Sunday, September 20, 2020

मैं अँधेरा लिखता हूँ...

मेरी ज़िन्दगी है 
सफ़ेद सफ़हे में लिपटे 
मेरे कुछ बेतरतीब हर्फ़, 

और मृत्यु
मेरी वो किताब है
जो कभी नहीं लिक्खी गयी... 

मैं बवंडर हूँ 
तबाही मचाता हूँ 
उड़ा ले जाता हूँ 
सबके घर, सबके सपने,

मैं वो अग्नि हूँ 
जिसे बुझाया नहीं जा सकता... 

मैं अँधेरा हूँ 
जिससे डरते हो तुम 
अकेले में,

मैं वो काली रात हूँ 
जिसकी कोई सुबह 
सुनिश्चित नहीं... 

Friday, September 11, 2020

फकैती वाले दिन (2)...

जब व्यस्त था
वो मज़दूर
हमारे बीच एक
ऊंची दीवार बनाने में,
हमने बदल लिए थे बिस्तर... 

एक संदूक रख छोड़ा था 
तुम्हारे वाले हिस्से में, 
उस संदूक में 
जितनी मेरी याद बची है 
मैं उतना ही ज़िंदा हूँ.... 

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याद नहीं मुझे 
अपनी पहली मौत, 

मेरी आखिरी मौत से पहले 
मुझे एक बार और जला देना... 

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मुझे नहीं पता फर्क 
रेत और पानी का,
कवितायें लिखनी है 
मुझे इंसानों और मछलियों पर.... 

मुझे रहना है 
मछलियों के घर में 
अपने गलफड़ों से सांस लेते हुए, 
पकड़नी है मछलियां 
फेंककर रेत में जाले को...  

फकैती वाले दिन...

मुझे ये चाँद बेचना है,
पर सारे खरीददार मुझे
बिखरे हुए प्रेमी लगते हैं,  
चाँद खरीदना उनका अधूरा सा ख्वाब है 
जो वो खुद को बेचकर 
पूरा करना चाहते हैं... 

मैं ढूँढ रहा हूँ कब से 
कि मिले कोई 
जिसे रहा हो 
इस चाँद से सच्चा प्रेम... 

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मैं कविताएं लिखना चाहता हूँ 
तुम्हारी भाषा में,
वो भाषा जिसका अनुवाद
बस हम दोनों के पास है,

ये जो बेवजह 
मेरी नज़्मों का किनारा खो गया 
उसे अपनी मुस्कुराहटों की भाषा में 
इठलाते हुए पढ़ लेना... 

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मैं फिर से लापरवाह हो जाना चाहता हूँ 
कुछ भी लिखते वक़्त,
लगता है 
लबालब भर गया हूँ शब्दों से,

मुझे धकेलना है इन शब्दों को 
किसी कूड़ेदान में 
और हो जाना है  
बिलकुल खाली... 

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एक चिंगारी है
मेरे तलवे के नीचे,
वो सिगरेट जो फेक दी किसी ने
आखिरी कश लेने से पहले,

मेरे पास माचिस भी है
और पानी भी  
मैं बुझता भी हूँ तो 
आखिर फिर से जलने के लिए.... 

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