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Tuesday, July 7, 2015

टर्निंग 30...

खुशी एक नए पड़ाव पर पहुँचने की...
कहते हैं न, वक़्त को बीतते देर नहीं लगती... मैंने भी कहाँ सोचा था कि ज़िंदगी की धुरी पर घूमता ये वृत्त इतनी जल्दी इस मुकाम तक पहुँच जाएगा... कभी किसी रेडियो चैनल पे सुना था 30's. That's like real adulthood. क्या सच में !!! 

मुझे उस दौर के पीछे छूटने का कोई अफसोस तो नहीं है, जी भर के जिया उस वक़्त को...  

Previous decade was full of drama, fun, heartbreak, romance and many other things. I did many things right, screwed up plenty other things too and in that process I enjoyed a lot. Many things made me proud of myself, many were embarrassing. I can't say whether I am prepared for my 30's, but even I was not prepared for my 20's either. 

I don't how m gonna take up this new challenge to be as energetic as my previous era, but definitely I need to do it more. I need to buckle up for certain new challenges which are knocking the door for my next decade of life. (Will let you guys know, what I will be going through...)
समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ, किसको किसको शुक्रिया करूँ... मुझे जीवन देने वाले मेरे माँ-पापा से लेकर, मेरे हर हमसफर को, हर दोस्त-हर दुश्मन, हर सुख-हर दुख, हर ठोकर को, हर कांटे को उस हर एक शय को जिसने इस ज़िंदगी को समझने में मेरी मदद की... हर नुक्कड़, हर गली, हर सड़क जहां जहां अपने पैरों को घिसट कर ज़िंदगी की इस रेस में भागने लायक बना... हर बिस्तर, हर छत, हर घर जहां मैंने अपनी ज़िंदगी के लिए सपने देखे... मेरा लिखा हर एक पन्ना, मेरी ली हर एक तस्वीर जो मुझे मेरे होना का एहसास दिलाती है... कितना कुछ-कितने लोग, जाने कितने लोगों ने कितने तरीके से मेरी इस ज़िंदगी में अपना अपना अंश डाला है...

मुझे पता है अपने जन्मदिन पर इंसान के पास कहने को बहुत कुछ होता है लेकिन फिलहाल लोगों की शुभकामनाओं के बीच खुश महसूस कर रहा हूँ, न किसी से कोई शिकवा है न कोई शिकायत.. ज़िंदगी हमेशा खूबसूरत थी और हमेशा खूबसूरत ही रहेगी.... बस नज़रिये की बात है... और मेरा नज़रिया  उतार चढ़ाव पर ज़रूर रहे पर ज़िंदगी से मोहब्बत तो बढ़ती ही जाती है...

आज कल सोशल नेटवर्किंग का दौर है, लोगों के फोन भले न आयें दुआएं ज़रूर पहुँच रही होंगी यही उम्मीद है...

So regardless of what I feel today, I am thankful of everything, I have now more than ever.  am sure everything will fall on place where it supposed to be. Just because I am in my 30's that doesn't mean I have turned older.  I am still the same Guy with dreams in his eyes and wonder in the heart... 

Thanks everyone, Thanks Life... शुक्रिया, शुक्रिया ज़िंदगी...

Sunday, July 14, 2013

P.S.:- सावधान, ये कोई सेंटी पोस्ट नहीं है...

काफी अरसा हो गया यहाँ कोई हलचल मचाये हुए...एक दिन की ही पोस्ट में सभी बातें और परेशानियों का चिट्ठा खोलना तो सम्भव नहीं है लेकिन फिर भी लिखने की स्वाभाविकता को बरकरार रखने के लिए यहाँ और एक पन्ना रद्दी ठेलने चला आया हूँ...

अब जैसा कि ये फोटू कह रहा है कि टट्टियाँ होती रहती हैं
लेकिन तभी तो बाथरूम में फ़्लश लगा होता है,
अब बैठ के उसे सूंघते रहोगे तो नाक तो भन्नायेगा ही,
इसलिए उसे बहाओ और अपना काम करते रहो..


