मैं ज़िंदा हूँ, अगर सिर्फ ये जानना ज़रूरी है तो हाँ, ज़िन्दगी जी रहा हूँ, ज़िन्दगी में मिलने वाले सुख-दुःख के बीच अपना होना बचाये हुआ हूँ.
कितना कुछ बदल जाता है, ज़िन्दगी में बदलते वक़्त के साथ... किसी भी पुरानी बात के साथ जब उसकी उम्र जोड़ता हूँ और हर बार साल बढ़ते जाते हैं तो लगता है वक़्त कितनी तेजी से फिसल जा रहा है, कुछ बाते २६ साल पुरानी हो गयीं तो कुछ १५... बस लोगों के मिलने और बिछड़ने की तारीखों के बीच खुद को धीरे-धीरे घिस रहा हूँ...
पहले कहीं भी, किसी रस्ते निकल जाय करता था तो ठोकरें भी बहुत लगती थीं, अब मैंने रास्ते कम कर दिए हैं तो ज़िन्दगी का सफर भी आसान सा हो गया, बोरिंग भी शायद ... हर संभावना हक़ीक़त बन जाए, यह ज़रूरी नहीं… कुछ सपने संभव ही इसलिए रहते हैं क्योंकि वे पूरे नहीं होते ... पूरे हो जाएँ तो वो सपने कहाँ रहे... मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया, ताकि हल्का रह सकूँ… कभी-कभी हल्कापन इतना ज्यादा हो जाता है कि मन गुब्बारे सा हवा में उड़ जाता है, पुरानी बातें याद आती हैं, बिना मतलब वाली पुरानी बातें ... कैसे सिर्फ एक खाली बैग और खली दिलोदिमाग के साथ बैंगलोर आया था, और अब अगर बैंगलोर समेटना चाहूँ तो भी नहीं समेट सकता, बस इसलिए नहीं कि यहाँ सामान जोड़ लिए, बल्कि यहां इतने लम्हें जोड़ लिए कि जाने कितने जन्म लग जाएँ ये सब समेटने में.
अब कुछ बातें इतनी पुरानी हो गयी हैं, जिनको आपस में जोड़ नहीं सकते, बस टुकड़ा टुकड़ा बिखरा हुआ सा कुछ रह जाता है ख़यालों के बीचो बीच, विश्वास नहीं होता कि कब और कैसे लिखना छूट गया, पहले बस में, कैंटीन में, ऑफिस में कहीं भी लिख लिया करता था, हर वक़्त कई सारे ख्याल आते थे... अब खाली सन्नाटे में भी कुछ नहीं आता.
कभी-कभी मेरे हर अनकहे को समझने वाले लोग शायद ये पढ़ कर मुझे समझ सकें, कि मैं ज़िंदा हूँ. बस ज़िंदा हूँ.



