Sunday, April 26, 2020

रुकना क्यूँ है...

स्याह रातें आएँगी,
खूब डराएँगी
पर रुकना क्यूँ है...

होगा अंधेरा घना
अनजानी आवाज़ें आएँगी
पर रुकना क्यूँ है...

बंजर हो ज़मीन
रेत जलाएँ पग को
चुभें भले काँटे
लथपथ हो रक्त से
पर रुकना क्यूँ है...

पिछले रास्ते कैसे थे
आगे के कैसे हों
डर कितना भी हो मन में
पर रुकना क्यूँ है...

मुमकिन है कि
मंज़िल ना मिले
चलने से भी
क़िस्मत तेरी राख हो भले
आग पे चल कर भी
पर रुकना क्यूँ है...

Saturday, April 25, 2020

रैंडम नोट्स इन द टाइम ऑफ़ कोरोना....

मैं बार बार खुद से यही सवाल पूछता हूँ कि क्या मैं अतीतजीवी हूँ, और जवाब हमेशा ना ही आता है, अतीत में क्या हुआ उससे मुझे शायद ही फ़र्क़ पड़ता हो... लेकिन उस अतीत जी सीख आगे काम आती है... अतीत में आए बवण्डरों ने भले ही इन गंदले खंडहरों में कुछ नहीं छोड़ा लेकिन इन खंडहरों के आँगन में एक पौधा मैं हमेशा उगाता रहा हूँ... मुझे इन ओस की बूदों से अब भी उतना ही प्यार है जितना पहले था, मैं आज भी पहाड़ों को अपना दिल दे बैठता हूँ, आज भी मुझे दूसरों के ख़्वाबों में ही रंग भरने का शौक़ है... फिर ये भी है कि आख़िर क्या बदला है, और इसका उत्तर मुझे भी नहीं पता... बदलने को तो कुछ नहीं बदला, कुछ नहीं बदलता... इस लॉक्डाउन ने ये भी सिखाया कि कैसे हमें नए रूप-रंग के यूज़्ड टू होने में नहीं के बराबर वक़्त लगता है... यही सामान्य लगने लगता है... मैं तो जैसे बहुत कुछ भूल चुका हूँ, अगर कुछ याद है तो बस मेरी पुरानी कहानियों के दो किरदार... 
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मेरे पास एक शहर है, उस शहर के बाहर बस रेत ही रेत है, कभी दिल करता है उसमें जाकर अपने कुछ ख़्वाब रोप दूँ... भले ही ख़्वाब अधूरे हों लेकिन इस बंजर रेत से बेहतर तो वो अधूरे ख़्वाबों का जंगल ही होगा... जब कभी बारिश होगी तो उस जंगल का मुहँ पलट कर रख दूँगा, पेड़ों की फुनगी पे पानी बहेगा और जड़ों में बादल अटक ज़ाया करेंगे... उल्टे-पुल्टे ख़्वाबों का हश्र भी उल्टा ही होना तय किया था मैंने कभी....
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काला एक बेहद खराब रंग है, खामोशी एक खराब शब्द, sad songs खराब टैस्ट और उदासी एक खराब सा दौर... मैं इस बाबत हमेशा कुछ न कुछ लिखता रहा हूँ... लोगों के सवाल मेरे जानिब आते रहते हैं कि मैं इतना उदास सा क्यूँ लिखता हूँ, मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं होता... मुझे भी नहीं पता कि मैं इतने उदास रुत का लेखक क्यूँ हूँ... ऐसा नहीं है कि मैंने इश्क़ पर नहीं लिखा, या खुशमिजाजी बिलकुल ही गायब रही हो मेरे सफहों से... पर उदास सा कुछ सोचकर उसे लिखते हुये मैं बहुत गहरे उतर जाता हूँ, इतना गहरा कि जैसे खुद वो सब कुछ जी रहा हूँ... मेरी इस उदास सी शै के बीच मैं खुश भी होता हूँ... उदास सा लिख कर भी खुश होता हूँ, और जब हद्द से ज्यादा खुश हूँ तो फिर उदास सा कुछ लिखता हूँ.... उदासी, तनहाई मेरी ज़िंदगी में आती रही है, हर किसी के ज़िंदगी में आती होगी.... बस मैं उसे कुछ घड़ी रोक कर उसे अपनी diary में उतार देता हूँ.... मेरी उदासी सिर्फ मेरे हर्फ में है, ज़िंदगी से उसे हमेशा दूर करता रहा हूँ मैं....

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बारिश... बैंगलोर की बारिश... एक एक टपकती बूँद से इश्क़ हुआ था कभी... पहली बार जब कुछ दिनों के लिए आया था तो अप्रैल का महीना ही था शायद, चिलचिलाती गर्मी के बीच शाम को हुई उस बारिश ने जैसे किसी मोहपाश में जकड़ लिया और हमेशा के लिए यहाँ आ गया... 2011 से 2020 तक का ये सफ़र, ऐसे जैसे कल ही की बात है... इस बीच कितना कुछ हो गया, लगता है अभी सो के उठा हूँ और वो सब कुछ शायद ख़्वाब था, जैसे कोई भ्रम... अभी एहसास हुआ कि गुलमोहर खिल गए होंगे, पर इस बार देख पाऊँगा या नहीं पता नहीं.. अब गुलमोहर में उतना इंट्रेस्ट रहा भी नहीं... बैंगलोर और उसकी बारिश, मुझे मालूम है ताउम्र ये बारिश अपनी सोन्धी ख़ुशबू के साथ बहुत कुछ याद दिलाती रहेगी... कुछ लोगों के मिलने से लेकर उनसे बिछड़ने तक का सफ़र...

