Tuesday, August 19, 2025

बारिश का वो कोना...

बैंगलोर की शामें हमेशा एक-सी नहीं होतीं।

कभी अचानक बादल उमड़ आते हैं, कभी हल्की-सी धूप लंबी सड़क पर बिखर जाती है। ऑफिस से लौटते वक्त अंशुल का सबसे प्यारा ठिकाना था — पार्क का एक कोना, जहाँ पुराने बरगद के नीचे लोहे की एक बेंच रखी थी।

उस बेंच पर बैठते ही शहर का शोर कुछ देर के लिए धुँधला हो जाता था। ट्रैफिक के हॉर्न, ऑटो वालों की आवाज़ें, और कॉफी की खुशबू से भरे ठेले — सब पीछे छूट जाते थे।

उस दिन भी अंशुल वहीँ आया था।
थकान उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी। नोटबुक खोली और वही पुरानी आदत — दो-चार लाइनें लिखना, फिर मिटा देना। उसके मन में एक ही सवाल चक्कर काट रहा था:

"क्या कोई इंसान मुझे सच में… टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

इसी सोच में डूबा था कि उसने देखा — पास वाली बेंच पर एक लड़की आकर बैठी। हल्की-सी बारिश शुरू हो चुकी थी, और वो लड़की छतरी न खोलकर बारिश को चेहरे पर पड़ने दे रही थी। बाल उसके गालों से चिपक रहे थे।

कुछ पल दोनों खामोश रहे।
फिर लड़की ने धीरे से पूछा —
“तुम्हें कभी डर लगता है… कि कोई तुम्हें पूरी तरह चाहेगा या नहीं?”

अंशुल ने किताब बंद कर दी।
ये वही सवाल था जो उसके भीतर महीनों से अटका पड़ा था।

“हाँ,” उसने कहा,
“डर हमेशा रहता है। लोग अक्सर कहते हैं ‘हम चाहेंगे’, पर जब टूटा-बिखरा इंसान सामने आता है, तो उनका प्यार भी काँच की तरह टूट जाता है।”

लड़की ने हल्की-सी मुस्कान दी। मुस्कान में दर्द था, जैसे वो जवाब सुनना चाहती भी थी और डरती भी।


अगले कई दिनों तक वो लड़की — रागिनी — उसी पार्क में मिलने लगी।
कभी दोनों बारिश से बचते हुए चायवाले के ठेले तक चले जाते। भाप उठते कपों के बीच उनकी बातचीत में भी एक गर्माहट घुलने लगी।
कभी वो पार्क के रास्तों पर देर तक चलते रहते। पेड़ों के नीचे गिरी पत्तियों पर कदम रखते हुए, खामोश रहते लेकिन भीतर बहुत कुछ कह जाते।

रागिनी बहुत बातें करती थी — अपने बचपन के बारे में, कॉलेज के दिनों के बारे में, और उस रिश्ते के बारे में जिससे वो बँधी हुई थी लेकिन खुश नहीं थी।
“वो इंसान मुझे चाहता तो है… पर टूट कर नहीं,” उसने एक बार कहा था।
“उसके प्यार में मजबूरी ज़्यादा है, गहराई कम।”

अंशुल सुनता रहा। हर शब्द उसके भीतर चोट करता, लेकिन वो समझता था कि प्यार का मतलब किसी को बाँधना नहीं, बल्कि उसे समझना है।


एक शाम की बात है।
बारिश बहुत तेज़ थी। बिजली चमक रही थी, और पार्क लगभग खाली था। रागिनी और अंशुल उसी बरगद के नीचे खड़े थे। हवा इतनी तेज़ थी कि उनकी छतरियाँ उलट रही थीं।

रागिनी ने अचानक कहा —
“तुम जानते हो न, कि शायद मैं कभी तुम्हारी नहीं हो पाऊँगी?”

