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Monday, September 9, 2013

प्रेम समझते हैं न आप... "Hachiko... A Dog's Story"

अभी कुछ दिन पहले अजित जी से बात हो रही थी... अभी जब Listen...Amaya के बारे में लिखा था तो मेरे ख्याल से पोस्ट पसंद आने के साथ-साथ उन्हें ये भी लगा कि मैं फिल्मों का चट्टन हूँ... (रश्मि दी की पोस्ट का शब्द अच्छा लगा तो उठा लिया...) सो उन्होंने भी लगे हाथों दो-तीन फिल्में देखने की सलाह दे डाली... बाकी सब तो हमारी देखी हुयी थीं लेकिन एक इंग्लिश फिल्म का भी नाम बताया... Hachiko A Dog's Story.... हमने तो नाम भी नहीं सुना था लेकिन थोडा अलग और अच्छा सा नाम लगा तो फ़ौरन डाउनलोड पर लगा दी... सामने तीन दिन का वीकेंड भी था... कुछ ख़ास काम नहीं था, वक़्त ही वक़्त था तो पूरा मूड बना हुआ था...

ये है Hachiko....
सन 1930 के आस पास की असली तस्वीर...
खैर चलिए अब आते है फिल्म के प्लाट पर, अगर आप केवल हिंदी पिक्चरें देख कर खुश हो जाने वालों में से हैं तब तो ऐसी फिल्म के बारे में आप सोच भी नहीं सकते... आपने जैकी श्रॉफ वाली तेरी मेहरबानियाँ ज़रूर देखी होगी लेकिन ये फिल्म उससे कहीं आगे की बात करती है... ये कहानी है, नहीं-नहीं कहानी नहीं ये तो एक सच्ची दास्ताँ है.. दास्ताँ है एक जापानी कुत्ते की... सन 1924 की सच्ची दास्ताँ... फिल्म शुरू होती है बच्चों के एक क्लासरूम से, जहां एक टीचर बच्चों को अपने अपने हीरो के बारे में एक छोटा सा essay बोलने को कह रही है, एक ८-९ साल का बच्चा आकर कहता है मेरा हीरो मेरे दादाजी का कुत्ता है "Hachiko..." सारे बच्चे हंस पड़ते हैं लेकिन वो अपनी कहानी ज़ारी रखता है... जी हाँ दरअसल Hachiko उस कुत्ते का नाम है... वो बताता है किस तरह उसके दादाजी को वो कुत्ता मिला या फिर ये कहें कि Hachiko ने उन्हें ढूँढ लिया... उस बच्चे के दादाजी संगीत के एक प्रोफ़ेसर थे जो हर रोज ट्रेन से दूसरे शहर जाते थे क्लास लेने... वहीँ से लौटते हुए उनकी नज़र पड़ी Hachiko पर जो ठीक उनके सामने आकर खड़ा हो गया... उनका भी उसपर दिल आ गया और उन्होंने उसे पाल लिया... Hachiko प्रोफ़ेसर के बिना एक मिनट भी रहना पसंद नहीं करता था, सुबह जब प्रोफ़ेसर ट्रेन पकड़ने जाते तो लाख मना करने के बावजूद वो उनके पीछे-पीछे आता और शाम में भी ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनते ही भाग के घर से आकर स्टेशन के बाहर खड़ा हो जाता... ये सिलसिला यूँ ही चलता रहता, हर रोज़ बिना रुके... वैसे प्रोफ़ेसर ने Hachiko को ट्रेन करने की भी कोशिश की मसलन कि अगर वो गेंद फेकें तो वो दौड़ कर जाए और उठा कर लाकर दे, जैसा अमूमन सारे कुत्ते करते हैं.. लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करता... 

