Tuesday, June 2, 2015

हमको कुछ नहीं आता है पर गाय हमारी माता है...

साहब- गाय हिंदुओं की माता होती है इसलिए हमें उसका सम्मान करना चाहिए, उसकी पूजा करनी चाहिए...

मैं-अच्छा साहब गाय कब से हमारी माता है, मतलब किसी वेद में किसी ग्रंथ में, कहीं ऐसा उद्धरण जहां से पता चले कि अगर हम गाय को माता न माने तो हम हिन्दू ही नहीं हैं... 

साहब- सब कुछ उद्धरित हो ये ज़रूरी तो नहीं, गाय हमारी माता है तो है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए..... 

मैं- बराबर कह रहे हैं साहब, लेकिन फिर हम पिता, चाचा, मामा का सम्मान क्यूँ नहीं करते.... 

साहब(गुस्से में)- तुम हिन्दू हो या नहीं तुम्हें अपनी संस्कृति का मज़ाक बनाते शर्म नहीं आती....

मैं- माफ कर दीजिये सर, गलती हो गयी... अच्छा हम जो ये बेल्ट, पर्स, जूते पहनते हैं वो भी तो हमारी माँ की ही चमड़ी से बनता है, हम ये सब उपयोग क्यूँ करते हैं... आपके जूते भी तो उसके ही लग रहे हैं... 

साहब- --------------------

मैं- हमें तो ये सब रोक देना चाहिए.... 

साहब- हाँ क्यूँ नहीं हम ये सब बैन कर देंगे... 

मैं- क्या निर्यात भी बंद कर देंगे ???

साहब- ---------------------

मैं- अच्छा, जब हमारी माता सड़क किनारे कचरे में से पोलिथीन बीन कर खाती रहती है तब आप क्या करते हैं....

साहब- -------------------

मैं- अच्छा साहब, ये सब छोड़िए.... ये बताइये जो आपको असली माँ है जिसने आपको जन्म दिया है, दिन भर में कितने घंटे आप उसकी सेवा करते हैं.... 

साहब- -------------------

Wednesday, May 27, 2015

समानांतर धाराएँ...

दो दिन जो समानांतर हैं,
आपस में कभी मिल नहीं सकते,
लेकिन दिखते नहीं है ऐसे,
टेढ़ी-मेढ़ी सरंचनाएँ हैं इनकी,
मैं मिलता हूँ दोनों से
अलग अलग वक़्त पर...
सब कुछ वही रहता है, 
लेकिन मैं वो नहीं हूँ
जो मैं था आज के पहले
मैं बदलता रहता हूँ
गिरगिट के रंग की तरह...
फिर भी मुझे शंका होती है
मैं वही हूँ या
बदल जाता हूँ हर बार,
एक पूरा दिन
अकेला बिता लेने के बाद,
पता नहीं मैं हूँ या नहीं हूँ,
लेकिन जब था तब नहीं था....

Tuesday, May 5, 2015

क्रमशः...

मैं अंगारे सी धधकती
नज़्में लिखना चाहता हूँ
कि कोई छूए भी तो
हाथ झुलस जाएँ,
मेरे लफ़्ज़ों के कोयले से
आग को विशालतर कर
इस मतलबी दुनिया को
जला देना चाहता हूँ 
और बन जाना चाहता हूँ
इस ब्रह्मांड का आखिरी हिटलर...

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इंसान किसी और के गम में
या क्षोभ में नहीं रोता,
न ही रोना कमजोरी है कोई ...
रोना तो
बस जरिया है सेल्फ-डिफेंस का,
खुद को जंजीरों में कैद करने के बजाय
दूसरों के मन में दहशत बिठा देना,
आखिर सेल्फ-डिफ़ेंस मे की गयी
हत्या भी हत्या नहीं कहलाती...


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इंसान का खुश होना एक झूठ है 
और खुश न होना उससे भी बड़ा झूठ,
उसका दूसरा झूठ 
हमेशा पहले झूठ से 
बड़ा होता है, 
बढ़ता रहता है झूठ का व्याज
दिन-ब-दिन,
फिर वो एक झूठ बेचकर 
दूसरा झूठ खरीदता जाता है,
और इस तरह बन जाता है
झूठ का सच्चा सौदागर...

