Saturday, January 16, 2021

पलायन...

"तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया... "
"पता नहीं... शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं.... और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता, अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए इंसान कब तक लिख सकता है... पता है, मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही.. लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... " 
"लेकिन तुम तो कहते थे कि लिखना कभी नहीं छूटना चाहिए, ये लाइफलाइन है...."
"हम्म्म्म... लाइफलाइन तो थी, लेकिन अब वो बेचैनी नहीं होती कुछ लिखने की... "
"फिर लेखक बनने का ख्वाब ?? "
"लेखक तो मैं आज भी हूँ, हमेशा रहूंगा... हाँ... एक किताब का क़र्ज़ है, वो लिखूंगा ज़रूर कभी जब लहरें शांत हो जाएँ आस-पास... और छोटा-मोटा तो लिखता ही रहूंगा, बस इस उम्मीद में कि वो पढ़कर कहीं कोई WOW कहके मुस्कुराते हुए ताली बजा रहा होगा... "
" ..... "
" और एक बात, अब मेरी लिखाई और फोटोग्राफी में वो पहले वाली बात नहीं रही,  बहुत कोशिश करने के बाद भी I am not able to create a masterpiece anymore... "
"पर, पलायन करना तो उपाय नहीं है ना..."
"पता है, कल ही एक फ़िल्म देख रहा था 'तृभंग', उसमें अरविन्दो कहता है कि जो हुआ वो होना निश्चित था, जो हो रहा है वो लिखा हुआ है और जो होने वाला है वो होकर ही रहेगा, तो वक्त को बेहतर करने की कोशिश ज़रूरी है लेकिन उसे जस के तस मान लेना पलायनवाद नहीं है... तो अगर और लिखना, अवश्यम्भावी होगा तो लिखूंगा ही..."

मैं इस बहते पानी के पन्ने पर,
लिखना चाहता हूँ, 
उसी तरह जैसे 
पहले हवाओं और ओस की बूँदों पर 
लिख दिया करता था... 
बेख़याली में भी लिखे शब्दों की 
क़समें खाकर 
आशिक़ आह भरा करते थे... 

पर मेरी कविताएं 
कमज़ोर हो गई हैं इन दिनों,
अब इन कविताओं के फेफड़ों में,
उन साँसों की खुशबू नहीं आती.... 

Monday, November 2, 2020

सपने...

सबकी ज़िंदगी के अपने अपने लक्ष्य होते हैं, आज के बदलाव भरे समय में अगर कोई एक बात है जो सबकी नींदें उड़ा रही है तो वो है नए तरह के सपने... 

पहले के सपने भी लोगों की सोच की तरह ही mediocre होते थे, साधारण सी ज़िंदगी के साधारण से सपने...

शायद मेरे भी ऐसे ही थे, मैं अकैडमिक्स में बहुत एवरेज रहा हमेशा, तो लगता था कुछ mediocre ही कर पाऊंगा... 2010 में engineering ख़त्म करने के बाद भी मुझे यही लगता था कि साधारण सी नौकरी चाहिए बस... 

फिर जब बैंगलोर आया तो सपने देखने सीखे, लगा कि अब तक कुएँ के मेढक की तरह जी रहा था, ऐसे इंसानों से मिला जो मेरे से उम्र में छोटे थे लेकिन अपने दम पर कुछ बड़ा करने का जज़्बा कहीं ज़्यादा था, महज़ 21-22 साल की उम्र में अपने सपने, अपने पैसे से पूरे करने की भूख... चाहे लड़का हो या लड़की. Infact लड़कियाँ ज़्यादा desperate थीं career और जॉब के लिए... CDAC का कोर्स चल ही रहा था फिर भी सब interview और exam देते ही रहते थे... 

मैंने तो नहीं दिया, लेकिन ऐसे कई interviews और exam का हिस्सा रहा... 

