Saturday, May 18, 2024

जन्मदिन मुबारक हो अजनबी...

प्यार- कई लाख जन्म 
मुझे सन्नाटे कभी पसंद नहीं थे, हाँ एकांत ज़रूर पसंद था. उस एकांत के दरम्यान तुम्हारी एक मुस्कराहट ने जैसे सब कुछ अलग-थलग कर दिया था. तुम्हारे साथ एक मिनट एक्स्ट्रा बिता लेने की ज़द्दोज़हद ही जीवन का पर्याय बन गयी थी. मुझे तुमसे कोई शिकवा, कोई शिकायत नहीं, हालाँकि ये बात ज़रूर है कि तुमने वादा किया था साथ निभाने का लेकिन शर्तें भी थीं, परिवार से अलग न होने की शर्त. गलती मेरी थी जो इतना बड़ा रिस्क लिया, अब जब लगता है कि उस एक रिस्क के बदले मैंने अपना बहुत कुछ दाव पर लगा दिया था तो गुस्सा आता है, उन कुछ सालों की ख़ुशी के बदले पिछले कई वक़्त से बस एक खाली जगह को भरने की कोशिश में लगा हूँ, पर तुमने इतनी ज्यादा जगह ले रखी थी कि वो काम भी नहीं हो रहा. 

चेम्ब्रा पीक याद है, ये फोटो वहीँ ली थी. इसको देख कर ख्याल आया कि तुम्हें भूलने में कितना वक़्त लगेगा आखिर. 

न ही अब कोई एकांत है, न ही कोई सन्नाटा बस अब अकेलापन है जो हर रोज़ कचोटता है. ऐसा लगता है जैसे मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी है, अपने सुख-दुःख तुम्हें बताने हैं. एक दोस्त की तरह ही सही, तुम्हारे जैसे बेहतरीन दोस्त का खो जाना मेरे इस जन्म का सबसे बड़ा नुक्सान है . 

अक्सर एक निर्वात में खुद को पाता हूँ. वहाँ बेहिसाब कहानियां हैं, अधूरी कहानियां. उसमें से बस एक सम्पूर्ण कहानी है, तुम्हारा वो क्षणिक सा साथ. ऐसा क्यों होता है जब जिनका मुश्किल दिनों में साथ दिया हों वे अक्सर ज़िन्दगी आसान होने पर एक काली सरल रेखा खींच, मुंह मोड़ कर चल देते हैं. इस विरह के बाद, उससे जुड़ी जीवन की जटिलतायें समाप्त हो जानी चाहिए किन्तु मनुष्य अजब प्राणी है कि दुर्भिक्ष में पेड़ से चिपके हुए कंकाल की तरह स्मृतियों को सीने से लगाये रखता हैं.

तुम्हारी यादें जैसे एकदम अंदर तक समा गयी हैं, कभी कभी आश्चर्य होता है कि कैसे इतने सालों के बाद भी तुम्हारी वो सारी छोटी-छोटी बातें भी याद रह गयी हैं. मुझे पता है, अब तुम्हारी बातें और उनका जिक्र मुझे नहीं करना चाहिए. 

अब जब तुम्हारे बारे में एक और पोस्ट लिखने बैठा हूँ, खुद को किसी उथले पानी में फंसी मछली से तुलना करने का दिल करता है, पर इस पानी के समांनांतर एक बहुत ही खारा समुद्र है जहाँ वैसे भी मेरा अस्तित्व अधूरा ही रहेगा, क्यूंकि मुझे हमेशा से शांत और कलकल करती नदियाँ ही रास आयी हैं. 

इस एकांत का विस्तार क्षितिज के अंत तक है, लेकिन इसके अंदर असंख्य कुचले हुए सपने हैं, बेवजह के समझौते हैं, अदृश्य बंधन हैं. तुम्हारी एक स्मृति आती है और अवसाद नाम का कीड़ा तुरंत डंक मारने लगता है. मैं इसीलिए भी मन मारकर लिखने बैठ जाता हूँ, तुमने हमेशा कहा है कि लिखो.. सारी संभावनाएं हैं कि बिखरे हुए शायर का लिखा हुआ सालों-साल पढ़ा जाता रहे, लेकिन मुझे कोई क्यों भला आज से सौ साल बाद पढ़ना चाहेगा.. और इस ठिठुरती हुई सर्द में कब तक मैं अपना लिखा बचा रख पाऊंगा .. 

