Tuesday, August 6, 2013

अनटायटिल्ड ड्राफ्ट्स...

कोई शहर बदलता नहीं बस उसे देखने का नजरिया बदलता जाता है, पिछले दिनों जब अपने शहर कटिहार में था तो कई सालों बाद उस शहर को उसी मासूम नज़रों से देखा... कहते हैं न आप किसी शहर के नहीं होते वो शहर आपका हो जाता है... वो शहर जहाँ मेरा लड़कपन आज भी उतना ही मासूम है... कुछ भी नहीं बदला था... बस कुछ लोग लापता हो गए, कुछ उस शहर से और कुछ मेरी ज़िन्दगी से..
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कभी-कभी लम्बी चुप्पी, एक आदत में तब्दील हो जाती है... किसी से कुछ कहना या फिर डायरियों के पन्नों पे अपनी तन्हाई घसीटना भी बहुत ज़रूरी हो जाता है...
बीते कितने ही वक़्त से मेरे मन में कई तरह के ख्याल बिना अल्फाजों के उमड़ रहे हैं, न जाने क्यूँ वो शब्द न ही जुबान पे आ रहे हैं और न ही उँगलियों पे... ह्रदय के अन्दर भावनाओं का स्तर खतरे के निशान के करीब पहुँच चुका है... ऐसा न हो कि कभी ये आखों का बाँध तोड़कर छलक ही पड़े किसी दिन...
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मैं खुद के लिए अजनबी हो जाना चाहता हूँ, मुझे ऐसा लगता है ऐसा कर लेने से शायद खुद के सवालों और डर से परे हो जाऊँगा... लेकिन खुद से ही खुद की पहचान छुपा लेना, खुद के अन्दर शून्य निर्माण कर लेने के सामान है... ऐसे किसी ठीहे की तलाश में छत पे खड़े आसमान को निहारता रहता हूँ....

Sunday, July 14, 2013

P.S.:- सावधान, ये कोई सेंटी पोस्ट नहीं है...

काफी अरसा हो गया यहाँ कोई हलचल मचाये हुए...एक दिन की ही पोस्ट में सभी बातें और परेशानियों का चिट्ठा खोलना तो सम्भव नहीं है लेकिन फिर भी लिखने की स्वाभाविकता को बरकरार रखने के लिए यहाँ और एक पन्ना रद्दी ठेलने चला आया हूँ...

अब जैसा कि ये फोटू कह रहा है कि टट्टियाँ होती रहती हैं
लेकिन तभी तो बाथरूम में फ़्लश लगा होता है,
अब बैठ के उसे सूंघते रहोगे तो नाक तो भन्नायेगा ही,
इसलिए उसे बहाओ और अपना काम करते रहो..


