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Wednesday, August 14, 2013

आपका शुक्रिया...

अक्सर लोग ऐसी पोस्ट्स तब लिखते हैं जब या तो उनके ब्लॉग की सालगिरह हो या फिर पोस्ट्स की संख्या सैकड़े के गुणनफल को छू रही हों... ऐसे अनदिने पोटली कौन खोलता है भला... लेकिन कई दिनों से सोचते सोचते आखिर आज इस धन्यवाद को आप सभी तक पहुंचा देने का ठान लिया...

पिछले कई महीनों से ब्लॉग पर ऐसी कुछ ख़ास उपस्थिति नहीं रही, लैपटॉप ख़राब होने की मजबूरी के बाद न लिखना कब आदत में तब्दील हो गयी पता ही नहीं चला... लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे लोगों के ईमेल आ रहे हैं जिनको न ही कभी मैंने अपने ब्लॉग पर देखा और न ही उनसे कभी बात हुयी, मैं तो उनके नाम तक नहीं जानता था... वो मेरे लिखे के लिए बधाई देते हैं और अगली फुल फ्लेक्स पोस्ट कब आएगी इसके बारे में पूछते हैं... उन्हें मुझे अपने ब्लॉग पर बुलाने का कोई मोह नहीं, कुछ के तो खुद के ब्लॉग भी नहीं, बस उन्हें सबका लिखा पढना अच्छा लगता है... खैर बड़ी बात ये है कि कई ऐसे लोग हैं जिनसे मेरा कोई संवाद नहीं लेकिन मेरी बातें उन तक पहुँच रही हैं और उन्हें अच्छी लग रही हैं... करीब साढ़े तीन साल पहले एक दिन यूँ ही टाईमपास के लिए हिंदी ब्लॉग लिखने का लिया गया फैसला आज तक मुझे कई अनएक्सपेक्टेड खुशियाँ दे चुका है..

न ही उन सभी खुशियों के पन्ने इस ब्लॉग पर उतारे जा सकते हैं और न ही उन सभी लोगों का जिक्र करना सम्भव हैं जिन्होंने इस ब्लॉग को और मुझे सराहा है, हो सकता एक-आध नाम छूट जाएँ और ऐसी कोई गुस्ताखी मैं नहीं करना चाहता हूँ... बस हर बार की ही तरह अपने उन तीन दोस्तों का जिक्र करना नहीं भूल सकता जिनकी बदौलत मैंने ब्लॉग्गिंग शुरू की थी... मनीष, प्रतीक और निशांत जिस तरह इन लोगों ने इस शुरुआत में मेरा साथ दिया मैं पूरी ज़िन्दगी नहीं भूल सकता... दोस्तों को थैंक्यू बोलने की आदत गन्दी होती है इसलिए नहीं बोलूँगा... 

सबसे पहली पोस्ट के रूप में मैंने करीब 1999 के आस-पास लिखी एक कविता संघर्ष पोस्ट की थी... पोस्ट करने के 23 दिनों बाद पहला कमेन्ट आया था संजय भास्कर जी का... कुल ज़मा 6 कमेंट्स से प्रोत्साहित होकर मैं अपनी टूटी-फूटी कवितायें पोस्ट करने लगा... लिखने से ज्यादा पढने का शौक था तो उस दौरान कई बेहतरीन ब्लोग्स भी खंगाल डाले.. सब एक से बढ़कर एक महारथी... कुछ चुनिन्दा पोस्ट्स को अपने ब्लॉग पर भी संग्रहित करना चाहा तो सुनहरी यादें नाम का एक आईडिया यूज किया.. लेकिन फिर समय कम होने के कारण ज्यादा दिनों तक ज़ारी नहीं रख सका... अब तक मेरे ब्लॉग पर लोगों का आना-जाना बढ़ चुका था... लेकिन मेरे ब्लॉग से कई लोगों की जान-पहचान तब बनी जब मैंने पहेलियाँ (पहचान कौन चित्र पहेली) शुरू कीं (उन दिनों पहेलियों का मक्कड़-जाल सा फैला था हिंदी ब्लोग्स पर)...  कई दिनों के सफल आयोजन के बाद उसको भी समय के अभाव में बंद कर दिया... अब मैं गद्य लिखने लगा था, बस यूँ ही छोटी-छोटी कहानियां अपनी ज़िन्दगी की... कुछ अपने निजी अनुभव और कुछ ख्यालों की उड़ान को आज भी इस ब्लॉग पर सहेज रहा हूँ...

