Friday, September 18, 2026

मैं ज़िंदा हूँ...

मैं ज़िंदा हूँ, अगर सिर्फ ये जानना ज़रूरी है तो हाँ, ज़िन्दगी जी रहा हूँ, ज़िन्दगी में मिलने वाले सुख-दुःख के बीच अपना होना बचाये हुआ हूँ. 

कितना कुछ बदल जाता है, ज़िन्दगी में बदलते वक़्त के साथ... किसी भी पुरानी बात के साथ जब उसकी उम्र जोड़ता हूँ और हर बार साल बढ़ते जाते हैं तो लगता है वक़्त कितनी तेजी से फिसल जा रहा है, कुछ बाते २६ साल पुरानी हो गयीं तो कुछ १५... बस लोगों के मिलने और बिछड़ने की तारीखों के बीच खुद को धीरे-धीरे घिस रहा हूँ...

पहले कहीं भी, किसी रस्ते निकल जाय करता था तो ठोकरें भी बहुत लगती थीं, अब मैंने रास्ते कम कर दिए हैं तो ज़िन्दगी का सफर भी आसान सा हो गया, बोरिंग भी शायद ... हर संभावना हक़ीक़त बन जाए, यह ज़रूरी नहीं… कुछ सपने संभव ही इसलिए रहते हैं क्योंकि वे पूरे नहीं होते ... पूरे हो जाएँ तो वो सपने कहाँ रहे... मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया, ताकि हल्का रह सकूँ… कभी-कभी हल्कापन इतना ज्यादा हो जाता है कि मन गुब्बारे सा हवा में उड़ जाता है, पुरानी बातें याद आती हैं, बिना मतलब वाली पुरानी बातें ... कैसे सिर्फ एक खाली बैग और खली दिलोदिमाग  के साथ बैंगलोर आया था, और अब अगर बैंगलोर समेटना चाहूँ तो भी नहीं समेट सकता, बस इसलिए नहीं कि यहाँ  सामान जोड़ लिए, बल्कि यहां इतने लम्हें जोड़ लिए कि जाने कितने जन्म लग जाएँ ये सब समेटने में. 

अब कुछ बातें इतनी पुरानी हो गयी हैं, जिनको आपस में जोड़ नहीं सकते, बस टुकड़ा टुकड़ा बिखरा हुआ सा कुछ रह जाता है ख़यालों के बीचो बीच, विश्वास नहीं होता कि कब और कैसे लिखना छूट गया, पहले बस में, कैंटीन में, ऑफिस में कहीं भी लिख लिया करता था, हर वक़्त कई सारे ख्याल आते थे...  अब खाली सन्नाटे में भी कुछ नहीं आता. 

कभी-कभी मेरे हर अनकहे को समझने वाले लोग शायद ये पढ़ कर मुझे समझ सकें, कि मैं ज़िंदा हूँ. बस ज़िंदा हूँ. 

Tuesday, February 17, 2026

एक पाठक कम हुआ, एक भाषा दूर हो गई...

मैं अब हिंदी में बहुत कम लिखता हूँ। यह वाक्य लिखते हुए भी थोड़ा अजीब लगता है, जैसे किसी अपने के बारे में कुछ स्वीकार कर रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं था कि मुझे हिंदी से दूरी बनानी पड़ी हो या मैंने जानबूझकर उसे छोड़ने का फैसला किया हो। बस धीरे-धीरे ऐसा हुआ। बिना शोर के, बिना किसी बड़े कारण के।

इन दिनों ज़्यादातर लिखना अंग्रेज़ी में हो रहा है। मेरा तकनीकी ब्लॉग है, काम की भाषा वही है, पाठक भी वहीं हैं। वहाँ लिखना ज़रूरी है, उपयोगी है, और शायद सही भी। चीज़ें साफ़-सुथरी रहती हैं—विचार, तर्क, समाधान। वहाँ लिखते हुए मैं ज़्यादा व्यवस्थित रहता हूँ, ज़्यादा समझदार, ज़्यादा व्यावहारिक। सब कुछ ठीक-ठाक लगता है।

