Saturday, April 15, 2017

5 साल इश्क़ के...

वक़्त... ऐसा लगता है कि दुनिया में बस यही एक चीज है जिसका चलते रहना निश्चित है... देखो न वक़्त के पहिये ने देखते ही देखते 5 साल का सफ़र तय भी कर लिया और हमें खबर तक नहीं हुयी... वैसे हम जिस जन्मों-जन्मों के सफ़र पर निकल चुके हैं, ये तो उसका बस एक छोटा सा हिस्सा है... इन सालों में मैंने बहुत कुछ लिखा है, लगभग सारा कुछ बस तुम्हारे लिए या सिर्फ इसलिए कि तुम्हें मेरा लिखा पसंद आ जाता है(जाने क्यूँ भला)... 

जब कभी कोई कहता है मुझे
"तुम इश्क़ बहुत अच्छा लिखते हो..."
मैं याद करता हूँ तुम्हारी मुस्कान
और दोहरा देता हूँ मन-ही-मन
"तुम बहुत प्यारी लगती हो मुस्कुराते हुए..."
क्या करूँ,
मैं इश्क़ लिखता हूँ तो तेरी याद आती है...

पहले मैं कई तरह के अजीबोगरीब सपने देखा करता था, उन सपनों में उलझा हुआ बेतरतीब इंसान जाने क्यूँ तुम्हें पसंद आ गया... उस यायावर को तुमने जैसे स्थिर कर दिया, जैसे नदी में बहता हुआ कोई बड़ा सा पत्थर कभी किसी पेड़ के तने पे जा लगता है और अपनी सारी उम्र वहीँ टेक लगाए बिता देता है... वक़्त के साथ-साथ वो धीरे-धीरे ज़र्रा ज़र्रा सा होकर मिटटी में तब्दील हो जाता है और उसी तने में मिल जाता है... 

आज कल मेरे सपनों के आयाम द्विअक्षीय हो गए हैं जो बस तुम्हारी खुशियों और मेरी ज़िन्दगी के बीच कई सारी रेखाएं बनाते हैं, दरअसल मेरे सपने, मेरी ज़िन्दगी के शीशे पर तुम्हारी परछाईं का आपतन बिंदु है...

जैसे-जैसे हम अपने इस सफ़र एक-एक कदम बढाते जा रहे हैं, हमारा सफ़र और लम्बा और खूबसूरत बनता जा रहा है... तुम्हारी इन चमचमाती आखों को देखता हूँ न तो ज़िन्दगी का सारा अँधेरा सिमट के जैसे बह जाता है इस रौशनी में... हमने बहुत से ख्वाब देखे हैं और हम हर बढ़ते सालों के साथ उसे सजाते हैं, संवारते है और तह लगा के रख देते हैं अलमारियों में ताकि जब भी इन यादों की अलमारी खोलें बस इन खिलखिलाती यादों को अपनी ज़िन्दगी में चस्प होता पाएं... 

चार शब्द समेटता हूँ मैं,
बस तुम्हारे लिए....
इन लफ्जों को कोई 
अक्स- -गुल समझ लेना 
और टांक लेना अपनी 
जुल्फों के जूड़े में...
वो इब्तिदा - -इश्क की 
एक शाम थी जब 
हमने अपना खाली दिल 
तुम्हारे नाम कर दिया ...
आँखों से होते हुए तुम्हारी हम
दिल से, अपने दिल के, दिल में बस गए 
और सपनो से बुनी इस जिंदगी को 
सुबह--शाम कर दिया ...

तुम्हें पता है हम अभी जिस शहर आये हैं उसके लिए मैंने ये वाला दिन ही क्यूँ चुना... नहीं ये कोई इत्तेफाक नहीं... बस इस 5 साल के इश्क़ के पौधे को थोड़ी प्यार भरी छाँव मिले जाए...

देखा है तुमने कभी
मार्च की हवाओं का गुलदस्ता,
भरी है कभी पिचकारी में
मेरी साँसों की नमी...
कहो तो इस नमी में भिगो के लिए आऊं
तुम्हारे लिए कई सारे छोटे-छोटे चाँद....

चलो साथ में टहलने चलते हैं... मैं, तुम और हमारा ये 5 साल का इश्क़... 

Sunday, April 9, 2017

आधे-आधे सपने...

ये तस्वीर बस यूँ ही... :)
मेरी लिखी हर नज़्म
एक कचिया है,
हर शाम की तन्हाई के खेत में
उपज आई लहलहाती फसल को जो काट देती है
हर सुबह...

