Monday, December 12, 2016

कांच के शामियाने... सिर्फ उपन्यास या किसी का सच...

ये उपन्यास जब आने वाला था तब ही सोचा था पढूंगा ज़रूर, जब आया तब थोडा उलझ गया निजी ज़िन्दगी के उलट फेरों में... इस बीच फेसबुक और ब्लोग्स पर समीक्षाएं आनी शुरू हुयी.... जब भी कोई फिल्म या किताब देखनी-पढनी होती है तो उसकी समीक्षा पढना अवॉयड करता हूँ... इससे पूर्वाग्रह बनने का खतरा रहता है इसलिए... लेकिन न चाहते हुए भी नज़र तो पड़ ही जाती है, तो एक आध झलक से ये समझ में आ गया कि नारीवादी उपन्यास है.... अलबत्ता ये "वादी" वाला फंडा मुझे आज तक समझ नहीं आया... ये वाद वो वाद... इतिहास-नागरिक शास्त्र में भी समाजवाद, पूंजीवाद से लेकर साम्राज्यवाद की परिभाषा याद करते करते "वाद" शब्द से ही नफरत हो गयी... और ये "नारीवादी" कहलाना अच्छी बात है या बुरी पता नहीं, कितनी बार तो मेरी माँ ही मुझे नारीवादी कह देती हैं और जिस तरह से कहती हैं उससे साफ़ लगता है कि उनको पसंद नहीं कि मैं नारीवादी बनूँ... इस बात का मैं क्या मतलब निकालूँ पता नहीं... 

खैर, वापस किताब पर आते हैं... "नारीवादी" उपन्यास सुखद तो नहीं हो सकता है इतना मुझे यकीन था तो मैंने इसे पढना कुछ दिनों के लिए टाल दिया, शायद उस समय मैं उदास होना अफोर्ड नहीं कर सकता था... २० अगस्त शनिवार की रात यूँ ही खाली बैठे बैठे उठा ली किताब पढने के लिए... बमुश्किल २० पन्ने पढने के बाद रश्मि दी को मेसेज किया कि बहुत डार्क उपन्यास लग रहा है पढूं या नहीं... उन्होंने मना कर दिया, मत पढो... अब मैं और गफलत में था, फिर नहीं पढने का फैसला किया... 
काफी देर तक आधी-उनींधी नींद में करवट बदलते बदलते फाइनली फिर से किताब उठाई.... करीब 2 बज रहे थे तो इतना यकीन था कि अगर पूरी पढ़ी तो सुबह तो हो ही जायेगी...

पूरी किताब पढ़ते बस खुद को यकीन दिलाता रहा कि ये बस एक कहानी है और कुछ नहीं... राजीव जैसे लोग नहीं होते और कोई जया नहीं है जो ये सब कुछ झेल रही है... गुस्सा, क्षोभ या बेबसी कुछ तो ज़रूर महसूस हुयी, बार-बार लगा कि किसी तरह इस कहानी में घुस जाऊं और जया की कुछ मदद कर सकूं.... पता नहीं ऐसे सामाजिक और पारिवारिक हालातों में कितनी औरतें जया जैसी हिम्मत दिखा पाती होंगी... कई महिलाओं ने आत्महत्या तक का कदम उठाया है, इतिहास इस बात का गवाह रहा है... "धोबी घाट" फिल्म में भी ऐसे ही एक हिस्से को डाला गया था, फिल्मों में-किताबों में हम इस तरह का कुछ पढ़ कर कितना भी दुखी हो लें लेकिन वास्तविक में अगर कहीं जया है तो उसे ये किताब पढने की ज़रुरत है ताकि वो इन हालातों से लड़कर बाहर आये, न कि घुट घुट कर जीते रहे... जब उपन्यास पढ़कर ख़त्म किया तो करीब सुबह के ५ बज चुके थे, नींद गायब थी पर थोड़ी करवट बदलते बदलते आ गयी आखिर... सबको ऐसे ही नींद आ गयी होगी ये पढ़कर वो मैं पक्का नहीं बता सकता.... 

"कांच के शामियाने" एक लड़ाई है जो सबको लड़नी आनी चाहिए.... हालाँकि ये लड़ाई इंटरवल के बाद शुरू होती तो शुरू का आधा उपन्यास बस टीस पहुंचाता है, लेकिन अन्दर रौशनी और उसको हासिल करने की हिम्मत जगानी है तो पहले अँधेरा दिखाना पड़ेगा...