बात उस दिन की है जब Hachiko प्रोफ़ेसर को स्टेशन छोड़ने जाने को तैयार नहीं हुआ... भौंक-भौंक कर कुछ कहता रहा जैसे... लेकिन प्रोफ़ेसर को कुछ समझ नहीं आया, वो उसे छोड़कर ही स्टेशन को निकल लिए... थोड़ी देर बाद देखा तो वो पीछे पीछे दौड़ा चला आ रहा है... उसने मुँह में गेंद दबा रखी थी... प्रोफ़ेसर हैरान, आज इसे क्या हुआ... उन्होंने उससे गेंद लेकर दूर फेक दिया, वो दौड़ कर गया और उठा कर ले आया... उन्होंने फिर फेका, उसने फिर लाकर दे दी... थोड़ी देर उसके साथ खेलकर प्रोफ़ेसर अपने काम को निकल लिए... Hachiko अब भी खुश नहीं था, वो भौंकता रहा... 

अरे मैं तो भूल ही गया था कि किसी भी समीक्षा में पूरी कहानी नहीं लिखते.. तो फिल्म में आगे क्या हुआ ये तो मुझे नहीं पता, आप फिल्म देखें आपको पता चल जाएगा... अगर आप अच्छी फिल्मों के शौक़ीन हैं तो याद रखिये ये फिल्म देखिएगा ज़रूर... मैं आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करूंगा... इस पोस्ट की नहीं बल्कि इस फिल्म की...
आपकी सुविधा के लिए फिल्म नीचे ही जोड़ दी है यहाँ भी देख सकते हैं और चाहें तो यू ट्यूब पर से डाउनलोड भी कर सकते हैं...

चलते चलते...
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मुज़फ्फरनगर का हाल आपमें से किसी से छुपा नहीं है, किसने किया, दोष किसका है इस लफड़े में नहीं पड़ना चाहता... हाँ एक अपील ज़रूर है अगर आप भी "कुत्ते" शब्द को एक गाली की तरह इस्तमाल करते हैं तो मत कीजिये... यकीन मानिए वो हमसे बेहतर हैं और प्यार और ज़िन्दगी हमें इन बेजुबानों से ही सीखने की ज़रुरत है... चलिए बाकी बातें आपके ये फिल्म देखने के बाद...

Wednesday, August 28, 2013

उम्र की सांझ का, बीहड़ अकेलापन और एक फिल्म "Listen...Amaya"

बीती रात एक फिल्म देखी, "Listen... Amaya"... काफी दिनों से इस फिल्म को देखने का सोच रहा था... फारूक शेख और दीप्ति नवल के जानदार अभिनय ने गज़ब का मैजिक क्रियेट किया है... स्वरा भास्कर ने अमाया के किरदार को इतना बेहतरीन निभाया है कि उस किरदार में उसकी जगह और किसी को सोच भी नहीं सका... वो अच्छी फिल्मों के प्रोजेक्ट्स ले रही हैं जिससे उनका फिल्मों और रोल्स का चयन भी प्रभावित करता है... फिल्म का निर्देशन लाजवाब है, छोटे-छोटे दृश्यों को भी प्रभावशाली बनाया गया है.. लेकिन इन सारी बातों से अलग जिस चीज ने सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर किया वो थी इसकी कहानी, इस फिल्म की कहानी कई हद तक राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल की फिल्म अमृत की याद दिलाती है... 

इस फिल्म को देखकर लगातार ये सोचता रहा कि अगर मैं अमाया की जगह होता तो क्या करता, क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो गया है कि इस तरह की परिस्थिति के अनुरूप खुद को ढाल सके... जब एक युवा अपनी मर्ज़ी से विवाह का फैसला करता है तब यही समाज और यही माता-पिता उसपर न जाने कितने दवाब डालते हैं... आज भी छोटे शहरों में प्रेम-विवाह, अंतरजातीय विवाह, या फिर लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार नहीं किया गया है... फिर कैसे ये समाज किसी बुजुर्ग को वही काम करने की आजादी दे देगा...  जब कभी बच्चे ऐसा कोई सम्बन्ध निबाहने की इच्छा रखते हैं तो उन्हें समाज की दुहाई दी जाती है, फिर कैसे वो बच्चे अपने माता/पिता के ऐसे किसी सम्बन्ध को लेकर उसी समाज से नज़रें मिला पायेंगे... 

