Sunday, August 30, 2015

मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न...

इस शहर में बरसों से कोई नहीं आया...
बस एक सुराख़ रख छोड़ा था आसमान में
जहाँ से धूप आती है सवेरे-सवेरे,
और कभी कभी बरसात भी वहां ठहर कर जाती है...
 
याद है तुम्हें, उस आसमान में जो एक सुराख छोड़ा था कुछ साल पहले, उसके नीचे अब बहुत बड़ा जंगल उग आया है.... अलग-अलग तरह के दरख़्त है उसमे, कुछ फूलों की कोमल पंखुड़ियाँ भी अठखेलियाँ करती हैं... सबके अलग-अलग रंग, अजीब अजीब सी खुशबू ... इसको अलग अलग छांट नहीं सकते, किसी की कोई अलग पहचान नहीं सब गडमड सा, सुहाना... 

ये जंगल एकदम सपनों सरीखा है न, सपना ही तो है...  क्यूंकि हकीकत में आस-पास देखो तो अजीब ही माहौल है...
मुझे नहीं लगता ये सही वक़्त है प्रेम कवितायें लिखने का जब आस-पास नफरत है, आग है, बरबादी है... लेकिन एक आखिरी सत्य तो प्रेम ही है न, बाकी सब तो तीखा है जहर से भी तेज़.... प्रेम में अगर दर्द भी है तो खट्टा सा है, एक चुटकी सपनों का नमक डाल दो सब जन्नत है....

तेरा रंग उलझ गया है,
मेरी नींद में कहीं
जो आधी रात कभी खुल जाये नींद तो
आस-पास दिखता है
तेरे प्यार का इंद्रधनुष....

तो इस शहर में कितना भी धुंधलका हो मैं प्रेम ही लिखूंगा हमेशा.... 

वक़्त के दरख़्त से बने इस कागज पर
गर मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न..
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