Sunday, December 7, 2025

धूप अब जलाने लगी है...

कभी ये धूप माँ जैसी लगती थी,
जो आँगन में खेलते बच्चे को चूम लेती थी…
अब वही धूप चुभने लगी है,
जैसे कोई नाराज़ हो गई हो,
बहुत दिनों से बोले बिना, बस तप रही हो।

हवाएँ भी अब कहानी नहीं कहतीं,
बस थककर बहती हैं ...
जैसे किसी ने उनके रास्ते पर
बहुत बोझ रख दिया हो।

पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है,
पर अफसोस , दिलों की नहीं।
समंदर ऊँचे हो रहे हैं,
पर इंसान की नीयतें और नीची।

हमने तरक्की के नाम पर
धरती की साँसें गिरवी रख दीं,
पेड़ों की जगह टॉवर लगाए,
फूलों की जगह एसी की हवा सूँघी,
और अब हैरान हैं कि बारिश रूठी क्यों है।

कभी-कभी लगता है,
धरती अब बोलना चाहती है,
कहना चाहती है कि “बस करो,”
पर हम मीटिंग्स, डेडलाइन्स,
और प्रॉफिट ग्राफ़्स में इतने उलझे हैं
कि उसकी खामोशी भी
हमारे लिए बस background noise बन गई है।

शायद एक दिन,
जब धूप जलाने लगेगी,
जब समंदर निगल लेंगे किनारे,
जब पंछी लौटेंगे ही नहीं,
तब हम समझेंगे,
कि ये सज़ा नहीं,
सिर्फ़ धरती का बदला हुआ अंदाज़ है।

Wednesday, December 3, 2025

अंतरद्वंद्व...

कभी लगता है,

वो ज़िंदगी बेहतर थी,
जब जेब में पैसे कम थे,
पर वक़्त ज़्यादा था।
जब बातें लंबी थीं,
और मतलब छोटे।

अब सबकुछ है,
सुविधा, सुरक्षा, स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे,
पर शायद वो “सच्ची मुस्कान”
कहीं पुराने दिनों की जेब में रह गई है।

कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या हमने तरक़्क़ी की है,
या बस अपने सवालों को
महंगे पर्दों के पीछे टाँग दिया है?

वो ज़िंदगी जिसमें सपने
साइकिल के पैडल के साथ भागते थे,
और ये ज़िंदगी,
जहाँ कारें हैं, पर मंज़िल नहीं।

शायद हम बेहतर जी रहे हैं,
पर महसूस कम कर रहे हैं।
वो पुराने दिन सादे थे,
पर सुकूनदार,
ये आज के दिन चमकदार हैं,
पर थके हुए।

कौन सी ज़िंदगी बेहतर थी,
शायद दोनों ही नहीं।
बेहतर तो बस वो पल था,
जब हम सोच नहीं रहे थे
कि कौन-सी बेहतर है।

Do you love it? chat with me on WhatsApp
Hello, How can I help you? ...
Click me to start the chat...