परेशानियों की शुरुआत उसी दिन से हो गयी थी, जब हमारे मुंडेर पर सुबह-सुबह कुछ कौवों ने बैठकर शोर मचाया था...  काला जादू जैसा कुछ होता है इसपर एक रत्ती भी यकीन नहीं है, लेकिन कहते हैं न जब खुद पर बीतती है तो मॉडर्न होने का सारा दंभ पानी हो जाता है... काले जादू के डर के कारण नहीं, लेकिन उन्होंने मेरी नींद ऐसी खराब कर दी कि सच में ख्याल आया कि उन कौवों को पकड़ के दिल खोल के सूत दिया जाए, लेकिन कहते हैं कौवे को मारना अशुभ होता है तो हमने इस ख्याल को जाने दिया (वैसे भी कौन सा हम कौवों को पकड़ पाते थे)... खैर आने वाले किसी खतरे से बेखबर गुड फ्राइडे के दिन हमने HTC का नया नया मोबाईल खरीदा... हमने सोचा फ्राइडे गुड है और क्या चाहिए भला... पहली बार इतना महंगा मोबाईल ख़रीदा था तो हम भी ख़ुशी से फूल के कुप्पा हुए जा रहे थे.. इस ख़ुशी के चक्कर में हम इस्टर वाला दिन भूल गए, और इसी दिन हमारे लैपटॉप ने अचानक से जल समाधि ले ली ... सारी ख़ुशी हवा हो गयी, हम घनघोर आशावादी इंसान की तरह अपने लैपटॉप को हरबार इस उम्मीद में ऑन करते रहे कि शायद अबकी हो ही जाए... अंत में कुल जमा एक हफ्ते के बाद हमें एहसास हो गया कि अब ये नहीं चलने वाला... एक आध जगह दिखाया तो पता चला कि लैपटॉप का मम्मी-तख्ता (मदर बोर्ड) ही ख़राब हो चुका है, कुल १० हज़ार तक का बजट बन सकता था, सो हमने कुछ दिनों के लिए टाल दिया... उधर भारत सरकार की कुछ आलसी हरकतों के कारण हमारी सैलरी रुकी हुयी थी (जो अब तक भी नहीं आई.. :-( )... खैर भारत सरकार को कुछ कहने का मतलब क्या है, उसका तो भगवान् भी मालिक नहीं है... 
जैसे तैसे बिना लैपटॉप और उस अनजाने काले साए से डर के हम अपना जीवन चला रहे थे, इसी बीच हमारे शरीर में कुछ केमिकल लोचा हो गया और अस्पताल का चक्कर लग गया, कहते हैं न गरीबी हो तो आटे का गीला हो जाना बिलकुल नहीं सुहाता है अपना हाल वैसा ही था... अस्पताल के लबादे में बिताये वो दिन बहुत मुश्किल थे, उन दिनों मैंने जाना ज़िन्दगी कोई हॉलिडे पैकेज नहीं है, यहाँ मिलने वाली हर एक सांस के लिए संघर्ष है... आस-पास के बिस्तरों पर लडती जिंदगियों ने भी हौसला दिया कि मेरा दुःख कुछ भी नहीं उन सबके आगे... खैर ये सीरियस बातें फिर कभी, इस पोस्ट में "सेंटियापा" घुसेड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है...
 अभी हम एकदम भले चंगे हैं, बिना किसी शोर शराबे के पिछले सन्डे हमारा जन्मदिन भी आके चला गया और कल से हमारा लैपटॉप भी पांच डिजिट गांधीजी के इन्वेस्टमेंट के बाद सामान्य तौर पर सांसें ले रहा है... 
ज़िन्दगी से दो दो हाथ करके कुछ मिला तो है नहीं हमें, लेकिन फिर भी तैयार हैं हम ज़िन्दगी से इश्क लड़ाने के लिए... आखिर इसे हर पल लगातार जीना पड़ता है, क्यूंकि ज़िन्दगी ड्राफ्ट में सेव नहीं की जा सकती...
अजीब रिश्ता है मेरा ज़िन्दगी के साथ, वो मुझे डराती है, धमकाती है, गिराती है... और मैं हँसता हूँ, मुस्काता हूँ और फिर खड़ा हो जाता हूँ...उफ़ ये मोहब्बत जो है ये ससुरी ज़िन्दगी से...
कितना भी सता ले तू मुझे ओ ज़िन्दगी,
तेरा दीवाना हूँ मैं, तेरे पास ही आऊंगा.


चलते चलते:- अब आप यहाँ तक आ ही गए हैं तो देर से ही सही लेकिन जन्मदिन की बधाई लिए बिना नहीं जाने दूंगा, वैसे भी किसी को कुछ समझ न आये और पोस्ट पर कमेन्ट करके अपने ब्लॉग पर आने का नीमंत्रण देना हो (ऐसा निमंत्रण, नीम के जूस से कम नहीं लगता मुझे), तो पोस्ट की आखिरी लाईन के सहारे ही अंदाज़े लगाये जाते हैं... और हाँ इस पोस्ट में दो-एक जगह "कुत्ता" शब्द का उल्लेख किया था जो अब हटा लिया गया है, क्या पता किसी की भावनाएं आहत हो जाएँ... 