ये किताब अभी भी मिल रही है वो भी बस 72 रुपये में... नहीं पढ़ी हो तो पढ़ सकते हैं... शैलेश जी के छापेखाने से नयी वाली हिंदी की इतनी अच्छी किताबें निकल रही हैं देखकर अच्छा लग रहा है... 

Monday, December 5, 2016

स्पोर्ट्स शूज़ पहनने वाली लड़कियां...


जूता भी मस्त चीज बनायी है इंसानों ने... मुझे लगता है इंसानी शरीर का सबसे मज़बूत हिस्सा पैर ही होता है लेकिन सबसे ज्यादा सुरक्षा भी पैरों के लिए ही ज़रूरी पड़ी... आखिर इस असमान ज़मीन को रौंदते हुए आगे बढ़ना ही तो ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा है... 

खैर, मेरा और जूतों का रिश्ता बड़ी देर से शुरू हुआ... हम ठहरे बिहार के एक छोटे से शहर के सरकारी बोर्ड के विद्यार्थी तो न ही कोई अनिवार्यता थी न ही कोई ज़रुरत... और तो और मुझे जूते पसंद भी नहीं थे, ऐसा लगता था जैसे बाँध दिया हो किसी ने पैरों को... जब पांचवीं में मेरा एडमिशन छोटे से अंग्रेजी स्कूल में कराया गया तो जूते की मजबूरी आन पड़ी, बड़ा मुश्किल दौर था... अकसर मैं क्लास में जूते उतार कर बैठता और पैरों को सांस लेने लायक हवा मिल जाती... अलबत्ता लडकियां जूतियाँ पहनती थीं, जो मुझे लगता था कि फीते वाले जूतों से ज्यादा आरामदेह होती होंगी.... वो चमड़े के जूतों का दौर था, स्पोर्ट्स शू नाम की चिड़िया ने शायद तब तक छोटे शहरों में सांस नहीं ली थी, बहुत हुआ तो कपड़े के PT शूज पहनते थे लोग... TV पर लोग दिखते स्पोर्ट्स शूज पहने हुए, एकदम चमक सफ़ेद भारी भरकम से.. देखने से ही ऐसे थे कि पहनने का कभी सोचा भी नहीं... 7वीं से हम फिर से सरकारी स्कूल में आ गए और फिर से हमने जूतों को अलविदा कह दिया... बिना जूतों के भी ज़िन्दगी मज़े में चलती रही... कभी कभार सर्दियों में बैडमिंटन मैच के लिए PT शूज पहनने की मजबूरी थी वो भी एक आध घंट एके लिए... 

इंजीनियरिंग में जब मैं हिमाचल रहने पहुंचा तो शायद पहली बार मैंने किसी लड़की को स्पोर्ट्स शूज पहने देखा... एक दो क्या लगभग सभी ने स्पोर्ट्स शूज ही पहने थे... हिमाचल की चढ़ाई-उतराई के लिए शायद वही जूते सही होंगे, उसपर से इतनी ठण्ड... लड़कियों के वो ज्यादातर गुलाबी या नीले स्पोर्ट्स शूज बड़े मस्त लग रहे थे, और जिस तरह से वो लडकियां एकदम आजादी के साथ तेज़ चलते हुए हिमाचल की पहाड़ी सड़कों पर चलती थीं ऐसा आत्मविश्वास मैं आज तक कभी किसी लड़की में नहीं देखा था... बिहार की लडकियां तो सलवार सूट पहने बाटा की सैंडल में धीमे क़दमों से चला करती थीं... 

मैंने भी उन्हीं दिनों अपने लिए स्पोर्ट्स शूज ख़रीदे थे, पहली बार पहना तो अक्कच जैसा लगा लेकिन जब एक दो दिन उसे पहनकर इधर उधर किया तो खुद के अन्दर भी आत्मविश्वास जैसा महसूस हुआ... उस दिन से जूतों की ऐसी आदत लग गयी जो आज तक नहीं छूटी...

