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Wednesday, August 3, 2016

कुछ लिखते रहना ज़रूरी है न, बस तुम्हारे लिए....

मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं कहीं इधर-उधर के कई नुक्कड़ों पर थोड़ा थोड़ा सा छूट सा गया हूँ... मेरे द्वारा लिखा हुआ सब कुछ, मेरे उस वक़्त का पर्यायवाची है... मुझे पर्यायवाची शब्द शुरू से ही पसंद नहीं आते, जाने कितने ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ एक जैसे होते हैं लेकिन हर शब्द हर जगह उपयोग नहीं किया जा सकता... हिन्दी व्याकरण में मुझे अनेक शब्दों के एक शब्द बहुत पसंद था, तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में होना भी अनेक शब्दों का एक शब्द है...   

तुमने जितने छल्लों में बांटकर मुझे ये वक़्त दिया है न, कलेंडर की कई तारीखों के कोनों में फंसा हुआ वो वक़्त टूथपिक से निकालना पड़ता है.. हो सके तो हर शनिवार इन छल्लों को मिलाकर एक पुल बना दिया करो न इस जहां से उस जहां तक... 

मैं तुम्हारी आखों को 
शब्दों में लिखता हूँ,

मेरी नज़मों में तुम
इश्क़ पढ़ती हो...

सच, तुम्हारी आखें ही इश्क़ हैं,

जिनमें खुद के गुमशुदा हो जाने की
रपट लिखवा दी थी मैंने पाँच साल पहले ही..

Monday, March 21, 2016

माइनस इनफिनिटी....

तुम्हारे कुछ बाल 
इन कंघियों में कैद होकर रह गए हैं
उसी तरह जैसे मकड़ी
खुद कैद हो जाती है
कभी कभी
अपने ही बुने जाले में...

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ओझराए हुये इन धागों के कोने में,
एक हल्की सी गांठ बांध रखी है
तुम्हारे नाम की,
चाहे कितना भी लटपटा जाऊँ
ज़िंदगी की लटेर के ऊपर,
हमेशा ये सनद रहेगा
कि मेरा एक सिरा बांध रखा है
तुमने हमेशा हमेशा के लिए....

*********

प्रेम इन्फाईनाईट की तरह है,
चाहे तो किसी से जोड़ लो, घटा लो
गुना करो, चाहे तो भाग लगा लो,
आगे माइनस लगा के
चाहो तो माइनस इनफ़िनिटी कर लो,
लेकिन वो वैसे ही बना रहेगा
उसी अभेद्यता के साथ,
जैसे मिले हुये हों
दो शून्य आपस में
सदा सदा के लिए...

Tuesday, January 12, 2016

हम प्रेम में ही हैं...

कितनी बार हम पूछते हैं
एक-दूसरे से एक ही सवाल
कि हम क्यूँ बने हैं एक दूसरे के लिए,
हम क्यूँ खड़े हैं साथ
और क्यूँ हर लम्हे को
छान रहे हैं चाँद की छलनी से,
वक़्त के हर गणित के साथ
हम समझना चाहते हैं
हमारे बीच का विज्ञान,
कितनी ही बार
तैरती है खामोशियाँ हमारे मध्य
जैसे खीच दी हो किसी ने
कोई समानांतर रेखा
जिसका कोई छोर न दिखता हो,
जैसे लगता है हम खड़े हैं अलग-अलग
और नहीं मिल सकेंगे कभी,
तभी अचानक से हम पहुँच जाते हैं
अनंत की धुरी पर
और घूमते हुये छू लेते हैं
एक दूसरे की उपस्थिति को,
ये पहेली जैसे सूडोकू की तरह है
कहीं से भी शुरू करें
हम वहीं पहुँचते हैं
उसी आखिरी खाने पर
जिसका अंक हमें
मिल कर सुलझाना पड़ता है,
अपनी ज़िंदगी का आखिरी खांचा
भर लेने के बाद
त्वरित हो जाती हैं साँसे
और मान लेते हैं हम कि
हम प्रेम में हैं,
हाँ-हाँ हम प्रेम में ही हैं...

Friday, November 20, 2015

यूं ही सफर में सोचते-सोचते...

लोग कहते हैं इश्क़ और मेरे लबों पर तुम्हारा नाम अपने आप आ जाता है....