हर बार ये सोचता हूँ कि क्या तुम्हें मुझसे बस इसलिए प्यार हुआ था, क्यूँकि मुझे शब्दों को सलीके से लिखने का हुनर था... एक इंसान के तौर पर आखिर क्या था कि तुम सब कुछ भूल-भाल कर मेरी तारीफों के पुल बाँध दिया करती थीं. क्यूँ मेरे काँधे, आज भी तुम्हारा टिका हुआ सर खोजते रहते हैं, क्यों तुम्हारी छोटी से छोटी याद मुझे आज भी झंझोड़ देती है... 

मैंने अपने आपको लिखने के बारे में सिर्फ़ इतना ही कहा है कि, मैंने तुम्हारे लिए तब लिखना शुरू किया था जब नंगे पैरों के तले घास की ओस की बूँदें हुआ करती थी, अब घास पर पैर रखो तो घास भी जैसे चुभती है... इन सारी  बीती बातों का कोई हिसाब नहीं है, न ही कभी होगा... 

ये शहर हमेशा वो लिखावट याद रखेगा और तुम मेरी हर एक अधूरी कहानी का हिस्सा रहोगी, ये एक आखिरी सत्य है... इस एक आखिरी बात के साथ तुम्हारे किरदार को अपनी कहानियों से अलविदा कर रहा हूँ, पता नहीं उस किरदार के बिना मेरी कितनी कहानियां पूरी हो पाएंगी. लेकिन इन कहानियों का कोई मोल नहीं जब इन्हें पढ़कर हमारे आँखों में ख़ुशी की चमक की बजाय ढेर सारी नमी आ जाती हो... एक आखिरी बार अपने मन के गुबार को निकाल दूँ तो तो शायद चैन से जी पाऊं. 

अब हम वापस से जैसे अजनबी से होके रह गए हैं. पर कहीं न कहीं तुमसे मुलाकात की उम्मीद आज भी है. सही है या गलत पता नहीं. उम्मीद रखने में कोई बुराई भी नहीं होनी चाहिए... चाहे वो मुलाक़ात, इस ब्रह्मांड की अनंत धुरी पर ही क्यों न हो. 

खैर, उम्मीद और अफ़सोस की बात करने का कोई मतलब नहीं, आज के लिए बस जन्मदिन मुबारक हो, तुम आज भी मेरी दुआओं में हो, हमेशा रहोगी. 

मुझे याद है तुमने कहा था कि तुम्हें हमेशा मेरी विश का इंतज़ार रहेगा. मुँझ पता है तब से अब तक सब कुछ बदल चुका, फिर भी. 

Friday, May 10, 2024

क्यूट खिड़कियाँ...

वैसे तो ज़िंदगी कई सारे सपनों के इर्द-गिर्द बुनी है, कुछ सपने पूरे होते हैं, कुछ अधूरे रह जाते हैं. कई सारे अधूरे सपनों के बीच जब एक प्यारी कोंपल झांकती है तो अचानक से ज़िन्दगी के पूर्ण होने का एहसास पनप जाता है... 

ज़िंदगी के बलखाती वसंत पड़ाव में कुछ ऐसा ही मेरे साथ हो रहा पिछले एक साल से. एक दौर था जब दस-एक साल पहले बरसाती बूंदों को ज़मीन में मिलते हुए देखा करता था खिड़कियों से, अब ये खिड़कियाँ  ज्यादा क्यूट दिखती हैं. ये रंग-बिरंगे चिन्नू-मिन्नू से कपड़े जैसे ऑक्सीजन का काम कर रहे हैं. 

इस एहसास के बारे में कितना भी सोचूँ, कुछ ख़ास लिख नहीं पा रहा हूँ, पहली बार बार ऐसा लग रहा जैसे शब्दों के ख़त्म हो जाने में भी एक संतोष है...  

जब साँस तुम्हारी आती है,
या जब हौले मुस्काती हो,
शब्द वहीं ठहर से जाते हैं
और मैं मुकम्मल हो जाता हूँ...

