Tuesday, May 21, 2019

अगर ज़िन्दगी एक सफ़र है, तो तुम्हारे साथ ही चलना है....

इतनी सारी जगहें, इतने देश घूमने के दरम्यान इतना तो मुझे समझ आया कि तुमसे अच्छा ट्रेवल पार्टनर कोई नहीं है.. पता नहीं शायद तुम्हारे लिए कोई और भी हो, पर ऐसा कोई नहीं जिसके साथ मैं इतना आज़ाद होता हूँ, इन सारी ट्रिप में वायनाड ही है जिसमे सबसे ज्यादा मज़ा आया... 

मुझे याद है तुमने लद्दाख ट्रिप के वक़्त कहा था कि अगर मैं होता तो तुम्हें मज़े करने नहीं देता, हो सकता है किसी हद तक ये बात सच हो लेकिन यकीन मानो अगर मैं होता तो वो ट्रिप हम दोनों का ही सबसे यादगार ट्रिप होता... लेकिन इस अगर-मगर ने बहुत कुछ अधूरा छोड़ दिया मेरे अन्दर... 

अभी तो मेरे हिस्से बस एक काश ! ही रह गया है... न जाने कितने काश हैं जो कचोटते हैं, मन उदास होता है फिर लगता है कि क्या पता फिर मौका मिले... 

मैं सबसे बेसिक बात ही भूल गया था इन सालों में कि क्या पता कल हो न हो...

पूरी दुनिया घूमनी है बस तुम्हारे साथ, तुम्हें सच में बहुत मिस करता हूँ... जब किसी नई जगह जाओ तो तुम जिस तरह कहती हो न "Wow...!" बस वही हर वक़्त सुनाई देता है मुझे... अरसा हो गया ऐसा कुछ सुने हुए, इन सब बातों को मैं बस यादों में तब्दील नहीं कर सकता, ये तो मेरा हकीकत थी, हमारी ख़ुशी का जरिया... 


Saturday, February 23, 2019

अब इसका क्या शीर्षक हो भला...

वक़्त बहुत गुज़र गया है इन सालों में, उतना ही जितना कायदे से गुज़र जाना चाहिए था.. ज़िन्दगी भी वैसे ही चल रही है जैसे मामूली तौर पर चला करती है... कोई चुटकुला सुना दे तो हंस देता हूँ और कोई इमोशनल मूवी दिखा दे तो आंसू निकल आते हैं... कुछ भी ऐसा बदला नहीं है, जिसका जिक्र करना ज़रूरी मालूम पड़े... हाँ इन बीते सालों में सीखा बहुत कुछ, सीखा कैसे दुनिया दोतरफा बातें कर सकती है... कैसे मोहब्बत नफरत के सामने कमज़ोर नज़र आती है कभी-कभी, कैसे आप कुछ चाहें तो उसको हासिल करने का ज़ज्बा कितना कुछ करवा जाता है...

ज़िन्दगी आम तौर पर किसी लड़ाई से कम तो है नहीं, कभी अपनों से, कभी दुनिया से और कभी अपने आप से ही... इस लड़ाई के बीचो बीच मैं खड़ा होकर आसमां निहारा करता हूँ, मुझे सुकून पसंद है... इस लड़ाई में अकेले जाने का दिल नहीं करता, लगता है मुँह फेर लूं... 

ज़िन्दगी कई सारे झूठों के इर्द-गिर्द सिमट न जाए इसलिए दुनिया में मोहब्बत बनी होगी, ऐसा सच जो जीना मुकम्मल करता है... इस लड़ाई में जब आस-पास इश्क़ घुल जाए तो अच्छा लगता है, लगता है जैसे कोई एक इंसान तो है जो मेरे साथ खड़ा है... लगता है ज़िन्दगी इतनी लम्बी होने की ज़रुरत ही क्या थी, चार दिन की ही होती लेकिन मोहब्बत से भरी होती तो क्या बुरा था, क्यूँ इतना दर्द देखना भला... 