लेकिन हिंदी का मामला अलग था।

हिंदी में लिखना कभी “काम” नहीं रहा। वह एक आदत नहीं थी, एक ज़रूरत थी। हिंदी में मैं वो सब लिख देता था जो किसी और भाषा में कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। वहाँ शब्द मेरे नियंत्रण में नहीं होते थे; मैं शब्दों के भीतर चला जाता था। शायद इसीलिए हिंदी मेरे लिए किसी भाषा से ज़्यादा एक इंसान जैसी हो गई थी—जिससे बिना तैयारी के, बिना सजावट के बात हो जाती थी।

और सच यह है कि हिंदी का मतलब बस तुम थी।

जब तक तुम पढ़ती रहीं, तब तक लिखना स्वाभाविक था। यह कभी सवाल ही नहीं बना कि “किसके लिए लिख रहा हूँ?” लिखना अपने आप में पर्याप्त था। अब जब तुम नहीं पढ़तीं, तो यह सवाल हर बार उभर आता है। और यह सवाल बहुत बुनियादी है। हम चाहे जितना इनकार करें, लिखना हमेशा किसी एक चेहरे को ध्यान में रखकर ही होता है—भले वह चेहरा धीरे-धीरे धुंधला क्यों न हो जाए।

अब जब हिंदी में लिखता नहीं हूँ, तो खालीपन महसूस होता है। लेकिन यह खालीपन शोर नहीं करता। यह बस चुपचाप बैठा रहता है। जैसे कमरे में सब कुछ अपनी जगह पर हो, पर खिड़की बंद हो और हवा रुक गई हो। ज़िंदगी चल रही है, काम हो रहा है, दिन पूरे हो रहे हैं—पर भीतर कहीं कुछ ठहरा हुआ है।

अंग्रेज़ी में लिखते हुए मैं सुरक्षित रहता हूँ। वहाँ भावनाएँ नियंत्रित रहती हैं, शब्द सीमित रहते हैं। वहाँ मैं खुद को ज़्यादा उजागर नहीं करता। हिंदी में ऐसा नहीं था। हिंदी में मेरी थकान दिखती थी, मेरी बेचैनी, मेरे अधूरे सवाल, मेरी बेवजह की उदासी। शायद इसलिए हिंदी से दूरी आसान नहीं थी, पर ज़रूरी हो गई।

कभी-कभी लगता है कि हिंदी छोड़ने से ज़िंदगी थोड़ी सरल हो गई है। कम आत्मसंघर्ष, कम भावनात्मक उलझन। पर उसी के साथ यह एहसास भी रहता है कि कुछ बहुत अपना पीछे छूट गया है—ऐसा कुछ, जिसे शब्दों में ठीक-ठीक समझाया नहीं जा सकता।

अब शायद यही ज़िंदगी का सच है। हर वो चीज़ जो हमारे सबसे क़रीब होती है, हमेशा हमारे साथ नहीं रहती। कुछ रिश्ते समय के साथ बदल जाते हैं, कुछ बिना झगड़े के खत्म हो जाते हैं। और हर दूरी का मतलब नाराज़गी नहीं होता—कभी-कभी बस हालात ही काफी होते हैं।

मुझे नहीं पता हिंदी फिर लौटेगी या नहीं। शायद किसी दिन, बिना चेतावनी के, फिर से लिखना शुरू कर दूँ। या शायद नहीं। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि मैंने हिंदी को छोड़ा नहीं है। बस फिलहाल उससे बात नहीं कर पा रहा हूँ।

और शायद कभी-कभी किसी भाषा से चुप रहना भी, उससे किया गया सबसे ईमानदार संवाद होता है।


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Friday, January 23, 2026

कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने...