कविताओं, पहेलियों और कहानियों का ७ मार्च २०१० को शुरू किया गया ये ब्लॉगिंग का सफ़र ताउम्र ज़ारी रहे इसकी कोशिश करता रहूँगा... अब नियमित रूप से इस ब्लॉग पर दिखता रहूँगा और अपने खामोश दिल की सुगबुगाहट से ये आँगन रौशन करूंगा इसी वादे के साथ अपने सभी पढने वालों को सहृदय धन्यवाद देता हूँ...

Saturday, September 29, 2012

एकांत-रुदन...

ज़िन्दगी में दोस्तों का होना कितना ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी... कोई फोर्मलिटी वाले दोस्त नहीं, दोस्त ऐसे जिन्हें दोस्ती की बातें पता हो... मोनाली की भाषा में कहूं तो "गंवार" (अच्छे लोगों को वैसे भी गंवार ही कहा जाता है आज कल), जिसके लिए दोस्ती कोई समझौता नहीं... एक ऐसी जगह जहाँ जाकर आप अपने दिल की सभी बातें कर सकते हैं... एकदम खुल कर के  बिना मन में ये डर रखे कि कहीं वो किसी बात का कोई गलत मतलब न निकाल ले या फिर किसी और के सामने आपकी बातें डिस्कस न करे (अच्छी या बुरी कोई भी)... मुझे हमेशा से ही ऐसे किसी दोस्त का साथ चाहिए होता है, पता नहीं क्यूँ... शायद मैं कमज़ोर हूँ, खुद को खुद तक समेट कर नहीं रख पाता... हर इंसान की अपनी एक आवाज़ होती है, लेकिन एक अच्छा दोस्त अपने साथ आवाजों का पूरा लश्कर लेकर आता है... लेकिन आज कल आस पास ऐसा कोई भी नहीं दिखता जिससे ढेर सारी बातें कर सकूं... अपने मन की बातें... सब व्यस्त हैं... हालांकि ये उम्र ही ऐसी है, जहाँ मेरे सारे हमउम्र कहीं न कहीं व्यस्त तो होंगे ही...

कल रात बहुत देर तक यूँ ही पार्क में बैठा रहा, आस पास के लोगों को देखता रहा... ऐसा लग रहा था मानो मैं किसी सड़क के डिवाईडर पर खड़ा हूँ जिसके दोनों तरफ तेज़ी से भागती हुयी गाड़ियां हों और जिसके अन्दर पसरा हुआ सन्नाटा... जैसे कहीं फंस कर रह गया हूँ... वहां खड़े खड़े एक गर्द सी जम जाती है, न जाने कितनी गर्द... जब काफी देर तक किसी से खुल कर बात न करो तो अजीब सी घुटन होने लगती है अन्दर ही अन्दर... जैसे ये अवसाद, ये अकेलापन, ये घुटन, ये आंसू सब एक दूसरे के समानुपाती हो गए हैं...

बस बेवजह ही उदास हुआ जा रहा हूँ, मेरी ये बेवजह की उदासी शायद मेरे अन्दर कहीं न कहीं तह लगाकर बैठ चुकी है... ये एक अवसाद की तरह है मेरे लिए, ऐसे जैसे किसी ने जख्म दिए और उसपर कई सारी जिद्दी मक्खियाँ छोड़ दी हों ... मेरे अन्दर ये किसी अंधे कुवें की तरह उतर आया है.. हर वक़्त एक अजीब सी खलिश, अजीब सा अकेलापन...सच में कभी कभी छुट्टी बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती ऐसा लगता है कोई काम ही नहीं, इससे अच्छा तो ऑफिस ही खुला रहा करे...

ये कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं है ये बस एक रुदन है, एकालाप है... इसे एकालाप ही रहने दें... कमेन्ट बक्सा बंद है क्यूंकि कभी कभी हमदर्दी भी कांच की किरचों की तरह चुभन देती है...

कुछ दिनों पहले ऐसे ही कुछ लिखा था...
वो खामोश रहता था,
ख़ामोशी बहने लगी थी
उसके खून के साथ
उसकी कोशिकाओं में समा गयी थी जैसे....
कभी कभी उसका दिल करता था
अपने हाथ के नाखूनों से
खुरच दे सारा बदन
महसूस करे उस दर्द को
और उस बहते खून के साथ
आज़ाद हो जाए उसकी खामोशियाँ भी....

Saturday, August 6, 2011

अबे गधों तुम लोगों की बहुत याद आती है यार...

