Saturday, August 23, 2025

साँसों के भीतर छुपे मौसम...

मेरे फेफड़ों में

अब भी
बरसात ठहरी है —
धूप की गंध लिए
वो पहली फुहारें,
जो तुम्हारी हँसी से
भीग गई थीं।

हर साँस
एक अलग मौसम बन कर
गुज़रती है —
कभी पतझड़ की तरह
सारे शब्द झड़ जाते हैं,
कभी वसंत बनकर
तेरा नाम
अलसी की पंखुड़ी-सा
खिल उठता है।

दाएँ नथुने से
ठंडी हवाओं में
तेरा खोया हुआ लिफ़ाफ़ा
घुस आता है,
और बाएँ से
गुज़र जाती है
तेरी याद की वह दोपहर
जिसमें नींद भी
उलझी पड़ी थी।

मैं जब भी गहरी साँस लेता हूँ,
मेरे भीतर
कोई पुराना मौसम
दस्तक देता है —
कभी तुम्हारा बाँका जून
कभी उदास जनवरी,
कभी वो मई की दोपहर
जहाँ तुमने
किसी पसीने से
मेरा नाम लिखा था।

साँसों के भीतर
एक पूरा साल पल रहा है,
और बाहर का मौसम
बस एक बहाना है
भीतर के ताप को
छुपाने का।

Friday, August 22, 2025

बारिश का वो कोना... - 2

ऑफिस से निकलते ही अंशुल ने देखा कि आसमान काले बादलों से भरा है और हवा में मिट्टी की गंध फैली हुई है। बेंगलुरु की शामें वैसे भी अक्सर नमी से भरी रहती हैं, लेकिन उस दिन बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी। लोग दौड़ते हुए ऑटो पकड़ रहे थे, छतरियाँ सिर पर तानकर इधर-उधर भाग रहे थे, मगर अंशुल ने अपने कदम धीमे कर दिए। उसे न भीगने की जल्दी थी, न घर पहुँचने की। दरअसल, इन दिनों उसके भीतर इतनी बेचैनी जमा हो गई थी कि बाहर की बारिश उसे राहत-सी लग रही थी।

वो धीरे-धीरे कब्बन पार्क की तरफ़ बढ़ा। ये जगह उसके लिए हमेशा किसी दोस्त जैसी रही थी। बरगदों की लंबी जटाएँ, गीली मिट्टी की खुशबू, और बारिश के बाद पत्तों पर ठहर गए छोटे-छोटे पानी के कतरे — सब उसे खींचकर वहीं ले जाते थे।

बरगद के पास वाली पुरानी बेंच की ओर बढ़ते हुए अचानक उसकी नज़र उस पर बैठी एक लड़की पर पड़ी। भीगी हुई हवा के बीच उसने चेहरा साफ़ देखने की कोशिश की और ठिठक गया। वो रागिनी थी।

कितने साल बीत गए थे? शायद पाँच या छह। फिर भी उसकी आँखें उसी तरह पहचान में आ रही थीं। वही आँखें जिनमें कभी उसने अपना पूरा भविष्य देख लिया था।

अंशुल के होंठों पर हल्की मुस्कान आई, मगर दिल धड़कने लगा। उसने हिम्मत करके धीरे से पुकारा, "तुम?"
रागिनी ने सिर उठाया, और बिना हैरानी दिखाए मुस्कुरा दी — एक थकी, लेकिन गहरी मुस्कान। "हाँ, मैं," उसने कहा।

दोनों कुछ पलों तक चुपचाप खड़े रहे। बारिश उनके बीच ऐसे गिर रही थी जैसे शब्दों के रास्ते में कोई पर्दा डाल दिया हो। फिर अंशुल ने पास आकर धीरे से पूछा, "बैठूँ?"
रागिनी ने बस सिर हिलाया।

बेंच पर दोनों एक-दूसरे से थोड़ा फासला बनाकर बैठ गए। वही बेंच जिस पर कभी उन्होंने साथ बैठकर कॉफ़ी पी थी, किताबें साझा की थीं, और ख्वाबों के धागे बुने थे।

अंशुल ने एक टहनी उठाकर ज़मीन पर लकीरें खींचनी शुरू कीं। उसने देखा कि रागिनी की हथेलियाँ हल्की-सी कांप रही थीं। शायद ठंड से, शायद किसी दबे एहसास से।

"कभी सोचा नहीं था, यहाँ मिल जाओगी," अंशुल ने धीमे स्वर में कहा।
रागिनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "ज़िंदगी हमें वहीं घुमाकर लाती है जहाँ से हम भागते हैं।"

फिर चुप्पी। बारिश धीरे-धीरे कम हो रही थी। बूंदें अब मोटी नहीं थीं, बस हल्की फुहार की तरह गिर रही थीं। पार्क के कोने से आती मिट्टी और घास की मिली-जुली खुशबू उन्हें किसी पुराने ज़माने में ले जा रही थी।

