Friday, November 20, 2015

यूं ही सफर में सोचते-सोचते...

लोग कहते हैं इश्क़ और मेरे लबों पर तुम्हारा नाम अपने आप आ जाता है....

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बंगलौर में
दूधिया कोहरा नहीं पसरता है कभी,
लेकिन तुम्हारे दूर होने से
मेरे दिल पे जो
उदासी का कोहरा है
उसमे मुश्किल हो जाता है
ढूँढना खुद का ही वजूद....

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जब तुम्हारे हिस्से का
आसमान उदास होगा
तो मेरे कमरे के बादल
और घने हो जाएँगे,
उस अंधेरे में
मेरे दिल की
थमी सी धड़कन
पहचान लोगी न....


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चलो न कहीं वादियों में एक छोटा सा प्लॉट लेकर डालते हैं प्यार के बीज और उगाते हैं इश्क़,
दुनिया में प्यार कम हो चला है इन दिनों...

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समंदर की गहराई की कसम खाने वाले लोग अकसर तुम्हारी आँखें देखकर अपनी जान गंवा बैठते हैं....
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ज़िंदगी के हर मोड पर किनारा तलाशते तलाशते कुछ साल पहले मुझे तुम्हारी आँखों की पलकों का सहारा मिल गया था, ऐसा लगता है जैसे किसी पिछले जन्म की बात है.... 

4 comments:

  1. वाह क्या अहसास है

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  2. समंदर की गहराई वाला मुझे बहुत पसंद आया

    http://ulatpalat.blogspot.in/2015/11/blog-post_27.html

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  3. ये पंक्तियाँ बहुत मुलायम तरीके से दिल की उदासी और चाहत दोनों को छू जाती हैं। बंगलौर के कोहरे से तुलना करना बड़ा खूबसूरत लगा, जैसे शहर नहीं बदला पर मन का मौसम बदल गया हो। आसमान, बादल और धड़कन की बात में एक गहरी जुड़ाव की भावना है, जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाती है।

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