मेरी सारी दौलत , खोखले आदर्श,
नकली मुस्कराहट

दो पल के लिए ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ...
कभी डाँटकर, कभी डपटकर
कभी माथे को सहलाकर,
अपने होने का एहसास दिलाती है माँ...
जब डरा सहमा सा,
रोता हूँ मैं
मेरे आंसू पोंछकर,
अपने आँचल में छुपा लेती है माँ...
जब रात्रिपहर में निद्रा से दूर
करवट बदलता रहता हूँ मैं,
अपनी गोद में सर रख कर
लोरी सुनाती है माँ...
परेशान वो भी है अपनी ज़िन्दगी में बहुत,
पर हँसी के परदे के पीछे,
अपने सारे गम छुपा जाती है माँ .......
अति उत्तम विचार.....
ReplyDeleteso true...
ReplyDeletema hotee hee aisee hai
bhavuk abhivykti..
शेखर भाई ..बड़ा अच्छा लिखा है .
ReplyDeleteहर एक पंक्ति बहुत ही बढ़िया है .
वैसे माँ के वारे में जितना कहा जाए
वो उतना ही कम है.
Bahut pyari kavita...kabhi humne bhi aisi ek koshish ki thi.. padhiyega aap, shayad achhi lage...
ReplyDeletehttp://monali-feelingsfromheart.blogspot.com/2009/03/maa.html
बहुत सुन्दर भाव से रची गयी अच्छी रचना
ReplyDeleteदिल भारी हुआ आज।
ReplyDeleteयह सुन्दर कविता पढकर अपनी माँ की याद आ गई।
चार साल पहले चल बसी।
सचमुच, माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता।
Lovely and touching lines indeed.
बहुत मन करता है कि उनकी याद में लंबी टिप्पणी लिख भेजूँ।
पर नहीं। लघु कविता पर लघु टिप्प्णी ही उपयुक्त रहेगी।
शुभकामनाएं
जी विश्वनाथ
bahut sundar kavita...
ReplyDelete-
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बच्चो के उत्साहवर्धन हेतु एक लघु प्रयास, कृपया आप अवश्य पधारे :
मिलिए ब्लॉग सितारों से
Maa aisee hee hoti hai...aankhen nam ho gayeen...
ReplyDeleteअच्छी पंक्तिया लिखी है ........
ReplyDeleteइसे पढ़े और अपने विचार दे :-
क्यों बना रहे है नकली लोग समाज को फ्रोड ?.
भाई, इतनी रात गए उदास कर दिए आप.. हर रोज कि तरह आज भी माँ से बात हुई, लेकिन मुझे पता ही नहीं कि जीतिया है.. कुछ पूछा ही नहीं मैंने.. :(
ReplyDeleteओह! क्या कहूँ इस रचना पर..बस! सुन्दर!
ReplyDeleteमाँ तो आखिर माँ होती है ना………………बहुत सुन्दर्।
ReplyDeletebahut acchhi kavita...maa ke naam se kavita likhe yaa gaanaa gaayen acchhi hi hoti hai....subhkamanaaye.
ReplyDeleteमां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं...सुकोमल भावनाओं से युक्त सुंदर रचनां।
ReplyDeleteशेखर भाई माँ के वारे में जितना कहा जाए
ReplyDeleteवो उतना ही कम है.
सबसे पहले:
ReplyDeleteआपकी शिकायत, मैं आपकी रचनाएँ पढने नहीं आता!
ऐसा नहीं है बंधुवर! मैं लिखता महीने में एक बार हूँ पर पढता तीस बार!
जब कुछ नया पोस्ट करें तो ईमेल द्वारा लिंक भेजें, मेरे लिए सुविधाजनक होगा!
अब आज की रचना:
भावपूर्ण रचना. हमारे यहाँ इसी तरह का त्यौहार दिवाली के निकट होई/ अहोई अष्टमी के रूप में मनाया जाता है!
भगवान सब जगह नहीं हो सकता था, इसलिए माँ का सृजन किया उसने!
आपकी आज्ञा से माँ का वंदन मेरे शब्दों में:
मेरा जीवन मेरी साँसे,
ये तेरा एक उपकार है माँ!
तेरे अरमानों की पलकों में,
मेरा हर सपना साकार है माँ!
तेरी छाया मेरा सरमाया,
तेरे बिन ये जग अस्वीकार है माँ!
मैं छू लूं बुलंदी को चाहे,
तू ही तो मेरा आधार है माँ!
तेरा बिम्ब है मेरी सीरत में,
तूने ही दिए विचार हैं माँ!
तू ही है भगवान मेरा,
तुझसे ही ये संसार है माँ!
सूरज को दिखाता दीपक हूँ,
फिर भी तेरा आभार है माँ!
बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! उम्दा प्रस्तुती!
ReplyDeletebas khuda ke bad man ka darja hi aya hai
ReplyDeleteसुमन जी माँ को समर्पित आपके शब्द एक सुकून दे गए ....जिसने माँ की कद्र करनी सीख ली
ReplyDeleteरब्ब ने उसकी झोली खुशियों से भर दी ....रब्ब आप पर भी मेहरबान होगा ....!!
बहुत सुन्दर........
ReplyDeleteVery touching.
ReplyDeleteख़ूबसूरत और भावपूर्ण प्रस्तुती!
ReplyDeleteबहुत ही ख़ूबसूरत कविता लिखी है....अगर बेटे को माँ के त्याग का अहसास हो..इस से ज्यादा किसी माँ को क्या चाहिए....अन्तिमे पंक्तियाँ बहुत सुन्दर हैं....God Bless U
ReplyDeletevery touching.....liked it very much...
ReplyDeleteआपकी रचना पढके माँ की कमी का अहसास और गहरा हुआ ......वो भी ये व्रत रखती थी ...वाकई माँ का होने का मतलब होता है एक संबल का साथ होना ...
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