Thursday, March 19, 2020

लव इन द टाइम ऑफ़ कोरोना....

शहर परेशान सा है, और मन्नु को बार बार नीरू की फ़िक्र हो रही है, वो ठीक तो होगी ना, अपना ख़याल तो रख रही होगी ना... उसे अपना ख़याल रखना आता भी तो नहीं था... वो बार बार मोबाइल उठाता है, सोचता है एक कॉल कर ले लेकिन बस उसका लास्ट सीन देखकर फ़ोन रख देता है... मन्नु जिसने कभी भगवान से ज़्यादा कुछ माँगा नहीं वो बस आज कल नीरू की सलामती माँगता है... जानता है वक्त अब पीछे नहीं जाएगा, कभी भी नहीं...

बैक्ग्राउंड में जज़्बा फ़िल्म का वो डायलोग चल रहा है...

"तुमने जाने दिया..."
"मोहब्बत थी इसलिए जाने दिए, ज़िद होती तो बाहों में होती...."

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“मुबारक हो, शादी की तारीख़ पक्की हो गयी...
“हाँ....”
“अच्छा ये बीमारी जो फैली है उसके कारण कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगा...”
“पता नहीं, ना हो तो अच्छा है... वरना...”
“वरना क्या...”
“वरना ना, हम भाग के शादी कर लेंगे, कितना यूनीक होगा ना...”
“हाहा, हाँ....”
“अख़बार की लाइन बनेगी, करोना से परेशान लड़के लड़की ने भाग के शादी की...”
“हाहा, अरेंज्ड मैरिज में ऐसा कौन किया होगा भला....”
“सच में..”
“लेकिन अगर सच में तारीख़ आगे बढ़ गयी तो...”
“पता नहीं, लेकिन तुमसे अब दूर रहना मुश्किल है बहुत....”
“सच्ची.....”
“मुच्ची...”

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मोहब्बत पर कई सारी फ़िल्में बनी हैं और बनती रहेंगी...

2004 में एक फ़िल्म आयी थी रेनकोट, उस वक्त शायद वो फ़िल्म उतनी अच्छी नहीं लगी थी या कहूँ समझ ही नहीं आयी...

आज गुजरे वक्त के साथ लगता है प्यार पर इससे बेहतरीन फ़िल्म नहीं बन सकती.... धीमी चलती है फ़िल्म लेकिन जिस तरह अजय देवगन और ऐश्वर्या के किरदार खुद अपनी ज़िंदगी में तकलीफ़ में होते हुए भी एक दूसरे के सामने खुद को अच्छा बतलाते हैं और जाते-जाते एक दूसरे की मदद किए जाते हैं, यही तो है प्यार...

प्यार के लिए साथ होना ज़रूरी है लेकिन अगर साथ ना भी हों तो एक दूसरे की फ़िक्र में जब मन बरबस पलट के एक दूसरे की तरफ़ देखता है तो वक्त उसी समय थम जाता है...

Thursday, January 23, 2020

एग्जामिनेशन सेंटर...

उन दिनों शायद
मेरा एक ही मक़सद हुआ करता था
कि किसी तरह पता चले
तुम्हारा कहीं कोई
इग्ज़ाम तो नहीं,
या कोई इंटर्व्यू ही हो,

और ज़िद करूँ
तुम्हारे साथ चलने की
तुम्हारे एग्जामिनेशन सेंटर तक,
कि जब तक तुम देती रहो इग्ज़ाम
मैं इंतज़ार करूँ तुम्हारा
वहीं कहीं बाहर
किसी चबूतरे पर बैठे हुए
या किसी पेड़ के नीचे,

बाहर के किसी ठेले से
खायी वो दो बेस्वाद इडलियों
का स्वाद घुलता रहे
इग्ज़ाम के ख़त्म के होने के इंतज़ार में...

फिर पूछूँ तुमसे कि कैसा हुआ सब कुछ,
तुम सुनाओ उन सवालों को
और कैसे तुमने हल कर दिया उन्हें,
और फिर वापस चल पड़ें
हॉस्टल की तरफ़
बस में बैठकर,
ऐसे ही किसी लाल एसी बस में
बैठे बेखयाली में
तुम्हारा हाथ पकड़ लिया था,
तो चौंक गयी थी न तुम...

उन दिनों बस तुम्हारे साथ ही
दिल करता था रहने का,
अब जब बातें वो बीत गयी
तो लगता है
इतना मुश्किल था क्या
साथ निभा जाना उस इंसान का,
जिसने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा था
एग्जामिनेशन सेंटर में भी नहीं...

Saturday, January 18, 2020

सीधी-सादी कविताएं...

उसे पसंद है सीधी-सादी कविताएं
जिनमें शब्दों के जाले न बुने गए हों
जिनमे बस बदहवास
प्रेम लिखा और कुछ नहीं
न उर्दू अल्फ़ाज़ों से खेला हो मैंने
न ही कोई विम्ब ऐसा
जो उसे समझ न आये
जिसमें भाव के अंदर
कोई और भाव न छुपा हो
इन्सेप्शन की तरह..

मैं उठाता हूँ अपनी डायरी 
खोजता हूँ कि 
लिखा हो शायद 
कुछ ऐसा आसान सा 
फिर लगता है जब 
ज़िंदगी ही कभी इतनी आसान न थी
तो लिखता कैसे... 

अब आसान सा लिखूँ 
तो झूठ लगता है,
उतना ही झूठ 
जितनी कुछ बीती बातें 
लगने लगी हैं आज कल... 

Friday, December 27, 2019

खुद को बचाये रखना...


उन्होंने कहा कि आंधियों में दीया जलाए रखना,
बिखरेंगे हज़ार घर, पर ख्वाबों वाला बचाये रखना,

इन उखड़ते हुये पेड़ों पे कई घोंसले थे चिड़ियों के,
इन परिंदों में तुम उड़ने का हौंसला बचाये रखना...

लोगों का क्या, वो नफरत लिखेंगे हज़ार तेरी हथेली पर, 
तुम बस दिल में बसी मोहब्बत पर भरोसा बचाए रखना

इस रंग बदलती दुनिया में लोगों के वजूद बदलते हैं
तुम खुद के अंदर खुद को बस बचाये रखना... 

Monday, November 11, 2019

हम और क्या करते...

हुये इतने मजबूर तो मोहब्बत क्या करते,
कभी छुड़ाते दामन कभी बे हौसला करते

बेवफा कहती है हमें तो कह ले दुनिया,
वफा का तलबगार होके भी हम क्या करते,

सीने से मुझे लगा के भी जो तू इतना रोती थी
तो अलविदा कहते नहीं तो और क्या करते,

मिजाज मेरा तेरी मुफ़लिसी पे आ गया था
पर जब हम खुद ही अधूरे थे तो क्या करते

इंतज़ार करने को तेरा हम तैयार थे ताउम्र
तूने रास्ता ही बदल लिया तो हम क्या करते

एक आँसू देखकर जब दिल बुझ सा जाता था
उन आँखों में समंदर देखते तो हम क्या करते... 
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