बिना किसी वजह के, बस ऐसे ही।
ना कोई तारीख़ थी याद करने की,
ना कोई तस्वीर थी देखने की —
फिर भी मन ने एक हल्की सी दस्तक दी...
जैसे कोई पुराना गीत अचानक कानों में उतर आए।
मैं सोचता हूँ —
अगर कभी हम सच में फिर मिले,
तो क्या कहेंगे?
या बस वही करेंगे जो अधूरे लोग करते हैं —
एक हल्की सी मुस्कान,
थोड़ी असहज चुप्पी,
और नज़रें जो हर शब्द को टाल देती हैं।
तुम्हें पता है, अब मैं कुछ नहीं माँगता किसी से।
ना मुलाक़ात, ना वादा,
ना ही वो सब जवाब जो कभी दिल चाहता था।
अब बस यही चाहता हूँ
कि जब कभी तुम्हारे आस-पास हवा चले,
उसमें मेरा कोई पुराना सवाल न टकराए।
क्योंकि मैंने खुद को समझा लिया है,
कुछ लोग लौटते नहीं,
सिर्फ यादों की तरह ठहर जाते हैं।
कभी तुमसे बात करते-करते
जैसे वक्त थम जाता था,
अब वो ठहराव भी डराने लगा है।
कभी लगता है,
हम दोनों बस वक्त के दो छोर पर बैठे हैं,
एक को “क्यों” की आदत है,
दूसरे को “अगर” की।
अब बस यही चाहता हूँ,
कि तुम्हें सुकून मिले,
भले मैं उस सुकून का हिस्सा न रहूँ।
और जब कोई तुम्हारे लिए कॉफ़ी बनाए,
तो उसमें उतनी ही मिठास हो
जितनी हमारी चुप्पियों में हुआ करती थी।
अगर कभी तन्हाई बहुत घनी लगे,
तो आँखें मूँद लेना,
मैं वहीं रहूँगा,
तुम्हारे ख़याल की आख़िरी मुलायम मुस्कान में।
