Tuesday, January 12, 2016

हम प्रेम में ही हैं...

कितनी बार हम पूछते हैं
एक-दूसरे से एक ही सवाल
कि हम क्यूँ बने हैं एक दूसरे के लिए,
हम क्यूँ खड़े हैं साथ
और क्यूँ हर लम्हे को
छान रहे हैं चाँद की छलनी से,
वक़्त के हर गणित के साथ
हम समझना चाहते हैं
हमारे बीच का विज्ञान,
कितनी ही बार
तैरती है खामोशियाँ हमारे मध्य
जैसे खीच दी हो किसी ने
कोई समानांतर रेखा
जिसका कोई छोर न दिखता हो,
जैसे लगता है हम खड़े हैं अलग-अलग
और नहीं मिल सकेंगे कभी,
तभी अचानक से हम पहुँच जाते हैं
अनंत की धुरी पर
और घूमते हुये छू लेते हैं
एक दूसरे की उपस्थिति को,
ये पहेली जैसे सूडोकू की तरह है
कहीं से भी शुरू करें
हम वहीं पहुँचते हैं
उसी आखिरी खाने पर
जिसका अंक हमें
मिल कर सुलझाना पड़ता है,
अपनी ज़िंदगी का आखिरी खांचा
भर लेने के बाद
त्वरित हो जाती हैं साँसे
और मान लेते हैं हम कि
हम प्रेम में हैं,
हाँ-हाँ हम प्रेम में ही हैं...

Friday, November 20, 2015

यूं ही सफर में सोचते-सोचते...

लोग कहते हैं इश्क़ और मेरे लबों पर तुम्हारा नाम अपने आप आ जाता है....

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बंगलौर में
दूधिया कोहरा नहीं पसरता है कभी,
लेकिन तुम्हारे दूर होने से
मेरे दिल पे जो
उदासी का कोहरा है
उसमे मुश्किल हो जाता है
ढूँढना खुद का ही वजूद....

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जब तुम्हारे हिस्से का
आसमान उदास होगा
तो मेरे कमरे के बादल
और घने हो जाएँगे,
उस अंधेरे में
मेरे दिल की
थमी सी धड़कन
पहचान लोगी न....


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चलो न कहीं वादियों में एक छोटा सा प्लॉट लेकर डालते हैं प्यार के बीज और उगाते हैं इश्क़,
दुनिया में प्यार कम हो चला है इन दिनों...

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समंदर की गहराई की कसम खाने वाले लोग अकसर तुम्हारी आँखें देखकर अपनी जान गंवा बैठते हैं....
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ज़िंदगी के हर मोड पर किनारा तलाशते तलाशते कुछ साल पहले मुझे तुम्हारी आँखों की पलकों का सहारा मिल गया था, ऐसा लगता है जैसे किसी पिछले जन्म की बात है.... 

Wednesday, November 4, 2015

किस्सा कुर्सी का और असमंजस वोटर का...

एक तरफ वो गठबंधन है जिसने अब तक मुखमंत्री तक डिक्लेयर नहीं किया है, जीत जाने के बाद आपस में ही मार काट मचने वाली है... बिना अच्छे नेतृत्व के बिहार को चलाना और आगे बढ़ाना, भैंस के ऊपर गीत गाने जैसा है... केवल मोदी के हवाई जुमलों के नाम पर यहाँ वोटर उनको वोट दे देगा ऐसी गलतफहमी तो उनको नहीं ही पालनी चाहिए.... महा प्रधान खुले आम अपनी जाति बघारते हुये और आरक्षण बढ़ाने की बात कर रहे हैं, उस आरक्षण के लिए उनके हिसाब से वो अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे, हालांकि जाति प्रथा के ऊपर एक लाइन भी कहीं बोलते नहीं दिखे... ज़ाहिर हैं उनको जाति प्रथा बनाए रखनी है तभी तो आरक्षण की रोटी सिकेगी...
दूसरी तरफ महागठबंधन है, जिसके साथ ऐसे लोग खड़े हैं जिनका भूतकाल खंगाला जाये तो आपके दिमाग का बफर खत्म हो जाएगा लेकिन काले कारनामे खत्म नहीं होंगे... व्यापारी और शिक्षित वर्ग वो #गुंडाराज अब तक नहीं भूला होगा...