काफी देर बाद रागिनी ने कहा, "जानते हो, इन सालों में सबसे बड़ा डर किस बात का लगा?"
अंशुल ने उसकी तरफ़ देखा। "किस बात का?"
उसने नजरें झुकाते हुए कहा, "इस बात का कि क्या कभी कोई मुझे फिर से सच में टूटकर चाहेगा भी या नहीं।"

ये सुनते ही अंशुल के भीतर कुछ हिल गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल के सबसे छुपे कोने से उसके ही शब्द चुरा लिए हों। वही डर तो उसके भीतर भी था। वही सवाल कि क्या किसी दिन उसे भी वैसा प्यार मिलेगा, जैसा उसने कभी दिया था।

कुछ पलों तक दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। उस खामोशी में कोई शिकायत नहीं थी, न कोई गिला, बस एक गहरी थकान और अनकही चाहत थी।

आसमान अब साफ़ हो रहा था। पेड़ों से टपकती बूंदों की आवाज़ गूँज रही थी। रागिनी ने धीरे-धीरे उठते हुए कहा, "चलूँ?"
अंशुल चाहता था कि वो कह दे—"थोड़ी देर और बैठो, अभी मत जाओ।" लेकिन उसके होंठों पर शब्द नहीं आए। वो बस मुस्कुरा दिया।

रागिनी जाते-जाते एक बार मुड़ी। उसकी आँखों में सवाल था, और शायद थोड़ी उम्मीद भी। अंशुल ने हल्के से सिर हिलाया, मानो कहना चाहता हो कि हाँ, शायद ये आख़िरी मुलाक़ात हो।

रागिनी के जाने के बाद कई हफ़्तों तक अंशुल का वही हाल रहा—ऑफ़िस से लौटकर वो देर रात तक खाली स्क्रीन के सामने बैठा रहता, कोडिंग करता, लेकिन बीच-बीच में हाथ रुक जाते। उसकी डायरी में दो-तीन अधूरी लाइनें ही जुड़ीं, और फिर बैकस्पेस सब मिटा देता।

वक़्त बीतता गया। रागिनी की याद धीरे-धीरे दर्द से हटकर एक अजीब-सी खामोशी में बदलने लगी। जैसे ज़िंदगी ने उसके भीतर कहीं गहरी तह बना दी हो, जहाँ वो किसी को आने नहीं देता।

फिर भी, अंशुल ने महसूस किया कि अब हर चीज़ को देखने का उसका नज़रिया अलग हो गया है।
कब्बन पार्क से गुज़रते हुए उसने पहली बार उन बुज़ुर्गों पर ध्यान दिया जो रोज़ शाम को हँसते-खिलखिलाते एक गोल घेरे में इकट्ठा होते थे।
कॉफ़ी कैफ़े में बैठकर उसने देखा कि आसपास बैठे लोग कितनी आसानी से अपने-अपने दुख-सुख बाँट लेते हैं।
और एक दिन उसने खुद को किताबों की दुकान पर खड़े पाया, जहाँ न जाने क्यों उसने एक शायर की किताब उठा ली।

उस किताब के पहले ही पन्ने पर लिखा था—
"इश्क़ हमेशा मिलन का नाम नहीं होता, कभी-कभी ये तुम्हें अपनी असल पहचान दिलाने का रास्ता भी बन जाता है।"

वो लाइनें पढ़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की गाँठ खोल दी हो।
रागिनी चली गई थी, हाँ। शायद कभी वापस न आए।
मगर उसने अंशुल को एक आईना दिखा दिया था—कि वो किस हद तक किसी से जुड़ सकता है, और साथ ही ये भी कि उसके भीतर टूटने के बाद भी खड़े रहने की ताक़त है।

धीरे-धीरे अंशुल फिर से लिखने लगा।
अब वो शब्द सिर्फ़ दर्द से नहीं निकलते थे, उनमें ठहराव था। उनमें ये एहसास था कि ज़िंदगी सिर्फ़ चाहतों की पूर्ति नहीं है, बल्कि अधूरेपन को अपनाना भी है।

और एक रोज़ उसने अपनी डायरी में लिखा—
"शायद मुझे कोई टूटकर चाहे या न चाहे... लेकिन मैं इतना ज़रूर करूँगा कि जब भी किसी को चाहूँ, वो पूरी सच्चाई और ईमानदारी से हो।"

उस शाम अंशुल को लगा कि उसने ज़िंदगी से कोई बड़ा हिसाब बराबर कर लिया है और वो ज़िन्दगी के अगले अध्याय के लिए तैयार है..... 

Tuesday, August 19, 2025

बारिश का वो कोना...