              कहने को तो कल फ्रेंडशिप डे है. वैसे मुझे नहीं लगता कि कोई अच्छा दोस्त दोस्ती जताने के लिए इस दिन का इंतज़ार करता होगा... अमां यार दोस्ती का भी कोई दिन होता है, हम जैसे आवारा लोग तो हर दिन ही दोस्तों के साथ मटरगस्ती किया करते हैं... बाकी सारे रिश्तों के मामले में थोडा अनलकी ज़रूर रहा हूँ (इस बारे में फिर कभी) लेकिन दोस्तों ने कभी अकेला नहीं छोड़ा... स्कूल से लेकर आज तक न जाने कितने ही आवारा दोस्त मिले हैं (अरे आवारा कहके तो फिर भी बहुत इज्जत दे रहा हूँ, क्यूंकि इससे ज्यादा तारीफ करने पर ये पोस्ट सेंसर बोर्ड की नज़र में आ सकती है)... लेकिन छोटे शहर में रहने का एक नुकसान तो है स्कूल के दोस्त बिछड़ जाते हैं, सब अलग अलग कोने में निकल जाते हैं अपने भविष्य(?) को संवारने के लिए... फिर शायद ही कभी मुलाकात होती हो... आप सोच रहे होंगे अरे नहीं ऐसा कहाँ होता है, हाँ हाँ अब ऐसा नहीं होता... अब तो मोबाइल का दौर है, सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट का दौर है... जो हम जैसे दोस्तों को जोड़े रखता है चाहे हम कहीं भी रहे... ये सिर्फ ऑरकुट का ही चमत्कार है कि स्कूल ख़त्म होने के ७-८ सालों के बाद मेरे सभी स्कूल फ्रेंड्स दुबारा कॉन्टैक्ट में आये जिनसे मिलने की उम्मीद छोड़ ही चुका था... ये काम फेसबुक ने नहीं ही किया होगा किसी के लिए...(थैंक्स ऑरकुट)...
               ये पोस्ट लिखते लिखते स्कूल की बातें फ्लैशबैक की तरह सामने से गुज़र रही हैं (अरे वैसा नहीं जैसा फिल्मों में दिखाते हैं, बैकग्राउंड म्यूजिक एंड ऑल, बस सिंपल सा ही है, लेकिन नोस्टालजिक करने के लिए काफी है)...
               