Monday, July 9, 2012

शुक्रिया ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी हर रोज अपने साथ कितनी पहेलियाँ समेट लाती है... किसी का ये कहना कि वो ज़िन्दगी में खुश है या दुखी दोनों ही बेमानी है... ज़िन्दगी कभी भी आपको अपने कमरे की उस दीवार जैसी नहीं लगती जिसका आप सिर्फ एक ही पहलू देख पाते हैं... ज़िन्दगी की सतहें पन्ना दर पन्ना खुलती जाती हैं और हम जीते जाते हैं... वैसे भी ज़िन्दगी का मज़ा भी वैसे ही लिया जाना चाहिए जैसे कोई महक सी हो सोंधी सी... बारिश की बूंदों का उस सूखी सी ज़मीन से गठबंधन हो रहा हो जैसे... ये खूशबू क्रियेट नहीं की जा सकती और कर भी लो तो वो करार नहीं आ सकता... आधे-अधूरे और पूरे से कुछ लम्हें ज़िन्दगी को बायलेंस करते रहते हैं... जैसे दूब पर ओस की बूँदें, हर पत्ती पर बारीकी से सजी हुयी ये प्यारी प्यारी सी बूँदें अपनी ख़ूबसूरती बिखेरती रहती हैं... क्या हम और आप इस तरह ओस की बूंदों को बिखेर सकते हैं... नहीं न... ज़िन्दगी के अपने कायदे होते हैं, अपनी उड़ान होती है... वो अपने दायरे खुद बनाती है, हम और आप उसमे अपनी बंदिशें नहीं डाल सकते...
ज़िन्दगी डेली आपके बरामदे में गिरने वाले अखबार की तरह है जो हम लेते ज़रूर हैं लेकिन उसका हर कॉलम पढ़ नहीं पाते... जाने कितनी खबरें जो अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी, हम नज़र तक नहीं डाल पाते... कुछ चीजें जो हमारी आखों के सामने बोल्ड लेटर्स में आती हैं बस उनपर एक निगाह डालकर उस दिन के अखबार को कोने में डाल देते हैं, ये भी नहीं सोचते कि हो सकता है १३वें पन्ने की कोई सिंगल कॉलम खबर ही हमारे काम की हो... और वो सिंगल कॉलम खबर धीरे धीरे हमारी आखों में बसे सपनों के साथ दम तोड़ देती है... हम इंतज़ार ही करते रह जाते हैं कि हमारी खुशियाँ कभी हमारे सामने बोल्ड लेटर्स में आयें पर हमेशा ऐसा हो नहीं पाता... हमें खुश रहने की वजहें तलाश करनी पड़ती हैं... ये वजहें कहीं भी हो सकती हैं, जैसे एक सुनसान से रास्ते के बीच बना कोई मंदिर, जैसे बीच रेगिस्तान में कोई मज़ार...
ज़िन्दगी रैंडम सा बिहैवियर देती है, और इसको जीने का मज़ा भी तो ऐसे ही आता है न... आखिर कई रैंडम शेड्स को मिलाकर ही तो कोई खूबसूरत सी तस्वीर बनती है... 
ज़िन्दगी बूँद बूँद बहती रहती हैं, धूप-छावं से गुंथी हुयी एक पतली सी पगडण्डी पर... उन पगडंडियों पर कई मुस्कुराहटें बिखरी पड़ी रहती हैं, खुशियों के लम्हें यूँ ही समेटने पड़ते हैं... हो सकता है कुछ चुभने वाले लम्हें भी मिल जाएँ, पर शिकायत करने की फुरसत ही कहाँ हैं हमारे पास.... हमें तो और आगे जाना है... आगे और भी कई मुस्कुराते चेहरे मिलने वाले हैं...
अभी पिछली 7 तारीख को जब बर्थडे केक काटा तो बस ऐसा लगा जैसे किसी को थैंक्स कह दूं पर समझ नहीं आया किसे... उनको जिन्होंने मुझे मेरा जीवन दिया, मेरा वजूद दिया या फिर उन दोस्तों का जो हर साल मेरा जन्मदिन ख़ास बनाते हैं या फिर उन खुशियों को जिनकी वजह से जीने की वजहें जिंदा रहीं... सबको थैन्क्ज़ कहने के बाद भी कुछ अधूरा सा लग रहा था... फिर ख़याल आया क्या इन खुशियों की वही इम्पोर्टेंस होती अगर ज़िन्दगी में वो दर्द भरे तन्हाई में लिपटे लम्हें न होते... क्या सुबह उठकर उस ख़ास चेहरे की एक झलक उतनी ही खूबसूरत होती अगर एक रात पहले अकेले में डिप्रेस होकर खूब जोर जोर से रोया न होता... क्या ये बारिश उतनी ही अच्छी लगती अगर कल उस तेज धूप ने उन सड़कों पर मेरे पैर न जलाए होते... अक्सर खुशियों के लम्हों में लिपटे हम उस दुःख का शुक्रिया अदा करना भूल जाते हैं जिसके कारण आज ये खुशियाँ हमें अच्छी लग रही हैं...
ज़िन्दगी एक कम्प्लीट पैकेज है जिसमे हमें सब कुछ मिलता है... हर उस चीज का शुक्रिया करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूँ.... उस हर एक दुःख का, हर उस आंसू का शुक्रिया... शुक्रिया ज़िन्दगी... शुक्रिया मुझे ख़ास बनाने के लिए....

 
आशाएं फिल्म का ये गीत जिसको सुनते सुनते ही ये पोस्ट लिखी है, आप भी ज़रूर सुनिए... आपको भी अच्छा लगेगा.. एक ही गाने में ज़िन्दगी समझा गया है कोई ... :-)

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