कई लोगों का कहना है मुख्यमंत्री तो नितीश होने हैं फिर क्या तकलीफ है, तकलीफ ये हैं कि नितीश कितना भी अच्छा बोलते हों(करते भी हों) लेकिन दोनों जेब में दो छुरी लेकर वोट मांगने आए हैं....

परेशानी ये भी है कि कोई भी बिहार का विकास नहीं करना चाहता, उनको पता है जैसे जैसे यहाँ के लोगों को बाकी दुनिया की पटरी से जोड़ने लगेंगे, यहाँ उनकी जाति वाली राजनीति दम तोड़ने लगेगी... इतना तो निश्चित है 80 प्रतिशत वोट तो इस बार भी जाति के आधार पर ही पड़ेंगे...

बिहार से जुड़े हजारों मुद्दों को छोडकर आजकल तंत्र-मंत्र-ज्योतिष पर जुमले फेकने का दौर है, जैसे हमारे पास और कुछ नहीं बचा हो बात करने को...

बिहार का वोटर असमंजस में है... पिछली कई सालों से लालू को एक सिरे से हटाने के कोशिश करने वाली भीड़ इस बार लालू(महागठबंधन) को ही वोट करेगी....

इन सब असमंजस से अलग मैं जा रहा हूँ कल वोट देने, जो भी मेरी नज़र में सबसे अच्छा और शिक्षित उम्मीदवार है चाहे वो निर्दलीय ही क्यूँ न हो... वोट तो डालना ही पड़ेगा, कीमती है मेरा वोट...

Sunday, August 30, 2015

मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न...

इस शहर में बरसों से कोई नहीं आया...
बस एक सुराख़ रख छोड़ा था आसमान में
जहाँ से धूप आती है सवेरे-सवेरे,
और कभी कभी बरसात भी वहां ठहर कर जाती है...
 
याद है तुम्हें, उस आसमान में जो एक सुराख छोड़ा था कुछ साल पहले, उसके नीचे अब बहुत बड़ा जंगल उग आया है.... अलग-अलग तरह के दरख़्त है उसमे, कुछ फूलों की कोमल पंखुड़ियाँ भी अठखेलियाँ करती हैं... सबके अलग-अलग रंग, अजीब अजीब सी खुशबू ... इसको अलग अलग छांट नहीं सकते, किसी की कोई अलग पहचान नहीं सब गडमड सा, सुहाना... 

ये जंगल एकदम सपनों सरीखा है न, सपना ही तो है...  क्यूंकि हकीकत में आस-पास देखो तो अजीब ही माहौल है...
मुझे नहीं लगता ये सही वक़्त है प्रेम कवितायें लिखने का जब आस-पास नफरत है, आग है, बरबादी है... लेकिन एक आखिरी सत्य तो प्रेम ही है न, बाकी सब तो तीखा है जहर से भी तेज़.... प्रेम में अगर दर्द भी है तो खट्टा सा है, एक चुटकी सपनों का नमक डाल दो सब जन्नत है....

तेरा रंग उलझ गया है,
मेरी नींद में कहीं
जो आधी रात कभी खुल जाये नींद तो
आस-पास दिखता है
तेरे प्यार का इंद्रधनुष....

तो इस शहर में कितना भी धुंधलका हो मैं प्रेम ही लिखूंगा हमेशा.... 

वक़्त के दरख़्त से बने इस कागज पर
गर मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न..

Wednesday, July 22, 2015

खरोंच...

ज़िंदगी एक मिथ्या है,
ज़िंदगी में खुश रहना एक मृगतृष्णा...
खुशियाँ चिराग है एक रोशनी का,
और उसके ठीक नीचे छुपा है गमों का अंधेरा...

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तुम्हारी आखें एक झूला है,
जिसमे मैं ज़ोर ज़ोर से उड़ान भरता हूँ,
पर तुम्हारे हर एक आँसू के साथ
पलट कर ज़मीन पर गिर जाता हूँ...

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ये तन्हाई की खरोंच
दिल तक बहुत ज़ोर से छिलती है,
इस चुभन को निहारते हुये
क्या मैं रो सकता हूँ सुकून से दो पल के लिए...
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