****************

मैं ऊब जाना चाहता हूँ
इस दुनिया से हमेशा के लिए
पर ऊब नहीं पाता...
मैं डूब जाना चाहता हूँ
कहीं किसी समंदर में
पर डूब नहीं पाता...
ऐसी चाहतें
ट्यूबवेल के नीचे लगे पत्थर
पर जमी कजली है...

****************

हर रात एक रेल की पटरी है
जिसपर मैं हर रात 2 से 4 बजे के बीच
सपनों की ट्रेन चलाता हूँ,
मेरे सपने इन दिनों,
पैसेंजर ट्रेन की यात्रा करते हैं,
हर छोटे हाल्ट-स्टेशनों पर रुकते हुए...
कभी-कभी मेरी नींद
अपनी गति बढ़ा कर
किसी हाल्ट तो लांघ दे तो
वो सपने उतर जाते हैं ट्रेन से
एक झटके में जंजीर खींचकर...

Sunday, March 26, 2017

पसीने से बहती कहानियां...

मेरे उतारे हुए मोज़े से
आती है
पसीने की अजीब सी गंध,
जैसे कुछ कहानियां और कुछ नज्में
थक गयी हों मेरे साथ चलते हुए
और बह गयी हों
पैरों के रास्ते से...

बीती रात
एक चूहा चुरा ले गया
छत पे पसरे उन मोजों को,
जाने उसे मेरी कौन सी कहानी
पसंद आ गयी होगी,
और उसे कुतर कर
बना लिया होगा
अपने लिए उन बिखरे शब्दों का बिल...

Monday, February 27, 2017

ब्लॉग, ज़िन्दगी और मैं... पिछले कई गुज़रे सालों का सफ़र...

आज से 17 साल पहले लिखना इसलिए शुरू हो गया कि किसी को मेरा लिखना बेइंतहा पसंद था, उस वक़्त तो मैं पता नहीं क्या क्या लिख देता था, और वो मुस्कुरा देती थी... जिद्दी थी और पागल भी... सोचता हूँ अगर वो इतनी जिद नहीं करती तो क्या मैं आज इतना सब कुछ लिख भी रहा होता या नहीं... उसका ये एहसान ही रह गया मुझपर, न चुका पाया और न ही भूल पाया... मेरा लिखा हर कुछ बस एक क़र्ज़ के नीचे रह गया.. अगर किसी को भी मेरे लिखे का एक कतरा भी पसंद आये तो मुझे अजीब सा लगता है... मुझे राइटर बनाने की उस एक जिद ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी... कहते हैं कि पहला प्यार सबसे हसीं होता है, लेकिन जब पहली बार दिल टूटे तो दर्द भी बड़ा होता है, इतना बड़ा कि उससे उबरने में सालों लग जाते हैं, सदियाँ भी कभी कभी... प्यार लिखते-लिखते अचानक से लिखने में बस दर्द ही बाकी रह गया... उस दौर का हर एक दिन पन्ने पन्ने में संजोया था, उस वक़्त शायद अगर ये ब्लॉग होता तो हर कोई पढ़ पाता... जितना प्यार मैंने उस वक़्त लिखा उतना फिर कभी नहीं लिख पाया, सोचता हूँ कि मैंने प्यार किया ज्यादा या लिखा ज्यादा.... पता नहीं... 

खैर उस डायरी के प्यार को एक दिन राख में तब्दील कर दिया... करीब 3 साल तक फिर कुछ नहीं लिखा एक शब्द भी नहीं... 

फिर 7 साल पहले 2010 में जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो सोचा भी नहीं था कि इतना कुछ लिख जाऊँगा... पहला ब्लॉग मज़े मज़े में बना लिया था, नाम रखा "Cyclone of Thoughts..." और पहली पोस्ट डाली "Who is Thakrey..."   :P 

फिर दो पोस्ट और डाली लेकिन ब्लॉग का पता बहुत लम्बा रख लिया था, तो अच्छा नहीं लगता था फिर हद से ज्यादा छोटा करके i555.blogspot.com कर लिया, उस वक़्त अंग्रेजी ब्लॉग्गिंग का भूत था लेकिन अंग्रेजी में कभी लिखा नहीं, हाँ ब्लॉग का नाम ज़रूर अंग्रेजी में था, अब तक हम 'Cyclone' से सीधा 'Whispers' पर आ गए थे... नाम था "Whispers from a Silent Heart... " अच्छी चल निकली थी दुकान, ब्लोगिंग का चस्का लग चुका था... उस वक़्त ब्लॉग पर पहेलियाँ भी खूब चलीं... "पहचान कौन" पहेली के नाम से लोगों को हमारा ब्लॉग पता चला... अच्छा दौर था, पहली बार मेरी पहचान उन लोगों के बीच हो रही थी जिनसे मैं कभी मिला नहीं था, हाँ फ़ोन फ्रेंड, लैटर फ्रेंड (उस वक़्त फेसबुक अब जैसा शक्तिशाली नहीं था.... ) बहुत थे पर अजनबियों के बीच खुद को खड़ा करने का मज़ा ले रहां था मैं... 

