Wednesday, May 17, 2017

इक तेरा इश्क़, इक मेरी ग़ज़ल...

मिलती है तू ख़्वाबों में, हर बार बिछड़ के ऐसे
धूप के कम्बल से झांकती जैसे वो ठिठुरती सी शाम है |

ए हमदम तेरा दिल मुझे उस नुक्कड़ सा लगता है
जिसे कोई मंजिल न मिली और वही आखिरी मुक़ाम है |

मैंने लिक्खी थीं कई नज्में अपनी मोहब्बत के वास्ते,
पर उन नज़्मों पर तेरी मुस्कराहट ही मेरा सच्चा कलाम है |

परवाह नहीं मुझे ज़माने की संगदिली की जब तक
मेरे दिल की ज़मीं पर तेरी मोहब्बत का आसमान है |

लिखने बैठा हूँ इक ग़ज़ल मोहब्बत के काफ़िये में
हर पन्ने पर लिक्खा मैंने बस तेरा ही नाम है |

कितना कुछ है जो लिखा जा चुका है कई-कई बार,
इक तिरा नाम है जिसे हर बार लिखना जज़ा का काम है |


*जज़ा- पुण्य 

4 comments:

  1. bahut hi khoobsoorat nazm hai suman bhaiya......
    aap ki Nazm ka hamesha aise hi intzaar rahta hai.

    ReplyDelete
  2. Aur tumhari gazal padna bhi jjaja ka Kam hai ❤

    ReplyDelete
  3. कितना कुछ है जो लिखा जा चुका है कई-कई बार,
    इक तिरा नाम है जिसे हर बार लिखना जज़ा का काम है |
    सुन्दर अभिव्यक्ति ! आभार। "एकलव्य"

    ReplyDelete
  4. loved your writing..pls do visit my blog need to know your views

    http://wazood.blogspot.in/

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...