Friday, April 19, 2024

वो एक दिन और उसकी याद...

मैं उससे कहता हूँ, कि चाहे कितने दुःख हों कम से कम ज़िंदा तो है, ठीक ठाक नौकरी है, घर है...  विकास खाली से मंडराते आसमां को निहार कर कहता है कि उसके बिना ज़िन्दगी जीने से बड़ी सजा भी क्या होगी भला... 

एक शाम जब वो यूँ ही आके लिपट सी गयी थी, ज़िन्दगी के उस एक छोटे से हिस्से में, वो कई बार टुकड़ा टुकड़ा होके बिखर जाना चाहता है.... 

उसे भी नहीं पता नहीं उसे क्या चाहिए, उसने जैसे सब कुछ कोशिश करके देख ली.... जाने किस रास्ते और किस मोड़ पर जाके सुकून मिलेगा... क्या एक closure नहीं मिलने की बेचैनी है, और क्यों नहीं है closure भला... उसने तो यही कहा था न, इससे पहले कि  कहीं दूर चली जाओ जाते-जाते गले लगाते जाना... उसने गुज़ारिश के मुताबिक़ लगा लिया था गले, और विकास को भी शायद कहीं न कहीं ये इल्म था कि  शायद ये आखिरी मुलाकात है तभी तो वो अचानक से भागकर नीचे दरवाज़े तक आया था... 

ज़िन्दगी में इतने माइलस्टोन के बीच भी वो एक ख़ास वो इक ख़ास दिन भुलाये नहीं भूलता, लोग कहते हैं कि एक याद के ऊपर अगर दूसरी अच्छी याद चस्प कर दो तो शायद ये दिन के मायने बदल जाएंगे, उस एक कोशिश में अपने कैलेंडर में उसके आने के दिन को एकऔर माइलस्टोन दे दिया... 

विकास कहता है अंशु सिर्फ एक हमसफ़र नहीं थी... एक सबसे प्यारी दोस्त जिससे कोई भी सुख-दुःख बेपरवाह होकर बांटा जा सकता था, जिसके पास उसके लिए हमेशा वक़्त था... एक रीडर जिसे उसके कुछ भी लिखे का बेसब्री से इंतज़ार रहता था,  जैसे लिखने से पहले ही पढ़ ले.... एक बेहतरीन ट्रेवल पार्टनर, जिसे हर नयी जगह देखने और उसे देखकर Wow !! कहने की तलब लगती हो... चाहे साथ फिल्म देखना हो, साथ किताबें पढ़ना या गाने सुनना, उसके साथ सब कुछ इतना परफेक्ट था... कि अब लगता है कि ज़िन्दगी के कई सारे खांचे एक साथ खाली हो गए और उसे भरने को कोई नहीं... 

पता है, एक रात बड़ा अजीब सा सपना देखा था... कम से कम बस वो इक सपना सुनने के लिए ही आ जाओ... क्या करूँ जिक्र सिर्फ उस एक शाम का, बस वो एक शाम वापस से जीने मेरे साथ आ जाओ... लालबाग़ में बारिश में फंसने के लिए आ जाओ... कभी आ जाओ पिज़्ज़ा लेकर मेरे जन्मदिन पर, या राजाजीनगर के पार्क में मेरे लिए एक कार्ड बनाकर आ जाओ, नहीं करूंगा गुस्सा कसम से और रोक लूँगा इस बार तुम्हें कार्ड फाड़ने से... छोटी ऊँगली पकड़े  "तैय्यब अली प्यार का दुश्मन" गाने के लिए आ जाओ... मेरे लिए फिर से कढ़ी-चावल बनाने आ जाओ... अभी घर से आयी होगी न तुम, तो आ जाओ मेरे लिए पेड़ा लेकर... मुझे बस इक बार सडू कहने ही आ जाओ.... 

या अगर ये सब मुमकिन नहीं तो आ जाओ कहने बस एक अलविदा... फिर से... 

Monday, March 18, 2024

कैसे पाऊँ प्रेम दोबारा...