अजीब बात ये हैं कि कम से कम भारत में हर फिल्म, हर गाना मोहब्बत के इर्द गिर्द ही लिखने का दौर रहा है और इस देश को सबसे मुश्किल मोहब्बत समझने में ही लग गयी, साथ रहने-साथ होने के लिए मोहब्बत से ज्यादा ज़रूरी भी भला क्या हो सकता है... 

मेरे अन्दर लेखक कभी बसता था भी या नहीं, ये तो नहीं पता लेकिन अब जब कभी लिखने बैठता हूँ तो लगता है कि जैसे मेरी कलम पर एक बोझ सा आन पड़ा है, अपनी मोहब्बत को हमेशा साथ रखने का बोझ... उसके बिना तो जैसे कुछ कर ही नहीं पाऊंगा कभी... 

ऐसे अकेला बैठा बैठा कुछ भी बकवास लिखता रहूँ और तुम ये पढ़ते रहो तो मुझे ही बुरा लगेगा न... 

एक मुसाफिर, जो तारों को देखता था, चाँद को सहलाता था, आसमान को बांधता था, सुबह की सूरज की किरणों में सुकून महसूस करता था... जिसने तितलियों की आखें पढने की कोशिश की थी, जो जागती आखों से सपने देखता था, उसे तुम्हारा इंतज़ार रहता है इन दिनों... 

Sunday, December 16, 2018

आवारों सड़कों की मोहब्बत...

उन तंग गलियों में हाथों में हाथ डाले 
जनमती पनपती मोहब्बत देखी है कभी... 

उन आवारा सड़कों पर 
छोटी ऊँगली पकडे चलती ये मोहब्बत... 

उस समाज में जहां सपनों का कोई मोल नहीं, 
ऐसे में एक दूसरे की आखों में 
अपना ख्व़ाब सजाती ये मोहब्बत... 

नाज़ुक सी डोर से जुड़े ये दिल, 
लेकिन आस-पास के कंटीले बाड़ों से 
लड़ती उनकी ये मोहब्बत... 

उनके होठों पर एक कच्ची सी मुस्कान लाने के लिए 
दुनिया भर से नफरत मोल लेती ये मोहब्बत... 

जब लोगों ने अपने दिल में जगह न दी तो, 
सड़कों किनारे बैठे 
आसमां का ख्व़ाब देखती ये मोहब्बत... 

थक जाएँ टहलते हुए तो, 
पार्क के बेचों पर 
बैठने को जगह तलाशती ये मोहब्बत... 

मिलन की उम्मीद जब हताशा में बदल जाए तो 
किसी तन्हा शाम में 
तकिये नम करती ये मोहब्बत... 

इन बंदिशों, रंजिशों से पंगे लेते हुए 
दिल में मासूम एहसास 
संजो कर रखती ये मोहब्बत... 

जब मंजिल लगे धुंधली सी तब भी 
वहाँ तक पहुँचने के 
रास्ते से ही मोहब्बत करती ये मोहब्बत....

जब साथ जवान न होने दिया जाए
तो साथ बूढ़े होने को बेताब ये मोहब्बत...

साल-दर-साल की जुदाई में,
हर ख़त्म होते साल के साथ
अगले साल का इंतज़ार करती ये मोहब्बत...

न किसी महल की ख्वाईश, 
न ही किसी जन्नत की  
हमें मुबारक अपने आवारा सड़कों की ये मोहब्बत...


Wednesday, October 17, 2018

एक बुरे इन्सान का दुःख....

