लिखना कभी भी मेरी प्राथमिकता नहीं रही है, मैं तो ढेर सारे लोगों से मिलना चाहता हूँ, उनसे बातें करना चाहता हूँ...उनके साथ नयी नयी जगहों पर जाना चाहता हूँ.. लेकिन जब कोई आस-पास नहीं होता तो बेबसी में कलम उठानी पड़ती है... ये कागज के टुकड़े जिनपर मैं कुछ भी लिख कर भूल जाता हूँ, मुझे बहुत बेजान दिखाई देते हैं... जब मैं खुश होता हूँ तो वो मेरे गले नहीं मिलते, जब आंसू की बूँदें बिखरना चाहती हैं ये कभी भी मुझे दिलासा नहीं दिलाते... जो कुछ भी लिखता हूँ वो बस मेरा एकालाप है, जिसका मोल तभी तक है जब तक उसको लिख रहा हूँ... उसके बाद वो मेरे किसी काम के नहीं...ऐसा लगता है जैसे डायरी लिखना मेरे लिए ज़िन्दगी से किया गया एक समझौता है... जितनी ही बार कुछ लिखने की कोशिश की है उतनी ही बार खुद की हालत पे रोना आया है... वो ऐसा वक्त होता है जब आसपास तन्हाईयाँ होती हैं, जब सन्नाटे की आवाज़ कानो के परदे फाड़ डालना चाहती है, एक अकेलापन जिससे मैं भागना चाहता हूँ... ऐसे में खुद-ब-खुद कलम हाथ में आ जाती है... उस वक्त मैं अपने हाथ में कागज़ और कलम की छुअन महसूस करता हूँ, शायद कुछ देर के लिए ही सही लेकिन उस एहसास में खुद के अकेलेपन को भूल जाता हूँ...
अकेला होना या खुद को अकेला महसूस करना इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी ज़िन्दगी में कितने ऐसे दोस्त हैं जो वक्त-बेवक्त आपके पास चले आते हैं और वो सब कुछ जानना चाहते हैं जो कहीं न कहीं कोने में दबा बैठा है... कितने लोग आपकी ज़िन्दगी में वो हक़ जता पाते हैं कि आपकी हर खुशियों को अपने ख़ुशी समझें और हर गम को अपना गम... हर किसी की ज़िन्दगी में कुछ शख्स होते हैं जिनके बस साथ होने से आपको एक सुकून सा महसूस होता है... दोस्ती का रिश्ता सबसे खूबसूरत सा रिश्ता है शायद, जहाँ आप बिना कुछ सोचे बिना किसी झिझक के अपने मन की सारी बातें कर सकते हैं... दोस्ती से ज्यादा वाला रिश्ता तो कोई हो नहीं सकता लेकिन आज की इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में कब दोस्त आगे बढ़ जाते हैं पता ही नहीं चलता... कई बार ऐसा होता है कि जब आप ज़िन्दगी के किसी नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हों और वो दोस्त आपके साथ नहीं होते...
खैर बात हो रही है इस रद्दी की जो मैं यूँ ही ज़मा करता जा रहा हूँ, बीच बीच में कितनी ही बार इस रद्दी से दिखने वाले पन्नों को ज़ला दिया है मैंने, क्यूंकि ये मुझे किसी काम के नहीं लगते.... वहां से मेरा अतीत झांकता है, एक ऐसा अतीत जहाँ बहुत कम चीजें हैं याद रखने लायक... जो चीजें बीत गयीं उनको क्या याद रखना, उनको क्या पढना... मेरा यूँ रह रह के डायरी जला देना कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता, लेकिन उनको समझाना बहुत मुश्किल है मेरे लिए... मैं यूँ बिखरे हुए अतीत के कचरे के बीच नहीं रह सकता... घुटन होती है, खुद पे गुस्सा आता है... जो बहुत ज्यादा अच्छी या बुरी बातें हैं वो तो पहले ही दिमाग और दिल की जड़ों में चस्प हो गयी हैं... काश वहां से भी निकाल के फेक पाता उन बातों को...

मुझे ये डायरी नहीं उन लोगों का साथ चाहिए जिनसे मैं बेइन्तहां मोहब्बत करता हूँ... अगर हो सके तो मुझे बस वो अपनापन चाहिए जिसके बिना किसी का भी जीना या जीने के बारे में सोचना भी बस एक समझौता है ...
शेखर जी,अतीत जा चुका है वो अब आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता,कल आपके इंतज़ार में है और आप किन के जाने पर अफ़सोस कर रहे है,जिन्हें आपकी यह फीलिंग्स समझना नहीं आया..खुद को इतना अकेला मत समझिए प्लीज़..!!
ReplyDeleteaaj kalam hath yun chalayegi,
ReplyDeletesyahi ban aansun bahayegi....
aaj dard mein sath nibhayegi,
to kal sang sang gana gayegi....
bhtreen abhivaykti....
