बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं, वो अक्सर पूछा करती है नया कब लिख रहे हो... मेरे पास कोई जवाब नहीं होता.. आखिर क्या कहूं, कितनी कोशिश तो करता हूँ लेकिन गीले कागज पर लिखना आसान नहीं होता... और वो स्याही वाली कलम तुमने ही तो दी थी न, उसकी लिखावट बहुत जल्द धुंधली पड़ जाती है... लेकिन वो ये बात नहीं समझती, और हर रोज यही सवाल पूछती है ...जानती हो उसने कितनी बार ही कहा तुम्हें भूल जाने को, शायद उसे मेरे चेहरे पर ये उदासी अच्छी नहीं लगती ... लेकिन तुम्हारे आने और लौट जाने के बीच मेरे वजूद का एक टुकड़ा गिर गया था कहीं, वो कमबख्त उठता ही नहीं बहुत भारी है... क्या ऐसा मेरे साथ ही होता है कि जो इस पल साथ होता है वो अगले पल नहीं होता...
मैं अब अजीब सी कश्मकश में हूँ, पहले जो शाम काटे नहीं कटती थी... नुकीले चाकू की तरह मुझे चीरने की कोशिश करती थी, अब वो फिर से तितली के पंखों की तरह चंचल हो गयी है... जो शाम तुम्हारे यादों के संग गुज़रती थी उसे अब उसने अपनी खिलखिलाहट से भर दिया है... पता नहीं कैसे... जो कुछ भी मैंने कहीं अपनी सबसे भीतरी तह के नीचे छुपा कर रख दिया था, उसे नीले आकाश की उड़ान भरते देख रहा हूँ...क्या ये वही शहर है जहाँ चाँद ने उगना छोड़ दिया था, कल रात देखा तो चाँद ज़मीन पर उतर आया था...
ये ज़िन्दगी उस मॉडर्न आर्ट पेंटिंग की तरह होती जा रही है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने उसे बनाया है... मुझे तलाश है बस अपने उस कलाकार की जिसकी बनाई तस्वीर में उलझा हुआ हूँ, ये मॉडर्न आर्ट बनाने वाले तस्वीरों पर अपना नाम भी कम ही लिखते हैं...

कितनी बार उसने मुझसे पुछा कि मैं जो तुम्हारे बारे में इतना कुछ लिखता हूँ तुम्हें इसकी कद्र भी है या नहीं, और मैं यही फैसला नहीं कर पाता कि ये मैं तुम्हारे काल्पनिक अस्तित्व के लिए लिखता हूँ या अपनी संतुष्टि के लिए या फिर कलम खुद-ब-खुद अपनी मंजिल ढूँढ लेती है... इन सभी उधेड़बुनों के बीच एक और ख्याल है जो मुझे बेचैन कर जाता है, जबकि उसे पता है मैं उसका नहीं हो सकता, फिर भी हर शाम वो मेरे पास आती है...
ये ज़िन्दगी उस मॉडर्न आर्ट पेंटिंग की तरह होती जा रही है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने उसे बनाया है... मुझे तलाश है बस अपने उस कलाकार की जिसकी बनाई तस्वीर में उलझा हुआ हूँ, ये मॉडर्न आर्ट बनाने वाले तस्वीरों पर अपना नाम भी कम ही लिखते हैं...
शत पतिशत सही ....
ReplyDeleteकह तो हम भी रहे थे बड़े दिनों से कि कुछ लिखो...थोड़ा क्रेडिट अपना भी बनता था... :)
ReplyDeleteकोई नहीं ....वैसे लिखे बहुत बढ़िया हो...
बहुत सही लिखा है|
ReplyDeleteज़िन्दगी की लकीरें अपने हाशिये से ही समझी जाती है
ReplyDeleteयह बैगनी चित्र आपके नाम.
ReplyDeleteसही बात कही है दोस्त।
ReplyDelete-----------
कल 03/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
bahut sundar shekhar ..tumhe padna hamesha hi achha lagta hai....
ReplyDeletelast para bahut badia w sahi hai...
shubhkamnaye
manjula
ठीक कहा है आपने ये ज़िन्दगी उस मॉडर्न आर्ट पेंटिंग की तरह ही है जिसे समझना बहुत मुश्किल है...
ReplyDeleteबिल्कुल सही
ReplyDeleteदोस्ती - एक प्रतियोगिता हैं
समय तो सबसे बड़ी सुलझन है।
ReplyDeleteबहुत खूब ....
ReplyDeletesach me tum mere jaise ho gaye ho, mahine me ek post...:D
ReplyDeletehaan yaar, ab jayda likh kar bhi kya mil jayega...bade bade dhurandhar baithe hue hain blog ki duniya hai...!
kuchh antaratma ki awaj kahe to likh dena jarur!
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waise ye to bata dete ki wo kaun hai, jo tumse puchhti hai aajkal likhte kyon nahi ho:D
बिल्कुल सही कहा।
ReplyDeleteअच्छी प्रस्तुति ..
ReplyDeletebilkul sahi and thanks for your friendship with me
ReplyDeletesahi hai ji bilkul sahi...
ReplyDeletesahi kha shekhar ...
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