Friday, December 27, 2019

खुद को बचाये रखना...


उन्होंने कहा कि आंधियों में दीया जलाए रखना,
बिखरेंगे हज़ार घर, पर ख्वाबों वाला बचाये रखना,

इन उखड़ते हुये पेड़ों पे कई घोंसले थे चिड़ियों के,
इन परिंदों में तुम उड़ने का हौंसला बचाये रखना...

लोगों का क्या, वो नफरत लिखेंगे हज़ार तेरी हथेली पर, 
तुम बस दिल में बसी मोहब्बत पर भरोसा बचाए रखना

इस रंग बदलती दुनिया में लोगों के वजूद बदलते हैं
तुम खुद के अंदर खुद को बस बचाये रखना... 

Monday, November 11, 2019

हम और क्या करते...

हुये इतने मजबूर तो मोहब्बत क्या करते,
कभी छुड़ाते दामन कभी बे हौसला करते

बेवफा कहती है हमें तो कह ले दुनिया,
वफा का तलबगार होके भी हम क्या करते,

सीने से मुझे लगा के भी जो तू इतना रोती थी
तो अलविदा कहते नहीं तो और क्या करते,

मिजाज मेरा तेरी मुफ़लिसी पे आ गया था
पर जब हम खुद ही अधूरे थे तो क्या करते

इंतज़ार करने को तेरा हम तैयार थे ताउम्र
तूने रास्ता ही बदल लिया तो हम क्या करते

एक आँसू देखकर जब दिल बुझ सा जाता था
उन आँखों में समंदर देखते तो हम क्या करते... 

Sunday, June 16, 2019

डेडलॉक...

ज़िन्दगी में कई सारे फेज होते हैं, बचपन में जब आप अपने पिता का सम्मान करते हैं, फिर एक वक़्त आता है जब दूरियां बढ़ जाती हैं, आपको आजादी चाहिए होती है और उनको अनुशासन, मन कड़वा होता है उन दिनों, नज़र बचाते फिरते हैं...  फिर एक वक़्त के बाद गर्व भाव आता है कि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में इतना कुछ किया, सबके लिए... सबका ख्याल रखा... और फिर धीरे धीरे जब उनपर प्यार आना शुरू होता है वो बूढ़े हो चुके होते हैं... फिर झिझक इतनी ज्यादा होती है कि प्यार जतला नहीं पाते... 

आज कल मैं आश्चर्य भाव में हूँ, हर बात पर गुस्सा करने वाले, अपनी जिद पूरी करवाने वाले आज मुझे कुछ नहीं कहते... वो बस चाहते हैं कि मैं जो चाहता हूँ वो मुझे मिले, उन्हें पता है कि अगर ये खुशियाँ मुझे आज नहीं मिलीं तो मैं कितना टूट जाऊँगा... मैं उनकी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी से मुहँ भी नहीं फेर सकता क्यूंकि उन्हें पता है इस तरह मैं कभी खुश नहीं हो पाऊंगा, और मैं खुश नहीं हुआ तो वो भी नहीं.... 

चारो तरफ डेडलॉक है, और इसमें सब फंसे हुए हैं... बस इस बात का गर्व है कि उन्होंने मेरी खुशियों की अहमियत समझी और आज मेरे हर निर्णय में मेरे साथ खड़े हैं, वो सिर्फ कहने को मेरे पिता नहीं हैं उन्होंने मेरे लिए सच में खुद को बदल लिया... अफ़सोस बस यही है कि इन खुशियों का महत्व हर कोई नहीं समझता, उनके लिए अजीब तरह की Priorities हैं, और मैं ये भी नहीं कह सकता कि वो अपनी जगह पर सही हैं...

खैर, पापाजी मुझे कई बार ऐसा लगा कि आप शायद भावनाओं को नहीं समझते, आज भी बहुत बार लगता है लेकिन आपने मुझे समझा और मेरी बदकिस्मती भी देखिये बदले में कुछ ख़ास नहीं है देने को... बस एक डेडलॉक दे दिया है मैंने उस भरोसे के बदले में... जब मेरी ख़ुशी में दूसरों को ख़ुशी मिलने लगे तो मैं बलिदान भी कैसे दूं, उससे भला कौन खुश होगा... जब मैं ही खुश नहीं...