मेरे माँ-पापा दोनों हीं टीचर हैं, अब आप सोच ही सकते हैं घर पर अनुशासन की कैसी गंगा बहती होगी (पापा ६ साल पहले रिटायर हो गए), इसलिए क्लास ७ तक कभी माँ के स्कूल में या फिर पापा के स्कूल में ही पढाई की, तो वहां ज्यादा आवारागर्दी करने का मौका ही नहीं मिलता था (वैसे उस समय बच्चे बहुत सीधे हुआ करते थे, आज कल के बच्चों की तरह नहीं).. खैर ८ वीं क्लास में आखिरकार एक सरकारी हाई स्कूल में दाखिला हुआ मेरा... और घर से ये सख्त हिदायत मिली कि दोस्ती केवल पढने-लिखने वाले लड़कों से करनी है, मैं भी आज्ञाकारी बच्चे की तरह रोज अटेंडेंस के समय देखता था कि रौल नंबर १-२ किस लड़के का है (आपकी जानकारी के लिए बता दूं हमारी क्लास में करीब २४० स्टुडेंट्स थे, हाँ हाँ सब एक ही क्लास में बैठते थे, क्लास क्या थी, पूरा हॉल था).. आखिरकार ५-६ दिन में पता चल गया कि शुरुआत के १०-१२ पढंदर कौन कौन हैं...जल्दी ही दोस्ती भी कर ली... अब ज़ाहिर सी बात है इतने लड़के हैं तो सबसे आगे की बेंचों पर सीट छेकनी पड़ती थी, क्लास का दरवाज़ा खुलने से पहले ही हमलोग बन्दर की तरह(?) खिडकियों पर झूलकर (कमरा दूसरी मंजिल पर था) आगे की बेंच पर कब्ज़ा जमा लेते थे... हर रोज कोई न कोई पहले आ ही जाता था इस आवश्यक कार्य को अंजाम देने के लिए... आगे के दो बेंच अक्सर हमारे कब्ज़े में ही होते थे, हम मतलब मैं, राहुल, आनंद, विजय(नीकू), मिथिलेश, मुकेश, उज्जवल, सुमन, मनोज, अभिषेक (अगर किसी को भूल रहा हूँ तो प्लीज माफ़ कर देना) :P कुछ दोस्त और थे लेकिन वो कभी भी आगे की बेंच पर नहीं बैठते थे, (यू नो पढने में तेज बैक बेन्चर्स :)) आशीष, अलोक, साकेत, संजीव और मदन.. शायद इस पोस्ट पर  आलोक या आशीष कोई कारण बता दे पीछे बैठने का, हो सकता है कुछ ऐसा ओबजर्व करता हो जो आगे की बेंच से देखना मुश्किल हो :P आशीष से उतनी ज्यादा बात नहीं होती थी, लेकिन फिर भी बहुत अच्छा दोस्त है वो मेरा, और आज भी बराबर कॉन्टैक्ट में बना हुआ है.. शायद हो सकता है यहाँ कमेन्ट भी कर दे इमोशनल होके... :)
               कभी कभी जब सीट की किल्लत होती थी तब तो हम एक बेंच पर सात लड़के बैठते थे (कैन यु इमैजिन) ... हमारे एक टीचर ने हमारा नाम सप्तऋषि रख दिया था .. :) उस समय हमारे क्लास  टीचर थे सी पी मेहता सर.. अंग्रेजी पढ़ाते थे, अब इतनी बड़ी क्लास में पढाना कोई आसान काम तो है नहीं, हमारे जैसे लुच्चे लड़के तो पहली बेंच पर बैठ के भी गप्पें लड़ाते थे तो आप सोच ही सकते हैं कि पीछे बैठने वाले लड़के क्या नहीं करते होंगे... मेहता सर ने इसके लिए अनूठा तरीका ढून्ढ लिया था, मैं तो अक्सर ही गप्प मारते पकड़ा जाता था, फिर मुझे बेंच पर खड़ा करते थे और बोलते थे फलाना चेप्टर को डिक्टेट करो...और खुद पूरी क्लास में टहलते हुए निगरानी करते रहते थे... न जाने कितने दिन मैं पूरी घंटी बेंच पर खड़ा रहा हूँ...
               बड़े ही मस्ताने दिन थे, इतने सारे लड़कों में से शायद ही कोई पढने जाता होगा, हम तो जाते थे जीने के लिए, खेलने के लिए, एक दूसरे से मिलने के लिए... उन दोस्तों से मिलने के लिए जिनके बिना दिन अधूरा लगता था...ये वो दिन थे जब छुट्टियां अच्छी नहीं लगती थीं... ये वो दिन हैं जो अब लौट कर नहीं आ सकते...
               कुछ भी नहीं भूला हूँ मैं, चाहे वो हर सुबह अपने घर के बाहर आनंद का इंतज़ार करना ताकि उसकी सायकिल पर आराम से बैठ के स्कूल जाऊं, चाहे वो उज्जवल की जिंदादिली या फिर  नीक्कू के पकाऊ जोक्स (finally i am admitting :)) हा हा हा.. :D अरे हाँ सुमन की वो लम्बी जीभ जिसे वो बड़े आराम से नाक तक की यात्रा कराके ले आता था, वो किसी कौतुहल से कम नहीं थी... उफ्फ्फ्फ... वो दिन ... अबे गधों तुम लोगों की बहुत याद आती है यार...  आशीष इसी शनिवार बंगलौर आ रहा है मिलने के लिए, कुछ और पुरानी बातें ताज़ा होंगी...
                आप सभी को फ्रेंडशिप डे की बधाई (हालाँकि मैं ऐसे किसी भी दिन को मानने से इनकार करता हूँ)...

Thursday, July 7, 2011

साल दर साल कम होती ज़िन्दगी...(happy b'day to me)...

