Monday, March 21, 2016

माइनस इनफिनिटी....

तुम्हारे कुछ बाल 
इन कंघियों में कैद होकर रह गए हैं
उसी तरह जैसे मकड़ी
खुद कैद हो जाती है
कभी कभी
अपने ही बुने जाले में...

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ओझराए हुये इन धागों के कोने में,
एक हल्की सी गांठ बांध रखी है
तुम्हारे नाम की,
चाहे कितना भी लटपटा जाऊँ
ज़िंदगी की लटेर के ऊपर,
हमेशा ये सनद रहेगा
कि मेरा एक सिरा बांध रखा है
तुमने हमेशा हमेशा के लिए....

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प्रेम इन्फाईनाईट की तरह है,
चाहे तो किसी से जोड़ लो, घटा लो
गुना करो, चाहे तो भाग लगा लो,
आगे माइनस लगा के
चाहो तो माइनस इनफ़िनिटी कर लो,
लेकिन वो वैसे ही बना रहेगा
उसी अभेद्यता के साथ,
जैसे मिले हुये हों
दो शून्य आपस में
सदा सदा के लिए...

Sunday, March 13, 2016

आधी-अधूरी पंक्तियों का नशा...

मैं एक भ्रम हूँ,
उस आईने के लिए
जो मुझमे खुद को देखता है...

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मुझे पता है
तुम कवितायें नहीं लिखती
लेकिन तुम्हारी मुस्कान
मेरे ऊपर लिखी गयी
तुम्हारी सबसे हसीन कविता है...

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तुमको अपना हमसफर बनाना
या ये कहूँ कि
बनाने का फैसला लेना
उतना ही आसान था जैसे
आँगन में पसरे कपड़ों का
अचानक से आई बारिश में भीग जाना,
लेकिन मुझे अपना हमसफर बना के
तुमने मुझे बना दिया है
कई खोटी चवन्नियों का मसीहा....

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आज शाम है,
कल बारिश
और परसों इश्क़...
उलझी सी बातें हैं न,
फिर उलझ न जाए
बारिश की बूंदे भी
हमारी नज़रों के धागे में...

Sunday, February 21, 2016

परिवर्तन...

परिवर्तन,
ये शब्द और इसका निर्माण
उतना ही सहज है
जितना सुबह के बाद शाम,
शाम के बाद रात,
इसमें कुछ भी अजीब नहीं
कुछ भी असंभव नहीं...

जो आज है वो कल नहीं होगा
जो कल है वो आज नहीं हो सकता,
जिससे आप आज प्रेम करते हैं
उसका बदलना अवश्यम्भावी है,
प्रेम न बदले उसका भार
अपने अंदर के परिवर्तन को उठाना होगा...

परिवर्तन, आज मुझमे है कल सबमे होगा,
सब के पैर परिवर्तन की धुरी पर हैं...

Thursday, February 11, 2016

दर्पण के नियम...

मैं खुद को आवाज़ लगता हूँ हर बार,
और मेरी आवाज़ मुझसे ही टकराकर
वापस लौट आती है,
काश कि आवाज़ आ पाती
दर्पण के परावर्तन के नियम के खिलाफ,
मेरा दिल इस दर्पण का आपतन बिन्दु है...

याद रखना अगर मैं घूमा लूँ
अपना दिल किसी थीटा कोण से,
मेरी आवाज़ की परावर्तित किरण
इकट्ठा कर लेगी दोगुना घूर्णन,
ये हर दर्पण का प्रकृतिक गुण है....

मेरा ये दिल दर्पण ही तो है तुम्हारा,
है न...

Tuesday, January 19, 2016

मेरे शब्द जंगल से हैं...

हर एक शब्द एक जंगल सरीखा होता है,
अपने अंदर कितना कुछ समेटे हुये
कई सारे पेड़, लताएँ
सैकड़ों चिड़ियों की बातें
जो की गयी हों आपस में ही,
बहुत देर तक मैं किसी
जंगल में हस्तक्षेप नहीं करता
बढ्ने देता हूँ उसे यूं ही
फलते-फूलते जंगल कई बार
मुझे मेरी ज़िंदगी की
कहानियाँ दे जाते हैं....
हर तरह की प्राकृतिक और मानवनिर्मित
आपदाओं से
इस जंगल को बचाए रखने का
संघर्ष ही जीवन है.... 
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