Friday, May 18, 2012

मेरी हर सांस, हर कविता एक तोहफा है सिर्फ तुम्हारे लिए...

         आस पास जब तन्हाईओं की शीतलहरी में मेरा दम घुटने लगता है, तो तुम्हारी इसी मुस्कराहट की चादर ओढ़े मैं सांस लेता हूँ... फिर चाहे वो इस समय की तेज़ धुप हो या फिर बारिश की ये तेज़ बौछारें... न ही मेरे पास और कोई छतरी है न ही कोई छत... बस तुम्हारा साया ही है जो मुझे हमेशा आगे चलते रहने का हौसला देता है....
      कभी कभी तुम मुझे सपनों की किसी सोन चिरैया की तरह लगती हो, जो रह रह कर किसी अनजाने से डर में मेरी छाती में दुबक जाती है... फिर जब तुम्हारी और मेरी धड़कन आपस मिल कर वो प्यार भरा संगीत बनाती हैं तो बरबस ही मेरी आखों के कोर नम हो जाते हैं... जब तुम मेरे साथ नहीं होती, तो तुम्हारी याद को अपने मन में गुनता रहता हूँ और तुम्हारे इंतज़ार का एक एक मोती तुम्हारी याद में चुनता रहता हूँ.... यूँ ही अपने कमरे में बैठे बैठे बाहर होती इस रिमझिम सी बारिश का दीवाना होता जा रहा हूँ.... खिड़की के इस शीशे से अपने चेहरे को सटाये बाहर बारिश की इन एक एक बूंदों तो टपकते हुए देखता हूँ, इन हरी हरी पत्तियों से होते हुए वो सड़क पर रेत में कहीं खो सी जाती है, उनका वजूद ठीक उसी तरह है जैसे मेरे चेहरे पर तुम्हारे लिए प्यार.... जो कभी कभी भले ही दिखता नहीं लेकिन वो वहीँ है कहीं छिपा हुआ चुपके से.... मेरे अन्दर का भी ये भारी सा अकेलापन बूँद बूंद  टपकता रहता है और कभी यूँ ही इन आखों की शिराओं से होकर बहते हुए मेरे चेहरे पर सूख जाया करता है....
        सोचता हूँ कभी तुम्हारे लिए कोई कविता लिखूं, फिर सोचता हूँ उसमे ऐसा क्या लिखूं जो उसके छंद मुकम्मल हो जाएँ, एक तुम्हारा वजूद ही तो है जिसके आगे सारी कविताओं का रंग फीका पड़ जाता है... तुम्हें पता है कल कल्पना की उड़ान में, सपनों के जहान में, मिट्टी के घरोंदे बनाते हुए जब उँगलियाँ सन गयीं तो कविता बनते हुए दिखाई दी थी मुझे.... बड़े करीने से उस घरोंदे को बाहर धूप में डाल दिया, सोचा शायद इसी घरोंदे से हमारी ज़िन्दगी की शुरुआत होनी हो... फिर फ़ूलों से गँध चुरा कर, तितली से रँग लेकर और अहसास के समन्दर में सीपियाँ चुनी,तो भी कविता बन गयी... कल जब तुम हमारी ज़िन्दगी की किताब के पन्नों को पलटोगी तो शायद तुम्हें इस बात का इल्म हो जाएगा कि ये सारी कवितायें सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए लिखी गयी हैं... अक्सर कविताओं से बुनी हुयी ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत होती है इसलिए तो हर सांझ के सूरज की मद्धिम सी रौशनी में तुम्हारे लिए एक कविता लिखता हूँ, इन सब कविताओं से घिरा हुआ हमारा संसार कितना प्यारा होगा न...
          आस पास की इस भीड़ में एक एहसास है जो मुझे तुम्हारे साथ बिताये हुए हर उस लम्हें की याद दिलाता है जो हमेशा हमेशा के लिए मेरी ज़िन्दगी में चस्प हो गए हैं... कितने दिनों से सोच रहा हूँ आज के दिन तुम्हें क्या तोहफा देना चाहिए, कुछ समझ नहीं आने पर निराश होकर ये पोस्ट लिखने बैठा हूँ.... आज के दिन बस इतनी ही ख्वाईश कि आने वाले कई कई सालों और जन्मों तक तुम यूँ ही मेरा हमसाया बन कर चलती रहोगी... आज का दिन वाकई में बहुत ख़ास है, हम आज साथ हैं क्यूंकि आज के दिन ही तुम आई थीं इस प्यार भरी दुनिया में...

