Friday, February 3, 2012

मौत के साथ सपने नहीं मरते...

          वो एक बेचैन सी सुबह थी, आस पास लोगों की भीड़... कई सारे अपने से चेहरे, जैसे सभी से एक न एक बार मिल चुका हूँ कहीं, बस अपने आप को नहीं देख पा रहा था मैं, फिर देखा तो कोई लेटा हुआ था सफ़ेद कपड़ों में लिपटा, शक्ल कुछ जानी पहचानी सी... आखें अजीब बेजान सी, हलकी हलकी नम, जैसे आंसू की कोई बूँद कैद हो गयी हो पलकों में, जैसे अभी टपक पड़ेंगी... चेहरे पर अजीब सी सफ़ेद हो चुकी मायूसी, जैसे कोई बहता दरिया अचानक से बर्फ हो गया हो... उस ठन्डे हो चुके से शरीर को घेरे कुछ लोगों की आँखों से बेरंग पानी टपक रहा है, कुछ के चेहरे पर सुकून कि चलो अच्छा ही हुआ... ठहाकों की आवाज़ भी सुनी थी मैंने, मेरी मौत पर वो हँसते रहे, वो मेरे सपने थे जो मेरी बेचारगी को घूर रहे थे... उनकी वो नज़र जैसे भेद रही थीं मेरे उस बेजान पड़े शरीर को...
          आखिर मेरे ही सपनो ने मुझे मार दिया, सपनो की ये बेरुखी ... आज मिटटी हो चुके मेरे शरीर की अर्थी को अंजाम देने आये हैं... उन्हें खबर है कि इन बेजान सुर्ख पड़ी आखों में आज भी कई सपने तड़प रहे हैं, वो मरे नहीं वो तो बस इंतज़ार कर रहे हैं, मेरे जल जाने का.. शायद ये उन सपनों की अग्निपरीक्षा का वक़्त है, मुझे यकीन है वो जीत जायेंगे.... मेरा शरीर तो कब का मर चुका है, वक़्त के तेज़ हवा के थपेड़े कब का बहा ले गए हैं उसे, इस बेगानी सी दुनिया की तेज़ धूप में जल चुकी है ये आत्मा भी,  लेकिन ये आग इन सपनो को जला नहीं सकती... वो सपने तो अज़र हैं, अमर हैं... वो सपने फिर मेरे साथ आयेंगे, आखिर वो सपने ही तो मेरे अपने हैं जो हर रात मेरे चाहते-न चाहते हुए भी हमेशा मेरे साथ रहे.... मेरे हमदम की तरह, मेरे हमसफ़र की तरह... इस बहती ज़िन्दगी के साथ वो भी बहते रहे, बिना रुके बिना थके.... आज उस मनहूस सी बेचैनी के बीच जाने कितनी अतृप्त इच्छाएं शोर मचा रहीं हैं, उस गुमनाम बसंत का इंतज़ार कर रही हैं, जब सपनों का फिर से इन आँखों के अंजुमन में आना होगा...
        जाने कब वो अगला जन्म होगा, सपने फिर आयेंगे और मेरे मन में फिर से जलाएंगे धीमे-धीमे खुद को पूरा करने की आग... मुझे यकीन है वो सपने फिर आयेंगे क्यूंकि मौत के साथ सपने नहीं मरते, बस सो जाते हैं थोड़ी देर के लिए क्यूंकि उन्हें फिर से आना होता है लौट कर इन्हीं आखों में ...

Wednesday, February 1, 2012

आत्महत्या, एक रास्ता भर है आजादी का...