रौशनी चुभ सी रही है आँखों में... लगता है ये रौशनी जिसमें मैं खुद को देख सकूं और मुझे एक उदास सा इंसान दिखे इससे बेहतर है अँधेरे में विलीन हो जाना... ऐसे में जब कोई बेखयाली से ये कह दे कि I Hope you are fine तो जैसे अन्दर ही अन्दर घुटन का एक समंदर ज़ोरदार हिलोरे मारकर मेरी हिम्मत के सारे बाँध तोड़ जाता है...  दुखी होने से ज्यादा मुश्किल है उस दुःख के रहते हुए भी पूरे ज़माने के सामने ख़ुशी का लिबास ओढ़कर चलते रहना... ज़िन्दगी जिसे हम सालों के नम्बर्स के हिसाब से बांटते हैं उसकी आधी दहलीज पर खड़े होकर भी मुझे यहाँ लगता है जैसे I am standing on the square one....

शायद मैं उदास हूँ, शायद दुखी या फिर शायद डिप्रेस्ड.. इन कई सारे शायद के बीच चौराहे पे खड़े होकर मन करता है शायद कोई तूफ़ान, बवंडर, उड़ा ही ले जाए मुझे... खुद से गुमशुदा हो जाने को ही शायद मौत कहते होंगे, या फिर शायद ज़िन्दगी जब ज़र्रे-ज़र्रे में बिखर जाए तब... लेकिन ज़िन्दगी और मौत के बीच हमेशा एक कालकोठरी होती है, मौन की कालकोठरी... जब हम खामोश हो जाते हैं, इतने खामोश कि अपने गम, सुख, क्रोध हर नुक्कड़ पर बस मौन का दामन थामे आगे निकल जाना चाहते हैं... जब शब्दों का कोई औचित्य नज़र न आता हो... 


मौन एक खालीपन सा छोड़े दे रहा है चारों ओर, मेरे अंदर एक ऐसा सवाल कि लगता है अगर अपने आप को अभिव्यक्त करने से कोई खुद रोक ले तो कितने दिन जीवित रह पाएगा... शब्द उठते हैं और बिना पूर्ण हुए अंदर ही अंदर विलीन हो जाते हैं...  जबकि मेरी ज़िंदगी का ताना बाना शब्दों के ही इर्द गिर्द रहा हो हमेशा, कम से कम 18 सालों से तो ज़रूर, ऐसे में अचानक से किसी से कुछ न कहने और कुछ न लिखने के लिए खुद को मना रहा हूँ... शरीर खंडित सा हुआ जाता है, दिमाग के नसें फटी सी जा रही हैं... अगर मेरे शब्द कभी मेरी पहचान रहे हों तो आज वही शब्द मेरे सबसे बड़े दुश्मन मालूम पड़ते हैं... 

दुनिया भर की सारी खामियों का पुलिंदा समेटे चुपचाप ही बैठना चाहता हूँ कुछ वक़्त और... किसी से कोई शिकायत नहीं, बस एक मौन ही बेहतर है.... शायद कुछ दिनों के लिए या फिर हमेशा हमेशा के लिए... 

किसी के नज़र में बुरा हो जाने में कोई बुराई नहीं, पर इतना बुरा बन जाना कि इस वजह से वो किसी अपने से दूर होने लगे... इससे बेहतर है, खामोश हो जाना चाहे जैसे भी हो... वैसे भी बुरे इंसानों के दुःख मायने नहीं रखते...

मैं एक बुरा इंसान हूँ, इंतना बुरा कि सबका अच्छा सोचता हूँ... 

Saturday, October 6, 2018

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है...

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है,
में ठीक तो हूँ न, हर रोज़ यही सवाल करती है

शाम हो गयी है देखो, अंधेरा भी हो गया है
आँचल में समेटकर वो मुझको, हिम्मत बहाल करती है

माँ भूखी है. व्रत रखा उसने मेरी लम्बी उम्र के लिए,
माँ की भूख से मिली ये उम्र मुझसे ही सवाल करती है

मैंने सजाया है दस्तरखान जाने कितने पकवानों से
पर जब तक माँ न खिला दे, ये भूख बेहाल करती है...

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है,
में ठीक तो हूँ न, हर रोज़ यही सवाल करती है...


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