Sunday, May 13, 2012

मेरी माँ थोड़ी अलग सी है...

            जानता हूँ इस पोस्ट का शीर्षक कई लोगों को अजीब सा लगेगा, आखिर ऐसी क्या अलग बात है मेरी माँ में... लेकिन माँ की जो सूरत अपने आस पास के लोगों से देखी, जैसी ममता, जैसे अपनेपन की बात सभी करते हैं वैसा कुछ भी मैंने अपनी निजी ज़िन्दगी में महसूस किया हो ऐसा नहीं है... हालांकि माँ तो सभी की अपने बच्चों से उतना ही प्यार करती है, लेकिन सभी अपना प्यार जतला सकें ऐसा नहीं है...
            मेरी माँ भी कुछ ऐसी ही हैं, उनके वर्किंग वुमेन होने का असर हमारे लिए मिलने वाले समय पर पड़ा... कभी फुर्सत में बैठ के बातें करना, दुलारना, पुचकारना शायद हमारी किस्मत में नहीं था... अलग दुनियादारी, अलग जिम्मेदारियां और ढेर सारा काम... मैं भी हमेशा अपने आस पास अपने दोस्तों की माओं को देखता था तो मेरा भी मन करता था कि कभी मेरी माँ भी इसी तरह मुझे प्यार से बेटा कह कर गले से लगा ले, आखिर किसका मन नहीं करता लेकिन ऐसा कोई पल कभी मेरी ज़िन्दगी में न आ सका... कितनी ही बार मन किया माँ की गोद में सर रख कर सो जाऊं... लेकिन कभी कभी ज़िन्दगी अपनी कुछ परिभाषाएं छुपा लेती है, और इसे मेरी बदकिस्मती समझूं या फिर नियति ज़िन्दगी का सबसे खुबसूरत एहसास ही छुप गया मुझसे... आखिर ज़िन्दगी का होना और उसका यूँ फलना-फूलना माँ के प्यार के बिना भला क्या मायने रखता है... लगता था मेरी माँ मुझे प्यार ही नहीं करती... शायद इसी डर से कि कहीं वो मुझसे दूर न चली जाए मैं ह्मेशा उनका आँचल पकडे चला करता था...
           जब धीरे धीरे बड़ा हुआ, थोडा समझदार(?) हुआ तब लगा कि वो प्यार तो ज़रूर करती होंगी लेकिन उन्हें जतलाना नहीं आता... फिर भी इस बात को कई सालों तक मैं एक्सेप्ट नहीं कर सका, आज भी कभी कभी जब अपने आस पास किसी माँ को अपने बच्चे से प्यार से गले लगाते हुए देखता हूँ तो आखें नम हो जाती हैं... कभी माँ के बारे में कुछ लिखने का सोचता हूँ तो वो एहसास नहीं ला पाता अपने शब्दों में, वो कुछ मैं महसूस ही नहीं कर सका कभी...कई बार माँ की बहुत याद आती है और रह रह कर लिखता भी रहा उनके बारे में...
           आज मदर्स डे पर और कुछ  कहने को नहीं है बस यही बात कि माँ मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, लेकिन आपके प्यार के लिए हमेशा तरसता रहा... हैप्पी मदर्स डे.... 

Friday, April 27, 2012

अक्सर इन दुनियादारी की बातों में घुटता रहता है प्यार ...