बैंगलोर की शामें हमेशा एक-सी नहीं होतीं।

कभी अचानक बादल उमड़ आते हैं, कभी हल्की-सी धूप लंबी सड़क पर बिखर जाती है। ऑफिस से लौटते वक्त अंशुल का सबसे प्यारा ठिकाना था — पार्क का एक कोना, जहाँ पुराने बरगद के नीचे लोहे की एक बेंच रखी थी।

उस बेंच पर बैठते ही शहर का शोर कुछ देर के लिए धुँधला हो जाता था। ट्रैफिक के हॉर्न, ऑटो वालों की आवाज़ें, और कॉफी की खुशबू से भरे ठेले — सब पीछे छूट जाते थे।

उस दिन भी अंशुल वहीँ आया था।
थकान उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी। नोटबुक खोली और वही पुरानी आदत — दो-चार लाइनें लिखना, फिर मिटा देना। उसके मन में एक ही सवाल चक्कर काट रहा था:

"क्या कोई इंसान मुझे सच में… टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

इसी सोच में डूबा था कि उसने देखा — पास वाली बेंच पर एक लड़की आकर बैठी। हल्की-सी बारिश शुरू हो चुकी थी, और वो लड़की छतरी न खोलकर बारिश को चेहरे पर पड़ने दे रही थी। बाल उसके गालों से चिपक रहे थे।

कुछ पल दोनों खामोश रहे।
फिर लड़की ने धीरे से पूछा —
“तुम्हें कभी डर लगता है… कि कोई तुम्हें पूरी तरह चाहेगा या नहीं?”

अंशुल ने किताब बंद कर दी।
ये वही सवाल था जो उसके भीतर महीनों से अटका पड़ा था।

“हाँ,” उसने कहा,
“डर हमेशा रहता है। लोग अक्सर कहते हैं ‘हम चाहेंगे’, पर जब टूटा-बिखरा इंसान सामने आता है, तो उनका प्यार भी काँच की तरह टूट जाता है।”

लड़की ने हल्की-सी मुस्कान दी। मुस्कान में दर्द था, जैसे वो जवाब सुनना चाहती भी थी और डरती भी।


अगले कई दिनों तक वो लड़की — रागिनी — उसी पार्क में मिलने लगी।
कभी दोनों बारिश से बचते हुए चायवाले के ठेले तक चले जाते। भाप उठते कपों के बीच उनकी बातचीत में भी एक गर्माहट घुलने लगी।
कभी वो पार्क के रास्तों पर देर तक चलते रहते। पेड़ों के नीचे गिरी पत्तियों पर कदम रखते हुए, खामोश रहते लेकिन भीतर बहुत कुछ कह जाते।

रागिनी बहुत बातें करती थी — अपने बचपन के बारे में, कॉलेज के दिनों के बारे में, और उस रिश्ते के बारे में जिससे वो बँधी हुई थी लेकिन खुश नहीं थी।
“वो इंसान मुझे चाहता तो है… पर टूट कर नहीं,” उसने एक बार कहा था।
“उसके प्यार में मजबूरी ज़्यादा है, गहराई कम।”

अंशुल सुनता रहा। हर शब्द उसके भीतर चोट करता, लेकिन वो समझता था कि प्यार का मतलब किसी को बाँधना नहीं, बल्कि उसे समझना है।


एक शाम की बात है।
बारिश बहुत तेज़ थी। बिजली चमक रही थी, और पार्क लगभग खाली था। रागिनी और अंशुल उसी बरगद के नीचे खड़े थे। हवा इतनी तेज़ थी कि उनकी छतरियाँ उलट रही थीं।

रागिनी ने अचानक कहा —
“तुम जानते हो न, कि शायद मैं कभी तुम्हारी नहीं हो पाऊँगी?”

अंशुल ने उसकी आँखों में देखा।
उन आँखों में सवाल भी थे और डर भी।
“जानता हूँ,” उसने धीरे से कहा।
“लेकिन ये भी जानता हूँ कि अगर कोई तुम्हें टूट कर चाहेगा… तो वो शायद मैं ही होऊँगा।”

कुछ पल खामोशी रही।
सिर्फ़ बारिश की बूँदें गिरती रहीं।


फिर एक दिन रागिनी नहीं आई।
ना उस शाम, ना अगले दिन।
पार्क की बेंच खाली थी, बरगद का कोना चुप था।

अंशुल कई हफ्ते इंतज़ार करता रहा।
उसकी नोटबुक में अब सिर्फ़ रागिनी से जुड़े शब्द भरते गए — बारिश, मुस्कान, डर, अधूरापन।

उसने कभी तलाशने की कोशिश नहीं की। शायद उसने समझ लिया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ़ एक शहर, एक पार्क और एक मौसम तक के लिए आते हैं।

लेकिन आज भी जब बारिश होती है, अंशुल उसी बरगद के नीचे बैठ जाता है।
लोग दौड़कर शेल्टर में भागते हैं, लेकिन वो भीगता रहता है — जैसे किसी अदृश्य साथी के साथ खड़ा हो।

उसके मन में अब भी वही सवाल गूंजता है—
"क्या कोई इंसान मुझे टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

और उसके भीतर से जवाब आता है—
"हाँ, शायद… वो आई थी। बस हमारे बीच वक़्त सही नहीं था।"


उसी वक़्त कहीं दूर... 