Sunday, April 19, 2015

बकासुर रसोई में...

एक वैबसाइट है JustEat, उनका स्लोगन है... Don't Cook, Just Eat... भई हमें तो बड़ी आपत्ति है इस स्लोगन से, क्यूँ न पकाएँ साहब !! जनाब ने स्लोगन तो रख दिया लेकिन खुदई को जब भूख लगती होगी तो अपने किचन की ही याद आती होगी... खुद के बनाए घर के खाने से भी स्वादिष्ट होती है कोई चीज भला, साफ-सुथरी जगह पर कम पैसों में बना लजीज खाना... अब जिनके हाथों में मेहंदी लगी हो वो खाएं होटल का खाना, 10 गुने दाम देकर वही खाना खाएँगे और फेसबुक पर चेक-इन दिखा के हीरो बन जाएँगे....

वैसे तो खाना बनाना कभी हमारा शौक नहीं था, हम तो शायर किसिम के आदमी थे... लेकिन जैसे शायरों की शायरी बिना दारू के बाहर नहीं निकलती, वैसे ही हमारे शब्द हमारे गुड़-मुड़ करते पेट के अंदर जमा रहते हैं.... खाना अंदर गया तो सारे जज़्बात ढुलक-ढुलक के बाहर आते हैं.... किसी भुक्खड़ ने कहावत भी हमारे जैसों के लिए ही लिखी हो शायद, क्यूंकी हमारे दिल का रास्ता बराबर हमारे पेट से ही होकर जाता है...  ऐसा भी नहीं है कि हमने कभी बाहर का खाना खाया ही नहीं, अब घर से निकले 13 साल से ज्यादा हो गए, हर जगह खाया लेकिन वो स्वाद कहीं नहीं मिला.... मिलेगा भी कैसे, जब खाना खुद के लिए और खुद की खुशी से बनाया जाये तब तो आएगा स्वाद...

अपन को अब भी याद है कि किचन में हमारी क्या मस्त धमाके के साथ हुयी थी, जब पहली बार चावल बनाया था तो प्रेशर-कुकर के सेफ़्टी वॉल्व ने 21 तोपों की सलामी दी थी, हम भी कहाँ हिम्मत हारने वाले थे ढक्कन खोल के बनाना शुरू किया, जितना भी पढ़ा था सारा फिजिक्स लगाने के बाद सही-सही चावल-पानी-समय का अनुपात निकालकर दोबारा ढक्कन बंद करने की हिम्मत दिखाई... थोड़े गीले ज़रूर बने थे लेकिन कसम से, इससे स्वादिष्ट तो कुछ नहीं खाया था इससे पहले.... खुद के बनाए खाने का स्वाद, ऐसा जैसे समुद्र मंथन करके अमृत निकाल लिया हो... ये बात अलग है कि वो अमृत हम किसी और को खिला देते तो वो भी "नीलकंठ" ही बन जाता...

हम पिछले एक साल से अकेले ही अपना फ्लैट लेकर रह रहे हैं, एकांत अच्छा लगता है न हमको... वैसे तो हम बहुत शांत गंभीर टाइप के इंसान हैं लेकिन जब भी खाना बनाने किचन में घुसते हैं तो बकासुर की आत्मा हमारे अंदर चली आती है, सोचते हैं जाने का-का बना लें कि दकच के खाने का मज़ा आ जाये... वैसे अगर आपको लगता है खाना बनाना कोनो आसान काम है तो आप बहुत सही सोच रहे हैं, बस आपके अंदर "फूड-स्विंग" होते रहने चाहिए....

चलिये अब आम जनता की बात करते हैं, बंगलौर में आधी से ज्यादा ऐसी जनता मिलेगी जो अपने हॉस्टल में मिलने वाले खाने से परेशान है... दिन भर का वही रोना, खाना अच्छा नहीं मिलता, अरे साहब तो बना लीजिये इसके लिए कौन सा हाथों में मशीन की ज़रूरत है....