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बंगलौर में
दूधिया कोहरा नहीं पसरता है कभी,
लेकिन तुम्हारे दूर होने से
मेरे दिल पे जो
उदासी का कोहरा है
उसमे मुश्किल हो जाता है
ढूँढना खुद का ही वजूद....

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जब तुम्हारे हिस्से का
आसमान उदास होगा
तो मेरे कमरे के बादल
और घने हो जाएँगे,
उस अंधेरे में
मेरे दिल की
थमी सी धड़कन
पहचान लोगी न....


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चलो न कहीं वादियों में एक छोटा सा प्लॉट लेकर डालते हैं प्यार के बीज और उगाते हैं इश्क़,
दुनिया में प्यार कम हो चला है इन दिनों...

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समंदर की गहराई की कसम खाने वाले लोग अकसर तुम्हारी आँखें देखकर अपनी जान गंवा बैठते हैं....
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ज़िंदगी के हर मोड पर किनारा तलाशते तलाशते कुछ साल पहले मुझे तुम्हारी आँखों की पलकों का सहारा मिल गया था, ऐसा लगता है जैसे किसी पिछले जन्म की बात है.... 

Saturday, July 11, 2015

जाने ये सिरफिरा कहाँ तक पहुंचेगा...

जाने इस सोहबत का असर कहाँ तक पहुंचेगा,
इस बज़्म में मेरी नज़मों का सफर कहाँ तक पहुंचेगा,

गर गुमनाम हो गयी हों इन आँखों में खामोशियाँ मेरी,
तो उन लबों में उलझे एक बोसे का असर कहाँ तक पहुंचेगा,

तेरी हर ज़िद पर नींद के बुलबुले हवा मे घुल से जाते हैं,
जाने मेरी हकीकत में तेरे ख्वाबों का घर कहाँ तक पहुंचेगा,

सजदे में झुक जाता है ये दिल तेरी मोहब्बत की इबादत में,
दुआएं लेकर निकले इन परिंदों का असर कहाँ तक पहुंचेगा,

समंदर रश्क किए बैठा है अपनी गहराई का लेकिन,
उसके एक कोने में बसा ये लावारिस शहर कहाँ तक पहुंचेगा...


Sunday, March 29, 2015

मेरी बातें अनछुइ सी रह जाती हैं इन दिनों....

आकाश में कुछ रंग बिरंगे फूल रोप दूँ तो,
तुम्हारी हर उदासी के ऊपर
फूलों की खुशबू गिरेगी ....
उस खुशबू से
तुम खुश तो हो जाओगी न....

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आसमां की झूलती खिड़कियों पे आईना है,
ठीक वैसे ही जैसे मेरी खिड़की पे लगा है...
तुम्हारी शक्ल आधी दिखे तो
तुम आईना नीचे कर लगा लिया करती हो,
कह दो तो आसमां भी झुका दूँ
कि देख सको
खिड़की के उस पार
तुम्हारी शक्ल के साथ इश्क भी है मेरा....

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धीमी सी आंच है इस दिल की सिगड़ी में,
इसमे जितनी तेरी याद जलेगी,
इश्क उतना ही कुंदन होगा....

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तुम्हारा चेहरा न गोल है न चौकोर
आकार बदलते हैं कुछ चेहरे
इस चाँद की तरह
होता भी है और कभी-कभी नहीं भी,
लेकिन जब नहीं भी होता
तब भी मुस्कुराता रहता है
छुप-छुप कर....

Tuesday, February 17, 2015

तुम ज़िंदगी हो मेरी...

तुम प्रेरणा हो मेरी,
तुम धारणा हो मेरी
अकेलेपन के जंगलों में
अचानक से मिले
इक कल्पतरु से छन कर
आती हुयी छांव हो मेरी...

गयी शाम
एक हल्का सा बादल
समेट रखा था,

एक शिद्दत से
जो बारिश की कुछ बूंदें
निचोड़ी उस बादल से,
लम्हा-लम्हा जोड़ कर जो की
तुम वो साधना हो मेरी...

तल्ख़ हुए हैं कई बार
शायद कुछ शब्द मेरे,
उसी तरह जैसे
कभी-कभी मैं झुँझला जाता हूँ
अपने आप से भी, 
खुद से लड़ते हुए
चलता हूँ जिसके साथ हमेशा
तुम वही ज़िंदगी हो मेरी...

तुम प्रेरणा हो मेरी...
तुम साधना हो मेरी.... 