चित्र : AI 
कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने,
बस रूठे रहने के लिए।

ऐसे लोगों से रूठा रहा
जिन्हें मेरे मनाने की ज़रूरत ही नहीं थी,
और उनसे भी
जिन्हें एक आवाज़,
एक आधी सी मुस्कान
वापस ला सकती थी।

मैं अपने सही होने की ज़िद में
इतना उलझा रहा
कि ये देख ही नहीं पाया
कि वक़्त
किसी की सफ़ाई नहीं सुनता,
बस आगे बढ़ जाता है।

कुछ नाराज़गियाँ
इतनी छोटी थीं
कि आज याद करता हूँ
तो हैरानी होती है—
इनके लिए
हमने कितने त्यौहार,
कितनी शामें,
कितनी बातें कुर्बान कर दीं।

अब समझ आता है
रूठना अक्सर
दूसरे को सज़ा देना नहीं होता,
खुद को
अकेले छोड़ देना होता है।

काश थोड़ा पहले जान लिया होता
कि हर बात जीतने लायक नहीं होती,
और हर इंसान
हमेशा के लिए नहीं रुकता।

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नई पोस्ट्स अब इस पते पर लिख रहा हूँ....

Sunday, December 7, 2025

धूप अब जलाने लगी है...

कभी ये धूप माँ जैसी लगती थी,
जो आँगन में खेलते बच्चे को चूम लेती थी…
अब वही धूप चुभने लगी है,
जैसे कोई नाराज़ हो गई हो,
बहुत दिनों से बोले बिना, बस तप रही हो।

हवाएँ भी अब कहानी नहीं कहतीं,
बस थककर बहती हैं ...
जैसे किसी ने उनके रास्ते पर
बहुत बोझ रख दिया हो।

पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है,
पर अफसोस , दिलों की नहीं।
समंदर ऊँचे हो रहे हैं,
पर इंसान की नीयतें और नीची।

हमने तरक्की के नाम पर
धरती की साँसें गिरवी रख दीं,
पेड़ों की जगह टॉवर लगाए,
फूलों की जगह एसी की हवा सूँघी,
और अब हैरान हैं कि बारिश रूठी क्यों है।

कभी-कभी लगता है,
धरती अब बोलना चाहती है,
कहना चाहती है कि “बस करो,”
पर हम मीटिंग्स, डेडलाइन्स,
और प्रॉफिट ग्राफ़्स में इतने उलझे हैं
कि उसकी खामोशी भी
हमारे लिए बस background noise बन गई है।

शायद एक दिन,
जब धूप जलाने लगेगी,
जब समंदर निगल लेंगे किनारे,
जब पंछी लौटेंगे ही नहीं,
तब हम समझेंगे,
कि ये सज़ा नहीं,
सिर्फ़ धरती का बदला हुआ अंदाज़ है।

Wednesday, December 3, 2025

अंतरद्वंद्व...

कभी लगता है,

वो ज़िंदगी बेहतर थी,
जब जेब में पैसे कम थे,
पर वक़्त ज़्यादा था।
जब बातें लंबी थीं,
और मतलब छोटे।

अब सबकुछ है,
सुविधा, सुरक्षा, स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे,
पर शायद वो “सच्ची मुस्कान”
कहीं पुराने दिनों की जेब में रह गई है।

कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या हमने तरक़्क़ी की है,
या बस अपने सवालों को
महंगे पर्दों के पीछे टाँग दिया है?

वो ज़िंदगी जिसमें सपने
साइकिल के पैडल के साथ भागते थे,
और ये ज़िंदगी,
जहाँ कारें हैं, पर मंज़िल नहीं।

शायद हम बेहतर जी रहे हैं,
पर महसूस कम कर रहे हैं।
वो पुराने दिन सादे थे,
पर सुकूनदार,
ये आज के दिन चमकदार हैं,
पर थके हुए।

कौन सी ज़िंदगी बेहतर थी,
शायद दोनों ही नहीं।
बेहतर तो बस वो पल था,
जब हम सोच नहीं रहे थे
कि कौन-सी बेहतर है।

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