तो क्या बस जूते भर पहन लेने से आत्मविश्वास आ जाता है, शायद नहीं... पर जहां तक मैंने Observe किया है, Regularly स्पोर्ट्स शूज पहनने वाली लड़कियों बाकी लड़कियों से ज्यादा confident होती हैं, कुछ तो मनोविज्ञान होता ही होगा... बहुत कम लडकियां हैं जो अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जूते पहनती हैं, कारण कई हो सकते हैं... अभी पिछले साल की बात है जब Chembra Peak की ट्रैकिंग पर गया था वहां ज्यादातर लड़कियों ने सैंडल, फ्लोटर्स और कुछेक ने तो हील्स भी पहने थे... वो फिसलन भरी मुश्किल ट्रैकिंग करते वक़्त आस-पास कैसा नज़ारा होगा इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते.... क्या इतना मुश्किल होता है अपने Daily Routine में एक अदद जूते को शामिल करना, पता नहीं...

खैर, इसमें कोई दो राय नहीं कि वो लडकियां मुझे अलग से दिख जाती हैं क्यूंकि वो शूज उन्हें सर झुका कर छुईमुई झुण्ड में चलने वाली लड़कियों से अलग करते हैं... वो बिंदास चलती हैं, कैसे भी रास्तों पर बिना लडखडाये... ज़रुरत पड़े तो दौड़ भी लगाती हैं लिफ्ट को रोकने के लिए... दौड़ते वक़्त कमर सीधी होती है और हाथ भागते हैं यूँ आगे पीछे एक रनर की तरह.... स्कूटी की बजाय बाइक चलाना पसंद करती है और उन जूतों के साथ वैसे ही किक मारती हैं जैसे दुनिया को एक मेसेज देना हो, कैपिटल लेटर्स में... उनके कदम छोटे छोटे नपे तुले नहीं होते, ये लम्बे लंबे डग होते हैं उन लड़कियों के... वो स्पोर्ट्स शूज पहनने वाली लडकियां.... 

Sunday, August 14, 2016

हर खाली दिन एक धीमा जहर है...


इन दिनों ऐसा लगता है जैसे मैंने अपना वजूद एक बार फिर से खो दिया है, चाहे कितना भी खाली वक़्त मिल जाये समझ नहीं आता कि क्या करना है... कितनी ही बार पूरा दिन ऐसे ही बिस्तर पर पड़े पड़े ही गुज़ार दिया है... पता नहीं क्यूँ मुझे कोई इतना अच्छा नहीं लगता कि उससे बात की जाये, लगता है अकेले ही वक़्त बिता लिया जाये तो बेहतर है... इतने सालों की जद्दोजहद के बाद जमापूंजी के रूप में बस कुछ खूबसूरत यादें हैं, अब तो उनको याद करके भी आँसू ही आते हैं... "डैडी" फिल्म में एक संवाद था न कि "याद करने पर बीता हुआ सुख भी दु:ख ही देता है...." मैं शायद उम्र के ऐसे दौर पर हूँ जब मूड स्विंग्स होते हों, लेकिन जिस रंज और दर्द के शहर में अपना वजूद तलाश रहा हूँ वो मुझे अपने ब्लॉग या डायरी में ही मिलता है.... कितनी अजीब बात है मेरे ब्लॉग का पता हर किसी के पास है अलबत्ता यहाँ कोई अपना दर्द पढ़ने नहीं आता, शायद कुछ लोग ऐसे होंगे जो इस दर्द में अपना दर्द तलाश कर दो आँसू बहा लिया करते होंगे... मैं भी तो कितनी ही बार निकलता हूँ इधर उधर के बेरंग पते पर खुद का दर्द तलाशते हुये... गम के खजाने तो हर किसी के होते हैं न, बस सबके सन्दूक का रंग अलग अलग होता है... मेरी सन्दूक का रंग स्याह सा पड़ गया है... कल सुबह से मुझे एक ही खयाल आ रहा है कि मुझे एक स्वेटर बुनना चाहिए, माँ खाली होती थी तो यही करती थी पहले... पर वो भी बुनू तो किसके लिए... 
 
कहते हैं, रोने से जी हल्का हो जाता है पता नहीं मेरा क्यूँ नहीं होता... हाँ जब रो चुकता हूँ तो किसी से मिलने का दिल नहीं करता, आईने के पास से भी गुज़रता हूँ तो वो चीख चीख कर मुझसे मेरा पुराना चेहरा मांगता है... ऐसे में बस एक ही चेहरा है जो मुझे सुकून देता है, बस उसे न ही कभी इस बात का इल्म होता है न ही होगा कभी.... काश कभी जैसे मैंने ज़बरदस्ती उसकी उदासी में खलल डाल कर उन्हें अपना बनाया था वो भी इसी तरह ज़बरदस्ती मुझे मेरे होने की याद दिला दे पर उसकी बेखबरी मेरे हर खाली दिन के ऊपर लिपटी हुयी होती है... 