अजीब सुख था वो, एक इंसान जिसे किसी भी क़ीमत पर अपने दम पर कुछ करना था, उसका support system बनने का सुख... 

इस पूरे वक्त में मुझे लगने लगा था कि शायद समय का पहिया घूम चुका है, और अब कोई टाइम पास नहीं करना चाहता, workaholic होना ही ट्रेंड है.. 

अभी भी कुछ लोगों से मिलता हूँ तो अच्छा लगता है, उनका जज़्बा देखकर अच्छा लगता है.. अच्छा लगता है अगर कोई आगे बढ़े, अपने सपने खुद पूरे करे... लेकिन उसके लिए पहले सपने देखने पड़ते हैं... अगर सपने नहीं हैं तो उन्हें पूरा करने की भूख भी नहीं होगी...

Sunday, September 20, 2020

मैं अँधेरा लिखता हूँ...

मेरी ज़िन्दगी है 
सफ़ेद सफ़हे में लिपटे 
मेरे कुछ बेतरतीब हर्फ़, 

और मृत्यु
मेरी वो किताब है
जो कभी नहीं लिक्खी गयी... 

मैं बवंडर हूँ 
तबाही मचाता हूँ 
उड़ा ले जाता हूँ 
सबके घर, सबके सपने,

मैं वो अग्नि हूँ 
जिसे बुझाया नहीं जा सकता... 

मैं अँधेरा हूँ 
जिससे डरते हो तुम 
अकेले में,

मैं वो काली रात हूँ 
जिसकी कोई सुबह 
सुनिश्चित नहीं... 

Friday, September 11, 2020

फकैती वाले दिन (2)...

जब व्यस्त था
वो मज़दूर
हमारे बीच एक
ऊंची दीवार बनाने में,
हमने बदल लिए थे बिस्तर... 

एक संदूक रख छोड़ा था 
तुम्हारे वाले हिस्से में, 
उस संदूक में 
जितनी मेरी याद बची है 
मैं उतना ही ज़िंदा हूँ.... 

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याद नहीं मुझे 
अपनी पहली मौत, 

मेरी आखिरी मौत से पहले 
मुझे एक बार और जला देना... 

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मुझे नहीं पता फर्क 
रेत और पानी का,
कवितायें लिखनी है 
मुझे इंसानों और मछलियों पर.... 

मुझे रहना है 
मछलियों के घर में 
अपने गलफड़ों से सांस लेते हुए, 
पकड़नी है मछलियां 
फेंककर रेत में जाले को...  

फकैती वाले दिन...

मुझे ये चाँद बेचना है,
पर सारे खरीददार मुझे
बिखरे हुए प्रेमी लगते हैं,  
चाँद खरीदना उनका अधूरा सा ख्वाब है 
जो वो खुद को बेचकर 
पूरा करना चाहते हैं... 

मैं ढूँढ रहा हूँ कब से 
कि मिले कोई 
जिसे रहा हो 
इस चाँद से सच्चा प्रेम... 

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मैं कविताएं लिखना चाहता हूँ 
तुम्हारी भाषा में,
वो भाषा जिसका अनुवाद
बस हम दोनों के पास है,

ये जो बेवजह 
मेरी नज़्मों का किनारा खो गया 
उसे अपनी मुस्कुराहटों की भाषा में 
इठलाते हुए पढ़ लेना... 

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मैं फिर से लापरवाह हो जाना चाहता हूँ 
कुछ भी लिखते वक़्त,
लगता है 
लबालब भर गया हूँ शब्दों से,

मुझे धकेलना है इन शब्दों को 
किसी कूड़ेदान में 
और हो जाना है  
बिलकुल खाली... 

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एक चिंगारी है
मेरे तलवे के नीचे,
वो सिगरेट जो फेक दी किसी ने
आखिरी कश लेने से पहले,

मेरे पास माचिस भी है
और पानी भी  
मैं बुझता भी हूँ तो 
आखिर फिर से जलने के लिए.... 

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