डिस्क्लेमर :- एक-दो पंक्ति सुनी थी उससे ही पूरा कुछ लिख डाला...

Thursday, December 25, 2014

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है....

कभी अचानक से सुबह जल्दी नींद खुल जाये तो मैं चौंक कर इधर-उधर देखने लग जाता हूँ.... तुम्हारे होने की हल्की सी खुशबू फैली होती है चारो तरफ..... जैसे चुपके से आकर मेरे ख्वाबों को चूमकर चली गयी हो.... आधी -चौथाई या फिर रत्ती भर भी, अब तो जो भी ज़िंदगी महफूज बची है बस यूं ही गुज़रेगी तुम्हारे होने के बीच....


वक़्त के दरख़्त पे
मायूसियों की टहनी के बीच 
कुछ पतझड़ तन्हाईयों के भी थे,
पर इस गुमशुदा दिसंबर में
उम्मीद की लकीरों और 
ओस की नमी के पीछे
दिखती तुम्हारी भींगी मुस्कान…

दिसंबर की सर्दियों के ख्वाब भी
गुनगुने से होते हैं,
रजाईयों में दुबके हुए से,
उसमे से कुछ ख़्वाब फिसलकर
धरती की सबसे ऊंची चोटी पर 
पहुँच गए हैं,
उस चोटी से और ऊपर, बसता है
ढाई आखर का इश्क अपना..

Monday, October 13, 2014

इस तन्हा शाम का विलोम तुम हो...

इन पेचीदा दिनों के बीच,
आजकल बिना खबर किए ही
अचानक से सूरज ढल जाता है,
नारंगी आसमां भी बेरंग पड़ा है इन दिनों...

इन पतली पगडंडी सी शामों में
जब भी छू जाती है तुम्हारी याद
मैं दूर छिटक कर खड़ा हो जाता हूँ...
क्या करूँ
तुम्हारे यहाँ न होने का एहसास
ऐसा ही है जैसे,
खुल गयी हो नींद
केवल बारह मिनट की झपकी के बाद,
इस बारह मिनट में मैं
तीन रेगिस्तान पार कर आता हूँ,
रेगिस्तान भी कमबख्त
पानी के रंग का दिखता है...

तुम्हारी याद भी एक जादू है,
उन नीले रेगिस्तानों में
मटमैले रंग के बादल चलते हैं....

इससे पहले कि इसे  पढ़ कर
तुम मुझे बावरा मान लो,
चलो इस शाम का
विलोम निकाल कर देख लेते हैं,

इस बारह मिनट की झपकी के बदले
तुम्हारी गोद में मिले सुकून की नींद
जहां बह रहे हैं
ये तीन नीले रेगिस्तान
वहाँ झील हो तुम्हारे आँखों की
और इन मटमैले बादलों के बदले
तुम्हारी उन काली ज़ुल्फों का घेरा हो...

इस तन्हा शाम का विलोम बस तुम हो...
आ जाओ कि,
ज़िंदगी फिर उसी लम्हे से शुरू करनी है
जहां तुम इसे छोड़ कर चली गयी हो...

अब ये मत कहना कि
ये नज़्म मुकम्मल नहीं,
आखिर तुम्हारे बिना कुछ भी
पूरा कहाँ हो पाया है आज तक....

Tuesday, June 24, 2014

आसमां और हथेलियाँ...

ये आसमां इतना विशाल है
बिल्कुल अनंत,
लेकिन उसमे,
मुझे बस शून्य दिखता है
बहुत बड़ा शून्य
जैसे किसी ने
एक बहुत बड़े घूमते कटोरे को
पलट कर रख दिया हो... 
बस ऊपर सब चक्कर खाते हुये दिखाई देते हैं,
कभी सूरज, कभी चाँद तो कभी बादल,
कोई नहीं रुकता मेरे लिए
जैसे सब ढूँढते रहते हैं कटोरे का छोर...

फिर अचानक से
तुम दिखती हो
हथेलियों से अपना चेहरा ढाँपे हुये,
तुम्हारी हथेलियों को सीधा करता हूँ तो
महसूस होता है जैसे
ये छोटे-छोटे हाथों की लकीरें
पकड़ के बैठी हैं मेरा वजूद
जैसे तुम थमी हुयी हो
मेरे भटकाव-मेरी बेचैनी को पकड़कर,
कान लगा कर सुनो तो
उन हथेलियों से,
सुनाई देती है मेरी हर सांस की आवाज़ें...

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