वक़्त से बड़ा शिकारी कोई नहीं होता... जो सबसे बेहतरीन लम्हें होते हैं न वो उसका शिकार करता है, फिर उसकी खाल को सफाई से उतार कर अपने ड्राइंग रूम में सज़ा लेता है... हम उस खाल को देखकर उसपर गर्व तो कर सकते हैं है लेकिन उस लम्हों की खाल के पीछे के तमाम अतृप्त इच्छाएँ नहीं देख पाते... मैंने तो कभी किसी चाँद-सितारे की मन्नत भी नहीं मांगी बस कुछ ख्वाब थे जो दर-दर टुकड़े हो चुके हैं... काश वो ख्वाब मैं दोबारा देख सकता तो उसके ऊपर दाहिनी ओर छोटा सा स्टार लगा देता 'टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई' वाला लेकिन वक़्त के पहियों में रिवर्स गियर जैसा कुछ नहीं होता... 

सुबह से मोबाइल सायलेंट करके उसे पलट कर रखा हुआ है लेकिन हर दो मिनट में पलट के देखता हूँ कि शायद उसके आने की आहट सुनाई दे जाये... लेकिन आज का दिन ऐसे गुज़रा जैसे किसी अंधे के हाथ की दूरबीन.... बेवजह, आज का दिन नहीं भी आता तो क्या फर्क पड़ता था....
बारिश का मौसम इस धरती के ज़ख़्मों पे मरहम सा लगता होता होगा न, लेकिन जलते हुये मांस पर पानी डाल दो तो उसके धुएँ में आस पास की सारी गंध खो जाती है... 


ऐसा लगता है जैसे ये ज़िंदगी कई करोड़ पन्नों का एक उपन्यास है जिसकी कहानी बस उसके आखिरी पन्ने पर लिखी है, बाकी सारे पन्ने खाली और हम सीधा आखिरी पन्ने तक नहीं जा सकते.... एक एक पन्ना पलटना ही होगा हमें.... 

Wednesday, August 3, 2016

कुछ लिखते रहना ज़रूरी है न, बस तुम्हारे लिए....

मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं कहीं इधर-उधर के कई नुक्कड़ों पर थोड़ा थोड़ा सा छूट सा गया हूँ... मेरे द्वारा लिखा हुआ सब कुछ, मेरे उस वक़्त का पर्यायवाची है... मुझे पर्यायवाची शब्द शुरू से ही पसंद नहीं आते, जाने कितने ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ एक जैसे होते हैं लेकिन हर शब्द हर जगह उपयोग नहीं किया जा सकता... हिन्दी व्याकरण में मुझे अनेक शब्दों के एक शब्द बहुत पसंद था, तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में होना भी अनेक शब्दों का एक शब्द है...   

तुमने जितने छल्लों में बांटकर मुझे ये वक़्त दिया है न, कलेंडर की कई तारीखों के कोनों में फंसा हुआ वो वक़्त टूथपिक से निकालना पड़ता है.. हो सके तो हर शनिवार इन छल्लों को मिलाकर एक पुल बना दिया करो न इस जहां से उस जहां तक... 

मैं तुम्हारी आखों को 
शब्दों में लिखता हूँ,

मेरी नज़मों में तुम
इश्क़ पढ़ती हो...

सच, तुम्हारी आखें ही इश्क़ हैं,

जिनमें खुद के गुमशुदा हो जाने की
रपट लिखवा दी थी मैंने पाँच साल पहले ही..

Friday, June 24, 2016

बंद कमरा...

इन दिनों मैं बहुत कुछ ऐसा सोचने लगा हूँ जो मैं नहीं चाहता कि तुम पढ़ो, कुछ रद्दी से पड़े पन्नों पर लिखकर उसे फाड़ कर फेक देता हूँ.... कभी हमारे बीच में की गयी कुछ अनकही बातों के सिरे को भी पकड़ो तब भी उससे नयी कोई बात नहीं निकलती... ससर गाँठ की तरह सारी पुरानी बातों के गिरहें खुलकर बस सीधा सन्नाटा बच जाता है... मैं फिर से ख़ानाबदोश होने लगा हूँ, दिन भर बेफालतू इधर उधर बौखलाया फिरता हूँ ... इंसान चाहकर भी अपनी परछाईयों से नहीं भाग सकता, शायद इसलिए मुझे अंधेरा अच्छा लगता है... किसी से नज़र चुराने की ज़रूरत नहीं है, खुद से खुद की बातों में खो जाना ही असीम सुख है... कितना अच्छा होता न अगर अंधेरा ही सच होता, इस तेज रौशनी में मेरी आखें चौंधिया जाती है, दिल में जलन होती है सो अलग... 

