Thursday, September 30, 2010

माँ...

आज के दिन हमारे बिहार में एक पर्व मनाया जाता है, " जीवित्पुत्रिका व्रत "..... आम भाषा में कहें तो "जिउतिया" | इस पर्व में माँ अपनी संतानों की मंगलकामना और लम्बी उम्र हेतु उपवास रखती है.... समय के अभाव में कुछ नया लिख नहीं पाया इसलिए दुनिया की हरेक माँ के चरणों में अपनी एक पुरानी कविता समर्पित कर रहा हूँ..... 
मेरी सारी दौलत , खोखले आदर्श,
नकली मुस्कराहट
सब छीनकर,
दो पल के लिए ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ...
कभी डाँटकर, कभी डपटकर
कभी माथे को सहलाकर,
अपने होने का एहसास दिलाती है माँ...
जब डरा सहमा सा,
रोता हूँ मैं
मेरे आंसू पोंछकर,
अपने आँचल में छुपा लेती है माँ...
जब रात्रिपहर में निद्रा से दूर
करवट बदलता रहता हूँ मैं,
अपनी गोद में सर रख कर
लोरी सुनाती  है माँ...
परेशान वो भी है अपनी ज़िन्दगी में बहुत,
पर हँसी के परदे के पीछे,
अपने सारे गम छुपा जाती है माँ .......

25 comments:

  1. अति उत्तम विचार.....

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  2. so true...
    ma hotee hee aisee hai
    bhavuk abhivykti..

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  3. शेखर भाई ..बड़ा अच्छा लिखा है .
    हर एक पंक्ति बहुत ही बढ़िया है .
    वैसे माँ के वारे में जितना कहा जाए
    वो उतना ही कम है.

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  4. Bahut pyari kavita...kabhi humne bhi aisi ek koshish ki thi.. padhiyega aap, shayad achhi lage...
    http://monali-feelingsfromheart.blogspot.com/2009/03/maa.html

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  5. बहुत सुन्दर भाव से रची गयी अच्छी रचना

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  6. दिल भारी हुआ आज।
    यह सुन्दर कविता पढकर अपनी माँ की याद आ गई।
    चार साल पहले चल बसी।
    सचमुच, माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता।
    Lovely and touching lines indeed.
    बहुत मन करता है कि उनकी याद में लंबी टिप्पणी लिख भेजूँ।
    पर नहीं। लघु कविता पर लघु टिप्प्णी ही उपयुक्त रहेगी।
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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  7. bahut sundar kavita...
    -
    -

    बच्चो के उत्साहवर्धन हेतु एक लघु प्रयास, कृपया आप अवश्य पधारे :

    मिलिए ब्लॉग सितारों से

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  8. Maa aisee hee hoti hai...aankhen nam ho gayeen...

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  9. अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    इसे पढ़े और अपने विचार दे :-
    क्यों बना रहे है नकली लोग समाज को फ्रोड ?.

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  10. भाई, इतनी रात गए उदास कर दिए आप.. हर रोज कि तरह आज भी माँ से बात हुई, लेकिन मुझे पता ही नहीं कि जीतिया है.. कुछ पूछा ही नहीं मैंने.. :(

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  11. ओह! क्या कहूँ इस रचना पर..बस! सुन्दर!

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  12. माँ तो आखिर माँ होती है ना………………बहुत सुन्दर्।

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  13. bahut acchhi kavita...maa ke naam se kavita likhe yaa gaanaa gaayen acchhi hi hoti hai....subhkamanaaye.

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  14. मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं...सुकोमल भावनाओं से युक्त सुंदर रचनां।

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  15. शेखर भाई माँ के वारे में जितना कहा जाए
    वो उतना ही कम है.

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  16. सबसे पहले:
    आपकी शिकायत, मैं आपकी रचनाएँ पढने नहीं आता!
    ऐसा नहीं है बंधुवर! मैं लिखता महीने में एक बार हूँ पर पढता तीस बार!
    जब कुछ नया पोस्ट करें तो ईमेल द्वारा लिंक भेजें, मेरे लिए सुविधाजनक होगा!
    अब आज की रचना:
    भावपूर्ण रचना. हमारे यहाँ इसी तरह का त्यौहार दिवाली के निकट होई/ अहोई अष्टमी के रूप में मनाया जाता है!
    भगवान सब जगह नहीं हो सकता था, इसलिए माँ का सृजन किया उसने!
    आपकी आज्ञा से माँ का वंदन मेरे शब्दों में:

    मेरा जीवन मेरी साँसे,
    ये तेरा एक उपकार है माँ!
    तेरे अरमानों की पलकों में,
    मेरा हर सपना साकार है माँ!
    तेरी छाया मेरा सरमाया,
    तेरे बिन ये जग अस्वीकार है माँ!
    मैं छू लूं बुलंदी को चाहे,
    तू ही तो मेरा आधार है माँ!
    तेरा बिम्ब है मेरी सीरत में,
    तूने ही दिए विचार हैं माँ!
    तू ही है भगवान मेरा,
    तुझसे ही ये संसार है माँ!
    सूरज को दिखाता दीपक हूँ,
    फिर भी तेरा आभार है माँ!

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  17. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! उम्दा प्रस्तुती!

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  18. bas khuda ke bad man ka darja hi aya hai

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  19. सुमन जी माँ को समर्पित आपके शब्द एक सुकून दे गए ....जिसने माँ की कद्र करनी सीख ली
    रब्ब ने उसकी झोली खुशियों से भर दी ....रब्ब आप पर भी मेहरबान होगा ....!!

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  20. ख़ूबसूरत और भावपूर्ण प्रस्तुती!

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  21. बहुत ही ख़ूबसूरत कविता लिखी है....अगर बेटे को माँ के त्याग का अहसास हो..इस से ज्यादा किसी माँ को क्या चाहिए....अन्तिमे पंक्तियाँ बहुत सुन्दर हैं....God Bless U

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  22. very touching.....liked it very much...

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  23. आपकी रचना पढके माँ की कमी का अहसास और गहरा हुआ ......वो भी ये व्रत रखती थी ...वाकई माँ का होने का मतलब होता है एक संबल का साथ होना ...

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