Thursday, March 19, 2020

लव इन द टाइम ऑफ़ कोरोना....

शहर परेशान सा है, और मन्नु को बार बार नीरू की फ़िक्र हो रही है, वो ठीक तो होगी ना, अपना ख़याल तो रख रही होगी ना... उसे अपना ख़याल रखना आता भी तो नहीं था... वो बार बार मोबाइल उठाता है, सोचता है एक कॉल कर ले लेकिन बस उसका लास्ट सीन देखकर फ़ोन रख देता है... मन्नु जिसने कभी भगवान से ज़्यादा कुछ माँगा नहीं वो बस आज कल नीरू की सलामती माँगता है... जानता है वक्त अब पीछे नहीं जाएगा, कभी भी नहीं...

बैक्ग्राउंड में जज़्बा फ़िल्म का वो डायलोग चल रहा है...

"तुमने जाने दिया..."
"मोहब्बत थी इसलिए जाने दिए, ज़िद होती तो बाहों में होती...."

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“मुबारक हो, शादी की तारीख़ पक्की हो गयी...
“हाँ....”
“अच्छा ये बीमारी जो फैली है उसके कारण कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगा...”
“पता नहीं, ना हो तो अच्छा है... वरना...”
“वरना क्या...”
“वरना ना, हम भाग के शादी कर लेंगे, कितना यूनीक होगा ना...”
“हाहा, हाँ....”
“अख़बार की लाइन बनेगी, करोना से परेशान लड़के लड़की ने भाग के शादी की...”
“हाहा, अरेंज्ड मैरिज में ऐसा कौन किया होगा भला....”
“सच में..”
“लेकिन अगर सच में तारीख़ आगे बढ़ गयी तो...”
“पता नहीं, लेकिन तुमसे अब दूर रहना मुश्किल है बहुत....”
“सच्ची.....”
“मुच्ची...”

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मोहब्बत पर कई सारी फ़िल्में बनी हैं और बनती रहेंगी...

2004 में एक फ़िल्म आयी थी रेनकोट, उस वक्त शायद वो फ़िल्म उतनी अच्छी नहीं लगी थी या कहूँ समझ ही नहीं आयी...

आज गुजरे वक्त के साथ लगता है प्यार पर इससे बेहतरीन फ़िल्म नहीं बन सकती.... धीमी चलती है फ़िल्म लेकिन जिस तरह अजय देवगन और ऐश्वर्या के किरदार खुद अपनी ज़िंदगी में तकलीफ़ में होते हुए भी एक दूसरे के सामने खुद को अच्छा बतलाते हैं और जाते-जाते एक दूसरे की मदद किए जाते हैं, यही तो है प्यार...

प्यार के लिए साथ होना ज़रूरी है लेकिन अगर साथ ना भी हों तो एक दूसरे की फ़िक्र में जब मन बरबस पलट के एक दूसरे की तरफ़ देखता है तो वक्त उसी समय थम जाता है...

Thursday, January 23, 2020

एग्जामिनेशन सेंटर...

उन दिनों शायद
मेरा एक ही मक़सद हुआ करता था
कि किसी तरह पता चले
तुम्हारा कहीं कोई
इग्ज़ाम तो नहीं,
या कोई इंटर्व्यू ही हो,

और ज़िद करूँ
तुम्हारे साथ चलने की
तुम्हारे एग्जामिनेशन सेंटर तक,
कि जब तक तुम देती रहो इग्ज़ाम
मैं इंतज़ार करूँ तुम्हारा
वहीं कहीं बाहर
किसी चबूतरे पर बैठे हुए
या किसी पेड़ के नीचे,

बाहर के किसी ठेले से
खायी वो दो बेस्वाद इडलियों
का स्वाद घुलता रहे
इग्ज़ाम के ख़त्म के होने के इंतज़ार में...

फिर पूछूँ तुमसे कि कैसा हुआ सब कुछ,
तुम सुनाओ उन सवालों को
और कैसे तुमने हल कर दिया उन्हें,
और फिर वापस चल पड़ें
हॉस्टल की तरफ़
बस में बैठकर,
ऐसे ही किसी लाल एसी बस में
बैठे बेखयाली में
तुम्हारा हाथ पकड़ लिया था,
तो चौंक गयी थी न तुम...

उन दिनों बस तुम्हारे साथ ही
दिल करता था रहने का,
अब जब बातें वो बीत गयी
तो लगता है
इतना मुश्किल था क्या
साथ निभा जाना उस इंसान का,
जिसने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा था
एग्जामिनेशन सेंटर में भी नहीं...

Saturday, January 18, 2020

सीधी-सादी कविताएं...

उसे पसंद है सीधी-सादी कविताएं
जिनमें शब्दों के जाले न बुने गए हों
जिनमे बस बदहवास
प्रेम लिखा और कुछ नहीं
न उर्दू अल्फ़ाज़ों से खेला हो मैंने
न ही कोई विम्ब ऐसा
जो उसे समझ न आये
जिसमें भाव के अंदर
कोई और भाव न छुपा हो
इन्सेप्शन की तरह..

मैं उठाता हूँ अपनी डायरी 
खोजता हूँ कि 
लिखा हो शायद 
कुछ ऐसा आसान सा 
फिर लगता है जब 
ज़िंदगी ही कभी इतनी आसान न थी
तो लिखता कैसे... 

अब आसान सा लिखूँ 
तो झूठ लगता है,
उतना ही झूठ 
जितनी कुछ बीती बातें 
लगने लगी हैं आज कल... 

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