शाम को इस अंधेरे से कमरे में बैठकर अपने अंदर की रगड़ सुन रहा हूँ, दिमाग बार-बार दिल को कहता है आखिर ज़रूरत क्या थी इश्क़ करने की, अब भुगतो... और दिल चुपचाप खुद को एक कमरे में बंद कर लेता है, मुझे डर लगता है कहीं यूं अकेले रहते रहते मैं किसी बंद कमरे में तब्दील न हो जाऊँ... 

रात एक माचिस है, 
और तन्हा होना एक बारूद 
तेरी याद एक रगड़ है, 
तीनों गर मिल जाएँ 
तो मेरी धड़कन 
राख़ हो जाती है जलकर....

Saturday, June 18, 2016

जैसा कि तुमने कहा...


इस छोटे से घर की खिड़की से
झांकता हुआ ये चाँद,
और इसे निहारते हुए
हम और तुम,
अपने साथ लिए
कुछ फुरसत के पल,
चलो बांध ले इन पलों को, 
जैसे बांध के रखा है 
तुमने अपने सपनों को
मेरी खुशियों के साथ...


Saturday, June 11, 2016

ये शाम अंधेरे में ही सही....

बैंग्लोर की ये सर्द सी शाम दिल में अजीब सी चुभन पैदा कर रही है जबकि पता है मैं कितना भी चाहूँ इसे जलाकर राख़ नहीं कर सकता... तुम्हारी प्राथमिकताओं के साथ जीना मुश्किल हो रहा है मेरे लिए... ऐसा लगता है मैंने खुद ही अपना कातिल चुन लिया है... जिस चीज से मुझे सबसे ज्यादा नफरत थी, वो बात मेरे साथ बहुत दूर तक चलती नज़र आ रही है...

ध्यान रखना जो बहुत मुश्किल से मिलता है उसके टूटने की आवाज़ भी उतनी ही गहरी उतरती है...

कभी कभी बड़ी शिद्दत से वक़्त को पीछे धकेलने की तलब होती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी चेन स्मोकर को सुबह सुबह सिगरेट की लगती होगी... अचानक से आज बोझ लगने लगता है, बासी से बीत गए उस कल को एक कश में अपने अंदर खींच लेने का दिल कर रहा है... उन सुर्ख पड़ी बातों का जुर्म बस इतना था कि वो अब बीत गयी हैं और दोबारा नहीं आ सकतीं... पुराना वक़्त बाहर बारिश में भीग रहा है...

इंतज़ार की सतह इतनी खुरदुरी होती है कि उस पर औंधे मूंह गिरने का दर्द बयान नहीं कर सकते... सरप्राईजेज़ तो बहुत दूर की बात है अब तो जैसा सोचता हूँ वैसा भी नहीं होता... 

Wednesday, June 8, 2016

मैं तुमसे भाग के भी तुम तक ही आऊँगा...

दिन भर की इधर उधर बेमानी सी बातों के इतर जल्द से जल्द घर पहुँचने की जाने क्यूँ अजीब सी हड़बड़ी होती है... शायद एक कोने में लौटने भर का सुकून ही है जो मुझे आवारा बना देता है... 

कभी कभी मुझे डर लगता है कि अगर मैं किसी दिन शाम को घर नहीं लौट सका तो डायरी में समेटे हर्फ बिखर तो नहीं जाएँगे... हर सुबह मैं कितना कुछ अधूरा छोडकर उस कमरे से निकलता हूँ, उस अधूरेपन के लिबास पर कोई पासवर्ड भी नहीं लगा सकता... बैंग्लोर में बारिश भी तो हर शाम होती है, और मैं हर सुबह खिड़की खुली ही भूल जाता हूँ... अगर कभी ज़ोरों से हवा चली तो वो खाली पड़े फड़फड़ाते पन्ने मेरे वहाँ नहीं होने से निराश तो नहीं हो जाएँगे... हर सुबह उस खिड़की से हल्की हल्की सी धूप भी तो आती है, उस धूप को मेरे बिस्तर पर किसी खालीपन का एहसास तो नहीं होगा... मेरे होने और न होने के बीच के पतले से फासले के बीच मेरी कलम फंसी तो नहीं रह जाएगी न, उस कलम की स्याहियों पर न जाने कितने शब्द इकट्ठे पड़े हैं, उन्हें अलग अलग कैसे पढ़ पाएगा कोई... 