अंशुल ने उसकी आँखों में देखा।
उन आँखों में सवाल भी थे और डर भी।
“जानता हूँ,” उसने धीरे से कहा।
“लेकिन ये भी जानता हूँ कि अगर कोई तुम्हें टूट कर चाहेगा… तो वो शायद मैं ही होऊँगा।”

कुछ पल खामोशी रही।
सिर्फ़ बारिश की बूँदें गिरती रहीं।


फिर एक दिन रागिनी नहीं आई।
ना उस शाम, ना अगले दिन।
पार्क की बेंच खाली थी, बरगद का कोना चुप था।

अंशुल कई हफ्ते इंतज़ार करता रहा।
उसकी नोटबुक में अब सिर्फ़ रागिनी से जुड़े शब्द भरते गए — बारिश, मुस्कान, डर, अधूरापन।

उसने कभी तलाशने की कोशिश नहीं की। शायद उसने समझ लिया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ़ एक शहर, एक पार्क और एक मौसम तक के लिए आते हैं।

लेकिन आज भी जब बारिश होती है, अंशुल उसी बरगद के नीचे बैठ जाता है।
लोग दौड़कर शेल्टर में भागते हैं, लेकिन वो भीगता रहता है — जैसे किसी अदृश्य साथी के साथ खड़ा हो।

उसके मन में अब भी वही सवाल गूंजता है—
"क्या कोई इंसान मुझे टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

और उसके भीतर से जवाब आता है—
"हाँ, शायद… वो आई थी। बस हमारे बीच वक़्त सही नहीं था।"


उसी वक़्त कहीं दूर... 


आज भी जब बारिश होती है, रागिनी खिड़की पर खड़ी होकर बाहर देखती है।
उसकी हथेलियाँ भीग जाती हैं, और वो बरगद के नीचे खड़े उस लड़के को याद करती है, जिसने उसे पहली बार आईना दिखाया था।

वो जानती है कि अंशुल ने शायद उसे आज भी वहीं तलाशना बंद नहीं किया होगा।
और उसके मन में एक चुप सवाल गूँजता है:

"क्या कोई मुझे टूट कर चाहेगा?"

और फिर भीतर से जवाब आता है:
"हाँ… वो था। बस मैंने ही हिम्मत नहीं की।"

Monday, August 18, 2025

अव्यक्त प्रेम की डायरी

(पन्ना- 17)

आज फिर घर अजीब-सा खाली है।
पियू की हँसी खिड़की से झाँकती नहीं,
और शिवी की खिलखिलाहट
कमरे की दीवारों पर टकराकर
वापस नहीं आती।

मैं दोनों की दूरी को
अपनी साँसों में नापता हूँ।
आईना धुँधला है—
क्योंकि उस पर तुम्हारी मुस्कान
काफ़ी दिनों से नहीं उतरी।

इन खालीपन के बीच
मैं एक पुल बनाता हूँ,
जो शायद किसी नक्शे पर नहीं है।
वह बस मेरी धड़कनों में है—
धीरे-धीरे जुड़ता हुआ,
हवा की तरह फैला हुआ।

शायद यही दूरी की गवाही है—
कि प्रेम कहीं खोया नहीं,
बस और गहरा होकर
अदृश्य हो गया है।

Thursday, August 7, 2025

मुझे नहीं आया प्रेम साबित करना...

तुम्हारे माथे पर
एक हल्की सी शिकन देख ली थी उस दिन,
उसके बाद से
हर शाम थोड़ा जल्दी लौट आता हूँ—

शायद यही मेरा "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ" है। 

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प्यार बहुत किया है,
गवाही नहीं दी,
क्योंकि इश्क़ अगर सच हो
तो अदालत नहीं, धड़कनें काफी हैं...

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तुमने पूछा, कभी क्यों नहीं कहा,
मैं मुस्कुराया —
"जो हर वक़्त महसूस हो
उसे साबित थोड़ी किया जाता है..."

मैं हर रोज़ लिखता हूँ तुम्हें,
बिना नाम, बिना पते के,
प्यार तो लफ़्ज़-लफ़्ज़ टपकता है,
पर तुम्हें भेजना नहीं आता...

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मुझे नहीं आता
प्रेम को सबूतों में बाँधना,
मैं तो बस हर रोज़
तुम्हें अपनी साँसों में रख लेता हूँ...

"मुझे नहीं आया 
प्रेम साबित करना,
बस आया प्रेम करना..."

प्यार बहुत करता हूँ,
बस जताना नहीं आता,
तुम हवा बनके रही पास
और मैं साँस बनके भी कुछ कह न सका...