        आत्महत्या को, खुद को खुद से आज़ाद करने की एक पहल के रूप में देखा जा सकता है... क्यूंकि इंसान कभी न कभी हार ही जाता है... कहते हैं ज़िन्दगी खुदा की दी गई खुबसूरत नेमत है. लेकिन जब इसकी ख़ूबसूरती से ही नफरत होने लगे तो.... आत्महत्या करने वालों को सब कायर कह देते हैं, लेकिन कभी गौर से सोचा तो जाना कि आत्महत्या करना भी अपने आप में कितनी हिम्मत से भरा फैसला है.... आखिर इस ज़िन्दगी से किसे लगाव नहीं होता, सभी इसे दिल से जीना चाहते हैं, इसकी धुन में मस्त होकर साथ साथ गाना चाहते हैं.... लेकिन जब ये मस्तानी धुन कानफाड़ू शोर में तब्दील हो जाए, तो सारे बंधन तोड़ कर बस आज़ाद होने का दिल करता है.... हालाँकि ये आजादी कभी भी किसी आशावादी इंसान को रास नहीं आएगी, लेकिन कभी न कभी जैसे हर चीज़ से नफरत होने लगती है... इंसान हर किसी से नफरत करके उबर सकता है, नए सिरे से जी सकता है... लेकिन अपने आप से जब नफरत होने लगे तो फिर और कुछ समझ नहीं आता... मैं आत्महत्या को किसी भी तौर पर सही नहीं ठहराना चाहता, बस उन सभी लोगों से सहानुभूति है जिन्होंने कई कठिन परिस्थितियों में अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म करने का फैसला लिया... पता नहीं क्यूँ ये बात बहुत STRONGLY कहना चाहता हूँ कि वो कायर नहीं थे, बस उन्हें ज़िन्दगी जीने का हुनर नहीं आया... वो थक गए, अपने आप से, अपने सपनों से, अपनी ज़िन्दगी से....
           मुझे नहीं पता कि आपमें से कितने लोगों के जहन में कुछ लम्हों के लिए ही सही लेकिन कभी अपने आप को ख़त्म करने का ख्याल आया होगा, फिर भी मुझे लगता है कि शायद वो लोग अकेले नहीं हैं जो खुद अपने आप की नफरत के शिकार हो गए... मुझे डर है अपने आप से बढती हुई ये नफरत कहीं अपनी ही जान लेने पर मजबूर न कर एक दिन...
            इस पोस्ट पर आने वाली टिप्पणियों के प्रकार का पूर्वाभास है मुझे, इसलिए कृपया सहानुभूति या आशावादी बनने की प्रेरणा से भरी टिपण्णी न करें ... आपने पढ़ा आपका शुक्रिया...

Sunday, January 22, 2012

आज मदर्स डे नहीं है, फिर भी....

यही एक तस्वीर मिली जिसमे आपने मुझे पकड़ा हुआ है...
       माँ, पता नहीं क्यूँ आज आपकी बहुत याद आ रही है, मुझे पता है आपसे मिलकर भी आपसे कुछ नहीं बोलूँगा... लेकिन फिर भी बस आपको देखने का मन कर रहा है... मुझे यूँ टुकड़ों में बिखरता देखकर शायद एक बार, बस एक बार मुझे गले से लगा कर कह दो, कोई बात नहीं विक्रम.. सब ठीक हो जाएगा, मैं हूँ न... मुझे यूँ रात रात भर जागता देखकर शायद आपका दिल भी पिघल जाए, और अपनी गोद में सर रख कर मुझे सोने दो... मुझे तो याद भी नहीं आपकी गोद में सर रखकर पिछली बार कब सोया था, कभी सोया भी था या नहीं... जानता हूँ आप उन माओं की तरह नहीं जो अपने बच्चों से अपना प्यार जतलाती रहती हैं, लेकिन फिर भी... शायद मेरी उचटती नींद को मनाने के लिए एक बार, बस एक आखिरी बार मुझे फिर से उसी सुकून से सोने दो...
        मेरा बचपन तो बस यूँ देखते देखते ही गुज़र गया, याद है माँ, मैं हमेशा आपका आँचल पकड़े पकड़े चलता था, सब कहते थे मैडम इसको कब तक यूँ ही चिपका कर चलते रहिएगा... आखिर एक दिन आपने मुझसे अपना आँचल छुडवा ही लिया... मुझे आज भी याद है मैं उस दिन कितना रोया था, तब से आज तक बस रोता ही रहा हूँ... न जाने कितनी जगह वही सुकून, वही छावँ ढूँढता हूँ, लेकिन ऐसा कहीं हो सका है भला... यहाँ तो चारो तरफ बड़ी तेज धूप है, मेरा शरीर मेरी आत्मा सब कुछ झुलसी जा रही है...
      या खुदा तू इस फेसबुक से कुछ सीखता क्यूँ नहीं, देखो न ये कितने परिवर्तन लाता रहता है... और ये टाईम-लाईन  का ऑप्शन तो हमलोग को भी मिलना चाहिए... मुझे देखना है वो वक़्त जब माँ मुझे अपनी गोद में उठाए घूमती होगी, जब पापा की ऊँगली थामे मैंने चलना सीखा होगा... जब मेरे रोने की आवाज़ सुनकर सब मुझे दुलारने लगते होंगे... जब दुनिया की इन समझदारी भरी बातों से मेरा कोई वास्ता नहीं था, जब खुशियों का मतलब केवल माँ की वो मुस्कराहट थी...
       मुझे शिकायत है तुम्हारी ज़िन्दगी की इस बनावट से... इसमें बैक डोर से इंट्री का कोई ऑप्शन क्यूँ नहीं... ओ खुदा  तुमने "क्यूरियस केस ऑफ़ बेंजामिन बटन" नहीं देखी क्या ?? ऐसा ही कुछ संशोधन अपनी किताब में भी लाओ न... मैं भी यहाँ से रिवर्स में जीना चाहता हूँ... बस अब बहुत हुआ, अब और आगे नहीं जाना... मुझे फिर से माँ की वही गोद चाहिए, पापा के कंधे की सवारी और आस पास मेरा ख्याल रखने वालों की भीड़...
     
