Monday, December 5, 2016

स्पोर्ट्स शूज़ पहनने वाली लड़कियां...


जूता भी मस्त चीज बनायी है इंसानों ने... मुझे लगता है इंसानी शरीर का सबसे मज़बूत हिस्सा पैर ही होता है लेकिन सबसे ज्यादा सुरक्षा भी पैरों के लिए ही ज़रूरी पड़ी... आखिर इस असमान ज़मीन को रौंदते हुए आगे बढ़ना ही तो ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा है... 

खैर, मेरा और जूतों का रिश्ता बड़ी देर से शुरू हुआ... हम ठहरे बिहार के एक छोटे से शहर के सरकारी बोर्ड के विद्यार्थी तो न ही कोई अनिवार्यता थी न ही कोई ज़रुरत... और तो और मुझे जूते पसंद भी नहीं थे, ऐसा लगता था जैसे बाँध दिया हो किसी ने पैरों को... जब पांचवीं में मेरा एडमिशन छोटे से अंग्रेजी स्कूल में कराया गया तो जूते की मजबूरी आन पड़ी, बड़ा मुश्किल दौर था... अकसर मैं क्लास में जूते उतार कर बैठता और पैरों को सांस लेने लायक हवा मिल जाती... अलबत्ता लडकियां जूतियाँ पहनती थीं, जो मुझे लगता था कि फीते वाले जूतों से ज्यादा आरामदेह होती होंगी.... वो चमड़े के जूतों का दौर था, स्पोर्ट्स शू नाम की चिड़िया ने शायद तब तक छोटे शहरों में सांस नहीं ली थी, बहुत हुआ तो कपड़े के PT शूज पहनते थे लोग... TV पर लोग दिखते स्पोर्ट्स शूज पहने हुए, एकदम चमक सफ़ेद भारी भरकम से.. देखने से ही ऐसे थे कि पहनने का कभी सोचा भी नहीं... 7वीं से हम फिर से सरकारी स्कूल में आ गए और फिर से हमने जूतों को अलविदा कह दिया... बिना जूतों के भी ज़िन्दगी मज़े में चलती रही... कभी कभार सर्दियों में बैडमिंटन मैच के लिए PT शूज पहनने की मजबूरी थी वो भी एक आध घंट एके लिए... 

इंजीनियरिंग में जब मैं हिमाचल रहने पहुंचा तो शायद पहली बार मैंने किसी लड़की को स्पोर्ट्स शूज पहने देखा... एक दो क्या लगभग सभी ने स्पोर्ट्स शूज ही पहने थे... हिमाचल की चढ़ाई-उतराई के लिए शायद वही जूते सही होंगे, उसपर से इतनी ठण्ड... लड़कियों के वो ज्यादातर गुलाबी या नीले स्पोर्ट्स शूज बड़े मस्त लग रहे थे, और जिस तरह से वो लडकियां एकदम आजादी के साथ तेज़ चलते हुए हिमाचल की पहाड़ी सड़कों पर चलती थीं ऐसा आत्मविश्वास मैं आज तक कभी किसी लड़की में नहीं देखा था... बिहार की लडकियां तो सलवार सूट पहने बाटा की सैंडल में धीमे क़दमों से चला करती थीं... 

मैंने भी उन्हीं दिनों अपने लिए स्पोर्ट्स शूज ख़रीदे थे, पहली बार पहना तो अक्कच जैसा लगा लेकिन जब एक दो दिन उसे पहनकर इधर उधर किया तो खुद के अन्दर भी आत्मविश्वास जैसा महसूस हुआ... उस दिन से जूतों की ऐसी आदत लग गयी जो आज तक नहीं छूटी...

तो क्या बस जूते भर पहन लेने से आत्मविश्वास आ जाता है, शायद नहीं... पर जहां तक मैंने Observe किया है, Regularly स्पोर्ट्स शूज पहनने वाली लड़कियों बाकी लड़कियों से ज्यादा confident होती हैं, कुछ तो मनोविज्ञान होता ही होगा... बहुत कम लडकियां हैं जो अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में जूते पहनती हैं, कारण कई हो सकते हैं... अभी पिछले साल की बात है जब Chembra Peak की ट्रैकिंग पर गया था वहां ज्यादातर लड़कियों ने सैंडल, फ्लोटर्स और कुछेक ने तो हील्स भी पहने थे... वो फिसलन भरी मुश्किल ट्रैकिंग करते वक़्त आस-पास कैसा नज़ारा होगा इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते.... क्या इतना मुश्किल होता है अपने Daily Routine में एक अदद जूते को शामिल करना, पता नहीं...