मैं कमरा भी ज्यादा साफ नहीं करता, मेरे कदमों के निशान ऐसे ही रह जाएँगे... उन निशानों को मेरी आहट का इंतज़ार तो नहीं होगा न... मेरी अनंत यात्रा के मुकद्दर में नींद तो होगी न, अक्सर जब मुझे नींद नहीं आती तो कुछ सादे से पन्नों पर अपनी ज़िंदगी लिखने का शौक भी पाल रखा है मैंने.... इत्तेफाक़ तो देखो मुझे सिर्फ अपने बिस्तर पर नींद आती है, और मैं अपने साथ अपनी डायरी भी लेकर नहीं निकलता....  

ऐसे में मैं अपनी हथेलियों पर तुम्हारे लिए चिट्ठियाँ उगा कर भेजा करूंगा.... तुम्हें तो पता है ही कि मेरी हथेलियों पर पसीने बहुत आते हैं, उसे मेरे आँसू न समझ बैठना... 

क्या मुझे साथ में एक्सट्रा जूते रख लेने चाहिए, कहीं किसी तपते रेगिस्तान में फंस गया तो उस आग उगलती रेत में कैसे पूरा करूंगा घर तक वापस आने का सफर... उफ़्फ़ मेरी कलाई घड़ी में इतने दिनों से बैटरि भी नहीं है, वक़्त का पता कैसे लगाऊँगा... इस घड़ी की सूईयों की तरह ये वक़्त भी कहीं भी ठहर जाता है, मेरा वक़्त सालों से मेरे बिस्तर के आस-पास अटक कर रह गया है... तुमको जो घड़ी दी थी न उसमे वक़्त देखते रहना क्या पता उस घड़ी के समय के हिसाब से मेरे कदम तुम्हारी तरफ चले आयें... 

दिल करता है पूरा शहर अपने साथ लिए चलूँ जहां भी जाता हूँ, लेकिन कितना अच्छा होगा न अगर तुम ही बन जाओ मेरा पूरा शहर, मेरी घड़ी, मेरा वक़्त, मेरी डायरी, मेरी कलम, मेरी धूप, मेरी शाम, मेरी बारिश, मेरी पूरी ज़िंदगी...  

Tuesday, April 26, 2016

लिख दिया है कुछ, यूं ही आँखें बंद किए हुये....

कभी कभी मुझे लगता है मेरे अंदर अंधेरा भरा हुआ है, तिल-तिल कर भरा हुआ अंधेरा.... और उसके भीतर एक छोटा सा चिराग छुपा है आधा जागा-आधा बुझा सा.... कभी कनखियों से झाँकते उस चिराग की रोशनी में मुझे खुद का चेहरा दिखाई देता है... ये रोशनी मेरे भीतर थोड़ी गर्मी तो पैदा करती हैं लेकिन साथ ही एक भूकंप भी आता है और मेरे वजूद को थोड़ा हिला कर चला जाता है....

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मैं सालों से लिख रहा हूँ, लिखता ही चला रहा हूँ... पता नहीं लिख रहा हूँ या बस अपनी कलम से कागज पे पड़ी ये सिलवटें हटा रहा हूँ... कोरे पन्ने खाली से लगते हैं मुझे, जैसे चीख चीख के कोई धुन तलाश रहे हों, उनपर अपनी स्याही उड़ेलकर उन्हें एक अधूरापन सौंप कर आगे बढ़ जाता हूँ.... शायद उन अधूरे-अधलिखे लफ्जों और धुनों की गिरहों को खोलकर कोई खोज ले अपना वजूद और बना दे अपने प्यार से भरा संगीत.... 

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कैब में बैठ के ऑफिस से घर जा रहा हूँ, काफी दिन से गर्मी की उठा पटक के बाद बाहर हलकी हलकी बारिश हो रही है... गाडी में FM पर धीमे आवाज़ में कोई गाना बज़ रहा है... अचानक से ड्राईवर एक गाने पर ज़ोर ज़ोर से गुनगुनाने लगता है, और गाने की आवाज़ बढ़ा देता है... गाना है, "मौसम है आशिकाना, ए दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ लाना"...
यकीन मानिए मैं बंगलौर में हूँ, और ड्राईवर भी दक्षिण भारतीय ही है...

