Tuesday, January 19, 2016

मेरे शब्द जंगल से हैं...

हर एक शब्द एक जंगल सरीखा होता है,
अपने अंदर कितना कुछ समेटे हुये
कई सारे पेड़, लताएँ
सैकड़ों चिड़ियों की बातें
जो की गयी हों आपस में ही,
बहुत देर तक मैं किसी
जंगल में हस्तक्षेप नहीं करता
बढ्ने देता हूँ उसे यूं ही
फलते-फूलते जंगल कई बार
मुझे मेरी ज़िंदगी की
कहानियाँ दे जाते हैं....
हर तरह की प्राकृतिक और मानवनिर्मित
आपदाओं से
इस जंगल को बचाए रखने का
संघर्ष ही जीवन है.... 

8 comments:

  1. तूफानों को थाम लेने के लिये ऐसे जंगल आवश्यक हैं, सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति।

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 21-01-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2228 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और सीमान्त गाँधी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. सच ही तो कहा है आपने कि हर शब्‍द जंगल सरीखा होता है। बहुत सुंदर रचना। कभी मेरे ब्‍लाग पर भी पधारें।

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  5. सच ही तो कहा है आपने कि हर शब्‍द जंगल सरीखा होता है। बहुत सुंदर रचना। कभी मेरे ब्‍लाग पर भी पधारें।

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  6. काफी दिनों बाद पढ़ा आपको..!
    मन के एहसासों को समेटे खुबसूरत रचना

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  7. ये शब्दों के जंगल ही काव्य खडा के देते हैं ...

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