परेशानियों की शुरुआत उसी दिन से हो गयी थी, जब हमारे मुंडेर पर सुबह-सुबह कुछ कौवों ने बैठकर शोर मचाया था...  काला जादू जैसा कुछ होता है इसपर एक रत्ती भी यकीन नहीं है, लेकिन कहते हैं न जब खुद पर बीतती है तो मॉडर्न होने का सारा दंभ पानी हो जाता है... काले जादू के डर के कारण नहीं, लेकिन उन्होंने मेरी नींद ऐसी खराब कर दी कि सच में ख्याल आया कि उन कौवों को पकड़ के दिल खोल के सूत दिया जाए, लेकिन कहते हैं कौवे को मारना अशुभ होता है तो हमने इस ख्याल को जाने दिया (वैसे भी कौन सा हम कौवों को पकड़ पाते थे)... खैर आने वाले किसी खतरे से बेखबर गुड फ्राइडे के दिन हमने HTC का नया नया मोबाईल खरीदा... हमने सोचा फ्राइडे गुड है और क्या चाहिए भला... पहली बार इतना महंगा मोबाईल ख़रीदा था तो हम भी ख़ुशी से फूल के कुप्पा हुए जा रहे थे.. इस ख़ुशी के चक्कर में हम इस्टर वाला दिन भूल गए, और इसी दिन हमारे लैपटॉप ने अचानक से जल समाधि ले ली ... सारी ख़ुशी हवा हो गयी, हम घनघोर आशावादी इंसान की तरह अपने लैपटॉप को हरबार इस उम्मीद में ऑन करते रहे कि शायद अबकी हो ही जाए... अंत में कुल जमा एक हफ्ते के बाद हमें एहसास हो गया कि अब ये नहीं चलने वाला... एक आध जगह दिखाया तो पता चला कि लैपटॉप का मम्मी-तख्ता (मदर बोर्ड) ही ख़राब हो चुका है, कुल १० हज़ार तक का बजट बन सकता था, सो हमने कुछ दिनों के लिए टाल दिया... उधर भारत सरकार की कुछ आलसी हरकतों के कारण हमारी सैलरी रुकी हुयी थी (जो अब तक भी नहीं आई.. :-( )... खैर भारत सरकार को कुछ कहने का मतलब क्या है, उसका तो भगवान् भी मालिक नहीं है... 
जैसे तैसे बिना लैपटॉप और उस अनजाने काले साए से डर के हम अपना जीवन चला रहे थे, इसी बीच हमारे शरीर में कुछ केमिकल लोचा हो गया और अस्पताल का चक्कर लग गया, कहते हैं न गरीबी हो तो आटे का गीला हो जाना बिलकुल नहीं सुहाता है अपना हाल वैसा ही था... अस्पताल के लबादे में बिताये वो दिन बहुत मुश्किल थे, उन दिनों मैंने जाना ज़िन्दगी कोई हॉलिडे पैकेज नहीं है, यहाँ मिलने वाली हर एक सांस के लिए संघर्ष है... आस-पास के बिस्तरों पर लडती जिंदगियों ने भी हौसला दिया कि मेरा दुःख कुछ भी नहीं उन सबके आगे... खैर ये सीरियस बातें फिर कभी, इस पोस्ट में "सेंटियापा" घुसेड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है...
 अभी हम एकदम भले चंगे हैं, बिना किसी शोर शराबे के पिछले सन्डे हमारा जन्मदिन भी आके चला गया और कल से हमारा लैपटॉप भी पांच डिजिट गांधीजी के इन्वेस्टमेंट के बाद सामान्य तौर पर सांसें ले रहा है... 
ज़िन्दगी से दो दो हाथ करके कुछ मिला तो है नहीं हमें, लेकिन फिर भी तैयार हैं हम ज़िन्दगी से इश्क लड़ाने के लिए... आखिर इसे हर पल लगातार जीना पड़ता है, क्यूंकि ज़िन्दगी ड्राफ्ट में सेव नहीं की जा सकती...
अजीब रिश्ता है मेरा ज़िन्दगी के साथ, वो मुझे डराती है, धमकाती है, गिराती है... और मैं हँसता हूँ, मुस्काता हूँ और फिर खड़ा हो जाता हूँ...उफ़ ये मोहब्बत जो है ये ससुरी ज़िन्दगी से...
कितना भी सता ले तू मुझे ओ ज़िन्दगी,
तेरा दीवाना हूँ मैं, तेरे पास ही आऊंगा.


चलते चलते:- अब आप यहाँ तक आ ही गए हैं तो देर से ही सही लेकिन जन्मदिन की बधाई लिए बिना नहीं जाने दूंगा, वैसे भी किसी को कुछ समझ न आये और पोस्ट पर कमेन्ट करके अपने ब्लॉग पर आने का नीमंत्रण देना हो (ऐसा निमंत्रण, नीम के जूस से कम नहीं लगता मुझे), तो पोस्ट की आखिरी लाईन के सहारे ही अंदाज़े लगाये जाते हैं... और हाँ इस पोस्ट में दो-एक जगह "कुत्ता" शब्द का उल्लेख किया था जो अब हटा लिया गया है, क्या पता किसी की भावनाएं आहत हो जाएँ... 

Friday, May 24, 2013

शौर्य क्या है ???

शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फ़ौजियों की एक पलटन का शोर,
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शोर।

शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे,
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाइश।

शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास,
या शोलों की बरसात से पल भर में एक शहर को शमशान बना देने का एहसास।

शौर्य,
बहती बियास में किसी के गर्म खून का हौले से सुर्ख हो जाना,
या अनजानी किसी जन्नत की फ़िराक में पल पल का दोज़ख बनते जाना,
बारूदों से धुंधलाए इस आसमान में शौर्य क्या है?

वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य,
शायद एक हौसला शायद एक हिम्मत हमारे बहुत अंदर,
मज़हब के बनाए नारे को तोड़ कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत,
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती दे पाने की हिम्मत,
मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत।

शौर्य,
आने वाले कल की खातिर अपने हिस्से की कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत।

शौर्य क्या है?

------------------------------------------------------------------------ जावेद अख्तर (फिल्म-शौर्य )

Friday, May 17, 2013

मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है, ग़र याद रहे...

         कभी-कभी ज़िन्दगी में कुछ बुरा होना ब्लेसिंग इन डिसगाईज हो जाता है.. अब देखिये न पिछले दो महीने से लैपटॉप ख़राब पड़ा है इन दिनों कुछ भी नहीं लिख सका, कुछ लिखा भी तो डायरी के पन्नों तक ही रहा.. फिर एक दिन बैठा बैठा उन पन्नों को पढना शुरू किया और साथ ही साथ रिकॉर्ड करना भी, जानता हूँ मेरी आवाज़ के हिसाब से पॉडकास्ट एक कोई ख़ास अच्छा आईडिया तो नहीं ही है, फिर भी अपनी आवाज़ में अपना कुछ लिखा सुनना किसे अच्छा नहीं लगता... कुछ गलतियां हुईं, सुधारता रहा और आज सब कुछ सुना तो दो पन्ने अच्छे बन पड़े हैं, उन दो पन्नों को पॉडकास्टस के रूप में यहाँ रख रहा हूँ... अगर कोई गलती लगे तो ध्यान ज़रूर दिलाईयेगा...





Thursday, April 18, 2013

मुझे रावण जैसा भाई चाहिए ...

फेसबुक आदि पर ये कविता पिछले कई दिनों लगातार शेयर होती रही है, लेकिन इसे लिखनेवाले की कोई पुख्ता पहचान नहीं मिली हालांकि सुधा शुक्ला जी ने ये कविता १९९८ में लिखी थी ऐसा कई जगह उन्होंने कहा है... खैर, जिसने भी लिखी हो इसे अपने ब्लॉग पर अज्ञात नाम से सहेज रहा हूँ... इस कविता की पंक्तियाँ अच्छी लगीं क्यूंकि सही मायने में, मैं भी कथित मर्यादा पुरुषोत्तम की छवि से सहमत नहीं हूँ ....

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गर्भवती माँ ने बेटी से पूछा
क्या चाहिए तुझे? बहन या भाई
बेटी बोली भाई
किसके जैसा? बाप ने लडियाया
रावण सा, बेटी ने जवाब दिया
क्या बकती है? पिता ने धमकाया
माँ ने घूरा, गाली देती है !
बेटी बोली, क्यूँ माँ?
बहन के अपमान पर राज्य
वंश और प्राण लुटा देने वाला,
शत्रु स्त्री को हरने के बाद भी
स्पर्श न करने वाला,
रावण जैसा भाई ही तो
हर लड़की को चाहिए आज,
छाया जैसी साथ निबाहने वाली
गर्भवती निर्दोष पत्नी को त्यागने वाले
मर्यादा पुरषोत्तम सा भाई 
लेकर क्या करुँगी मैं?
और माँ
अग्नि परीक्षा, चौदह बरस वनवास और
अपहरण से लांछित बहु की क़तर आहें
तुम कब तक सुनोगी
और कब तक राम को ही जनोगी,
माँ सिसक रही थी - पिता अवाक था.
-------अज्ञात 
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