ये लिखते लिखते गाने की आवाज़ और तेज़ हो गयी है, "ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी ये बरसात की रात"....

Tuesday, March 29, 2016

एकांत...

खिड़की के चार सींखचों और
दरवाज़े के दो पल्ले के पीछे
इस बेतरतीब बिस्तर
और इन तकियों के रुई के फाहे में,
बिना रुके इस घुमते पंखे
और इस सफ़ेद CFL की रौशनी में,
हर उस शय में
जो मुझे इस कमरे के
चारो तरफ से झांकती है...
इस घुटन में
पालथी मार के बैठा है
चपटा हुआ चौकोर एकांत...
 
मैं इस एकांत को,
तह-तह समेटता हूँ
इसके मुड़े-तुड़े कोनों पर
इस्तरी लगाके इसकी सिलवटों को
समतल करता हूँ,
लेकिन हर बार ये एकांत
वापस छितर जाता है
हर कोने में,
क्या इस एकांत को
बंद किया जा सकता है
किसी बोतल में
और फेक दिया जाए
किसी सागर की अथाह गहराईओं में,
तुम्हारी आँखें भी मुझे
किसी समंदर सा एहसास दिलाती हैं,
क्या पी जाओगी मेरा ये सारा एकांत...

Saturday, March 26, 2016

कोने पे तनहाई...

इन दिनों मैं पेंसिल से लिखता हूँ
ताकि मिटा दूँ लिखने के बाद
और शब्दों को बचा सकूँ
इधर उधर ओझरा जाने से,
काश कि आस-पास उलझे हुये
यूं बेवजह लड़ते हुये
लोगों को भी मिटा पाता
किसी इरेज़र से
और उगा देता वहाँ
गुलमोहर और अमलताश के कई सारे पेड़....

*********

नीले आमों की गुठलियों पर
काले संतरे उगाने हैं
पर कमबख्त ये बैंगनी सूरज
अपनी हरी किरणें
पड़ने ही नहीं देता इन लाल पत्तों पर...
ये रंग भी अजीब होते हैं न,
ज़रा से इधर उधर हो जाएँ तो
अर्थ ही बदल देते हैं... 

*********
मैं इन दिनों
किसी खाली डब्बे सा बन के रह गया हूँ,
बिलकुल खोखला,
जो हर छोटी बात पर
ढनमनाता रहता है...
मुझे यकीन था
कि किसी न किसी रोज़
कोई मेरे इस बेवजह के शोर
की वजह तलाशता ज़रूर आएगा,
लेकिन अब मैं खुद बुतला गया हूँ
और खोजता हूँ अपने आप को,
एक खाली से डब्बे का भी क्या वज़ूद होगा भला...

Monday, March 21, 2016

माइनस इनफिनिटी....

तुम्हारे कुछ बाल 
इन कंघियों में कैद होकर रह गए हैं
उसी तरह जैसे मकड़ी
खुद कैद हो जाती है
कभी कभी
अपने ही बुने जाले में...

*********

ओझराए हुये इन धागों के कोने में,
एक हल्की सी गांठ बांध रखी है
तुम्हारे नाम की,
चाहे कितना भी लटपटा जाऊँ
ज़िंदगी की लटेर के ऊपर,
हमेशा ये सनद रहेगा
कि मेरा एक सिरा बांध रखा है
तुमने हमेशा हमेशा के लिए....

*********

प्रेम इन्फाईनाईट की तरह है,
चाहे तो किसी से जोड़ लो, घटा लो
गुना करो, चाहे तो भाग लगा लो,
आगे माइनस लगा के
चाहो तो माइनस इनफ़िनिटी कर लो,
लेकिन वो वैसे ही बना रहेगा
उसी अभेद्यता के साथ,
जैसे मिले हुये हों
दो शून्य आपस में
सदा सदा के लिए...

Sunday, March 13, 2016

आधी-अधूरी पंक्तियों का नशा...

मैं एक भ्रम हूँ,
उस आईने के लिए
जो मुझमे खुद को देखता है...