आज भी जब बारिश होती है, रागिनी खिड़की पर खड़ी होकर बाहर देखती है।
उसकी हथेलियाँ भीग जाती हैं, और वो बरगद के नीचे खड़े उस लड़के को याद करती है, जिसने उसे पहली बार आईना दिखाया था।

वो जानती है कि अंशुल ने शायद उसे आज भी वहीं तलाशना बंद नहीं किया होगा।
और उसके मन में एक चुप सवाल गूँजता है:

"क्या कोई मुझे टूट कर चाहेगा?"

और फिर भीतर से जवाब आता है:
"हाँ… वो था। बस मैंने ही हिम्मत नहीं की।"

Monday, August 18, 2025

अव्यक्त प्रेम की डायरी

(पन्ना- 17)

आज फिर घर अजीब-सा खाली है।
पियू की हँसी खिड़की से झाँकती नहीं,
और शिवी की खिलखिलाहट
कमरे की दीवारों पर टकराकर
वापस नहीं आती।

मैं दोनों की दूरी को
अपनी साँसों में नापता हूँ।
आईना धुँधला है—
क्योंकि उस पर तुम्हारी मुस्कान
काफ़ी दिनों से नहीं उतरी।

इन खालीपन के बीच
मैं एक पुल बनाता हूँ,
जो शायद किसी नक्शे पर नहीं है।
वह बस मेरी धड़कनों में है—
धीरे-धीरे जुड़ता हुआ,
हवा की तरह फैला हुआ।

शायद यही दूरी की गवाही है—
कि प्रेम कहीं खोया नहीं,
बस और गहरा होकर
अदृश्य हो गया है।

Thursday, August 7, 2025

मुझे नहीं आया प्रेम साबित करना...

तुम्हारे माथे पर
एक हल्की सी शिकन देख ली थी उस दिन,
उसके बाद से
हर शाम थोड़ा जल्दी लौट आता हूँ—

शायद यही मेरा "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ" है। 

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प्यार बहुत किया है,
गवाही नहीं दी,
क्योंकि इश्क़ अगर सच हो
तो अदालत नहीं, धड़कनें काफी हैं...

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तुमने पूछा, कभी क्यों नहीं कहा,
मैं मुस्कुराया —
"जो हर वक़्त महसूस हो
उसे साबित थोड़ी किया जाता है..."

मैं हर रोज़ लिखता हूँ तुम्हें,
बिना नाम, बिना पते के,
प्यार तो लफ़्ज़-लफ़्ज़ टपकता है,
पर तुम्हें भेजना नहीं आता...

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मुझे नहीं आता
प्रेम को सबूतों में बाँधना,
मैं तो बस हर रोज़
तुम्हें अपनी साँसों में रख लेता हूँ...

"मुझे नहीं आया 
प्रेम साबित करना,
बस आया प्रेम करना..."

प्यार बहुत करता हूँ,
बस जताना नहीं आता,
तुम हवा बनके रही पास
और मैं साँस बनके भी कुछ कह न सका...

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शायद इसलिए
हर बार तुम्हें पाने की जगह
मैंने तुम्हें होने दिया —
जैसे चुपचाप
कोई दीपक रख आता है
मंदिर की देहरी पर
बिना मन्नत माँगे।

मैंने नहीं पूछा कभी
कि तुम क्यों दूर हो,
क्योंकि नज़दीकी मापने का हुनर
मेरे प्रेम में था ही नहीं।

जो भी था —
वो उसी तरह बहा
जैसे नदी अपने किनारों से
सिर्फ मिलने की उम्मीद में टकराती है,
ना कोई सवाल,
ना कोई सबूत।

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प्रेम मेरे लिए कोई तर्क नहीं था,
वो बस एक आदत थी —
तुम्हें हर दिन महसूस करने की।

मैंने कभी नहीं माँगा
तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ,
पर हर दुआ में
तुम्हारी छाया रख दी थी—
जैसे धूप में कोई
किसी पेड़ को याद करता है।

जो तुमसे कहा नहीं
उसे कई बार
अपनी ही नींद से चुरा कर
कविताओं में रख आया हूँ,
ताकि जब पढ़ा जाए
तो लगे —
कि कोई चुपचाप
तुमसे प्रेम कर रहा है… तब भी...

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