काश हर पिता अपने बच्चों के साथ खड़े होते, उनपर उतना ही भरोसा करते, उसी तरह जिस तरह आप मेरे साथ खड़े हैं, मुझपर भरोसा किया है... 

मैं लड़ रहा हूँ, आगे भी लड़ना चाहता हूँ, बस हिम्मत नहीं मिलती....मैं आपको वो ख़ुशी देना चाहता हूँ जो आपको मुझे खुश देखकर मिलती हो... और मेरी ख़ुशी ऐसे पिंजरे में कैद हो गयी है जिसकी चाभी मेरे हाथ में है ही नहीं... 

Saturday, February 23, 2019

अब इसका क्या शीर्षक हो भला...

वक़्त बहुत गुज़र गया है इन सालों में, उतना ही जितना कायदे से गुज़र जाना चाहिए था.. ज़िन्दगी भी वैसे ही चल रही है जैसे मामूली तौर पर चला करती है... कोई चुटकुला सुना दे तो हंस देता हूँ और कोई इमोशनल मूवी दिखा दे तो आंसू निकल आते हैं... कुछ भी ऐसा बदला नहीं है, जिसका जिक्र करना ज़रूरी मालूम पड़े... हाँ इन बीते सालों में सीखा बहुत कुछ, सीखा कैसे दुनिया दोतरफा बातें कर सकती है... कैसे मोहब्बत नफरत के सामने कमज़ोर नज़र आती है कभी-कभी, कैसे आप कुछ चाहें तो उसको हासिल करने का ज़ज्बा कितना कुछ करवा जाता है...

ज़िन्दगी आम तौर पर किसी लड़ाई से कम तो है नहीं, कभी अपनों से, कभी दुनिया से और कभी अपने आप से ही... इस लड़ाई के बीचो बीच मैं खड़ा होकर आसमां निहारा करता हूँ, मुझे सुकून पसंद है... इस लड़ाई में अकेले जाने का दिल नहीं करता, लगता है मुँह फेर लूं... 

ज़िन्दगी कई सारे झूठों के इर्द-गिर्द सिमट न जाए इसलिए दुनिया में मोहब्बत बनी होगी, ऐसा सच जो जीना मुकम्मल करता है... इस लड़ाई में जब आस-पास इश्क़ घुल जाए तो अच्छा लगता है, लगता है जैसे कोई एक इंसान तो है जो मेरे साथ खड़ा है... लगता है ज़िन्दगी इतनी लम्बी होने की ज़रुरत ही क्या थी, चार दिन की ही होती लेकिन मोहब्बत से भरी होती तो क्या बुरा था, क्यूँ इतना दर्द देखना भला... 

अजीब बात ये हैं कि कम से कम भारत में हर फिल्म, हर गाना मोहब्बत के इर्द गिर्द ही लिखने का दौर रहा है और इस देश को सबसे मुश्किल मोहब्बत समझने में ही लग गयी, साथ रहने-साथ होने के लिए मोहब्बत से ज्यादा ज़रूरी भी भला क्या हो सकता है... 

मेरे अन्दर लेखक कभी बसता था भी या नहीं, ये तो नहीं पता लेकिन अब जब कभी लिखने बैठता हूँ तो लगता है कि जैसे मेरी कलम पर एक बोझ सा आन पड़ा है, अपनी मोहब्बत को हमेशा साथ रखने का बोझ... उसके बिना तो जैसे कुछ कर ही नहीं पाऊंगा कभी... 

ऐसे अकेला बैठा बैठा कुछ भी बकवास लिखता रहूँ और तुम ये पढ़ते रहो तो मुझे ही बुरा लगेगा न... 

एक मुसाफिर, जो तारों को देखता था, चाँद को सहलाता था, आसमान को बांधता था, सुबह की सूरज की किरणों में सुकून महसूस करता था... जिसने तितलियों की आखें पढने की कोशिश की थी, जो जागती आखों से सपने देखता था, उसे तुम्हारा इंतज़ार रहता है इन दिनों... 
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