Tuesday, October 15, 2013

इन्सानों की बलि...

दृश्य 1
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गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था उसने गुलदावदी से कहा यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ??? गुलदावदी इतराते हुये बोली, हाँ और नहीं तो क्या.... गेंदे ने बुझे मन से अपना ऑफिस बैग उठाया और दफ्तर की ओर चल पड़ा... पीछे से गुलदावदी ने आवाज़ लगाई आज दफ्तर से जल्दी आना, शाम को मंदिर जाना है... आते वक़्त रास्ते से इन्सानों के कुछ अच्छे बाल तोड़ लाना.... घने देख के ही लेना... और उनमे डैंड्रफ और जुएँ भी न हों.... 
शाम को लौटते वक़्त गेंदे ने देखा सभी इंसान गंजे ही हैं...
"कमबख्त पूजा वाले दिन बालों की बड़ी किल्लत होती है, साले सब सुबह सुबह ही सारे बाल काट ले जाते हैं... "
बड़ी देर बाद खोजने पर एक 4-5 साल की बच्ची दिखी, गेंदे ने सोचा "यार बिना बालों के ये कितनी बेरंग दिखेगी, फिर सोचा अगर इसके बाल नहीं लिए तो आज की पूजा अधूरी रह जाएगी...
फिर फटाफट उसके छोटे-छोटे बाल तोड़कर वो घर की तरफ चल पड़ा... 
"ये बाल चढ़ाने से पूजा ज़रूर सफल हो जाएगी.... "

दृश्य 2
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लंच का समय है, कैंटीन की कुर्सियों पर बैठे बकरे, ऊंट और भैंस अपनी अपनी घास खा रहे हैं... भैंसे ने बात शुरू की,  "अरे दोस्तो  **** पूजा आ रही है, कैसे मनाना है, कुछ सोचा है ??? "
"सोचना क्या है..."
"अरे पिछली बार जो हमने **** जाति के इन्सानों की बलि चढ़ाई थी, सब बेकार हुआ... देवी माँ खुश ही नहीं हुईं... गजब सूखा पड़ा था, साली हरी घास खाने को तरस गए थे... इस बार तो **** की ही बलि चढ़ाएँगे, मैंने पढ़ा है वो इंसान की सबसे ऊंची ब्रीड है.... इस बार माँ जरूर प्रसन्न होंगी..."
बकरे ने बात आगे बढ़ाई,
"यार इस बार तो अपने त्योहार पर हमने करीब 10000 हाई ब्रीड इन्सानों को इकट्ठा करके बांध रखा है... "
"वाह, क्या बात है..."
"हाँ, इस बार **** जरूर खुश होगा, जन्नत नसीब होगी हमारे बकरों को...."
ऊंट के चेहरे पर गजब का तेज़ आ गया,
"भाईजान, हमने भी तो 10000 गोरे इंसान मंगवाएँ हैं विदेश से, सुना है उसकी बलि देने पर सारी मिन्नतें पूरी हो जाती हैं...."
"वाह इसका मतलब मरने के बाद हम सबको ही स्वर्ग मिलेगा..."
ये बोलकर तीनों ठहाका लगाते हैं, और पूरा कैंटीन उनकी हंसी से गूंज पड़ता है..

लेखक की चिप्पी ...
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क्या किसी भी धर्म में ऐसा कोई त्योहार है जिसमे धार्मिक कारणों से छायादार पेड़ लगाने, फूल-पत्तियों के पौधे लगाने, या फिर पशु-पंछियों को आज़ाद करने की रस्म हो ??? इंसान द्वारा किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना फूलों को तोड़े हुआ पूरा नहीं होता.... कई अनुष्ठानों में अलग अलग पशुओं की बलि देने की भी प्रथा है... मैं यहाँ किसी धर्म विशेष को उचित या अनुचित ठहराने के लिए नहीं आया, बस सवाल इतना सा है कि उस ऊपर वाले के नाम की धार्मिक गतिविधियों में हम इसे धरती का भला क्यूँ नहीं कर सकते.... धर्म की पूर्ति के लिए पर्यावरण विध्वंस क्यूँ ???

ये उस युग की बात हो सकती है जब पेड़-पौधे और पशुओं की प्रजातियों की सभ्यता ने विकसित रूप ले लिया होगा... सोचिए अगर भैंस, बकरे और ऊंट भी इतने ही विकसित और धार्मिक होते और वे अपने काल्पनिक इष्ट जनक को खुश करने के लिए इंसानों की बलि दिया करते तब इंसानों तुम्हें कैसा लगता ???

9 comments:

  1. बहुत बढ़िया कटाक्ष.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-10-2013) "ईदुलजुहा बहुत बहुत शुभकामनाएँ" (चर्चा मंचःअंक-1400) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ज्वलंत प्रश्न करती साथ ही नि:शब्द करती संतुलित सोच ......... शुभकामनाएं

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  4. आज की बुलेटिन हैप्पी बर्थडे कलाम चाचा में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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  5. :) nihshabd... kahin aisa ho jata to ............!!

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  6. बिलकुल सही कहा आपने। बलि किसी भी दृष्टि से धर्म नहीं कही जा सकती। बलि तो ऐसी कुप्रथाओं की देनी चाहिए।

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  7. बहुत ही सुंदर सोच के साथ किया गया कटाक्ष ....

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