खैर, इसमें कोई दो राय नहीं कि वो लडकियां मुझे अलग से दिख जाती हैं क्यूंकि वो शूज उन्हें सर झुका कर छुईमुई झुण्ड में चलने वाली लड़कियों से अलग करते हैं... वो बिंदास चलती हैं, कैसे भी रास्तों पर बिना लडखडाये... ज़रुरत पड़े तो दौड़ भी लगाती हैं लिफ्ट को रोकने के लिए... दौड़ते वक़्त कमर सीधी होती है और हाथ भागते हैं यूँ आगे पीछे एक रनर की तरह.... स्कूटी की बजाय बाइक चलाना पसंद करती है और उन जूतों के साथ वैसे ही किक मारती हैं जैसे दुनिया को एक मेसेज देना हो, कैपिटल लेटर्स में... उनके कदम छोटे छोटे नपे तुले नहीं होते, ये लम्बे लंबे डग होते हैं उन लड़कियों के... वो स्पोर्ट्स शूज पहनने वाली लडकियां.... 

7 comments:

  1. आपकी बात से लगभग सहमत. न केवल जूते , जींस, trousers का भी यही प्रभाव होता है. परिधान के अनुसार ही पैर पड़ते हैं. साड़ी पहनने पर उठाना बैठना अलग गति, अलग तरीके से होता है. जींस और स्पोर्ट्स शूज पहनने पर पैरों के नीचे जैसे स्प्रिंग लग जाते हैं. किसी प्रतीक्षा जैसे, ट्रेन, विमान आदि में अपने आप यहाँ से वहाँ चलना, कुछ व्यायाम सा हो जाता है. बहुत अच्छा लिखा है आपने.

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    1. मैं ऐसे माता-पिता से भी मिला हूँ जिनको बेटियों का स्पोर्ट्स शूज पहन के जोग्गिंग करना पसंद नहीं.... ऐसे लोगों के लिए क्या कहना चाहेंगी.... :(

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  2. इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि परिधान/सज्जा न सिर्फ आपके लुक्स को एक नया रूप देते है बल्कि आत्मविश्वास में भी इजाफा करते हैं और यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। हालांकि आज भी सलवार-सूट पहनना और मेकअप/केयर न करना सभ्य लड़कियों के लक्षण माने जाते है पर अब ज्यादा फर्क नहीं पड़ता ☺

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  3. ये मुद्दा लड़कियों के लिए बहुत अहम् है. मैं भी इस पर एक पोस्ट लिखने वाली थी. अब तुम्हारी पोस्ट ही शेयर कर देती हूँ. मैं भी छोटे शहर से हूँ लेकिन चूँकि स्पोर्ट्स में रहती थी इसलिए स्पोर्ट्स शूज़ नाइंथ क्लास से पहन रही हूँ हालांकि वह लोकल कम्पनी के सस्ते शूज़ थे लेकिन फिर भी मेरे पास थे तो. :) पीटी शूज़ तो बचपन से ही पहने हैं.
    मैं तुम्हारी इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ कि स्पोर्ट्स शूज़ से बहुत आत्मविश्वास आ जाता है. जब मुझे ज्यादा चलना होता है तो स्पोर्ट्स शूज़ ही पहनकर निकलती हूँ और सर्दियों में तो हमेशा. यहाँ तक कि जब डीयू के एक कॉलेज में पढ़ाने जाती थी तब भी सर्दियों में सलवार सूट पर स्पोर्ट्स शूज़ ही पहनती थी. मुझे नहीं फर्क पड़ता कि कोई देखेगा तो क्या कहेगा. पैर हमारे शरीर का अहम् हिस्सा हैं, इन्हें सबसे अधिक आराम देना चाहिए. फैशन के पीछे पैरों और कमर की बड़ी बीमारियाँ लेकर घुमने से ज्यादा अच्छा है अच्छे जूते पहने जायं.

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  4. फेशन के अलावा जूतों का महत्त्व जीवन से गहरा जुड़ा है ये तथ्य है की लोग तो कितना कुछ कह जाते है ... जूते से पर्सनालिटी बता देते हैं ...

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  5. लड़कियों पर बड़ा ध्यान जा रहा है आज कल? :P

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    1. अभी नहीं जाएगा तो कब जाएगा... ;)

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