             लो जी एक बार और मेरा जन्मदिन आ गया, और इसके साथ ही मैंने यहाँ इस खूबसूरत से सफ़र में २६ साल गुज़ार दिए | वैसे इस जन्मदिन में कुछ ख़ास तो है नहीं, हर साल ही आता है... बस इस दिन का इंतज़ार इसलिए ज्यादा होता है कि इसी बहाने कुछ भूले बिसरे लोग याद कर लिया करते हैं... अभी रात में बालकनी में बैठा हूँ और लोगों की ढेर सारी बधाईयों का शुक्रिया अदा कर रहा हूँ... सोच रहा हूँ हम जन्मदिन पर खुशियाँ क्यूँ मनाते हैं शायद इसलिए कि इस दिन हमें इस ज़िन्दगी जैसी खूबसूरत नेमत से रूबरू होने का मौका मिला, अरे आप क्या सोचने लगे .. ज़िन्दगी जैसी भी है खूबसूरत ही है....
              और जब लोग मुझे विश करते हैं तो बहुत अच्छा लगता है | अब तो ये सोशल नेटवर्किंग साईट्स के आ जाने से किसी को बर्थडे विश करना भी आसान हो गया है, ज्यादा कुछ करने की ज़रुरत नहीं है बस हैप्पी बर्थडे टाईप कीजिये और भेज दीजिये... पहले भले ही कम लोग होते थे विश करने वालों में लेकिन शायद ज्यादा ख़ुशी मिलती थी |  
               एक पुराना किस्सा याद आ रहा है, मैं जब पटना में लॉज में रहता था तो उस समय उस एरिया के आस पास के सारे लड़कों के फोन बगल वाले टेलीफोन बूथ में आते थे, और वो अंकल जो टेलीफोन बूथ चलाते थे बहुत ही अच्छे और सरल स्वभाव के थे, सभी को बाकायदा बुलाते थे या खबर पहुंचवा देते थे...हमारा लॉज बगल में ही था, तो ५ मिनट बाद फोन करने को कहकर वहां के लड़कों को बुला लिया जाता था... साल २००३ की बात है, मैंने उन्हें पहले ही कह दिया कि अंकल आज मेरा जन्मदिन है हो सकता है मेरे कुछ ज्यादा फोन आयें आज तो उन्होंने कहा कोई बात नहीं, तुम चाहो तो यहीं मेरे घर में ही बैठो आराम से... मैंने उन्हें कहा यूँ बेकार क्यूँ बैठूंगा भला, आज आप आराम कीजिये आज बूथ का ज़िम्मा मुझ पर सौंपिए.. काफी न नुकुर के बाद वो राज़ी हो गए, फिर क्या था मैंने उस दिन उस टेलीफोन बूथ को चलाने का बीड़ा उठाया, इस तरह मेरे दोस्तों को मुझसे बात करने के लिए दुबारा फोन करने की ज़रुरत भी नहीं पड़ी और मैंने अपने १८वें जन्मदिन को यादगार बना दिया... 
               वो भी बहुत अच्छे दिन थे, कई दोस्त तो उन दिनों ग्रीटिंग कार्ड भी दिया करते थे... फिर धीरे धीरे मोबाइल का प्रचलन बढ़ा तो हर जन्मदिन पर बधाईयों का सिलसिला भी बढ़ गया... तब तो कई दोस्त रात १२ बजे ही विश करने लगे, बहुत ख़ुशी मिलती है न जब कोई रात में विश करे....ऐसा लगता है उसको मेरे जन्मदिन का इंतज़ार ही था जैसे.... :)
                इस पोस्ट को लिखते वक़्त सोचा था कुछ दार्शनिक जैसा गंभीर पोस्ट लिखूंगा लेकिन अपने जन्मदिन की ख़ुशी को शायद छुपा नहीं पा रहा हूँ... तो आप भी जल्दी से मुझे विश कर दीजिये, और अग्रिम धन्यवाद भी लेते जाईये... एक गाना याद आ रहा है...
हम भी अगर बच्चे होते, नाम हमारा होता डब्लू-बबलू
खाने को मिलते लड्डू और दुनिया कहती
हैप्पी बर्थडे टू यू..... :)
अरे हाँ ब्लॉग का कलेवर भी बदल दिया गया है, आखिर परिवर्तन संसार का नियम है... ==========================================================
चलते चलते....

               मेरे जन्मदिन के साथ ही आज एक ऐसे इंसान की पुण्यतिथि है जिसने महज २५ वर्ष की उम्र आज से १२ साल पहले अपनी जान इसलिए दे दी ताकि हम जैसे लोग अपना २६वाँ जन्मदिन मना सकें, बात कर रहा हूँ एक महान शहीद विक्रम बत्रा की जो आज के ही दिन कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे...... इस सिपाही को मेरा शत शत नमन...
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Saturday, March 19, 2011

देखते देखते होली आ गयी और पता भी नहीं चला...

             क्या आपमें से किसी को पता चला, कल होली है... क्या आज भी वही उत्साह है आपके मन में जो बचपन में पिचकारी और गुलाल देख कर आता था... अरे ये क्या कह रहे हैं आप, अब उम्र नहीं रही... अजी छोडिये... आज भी निकलिए तो होली के दिन घर से बाहर, जब चार यार मिल जायेंगे वो उम्र भी लौट आएगी और वो उमंग भी...
             अरे ज्यादा सोचिये नहीं, अच्छा बुरा सोचने का वक़्त नहीं है...लौटिये उसी दुनिया में और खो जाईये... अपने इस ब्लैक एंड व्हाईट हो चुके मन को रंगों से भर दीजिये... और हाँ रंग लगाने में कमी मत कीजियेगा... कुछ तस्वीरें देखिये हमारी होली की....







 
             और ज्यादा कुछ नहीं , बस आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं...
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