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शायद इसलिए
हर बार तुम्हें पाने की जगह
मैंने तुम्हें होने दिया —
जैसे चुपचाप
कोई दीपक रख आता है
मंदिर की देहरी पर
बिना मन्नत माँगे।

मैंने नहीं पूछा कभी
कि तुम क्यों दूर हो,
क्योंकि नज़दीकी मापने का हुनर
मेरे प्रेम में था ही नहीं।

जो भी था —
वो उसी तरह बहा
जैसे नदी अपने किनारों से
सिर्फ मिलने की उम्मीद में टकराती है,
ना कोई सवाल,
ना कोई सबूत।

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प्रेम मेरे लिए कोई तर्क नहीं था,
वो बस एक आदत थी —
तुम्हें हर दिन महसूस करने की।

मैंने कभी नहीं माँगा
तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ,
पर हर दुआ में
तुम्हारी छाया रख दी थी—
जैसे धूप में कोई
किसी पेड़ को याद करता है।

जो तुमसे कहा नहीं
उसे कई बार
अपनी ही नींद से चुरा कर
कविताओं में रख आया हूँ,
ताकि जब पढ़ा जाए
तो लगे —
कि कोई चुपचाप
तुमसे प्रेम कर रहा है… तब भी...

Tuesday, August 5, 2025

एक पुरानी रेसिपी, एक नई होली और कटिहार की धूप...


घर लौटने का सुख हमेशा ही कुछ खास होता है। ये वो जगह होती है, जहाँ हर दीवार, हर कोना एक किस्सा कहता है। कुछ जगहें सिर्फ जगह नहीं होतीं — वो वक़्त का ठहराव होती हैं, एक एहसास, जो हर बार लौटने पर हमें थोड़ा और खुद से मिलवाता है। मेरे लिए कटिहार वैसी ही जगह है।  

इस बार जब मैं कटिहार आया, तो शहर वही था, लेकिन मेरे साथ मेरी छोटी-सी दुनिया भी थी — प्रियंका और हमारी बेटी शिवी, जो अभी पौने दो साल की है। एक दिन यूँ ही हल्की-फुल्की बातों के बीच प्रियंका ने कहा, “कचरी बनाते हैं।” मेरे अंदर कुछ खिल गया — वो स्वाद, वो प्रक्रिया, वो भूली-बिसरी रसोई की स्मृतियाँ जैसे फिर से जाग उठीं। मैंने तपाक से जोड़ा, “दाल बड़ी भी बनायें।”

बस, फिर क्या था! जैसे एक छोटा-सा उत्सव मनाने की वजह मिल गई। अगले दिन सुबह-सुबह तैयारी शुरू हो गई। घर की रसोई में सारा माहौल बदल चुका था। उरद दाल पानी में भीग रही थी और बगल में चावल भी धुलकर छन्नी में रखे थे, ताकि सारा पानी निकल जाए। प्रियंका ने चावल में थोड़ा-सा जीरा और अजवाइन मिलाया और फिर उन्हें अच्छे से सुखाने के लिए फैला दिया। ये प्रक्रिया जितनी साधारण लगती है, उतनी ही जरूरी भी होती है। जीरा और अजवाइन की हल्की सुगंध चावल में बस जाती है, और यही स्वाद कचरी में जान डाल देता है।

प्रियंका बड़ी निपुणता से काम में लगी थी, और मैं कभी-कभी मदद करने के बहाने उसके आसपास मंडरा रहा था। रसोई में मसालों की खुशबू घुलने लगी थी, लेकिन इस कहानी की सबसे प्यारी बाधा थी — शिवी। रसोई के हर कोने में उसकी नन्ही उंगलियाँ मौजूद थीं। तभी हमारी छोटी-सी नन्ही शैतान शिवी ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उसके कदम जहाँ भी पड़ते हैं, वहाँ खिलखिलाहट और हलचल दोनों साथ चलती हैं।

जैसे ही दाल पिसी और उसमें मसाले मिलाकर बड़ी का घोल तैयार हुआ, शिवी ने अपनी जिज्ञासा जतानी शुरू कर दी। उसके नन्हे-नन्हे हाथ बड़ी को छूने के लिए आगे बढ़ रहे थे। मैंने उसे गोद में उठाया, लेकिन उसकी निगाहें रसोई में बनते हर व्यंजन पर टिकी रहीं।