खैर वापस ब्लॉग पर आते हैं, मैं उन दिनों कुछ भी अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में नहीं लिखता था... सच कहूं तो डर लगता था कि लोग पढेंगे तो क्या सोचेंगे, वही डर जिसने पूरी दुनिया को अपंग बना रखा है.. इसी दौरान मेरा वो ब्लॉग एक दिन अचानक से गायब हो गया, उस वक़्त लगा था कि हैक हो गया है लेकिन अब जब मैं खुद साइबर सिक्यूरिटी में हूँ तो लगता है कुछ और ही हुआ होगा... सारी पुरानी पोस्ट गायब अचानक से ख़त्म हो गयी थी, और मैंने कुछ संजोया भी नहीं था... प्रशांत भैया ने कुछ पोस्ट्स अपने फीड रीडर से निकाल के दीं, हालाँकि जब मैंने उनको पढ़ा तो लगा जाने क्या बकवास लिखा था.... मेरे लिए शायद ये वेक अप कॉल था, मैं एक ब्लॉगर की तरह लिख रहा था जबकि मैं एक लेखक की तरह लिखना चाहता था... नया ब्लॉग बनाया और फिर से लिखना शुरू किया, पहले से कुछ अलग ये सोचे बिना कि कोई इसे पढ़ भी रहा होगा... 

पता नहीं, वो बेहद उदास शाम थी जब मैंने बेपरवाही के साथ अपनी ज़िन्दगी का एक पन्ना खोल के ब्लॉग पर लगा दिया... पता नहीं कितने लोगों ने पढ़ा, खुद से रिलेट किया लेकिन पहली बार मुझे ब्लॉग पर कुछ लिखकर अच्छा सा लग रहा था, फिर मैंने अपने बारे में, अपनी ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ लिखा... लोग क्या कहेंगे वाला डर निकल गया था, हालाँकि ये लगता था कि कोई घर से न पढ़ ले... बहुत कुछ लिखा उस दरमयान... 

2011-2012 मेरी ज़िन्दगी के सबसे उथल-पुथल वाले सालों में से रहा, उन दिनों मैंने बहुत कुछ पाया... ढेर सारा लिखा, उन दिनों ज्यादा लिखने की वजह भी बहुत ख़ास थी... जबकि आपको पता हो आपके ठीक पीछे बैठ के कोई ब्लॉग के पोस्ट होने का इंतज़ार कर रहा हो... सच में प्यार से ज्यादा खूबसूरत वो वक़्त होता है जब प्यार हो रहा होता है... प्यार किसी भी वक़्त हो, किसी भी उम्र में हो लेकिन जब ये हो रहा होता है न हम एक टीनएजर से ज्यादा कुछ नहीं होते... मैंने उस वक़्त अपनी ज़िन्दगी में जो भी सोचा, जो भी किया सब कुछ लिखा, शायद सिर्फ इसलिए कि मेरे पीछे बैठी अंशु पढ़ सके उसे... उसे पीछे से झाँकने में इसके लिए मैंने क्लास में अपनी सीट पीछे कर ली थी... कमाल है न, इसी ब्लॉग से उसने मुझे जाना, इसी ब्लॉग पर मैंने उससे बातें कीं, यहीं प्यार का इज़हार भी कर दिया... 

सच कहूं तो मैंने खुद के लिए बहुत कम ही लिखा, पहले किसी और के लिए लिखा करता था और फिर किसी और के लिए... हाँ लिखने के लिए कुछ "push" तो चाहिए ही होता है न...

आजकल यहाँ कम ही लिखता हूँ, मैं वापस उसी डर में चला गया हूँ कि लोग पढेंगे तो क्या कहेंगे... :)

Monday, December 12, 2016

कांच के शामियाने... सिर्फ उपन्यास या किसी का सच...