ReplyDeleteYaar atit tumhe tumhari galtoyon se sabak lene ki prerna deta hai. Atit main agar gam hai toh khusiyan bhi hai. Tere ander bahut talent hain. Tujhe bhale he ye raddi dikhai de par tere lekh inpar utarte hai to yeh raddi nahin,bhavnayien ban jati hai aur inka mahattta bahut adhik badh jati hai. Apne ko kabhi akela mat samajh,zamana tere sath hai. Hum bhi tere sath hai.
ReplyDeleteमैं फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया।
ReplyDeleteअतीत का स्वाहा हो जाना अच्छा ही होता है...
ReplyDeleteशुभ वर्तमान से सुन्दर भविष्य का निर्माण होगा!
शुभकामनाएं!
बीत गयी सो बात गयी. आपका विचार ठीक ही है....
ReplyDelete"बीच बीच में कितनी ही बार इस रद्दी से दिखने वाले पन्नों को ज़ला दिया है मैंने, क्यूंकि ये मुझे किसी काम के नहीं लगते.... वहां से मेरा अतीत झांकता है, एक ऐसा अतीत जहाँ बहुत कम चीजें हैं याद रखने लायक"
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है दोस्त मगर कुछ पन्नों के जला देने से यादें राख़ नहीं होती।
कल 13/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
बहुत ही अच्छा लिखा है आपने ...।
ReplyDeleteदर-असल जो दर्द कलम कि स्याही से होत हुआ कागज के पन्नों तक जाता है, वो पैदा दिल से हि हुआ होत है| लिखना उस दर्द को साझा करना है बस, दिल की टीस कागजों को जला देने से कम नहीं होगी, वो दिग्भ्रमित हो जायेगी, पुअर खो जायेगा , संभाल के रखो...पोस्ट बेचैन है!!!
ReplyDeleteमेरा ऐसा मानना है कि लिखे हुए जज़्बात कभी बी माने नहीं होते बाकी तो अपना-अपना नज़रिया है।
ReplyDeleteसमय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/2011/12/blog-post_12.html
http://aapki-pasand.blogspot.com/2011/12/blog-post_11.html
बहुत ही अच्छा लिखा है आपने| धन्यवाद|
ReplyDeletebhaavamay prastuti.
ReplyDeleteभूत से पीछा छुडाने के लिए ज़रुरी हो जाता है यूँ कागजों को जलाना ... सार्थक सोच
ReplyDeletekagaj aur kalam bejan nahi..akelepan mein hamare sabse achche sathi hote hai...jo hamari har baat sunte hai..
ReplyDeletedil ko chune vali aapki rachna
mere blog par bhi aapka swagat hai...:)
bahut achchha likha hai aapne... yashwant ji ki baaton se sahmat hoon ki kuch panne jala dene se yaaden rakh nahi hoti.....
ReplyDeleteदिल से निकला आत्मकथ्य!! ऐसे ही किसी लम्हे में सब कुछ जला डाला था, डायरियां, इबारतें जो दिल से लिखी थीं और सारे प्रेम-पत्र!! वे लोग अगर दुबारा मिला जाएँ तो इन कागजों की ज़रूरत नहीं रहेगी.. और अगर ना मिलें तो कागज़ इकट्ठा करके क्या फायदा!! यादें भी रद्दी की तरह ही तो हैं!!
ReplyDeleteकल १७-१२-२०११ को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
ReplyDeleteधन्यवाद!
अच्छा लिखा है आपने..
ReplyDeleteमगर यादों से पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल भी तो है !
अतीत की कहानी यादों की स्याही से कागज पे नहीं , दिलो-दिमाग पे लिखी रहती है ,जो कभी कभार
ReplyDeleteवर्तमान के आवरण से बाहर झांककर झकझोर देती है .
बहुत अच्छी रचना.
waqt kambakht hai....
ReplyDeletebhulna ek kosish, bhulana jarurat, par ye kadachit sambhav nahi....
Sidhe saade shabdon mein bahut kuch likh diya hai aapne....
Vyast Rahein, Mast Rahein
www.poeticprakash.com
सही कहा....
ReplyDeleteडायरी के पन्ने तो जला डालेंगे लेकिन जो पन्ने मन की डायरी के हैं उनका कोई उपाय हो तो बताएं...कभी लगता है की सब जला दिए लेकिन उन पन्नों पर लिखे अक्षर एकांत में अपने आप उभरने लगते हैं...कोई उपाय.....???
सुन्दर लेख कहूँ या मन की बातें...
jivan me bahut kuchh aisa hota hai jo jalane ke liye hota hai aur bahut kuchchh jala dene par bhi nahi jalta . wo hamesha kahi na kahi jinda rahta hai
ReplyDeletesari raddi jala den
ReplyDeletesahi kaha dost...lekin kya karein ye wahi raddi hai jise kabhi unke hath uthakar aankhon se choo kar hontho se budbuda diya karte the...tabse ye badi jiddi ho gayi hai...kai bahane rakhti hai khud ko na jalane dene ke...
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