Tuesday, June 23, 2015

स्मोकिंग किल्स एंड सो डज दिस सोसाइटी...

लिखना न लिखना अक्सर मूड स्विंग पर निर्भर करता है, और थोड़ा बहुत वक़्त की उपलब्धता पर भी... लेकिन पिछले कुछ दिनों से ज़िंदगी के कई पहलू से गुजरते हुये आज वाकई निराश हूँ, इसलिए नहीं कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा नहीं हो रहा, हम ऐसा कह भी नहीं सकते क्यूंकी शायद जब अच्छा हो रहा हो तो हम इसकी खुमारी में इतना खोए रहते हैं कि वो वक़्त कब गुज़र जाता है पता भी नहीं चलता...

ये निराशा या उदासी जो भी कह लूँ दरअसल इस बात पर ज्यादा है कि जो हो रहा है उसपर मेरा ज़ोर न के बराबर है, मैं चाह कर भी कुछ नहीं सकता सिवाय इस बात को लेकर रोने के कि ज़िंदगी के इम्तहान खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे... मुझे नहीं पता कि ज़िंदगी में इतना निराश और अकेला पिछली बार कब हुआ था, शायद तब जब तुम मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी... 

दुनिया से लड़ने की हिम्मत में मेरे अंदर कभी कमी ज़रूर रही हो लेकिन मैं किसी न किसी तरीके से वहाँ हमेशा पहुँच गया जहां पहुँचना चाहता था.... शायद इस बार भी पहुँच जाऊंगा, लेकिन हर बार इस लड़ाई में मेरा कितना वक़्त यूं ही जाया हो गया... ज़िंदगी की इस भाग दौड़ में अब मैं इतना समय भी नहीं निकाल पाता कि, ढंग से रुक कर दो सांस ले सकूँ, उदास होने पर थोड़ा रो सकूँ.. कहते हैं रोने से मन हल्का हो जाता है  लेकिन आज कल न रोने का वक़्त है न ही किसी बात पर दुखी होने का, ज़िंदगी बस एक रोबोट की तरह चली जा रही है....

सोचा था, कुछ बदलाव के झोंके तुम्हारे रूप में आएंगे तो ज़िंदगी शायद बदल जाएगी लेकिन अब हम दोनों के पास ही वक़्त नाम की शय कम ही गुजरती है...

बहुत दिनों बाद फ्रस्ट्रेट होकर कुछ लिखने बैठा हूँ, सिर्फ इसलिए कि किसी को कुछ कह सकूँ या अपना हाल बाँट सकूँ उतना वक़्त और भरोसा दोनों ही नहीं है आज कल...

उदास हूँ, निराश हूँ.... बस यही कि हमेशा सब ठीक ही हुआ है तो ये भी ठीक हो जाएगा....

Disclaimer:- मैं सिगरेट नहीं पीता क्यूंकी It can Kill me One day, लेकिन इस समाज का क्या जिसके  बेवकूफाना सवालातों की वजह से मैं रोज मरता हूँ... 
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