          ज़िन्दगी जीने का मकसद क्या हो सकता है किसी के लिए... नौकरी, पैसा, घर, गाडी... आखिर ऐसा क्या है जिसको पाकर इंसान इतना खुश हो जाए कि उसकी आखों से आंसू आ जाएँ... शायद इन सब में कुछ भी नहीं.... मैंने महसूस किया है एक प्यार ही है जो इंसान को सबसे ज्यादा खुश करता है.... ये प्यार कोई भी हो सकता है, माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का या फिर पति-पत्नी का... लेकिन इंसान इन प्यार के एहसासों से दूर अपनी सारी ज़िन्दगी न जाने किस मृगतृष्णा के पीछे भागता रहता है और भूल जाता वो कुछ जिसके बिना वो वाकई में अधूरा है... 
          समय के इस चौराहे पर वो घर, वो रिश्ते बदलने लगे हैं क्या... अब जब सुबह उठने के साथ हम अपनों का चेहरा नहीं मोबाईल की स्क्रीन देखने लगे हैं... जब हमें अपनों की सेहत से ज्यादा शेयर मार्केट का हाल जानने में दिलचस्पी है... जब किसी से बात करने के लिए हमें इन बेजान मशीनों पर निर्भर रहना पड़ता है.... ये बातें सभी समझते हैं, सभी जानते हैं फिर भी हम खामोश हैं, मौन हैं... शायद कहीं मन ही मन में ये मान चुके हैं कि यही धारा है समय की, जो हमारे पहुँच से बाहर है... हमें लगता है सब ठीक है, सब समझदार हैं, सब समझ लेंगे... लेकिन शायद ऐसा हो नहीं पाता... धीरे धीरे सब दूर होते जाते हैं... महीने के अंत में हमारे पास पैसे तो जुड़ते जाते हैं लेकिन उनको खुशियों के साथ खर्च करने के लिए लोगों की भीड़ कम होती जाती है... शायद हम ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इन रिश्तों से बाहर निकलने के साथ ही अगले मोड़ पर अंधकार है, एक गहरा अंधकार.... जैसे एक ब्लैक होल है जहाँ आके सब कुछ ख़त्म हो जाता है... जहां जीने का कोई मकसद नहीं... कुछ भी नहीं.... मौसम के बदलने पर पहाड़ हिंसक हो जाते है, जबकि सच्चा प्रेम दिलों में हमेशा एक सा बसंत बनाए रखता है और बाहर की बर्फीली हवाएं भीतर पहुंच नहीं पातीं... प्यार वह कंडीशनिंग है जो रिश्तों के पारे को थामे रहती है...
          ज़िन्दगी की इस बेतुकी सी दौड़ में जो कभी फुर्सत मिले तो पीछे पलट कर देखना वो जो हमारी ज़िन्दगी में सबसे ज्यादा ज़रूरी है वो कहीं पीछे छूट गया है... वो प्यार जिसके बिना जीना बेमानी है किसी का भी, वो प्यार धीमे धीमे घुट रहा है... हमारे ध्यान से कहीं दूर, और जब इन भटके हुए रास्तों पर दौड़ती हमारी ज़िन्दगी पलट कर देखती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है... पैसों के पीछे भागते इन मशीन बन चुके खोल को उतारकर इंसान बनने की कोशिश ज़रूर कीजिये और थाम लीजिये उन हाथों को जो अकेले हैं, तन्हा हैं हमारे प्यार के बिना...
             रिश्तों के अंतर्द्वद्व को समझने में निदा फाजली की ये पंक्तियां शायद कुछ मदद कर सकें...

‘जीवन शोर भरा सन्नाटा, जंजीरों की लंबाई तक सारा सैर-सपाटा।
हर मुट्ठी में उलझा रेशम, डोरे भीतर डोरा, बाहर सौ गांठों के ताले, अंदर कागज कोरा।

Wednesday, April 25, 2012

प्यार तो होना ही था न....