***********

मुझे पता है
तुम कवितायें नहीं लिखती
लेकिन तुम्हारी मुस्कान
मेरे ऊपर लिखी गयी
तुम्हारी सबसे हसीन कविता है...

***********

तुमको अपना हमसफर बनाना
या ये कहूँ कि
बनाने का फैसला लेना
उतना ही आसान था जैसे
आँगन में पसरे कपड़ों का
अचानक से आई बारिश में भीग जाना,
लेकिन मुझे अपना हमसफर बना के
तुमने मुझे बना दिया है
कई खोटी चवन्नियों का मसीहा....

***********

आज शाम है,
कल बारिश
और परसों इश्क़...
उलझी सी बातें हैं न,
फिर उलझ न जाए
बारिश की बूंदे भी
हमारी नज़रों के धागे में...

Sunday, February 21, 2016

परिवर्तन...

परिवर्तन,
ये शब्द और इसका निर्माण
उतना ही सहज है
जितना सुबह के बाद शाम,
शाम के बाद रात,
इसमें कुछ भी अजीब नहीं
कुछ भी असंभव नहीं...

जो आज है वो कल नहीं होगा
जो कल है वो आज नहीं हो सकता,
जिससे आप आज प्रेम करते हैं
उसका बदलना अवश्यम्भावी है,
प्रेम न बदले उसका भार
अपने अंदर के परिवर्तन को उठाना होगा...

परिवर्तन, आज मुझमे है कल सबमे होगा,
सब के पैर परिवर्तन की धुरी पर हैं...

Thursday, February 11, 2016

दर्पण के नियम...

मैं खुद को आवाज़ लगता हूँ हर बार,
और मेरी आवाज़ मुझसे ही टकराकर
वापस लौट आती है,
काश कि आवाज़ आ पाती
दर्पण के परावर्तन के नियम के खिलाफ,
मेरा दिल इस दर्पण का आपतन बिन्दु है...

याद रखना अगर मैं घूमा लूँ
अपना दिल किसी थीटा कोण से,
मेरी आवाज़ की परावर्तित किरण
इकट्ठा कर लेगी दोगुना घूर्णन,
ये हर दर्पण का प्रकृतिक गुण है....

मेरा ये दिल दर्पण ही तो है तुम्हारा,
है न...

Tuesday, January 19, 2016

मेरे शब्द जंगल से हैं...

हर एक शब्द एक जंगल सरीखा होता है,
अपने अंदर कितना कुछ समेटे हुये
कई सारे पेड़, लताएँ
सैकड़ों चिड़ियों की बातें
जो की गयी हों आपस में ही,
बहुत देर तक मैं किसी
जंगल में हस्तक्षेप नहीं करता
बढ्ने देता हूँ उसे यूं ही
फलते-फूलते जंगल कई बार
मुझे मेरी ज़िंदगी की
कहानियाँ दे जाते हैं....
हर तरह की प्राकृतिक और मानवनिर्मित
आपदाओं से
इस जंगल को बचाए रखने का
संघर्ष ही जीवन है.... 

Tuesday, January 12, 2016

हम प्रेम में ही हैं...

कितनी बार हम पूछते हैं
एक-दूसरे से एक ही सवाल
कि हम क्यूँ बने हैं एक दूसरे के लिए,
हम क्यूँ खड़े हैं साथ
और क्यूँ हर लम्हे को
छान रहे हैं चाँद की छलनी से,
वक़्त के हर गणित के साथ
हम समझना चाहते हैं
हमारे बीच का विज्ञान,
कितनी ही बार
तैरती है खामोशियाँ हमारे मध्य
जैसे खीच दी हो किसी ने
कोई समानांतर रेखा
जिसका कोई छोर न दिखता हो,
जैसे लगता है हम खड़े हैं अलग-अलग
और नहीं मिल सकेंगे कभी,
तभी अचानक से हम पहुँच जाते हैं
अनंत की धुरी पर
और घूमते हुये छू लेते हैं
एक दूसरे की उपस्थिति को,
ये पहेली जैसे सूडोकू की तरह है
कहीं से भी शुरू करें
हम वहीं पहुँचते हैं
उसी आखिरी खाने पर
जिसका अंक हमें
मिल कर सुलझाना पड़ता है,
अपनी ज़िंदगी का आखिरी खांचा
भर लेने के बाद
त्वरित हो जाती हैं साँसे
और मान लेते हैं हम कि
हम प्रेम में हैं,
हाँ-हाँ हम प्रेम में ही हैं...
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