Sunday, October 28, 2012

चलो कुछ तारे तुम्हारे नाम कर दूं..

हर उस बैंगनी रात की गवाही में
उस नीले परदे को हटाकर
चिलमन के सुराखों से,
झांकता हुआ आसमान की तरफ
पल पल बस यही सोचता हूँ,
कुछ तारे तुम्हारे नाम कर दूं...

जब भी उन थके हुए पैरों को
कभी डुबोता हूँ जो
पास की उस झील में,
सन्न से मिलने वाले उस
सुकून को महसूस करके सोचता हूँ,
कुछ ठन्डे पानी के झरने तुम्हारे नाम कर दूं...

जब भी अकेले में कभी
करता हूँ तुम्हारा इंतज़ार,
हर उस पल
घडी के इन टिक-टिक करते
क़दमों को देख कर ये सोचता हूँ,
घडी की सूईओं के कुछ लम्हें तुम्हारे नाम कर दूं...

जब भी तुम्हारे साथ
बिताया वक़्त कम लगने लगता है,
जब कभी भी
तुम्हें भीड़ में खोया मैं
अच्छा नहीं लगता,
अपनी उम्र के साल गिनते हुए सोचता हूँ,
आने वाले सारे जन्म बस तुम्हारे नाम कर दूं...

10 comments:

  1. क्या बात है वत्स!! बदले बदले से हैं अन्दाज़ तुम्हारे!! Keep it up!!

    वो तेरे साथ बिताया हुआ हर वक्त था कम
    जो बिताया था मैंने पिछले जनम साथ तेरे
    मेरे परमात्मा ने मेरी दुआ मान ही ली
    मुझको इस जन्म में भेजा है फिर से पास तेरे
    भीड़ में जब भी कभी गुम हुई जाती है तू,
    मुझको लगता है कि ये दिल अभी भरा ही नहीं,
    उफ्फ कैसी है तिशनगी मेरी
    ऐ खुदा एक जनम और और मुझे दे दे प्लीज़!!

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  2. अंतिम बंद में जाकर उदार हुए वरना तो कुछ-कुछ में ही अटके थे! सब कुछ लुटाने पर तो जिंदगी ठेंगा दिखा देती है कुछ पर क्या भाव देगी? :)...मस्त खयाल जगे इस कविता को पढ़कर।

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  3. मैंने इसको एक कविता के रूप में देखा...
    बहुत सुन्दर शेखर..
    :-)

    सस्नेह
    अनु

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  4. Apne janm chahe kisi k bhi naam karo.. magar ye jheel, taare etcetra etcetra ... tumhare naam hi kab hue jo kisi aur k naam karne chale? :P
    BTW.. kaqvita achhi h :)

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  5. bahut bahut sundar rachna....

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  6. सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  7. हर उस बैंगनी रात की गवाही में
    उस नीले परदे को हटाकर
    चिलमन के सुराखों से,
    झांकता हुआ आसमान की तरफ
    पल पल बस यही सोचता हूँ,
    कुछ तारे तुम्हारे नाम कर दूं..

    बहुत ही भाव- प्रवण कविता। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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