वो तो भला हो हमारे कॉलेज के दोस्तों का कि उनकी संगत ने खाना बनाना सिखा दिया, और ऐसे दोस्तों का भी जिनके साथ रहे और उनको कुछ नहीं आता था, अब इससे एक अच्छी बात ये हो गयी कि हमें फुल एक्सपोजर मिल गया... वैसे भी ये ज़िंदगी में इतना तो समझ आ ही गया कि अगर सही समय पर एक्सपोजर न मिले तो इंसान पप्पू या गुड्डू बन के ही रह जाता है...

अब एक और बात है जो कीलियर करनी ज़रूरी है, जब भी हम खाने-वाने की फोटो फेसबुक पर डालते हैं तो हमारे जैसे कई बेचलर्स जल-भून के राख़ हुआ चाहते हैं और ये तक कह डालते हैं कि भई कभी बुलाओ खाने पे... ये साले फेसबुक ने भी ऐसा झुनझुना पकड़ा दिया है कि जब तक दस लोगों को जला न लो मज़ा नहीं आता.... खैर हम भी दाँत निकाल के कह देते हैं हाँ भई आओ और खुदई बना के खा लेना, हम भी कुछ मदद कर देंगे, अब साहब इनके हाथों में कोई मेहंदी लगी है या ये हमारे जमाई बाबू हैं जो इनको हम बना के खिलाएँ.... हाँ, अब कोई "खास" मेहमान हो तो बात अलग है....

आस-पास नज़र फिराने पर, खाने बनाने के और भी कई फायदे नज़र आ रहे हैं जो पर्सनल तौर पर शायद शादी के बाद पता चलें, अब अगर उस फायदे के बारे में ज्यादा बात किए तो जनता टांग खीचने लगेगी.... बाकी अपने देवांशु और PD भैया तो अपना जलवा दिखा ही रहे हैं बियाह के बाद...

चलिये बाकी बातें सीधे किचन से करते हैं, आज इतवार के शुभ अवसर पर हमने पूरी अय्याशी की, तड़ातड़ फोटो भी फेसबुक पर ठेल मारी... और जैसा यकीन था लोग-बाग मूंह बिसार के अपना लार समेटते रह गए... चलिये आप लोग भी ई बाजू वाला फोटो देखिये और (जो करना है कर लीजिये, हमको क्या.... )...

रात हो गयी और हम चले खाना बनाने, अगर आलस चरम पर है तो बाहर का खाना खाइये... और अगर किचन है तो जाइए खाना बनाइये और बोलिए 'बकासुर महाराज की... "जय..."

Tuesday, April 14, 2015

एकम एक, एक दूनी दो, एक तिया तीन...

आज की तारीख देख रही हो न.... तुम मानो या न मानो ये तारीख़ तो महज एक छलावा भर है... किसने कहा कि तुम्हें इसी दिन मुझसे प्यार हुआ था... क्या पता एक हफ्ते पहले हुआ हो, या एक महीने पहले या फिर सात जन्म पहले ही... हाँ बस ये तारीख ही है जो हमें याद है सलीके से, बाकी के जज़्बातों को तो तारीखों का जामा पहनाना मुश्किल ही है...
अजीब बात है न, हम ये तारीख ही तय नहीं कर पाते कि हमें प्यार हुआ कब था... अब प्यार कोई बाइनरि फ्लैग थोड़े न है, जो एक और सिफ़र के बीच ही सिमट जाये....
प्यार के इस analog सिग्नल को कितना भी ग्राफ में उतार लो पता कभी नहीं चलेगा कि आखिर किस Dimension पर दिल हाथ से निकल गया...

सुबह दफ्तर जाने की हड़बड़ी है और नींद ने भी आंखो में दस्तक दे दी है... बस एक इश्क़ का बटन ही है जो बंद होने का नाम नहीं ले रहा, उसपर ये बंगलौर का कातिल आशिक़ाना मौसम....

मैंने तुम्हारे लिए बहुत कुछ लिखा है, आगे भी लिखूंगा लेकिन क्यूँ न आज अपनी खामोशीयों को कुछ कहने दें.... आखिर उन लंबे सुहाने रास्तों पर टहलते हुये कई बार हमारी खामोशियों ने
भी बहुत कुछ कहा है एक दूसरे से....
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