अक्सर सांझ बहुत सुहावनी होती है, लेकिन कभी-कभी अकेलापन इसी संध्या को बोझल बना देता है.. और अगर वो जीवन संध्या हो तो ? एक इंसान अपनी ज़िन्दगी में कई सारे नुक्कड़ों से होकर गुज़रता है... कई सारे संघर्षों और ज़द्दोज़हद से लड़ता हुआ, अडिग अपने कर्म करता जाता है... लेकिन जब वो ज़िन्दगी के आखिरी नुक्कड़ की और जाने वाली सड़क पर होता है तो उसके पग भी हलके-हलके कांपते ज़रूर हैं... घर-परिवार-नौकरी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका वो इंसान इस दौड़ती-भागती दुनिया को अपने पैरों की कम्पन नहीं दिखाना चाहता... अधिकतर बच्चे भी नौकरी की भागादौड़ी में दूसरे शहर चले जाते हैं... कई बार तन से बूढा हुए बिना ही इंसान मन से बूढा हो जाता है... जब इस बार घर गया था तब बातों ही बातों में माँ-पापा का दर्द महसूस कर पाया, माँ ने कहा आजकल पैसे तो सभी के पास हैं लेकिन समय किसी के पास नहीं... ऐसे में बस उसके साथ उनका हमसफ़र ही होता है जो बिना बताये सब समझ लेता है...

लेकिन ऐसे में, अगर एक हमसफ़र ही पीछे छूट गया तो... हम शायद उस अकेलेपन की कल्पना भी नहीं कर सकते... उनकी ज़िन्दगी कैसी बेरौनक हो जाती है... लगभग इसी तरह के विषय पर रश्मि दी की कुछ पोस्ट्स पढ़ी थीं, उस समय तो यूँ ही पढ़ गया था लेकिन जब ऐसी घटनाएं विजुअल्स में कन्वर्ट हो जाती हैं तो दिमाग सोचने पर मजबूर हो ही जाता है... अब बात ये है कि क्या इस उम्र में विवाह करना उचित है, सामजिक वर्जनाओं के अलावा भी कई बातें हैं जो परेशानियां पैदा कर सकती हैं, मसलन संपत्ति का बटवारा हो या फिर परिवार में आये इस बदलाव के साथ सामंजस्य... ऐसे में रश्मि दी ही एक और सुझाव लेकर आती हैं, वो है लिव-इन रिलेशनशिप, लेकिन बात फिर वहीँ आकर अटक जाती है कि क्या हमारा परिवार और समाज इसे स्वीकार कर पायेगा...

लेकिन जिन्होंने कभी हमारे लडखडाते हुए से क़दमों को रास्ते नापने की समझ सिखाई, क्या हम उन्हें इतनी सी आजादी भी नहीं दे सकते कि अगर वो चाहें तो उम्र के उस आखिरी नुक्कड़ तक जाने वाली सड़क पर वो भी किसी का हाथ थाम सकें और ऐसी किसी परिस्थिति में अगर कोई बुजुर्ग ऐसा निर्णय लेते हैं तो हम भी पूरे सम्मान के साथ इसे स्वीकार सकें...

खैर, इस फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिख सका, लेकिन अगर आप अपनी व्यस्त ज़िन्दगी से दो घंटे निकाल कर इस फिल्म को देख सकें तो ज़रूर देखें और सोचें कहीं हम उन्हें किसी ख़ुशी से वंचित तो नहीं कर रहे हैं... फिल्म DVD और यू ट्यूब दोनों पर उपलब्ध है...
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