यह अनुभव मेरे लिए सिर्फ खाने-पीने का मामला नहीं था, बल्कि यह अपनेपन की, परिवार की और घर के उन छोटे-छोटे पलों की याद दिलाने वाला था। जो शब्दों में बयाँ नहीं हो सकते, लेकिन दिल में गहरे उतर जाते हैं।  शायद असली कहानी यही होती है — उन पलों को सहेजना, जो कभी लौटकर नहीं आते, लेकिन अपनी ख़ुशबू हमेशा पीछे छोड़ जाते हैं। 

इस बार की होली भी खास रही — शिवी की दूसरी होली, लेकिन कटिहार में पहली। पहली बार रंगों को देखकर उसकी आँखों में जो हैरानी और खुशी थी, उसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल है। पिछली होली में वो बहुत छोटी थी, रंगों का मतलब भी नहीं समझती थी। लेकिन इस बार, जैसे ही रंगीन पिचकारी और गुलाल उसके हाथ में आया, वो खिल उठी।


उसने पहले थोड़ा हिचकते हुए अपनी हथेली पर गुलाल लगवाया। फिर धीरे-धीरे वो खुद दूसरों को रंगने लगी। आँगन में रंगों के छींटे उड़ रहे थे, और वो बीच में हँसती हुई दौड़ रही थी। पानी की बाल्टी में हाथ डालना, चेहरे पर रंग लगते ही खिलखिलाकर हँसना — ये सब उसके लिए पहली बार था, लेकिन हमारे लिए ये पल हमेशा के लिए यादगार बन गए।

उस दिन कटिहार की छत सिर्फ रंगों से नहीं, भावनाओं से भी भीग गयी थी। और मेरे लिए वो पल... जैसे वक़्त वहीं ठहर गया।

कटिहार ने मुझे हमेशा सहेजा है — एक पुराने लेखक को, जो कुछ सालों से लिखना भूल गया था, क्योंकि पढ़ने वाले कम हो गए थे। लेकिन यहाँ, इन दिनों में, मैंने पाया कि लिखना कभी किसी बाहरी सराहना पर निर्भर नहीं करता — यह एक भीतर की आग है, जो तब भी जलती है जब कोई नहीं देख रहा होता।

और इस आग को फिर हवा मिली — प्रियंका की रसोई से, शिवी की पहली रंगों-भरी होली से, और कटिहार की उस धूप से जिसमें चावल सूख रहे थे।

ये सिर्फ एक रेसिपी नहीं थी। ये एक जीवन-रस था, जो घर, रिश्तों, और समय के साथ पककर तैयार हुआ था। अगली बार जब कोई कहे “कचरी बनाते हैं,” तो समझिए — कोई पुराने दिनों को ज़िंदा कर रहा है, कोई रिश्तों को धीमी आँच पर सेंक रहा है, और कोई अपने भीतर की शांति को फिर से महसूस कर रहा है।

Thursday, July 31, 2025

जो पन्नों पर नहीं लिखा गया...

कुछ चुप्पियाँ
इतनी घनी होती हैं
कि उन्हें पढ़ने के लिए
शब्दों को भी
कहीं और से आना पड़ता है..

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मैंने अपनी सबसे सुन्दर कविता
तुमसे नहीं कही —

ताकि तुम मेरे साथ रहो हमेशा
मेरा बेस्ट सुनने के लिए ... 

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हर बार जब मैं
तुम्हारे नाम की आख़िरी मात्रा पर रुकता हूँ —
एक नज़्म वहीं से
उदास होकर लौट जाती है...

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वो जो एक चाय का कप
तुमने अधूरा छोड़ा था,
अब उसमें
मैं अपने दिन की तन्हाई घोलता हूँ...

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इश्क़ अब भी है,
बस वो अब
नज़्मों में नहीं,
दोपहरों की खिड़कियों में
कभी-कभी सूखता मिलता है...

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इंतज़ार एक ऐसी चुप्पी है, जिसे सिर्फ वही सुन सकता है जिसे तुमने कभी अलविदा नहीं कहा...

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मैंने खुद को उस वक़्त सबसे ज्यादा समझा
जब कोई समझने वाला नहीं था...

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जिन शब्दों को किसी ने नहीं पढ़ा, वही मेरी सबसे ईमानदार कविता थी... 

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