगी फिर उसी लम्हे से शुरू करनी है
जहां तुम इसे छोड़ कर चली गयी हो...

अब ये मत कहना कि
ये नज़्म मुकम्मल नहीं,
आखिर तुम्हारे बिना कुछ भी
पूरा कहाँ हो पाया है आज तक....

Sunday, October 12, 2014

याद तुम्हारी रुकी हुयी है...

कागज़ के उस मुड़े-तुड़े पन्ने पर
याद तुम्हारी रुकी हुयी है....

न तुमसे मोहब्बत है,
न ही कोई गिला रहा अब,
फिर भी न जाने क्यूँ
नमी तुम्हारे नाम की अब भी
मेरी आखों में रुकी हुयी है....

कुछ दरका, कुछ टूटा जैसे 
दिल का जैसे सुकून गया था,
माज़ी की उस मैली चादर पे
खुशबू उस शाम की अब भी
इन साँसो पे रुकी हुयी है...

जलाए कितने पन्ने
अपनी कहानियों के लेकिन,
वो कसक तेरे अब न होने की,
कितनी नज़मों मे रुकी हुयी है...

कागज़ के उस मुड़े-तुड़े पन्ने पर
याद तुम्हारी रुकी हुयी है....


Saturday, October 11, 2014

मेरी लंबी उम्र के लिए हमारा प्यार ही काफी होगा....

आज करवाचौथ पर फेसबुक पर तरह-तरह के स्टेटस देखे, कुछ बेहद कड़वे कुछ प्यार में पूरी तरह से डूबे हुये, किसी भी इस तरह के स्टेटस पर अपनी राय देने से बचा... जब भी इस तरह का कोई भी पर्व आता है अजीब तरह की कशमकश होती है...
इस बाजारवाद को अगर एक किनारे कर भी दें लेकिन एक बात तय है कि अगर कोई मेरी सलामती के लिए एक पूरा दिन भूखे रहने का निर्णय ले तो मेरे लिए इससे बड़ी दुख की बात और कुछ नहीं हो सकती...
हालांकि माँ हर साल जीतिया के नाम पर ये करती आई हैं, लेकिन चूंकि उनका विरोध कर सकूँ उतना सामर्थ्य नहीं है और मैं अकेला भाई भी नहीं कि ऐसे कह दूँ... माँ साफ साफ ये कह के निकल जाएंगी कि केवल तुम्हारे लिए थोड़े ही रखा है....
लेकिन इतनी बात पक्की है कि शादी के बाद अगर मेरी पत्नी ये कहे कि उसे मेरी लंबी उम्र लिए भूखे रहना है तो इसका विरोध मैं ज़रूर करूंगा... उम्मीद करूंगा ऐसा कोई दिन न आए और हम स्वेच्छा से इस नौटंकी से दूर रह सकें... 3 महीने पहले हुयी Prashant Priyadarshi भैया की शादी के बाद जब आज वहाँ करवाचौथ का Boycott हुआ तो उम्मीद जगी हम इन नौटंकियों से आज़ाद होंगे कभी न कभी....
काश आने वाले समय मैं उसे ये समझा सकूँ कि यकीन मानो मेरी लंबी उम्र के लिए सिर्फ हमारा प्यार ही काफी है, किसी को भूखे रहने की कोई ज़रूरत नहीं... अगर मेरी लंबी उम्र चाहती ही हो तो चलो मिल कर कुछ अच्छा खाने का बनाते हैं और साथ मिल कर खाते हैं..
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