ये उपन्यास जब आने वाला था तब ही सोचा था पढूंगा ज़रूर, जब आया तब थोडा उलझ गया निजी ज़िन्दगी के उलट फेरों में... इस बीच फेसबुक और ब्लोग्स पर समीक्षाएं आनी शुरू हुयी.... जब भी कोई फिल्म या किताब देखनी-पढनी होती है तो उसकी समीक्षा पढना अवॉयड करता हूँ... इससे पूर्वाग्रह बनने का खतरा रहता है इसलिए... लेकिन न चाहते हुए भी नज़र तो पड़ ही जाती है, तो एक आध झलक से ये समझ में आ गया कि नारीवादी उपन्यास है.... अलबत्ता ये "वादी" वाला फंडा मुझे आज तक समझ नहीं आया... ये वाद वो वाद... इतिहास-नागरिक शास्त्र में भी समाजवाद, पूंजीवाद से लेकर साम्राज्यवाद की परिभाषा याद करते करते "वाद" शब्द से ही नफरत हो गयी... और ये "नारीवादी" कहलाना अच्छी बात है या बुरी पता नहीं, कितनी बार तो मेरी माँ ही मुझे नारीवादी कह देती हैं और जिस तरह से कहती हैं उससे साफ़ लगता है कि उनको पसंद नहीं कि मैं नारीवादी बनूँ... इस बात का मैं क्या मतलब निकालूँ पता नहीं... 

खैर, वापस किताब पर आते हैं... "नारीवादी" उपन्यास सुखद तो नहीं हो सकता है इतना मुझे यकीन था तो मैंने इसे पढना कुछ दिनों के लिए टाल दिया, शायद उस समय मैं उदास होना अफोर्ड नहीं कर सकता था... २० अगस्त शनिवार की रात यूँ ही खाली बैठे बैठे उठा ली किताब पढने के लिए... बमुश्किल २० पन्ने पढने के बाद रश्मि दी को मेसेज किया कि बहुत डार्क उपन्यास लग रहा है पढूं या नहीं... उन्होंने मना कर दिया, मत पढो... अब मैं और गफलत में था, फिर नहीं पढने का फैसला किया... 
काफी देर तक आधी-उनींधी नींद में करवट बदलते बदलते फाइनली फिर से किताब उठाई.... करीब 2 बज रहे थे तो इतना यकीन था कि अगर पूरी पढ़ी तो सुबह तो हो ही जायेगी...

पूरी किताब पढ़ते बस खुद को यकीन दिलाता रहा कि ये बस एक कहानी है और कुछ नहीं... राजीव जैसे लोग नहीं होते और कोई जया नहीं है जो ये सब कुछ झेल रही है... गुस्सा, क्षोभ या बेबसी कुछ तो ज़रूर महसूस हुयी, बार-बार लगा कि किसी तरह इस कहानी में घुस जाऊं और जया की कुछ मदद कर सकूं.... पता नहीं ऐसे सामाजिक और पारिवारिक हालातों में कितनी औरतें जया जैसी हिम्मत दिखा पाती होंगी... कई महिलाओं ने आत्महत्या तक का कदम उठाया है, इतिहास इस बात का गवाह रहा है... "धोबी घाट" फिल्म में भी ऐसे ही एक हिस्से को डाला गया था, फिल्मों में-किताबों में हम इस तरह का कुछ पढ़ कर कितना भी दुखी हो लें लेकिन वास्तविक में अगर कहीं जया है तो उसे ये किताब पढने की ज़रुरत है ताकि वो इन हालातों से लड़कर बाहर आये, न कि घुट घुट कर जीते रहे... जब उपन्यास पढ़कर ख़त्म किया तो करीब सुबह के ५ बज चुके थे, नींद गायब थी पर थोड़ी करवट बदलते बदलते आ गयी आखिर... सबको ऐसे ही नींद आ गयी होगी ये पढ़कर वो मैं पक्का नहीं बता सकता.... 

"कांच के शामियाने" एक लड़ाई है जो सबको लड़नी आनी चाहिए.... हालाँकि ये लड़ाई इंटरवल के बाद शुरू होती तो शुरू का आधा उपन्यास बस टीस पहुंचाता है, लेकिन अन्दर रौशनी और उसको हासिल करने की हिम्मत जगानी है तो पहले अँधेरा दिखाना पड़ेगा...

ये किताब अभी भी मिल रही है वो भी बस 72 रुपये में... नहीं पढ़ी हो तो पढ़ सकते हैं... शैलेश जी के छापेखाने से नयी वाली हिंदी की इतनी अच्छी किताबें निकल रही हैं देखकर अच्छा लग रहा है... 
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