बता सखी अब
कैसे पाऊँ प्रेम दोबारा,
तृष्णा मिटे अब कैसे फिर से,
कैसे अब मैं पुनः तृप्त हूँ…

कैसे नापूँ आसमान मैं,
कैसे स्वप्न सजीले देखूँ
तूने ही जब राह फेर ली
कैसे अब उन रस्तों की चाल लूँ...

कैसे भूले राधा को कृष्णा,
कैसे विरह का गीत सुनाये
जो प्रेम अपूर्ण है मन के अंदर ,
कैसे उसको पूर्ण बताये...

बता सखी अब
कैसे पाऊँ प्रेम दोबारा
तृष्णा मिटे अब कैसे फिर से
कैसे अब मैं पुनः तृप्त हूँ… 

कैसे उड़ूँ मैं रोशनियों में
जब जुगनू सारे थक के गिर गए,
कैसे देखूँ उन चेहरों को
मेरे लिये वो कबके मर गये...

कैसे फिरसे बरसे बादल
कैसे भींगूं फिर बारिश में मैं,
कैसे ये शहर हो फिर स्वर्ग सरीखा
कैसे हवा हो ठंडी-ठंडी ...

बता सखी अब
कैसे पाऊँ प्रेम दोबारा
तृष्णा मिटे अब कैसे फिर से
कैसे अब मैं पुनः तृप्त हूँ…

Wednesday, March 13, 2024

अधूरी दास्तानें (2)...

“प्यार तो सबसे बेसिक ज़रूरत है ना जीने के लिए."
“है तो….”
“फिर ? “
“फिर क्या ?”
“कुछ नहीं.”
“प्यार है ना, बहुत है… प्यार अब तक है तभी तो ज़िंदा हूँ…”
“………..”

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मुझे लगता है दो बिछड़ जाने वालों के बीच एक कोड वर्ड होना चाहिए, जो सिर्फ़ वो दोनों समझ सकें. जब भी ये कोड वर्ड बोला जाए तो दूसरे को ये एहसास हो जाये कि सामने वाला कमज़ोर पड़ रहा है....

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वक़्त के साथ कैसे मायने बदलने लगते हैं. पहले जो अपना घर था जाने कब बिटिया का दादी-घर बन गया. चाहे कुछ भी कह के पुकारा जाए, ये तो अपना ही घर रहेगा हमेशा. क्योंकि न ये सुकून कहीं है और न ही बड़ों का हाथ सर पे होने का विश्वास, फिर चाहे भले ही अब वो शारीरिक तौर पर हमारा सहारा न बन सकें. सुबह जब खिड़की से पहली रौशनी कमरे में आती है तो अलग सा एहसास है, पता नहीं क्यों ऐसा एहसास बैंगलोर में नहीं आता. पिछले बाईस सालों में जाने कितने ठिकाने बदले और हर बार हर शहर पुराना हो गया. पता नहीं भगवान ने मुझे ये वरदान


दिया है या अभिशाप कि एक बार मैं अगर कहीं से आगे बढ़ जाता हूँ तो वापस कभी उस चीज को मिस नहीं करता. फिर चाहे वो कोई जगह हो या इंसान. हाँ जब तक वो साथ हो, पूरी शिद्दत से साथ होता है, इसलिए इससे पहले कि ये शहर भी सिर्फ़ अनछुई याद बन के रह जाये, यहाँ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त बिता लेने चाहता हूँ. आख़िर ये शहर भी वैसा ही बन जाएगा कुछ सालों बाद....

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मैंने नहीं लिखा प्रेम कई सालों से,
दुनिया में बचा है ना प्रेम,
या विलुप्त हो रहा धीरे-धीरे
ओज़ोन की परत की तरह ..

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कितने भी साल बीत जायें,
कानों में एक आवाज़ है
जो भुलाए नहीं भूलती.
मन करता है पूछूँ,
कैसी हो तुम
ठीक हो न,

फिर लगता है
कहीं तुमने भी
यही सवाल पूछ लिया तो,
तो क्या कहूँगा.
झूठ बोल नहीं पाऊँगा और,
सच बोला नहीं जाएगा. 

इसलिए बिना पूछे,
बता दो ना,
कैसी हो
क्या बिलकुल वैसी
जैसी मिलती थी मुझे हर सुबह

मुस्कुराते हुए…

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