       माँ आपकी फेवरेट प्रार्थना याद है न आपको...
हम न सोचें हमें क्या मिला है,
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण,
फूल खुशियों के बांटें सभी को,
सबका जीवन ही बन जाए मधुवन...
अपनी करुणा का जल तू बहाके,
कर दे पावन हर एक मन का कोना..
       ए भगवान् अगर सबको एक न एक दिन मरना ही है तो, मेरी एक आखिरी ख्वाईश कबूल कर लो न प्लीज.... माँ का आँचल पकडे ही मैं अपनी सांस की आखिरी गिरह खोलना चाहता हूँ...

Friday, January 13, 2012

बहती हुई ज़िन्दगी की कुछ बूँदें ...

       भरोसे के एक गहरे समंदर में तुमने मुझे छोड़ दिया है, मेरी बेपरवाही की आजादी कहीं खोती सी जा रही है , यूँ समझदार बने रहने की जद्दोजहद में उलझ कर रह गया हूँ, ठीक उसी तरह जैसे भँवरा कमल के अन्दर कैद हो जाता है... मेरे मन के अन्दर के आज़ाद से झरने को शांत करने की जितनी ही कोशिश कर रहा हूँ, बूंदों का शोर बढ़ता जा रहा है...
      दिल अजीब सी ख़ामोशी की तरफ बढ़ता जा रहा है, यहाँ कागज के पन्नों का शोर नहीं, यहाँ कलम की नीब के घिसटने की आवाज़ भी नहीं... शब्दों को अपनी सोच से अलग करने की नाकाम कोशिश ज़ारी है... कुलांचें भरता हुआ ये मन अचानक से रेत की तरह ज़र्रे ज़र्रे में बिखर जाना चाहता है... मंजिलों को पाने की परवाह तो मैंने कब की छोड़ दी थी, लेकिन अब तो रास्ते भी बहते जा रहे हैं...
       हो सकता है तुम्हें ये यकीन हो कि खुद अपने आप से हो रही इस कशमकश में मैं जीत जाऊँगा, इसलिए जिस दिन भी मेरे अन्दर का ये तूफ़ान मुझे परेशान करने लगे और तुम्हारा ये यकीन टूटता दिखाई देने लगे... चुपचाप तुम्हारी ज़िन्दगी से कहीं दूर चला जाऊँगा, क्यूंकि मैं तुम्हारे इस विश्वास को हारते हुए नहीं देख सकता... तुम्हारी ज़िन्दगी को अपने शब्दों की डोर में नहीं बाँध सकता, अपनी ज़िन्दगी की किताब में से तुम्हारे हिस्से के पन्ने तुम्हें वापस लौटाना चाहता हूँ, पर उन खाली पन्नो का क्या करूंगा जो तुम्हारे नाम हो चुके हैं हमेशा हमेशा के लिए... उनमें मेरी खामोशियाँ कैद हो गयी हैं, मैंने ही तो कहा था न कि ख़ामोशी भी कुछ कहती है, जाने खामोशियों में लिपटे इन पन्नों को उनका मुकाम हासिल होगा या नहीं... हो सके तो इन पन्नो को फाड़ के फेक देना... नहीं तो इन पन्नों में कैद मेरे सपने घुट घुट के दम तोड़ देंगे... इन्हें आज़ाद कर देना... मेरी ही तरह मेरे इन सपनों का भी कोई मोल नहीं...
       मेरे सपने रुई के फाहे की तरह हलके हो गए हैं, लाख कोशिश करूँ समेट नहीं पाता हर बार ही उनका रूख जाने-अनजाने में तुम्हारी तरफ हो जाता है... मुझे पता है मेरा बार-बार ऐसा करना तुम्हें बेवजह ही उदास कर जाता है, पर यकीन मानो अपनी इस बेचारगी और बदनसीबी से मेरा मन भी कुंठित सा हो गया है... मैं उदास नहीं, हताश भी नहीं बस थोडा थक गया हूँ, इस थकान का असर तुम्हें भी दिख ही जाता होगा मेरे चेहरे पर... जाने क्यूँ अपनी इस ब्लैक एंड व्हाईट शाम में तुम्हारी मौजूदगी के रंग भरने का शौक पाल बैठा मैं...  
        खैर मेरी परवाह मत करना,मेरी ज़िन्दगी की हर शाम बस यूँ ही गुजरेगी... सूरज की डूबती किरणों में ओझल हो जाएगी धीरे धीरे... लेकिन मैं जहाँ भी रहूँ, तुम्हें तोहफे में अपनी तन्हाई और तुम्हारी मुस्कान भेजा करूंगा...