"ए पगली, नींद आ रही है क्या ??? सर सहला दूं... ?"
"हम्म्म्म....."
".... आओ, चलो सो जाओ.. !!!"
"अच्छा एक बात बताओ, तुम्हारा हाथ दर्द नहीं करता ??? यूँ घंटों मेरा सर सहलाते रहते हो, खुद तो एक मिनट के लिए भी नहीं सोते.... !!!"
"ऊंह हूँ......"
"क्यूँ ??? !!!"
"क्यूंकि, विकास अंशु को बहुत प्यार करता है.... और अंशु को इतने सुकून से, इतने प्यार से सोते देख कर उसे खूब ख़ुशी मिलती है...."
"अच्छा.... रियली ?? !!!...."
"ह्म्म्म..... अच्छा अब ऐसे मुझे देखना बंद करो, और आँखें बंद करो और सो जाओ..."
"....."  
"....."
"विकास ?????......"
"ह्म्म्म.... बोलो न...."
"अपना दूसरा हाथ लाओ न, मुझे तकिया बनाना है......"
"हा हा हा.. पगली कहीं की.... ये ले.... अब मुस्कुराना बंद करो और निन्नी कर लो...."
"....."
"....."  
"....." 
"....." 
"विकास, एक बात कहूं....!!!"
"कहो न... !!!"
"....अंशु भी विकास को बहुत प्यार करती है....."
"क्या कहा.... फिर से कहो... !!! ???.... ए अंशु ... सुनो न... क्या कहा.... मैंने सुना नहीं.... प्लीज कहो न.....एक बार और कहो न..."
"ऊंह हूँ......तुमने मिस कर दिया..." 
"अरे बोलो न.. प्लीज.... मैंने सच में नहीं सुना...."
"मैंने कहा..... आई लव यू...."
"सच्ची....??? सच सच कहो..... "
"ह्म्म्म...."
"कब से... कैसे....."
"पता नहीं... मुझे सच में नहीं पता...." 
"पहले क्यूँ नहीं बताया... पगली....." 
"मुझे खुद पता चलता तब न....."
"....."
"....."  
"....." 
"....."  
"विकास ???? ....."
"ह्म्म्मम्म......"
"क्या देख रहे हो...???"
"वो देखो आसमान में वो खूबसूरत से टिमटिमाते तारे, और चाँद देखो कितना सुन्दर लग रहा है... "
"तारे ??? चाँद ??? पागल हो गए हो क्या,  वो तो छत और वहां पंखा घूम रहा है..."
"ओफ्फ्फ हो... तुम देख नहीं पा रही हो अंशु, गौर से देखो... अरे ऐसे नहीं आखें बंद करके देखो... ठंडी हवा है, सामने कित्ती प्यारी सी नदी बह रही है... आवाज़ तो सुनो पानी की....."
"......हे भगवान्, क्या हो गया तुमको.....!!!"
"अरे रे ज्यादा मत सोचो, देखो न, चाँद कितने प्यार से हमें देख रहा है, उसकी इस ठंडी धूप को हम पर पड़ने दो न, तुम्हें पता है जब भी ये ठंडी चांदनी रिश्तों पर पड़ती है, तो अक्सर प्यार हो जाया करता है...."
"मुझे नहीं पता तुम क्या बोलते रहते हो, तुम राईटर लोग भी न, कुछ भी सोच कर कुछ भी बोलते हो और कुछ भी लिख देते हो.... "
"हा हा हा... पगली....ठीक है, चलो सो जाओ...."
"..............अब नींद कहाँ से आएगी बुद्धू..... ऐसे में नींद भी आती है क्या....."
"ये भी सही बात है.... "
"....."  
"....." 
"....." 
"विकास ???...."
"हम्म्म्म...."
"ये कहीं सपना तो नहीं....!!! मुझे सच में तुमसे प्यार हो गया क्या....???"
"हाँ रे..... तुझे तो सच में मेरे से प्यार हो गया.... लेकिन कैसे हो गया रे पगली... मुझे तो लगा था मैं अकेला ही रह जाऊँगा हमेशा...."
"क्यूँ नहीं होता आखिर, विकास अंशु से इतना प्यार करता है.... अंशु को भी एक दिन प्यार तो होना ही था न..... "

Thursday, April 19, 2012

इन लव विद गुलमोहर...

गुलमोहर तुम तब भी थे न,
जब जाता था मैं
माँ का आँचल पकडे
यूँ उन पक्की सड़कों पर
अपने स्कूल की तरफ 
और देखता रहता था तुम्हें
अपनी नन्हीं अचरज भरी आखों से...  

हर महीने के
मेरे इंतज़ार से बेखबर
आते थे केवल अप्रैल-मई में ही
और रंग देते थे सड़कों की छत
अपने इस लाल-केसरिये रंग से...

तुम तब भी थे न
जब धीमी धीमी बारिश में
तुम्हारे पेड़ के नीचे
छिप जाते थे हम
और तुम गिरा देते थे प्यार से
अपने फूलों का एक गुच्छा...

जाने तुमसे ऐसा कौन सा रिश्ता है,
बचपन से ही हर बार
अपनी अधखिली कलियाँ
मुझे दे जाते हो...
लेकिन मुझे एक बात बताओ
क्या तुम्हें वसंत और सावन 
कुछ भी पसंद नहीं 
जो इस सूरज की तेज़ गर्मी में आते हो....

कितनी ही बार महसूस 
किया है मैंने
हमेशा से ही आते हो
जब होता हूँ मुश्किलों में,
और जो हो जाते हो संग मेरे
बिखरते हुए मेरे अस्तित्व को
अजीब सा सुकून दे जाते हो...

कुछ तो कशिश है तुझमे
जो यूँ खिचा चला आता हूँ,
अपने प्यार की ये 
मनोहर कहानियाँ 
तुझसे बस तुझसे
बांटने लाता हूँ...

इन लाल-हरे फूल-पन्नों के बीच
रूप तुम्हारा गज़ब का
निखरता है,
इन दिनों मुझे आने वाले सपनो में
बस और बस
गुलमोहर बिखरता है..... 
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