Monday, January 2, 2012

वो बुड्ढा तो पागल है...

            कल रात उसकी बेटी का कुछ इज्जतदार घराने के लड़कों ने बलात्कार कर दिया, कहते हैं कल नया साल जो शुरू हो रहा था, जश्न मनाना तो बनता था न... अब वो पगली लड़की क्या जाने जश्न क्या होता है, उसने बात अपनी आबरू पर ले ली .... बस फिर भी क्या था... दे दी अपनी जान... और वो बूढ़ा... नए साल का तोहफा भी उसको क्या मिला... बेटी के फटे कपडे और जश्न मनाती हुयी चीखती लाश... कसूर भी क्या था उस बुड्ढे का, बेचारा दो जून की रोटी जब नहीं कमा पाया, उसको लगा उसकी बेटी किसी शरीफ घर में बरतन-बासन कर लेगी, घर में दो पैसे आ जायेंगे... लेकिन क्या फलसफा है, जितना ही रोशन घर हो उसमे रहने वाले लोगों के मन में उतना ही अँधेरा बढ़ता जाता है...
            उस बुड्ढे को तो खुश होना चाहिए, जान छूटी बेटी नाम की इस बला से... जिंदा रह के भी क्या कर लेती, फिर किसी इज्जतदार घराने में जाती और दहेज़ के लिए ज़ला दी जाती... पता नहीं क्यूँ रो रहा है, पगला है बिलकुल... उसे तो जश्न मनाना चाहिए... अरे भाई कलेंडर जो बदल गया है... क्या हुआ जो उसके पास रहने को घर नहीं, क्या हुआ जो इतनी ठिठुरती सर्दी में उसने कपडे नहीं पहने, क्या हुआ जो अपनी बेटी की लाश को जलाने के लिए उसके पास पैसे नहीं... उसे तो खुश होना चाहिए आसमान की आतिशबाजी को देखकर... उसे तो खुश होना चाहिए उस भीड़ को देखकर जो शराब के नशे में झूम रही है, ज़रा महसूस तो कर के देखे उस संगीत को, जिस पर लोग थिरक रहे हैं... ये सिगरेट का धुंआ उसे अच्छा क्यूँ नहीं लग रहा... कितनी रौशनी है चारो तरफ...
           पता नहीं क्या सोचा था उसने, उसको क्या लगा जीना उतना आसान है, अरे उसको तो उसी समय मर जाना चाहिए था, जब उसके घर बेटी पैदा हुयी थी... उसको शायद पता नहीं था, एक गरीब को बेटी पैदा करने का कोई अधिकार नहीं... उसको क्या लगा था उसकी एक बेटी के मर जाने से हम नए साल का जश्न मनाना छोड़ देंगे... उसको शायद इस नए साल के जश्न का दस्तूर पता नहीं था, अभी भी रो रहा है... उसको तो उन लड़कों का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि अब वो भी चैन से मर सकेगा...
        अरे आप क्यूँ परेशान हैं, वो बुड्ढा तो बेवकूफ है, चलिए हम सब नए साल का जश्न मनाएं... आतिशबाजी का बंदोबस्त है न... ??? आप सभी को नया साल  मुबारक हो...
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