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Wednesday, September 21, 2022

मैं अब भी सोचता हूँ...

जानता हूँ, अब पहले की तरह न सोच पाऊंगा, न ही लिख पाऊंगा लेकिन टूटे-फूटे ख्यालात तो आते ही रहते हैं... 

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ठंड के वक़्त,
रज़ाई में दुबक कर
लिखी गयी कविताएँ
अक्सर गर्मियों में
पिघल जाया करती हैं…
 
इसलिए
मैंने लिखी हैं कुछ नज़्में
जिनके अंदर छिपी हैं
मेरे दिल की चिंगारियाँ…

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जब रात को बहुत तेज नींद आती है न, तो मैं चाय में चाँद घोर कर पी जाया करता हूँ…

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मैं चुपचाप हूँ,
इसलिए नहीं कि
कहने को कुछ नहीं,
बल्कि इसलिए कि
कुछ कहे-सुने
के दरम्यान
मेरी धड़कनें खो जाती है….

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इन दिनों ज़िंदगी में धूप बहुत ज्यादा है, सूरज को पीठ दिखाता हूँ तो सीने तक उसकी जलन महसूस होती है...

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लिखना कोई काम नहीं है, बस एक सफ़र है… उन रास्तों से गुजरने जैसा जहां बैठे बैठे मन कई ख़याल बुनता है…
कुछ ख़याल हवा हो जाते हैं, कुछ कुलाँचे भरते हुए दूसरों के मन को भी अपने साथ लिए चलते हैं… मेरे शब्दों के साथ चलने वालों का कारवाँ बहुत पुराना है… जो लोग मेरे साथ नए जुड़े हैं और मेरा लिखा नहीं पढ़ा कभी उन्हें ये किसी लतीफ़े से कम नहीं लगता…
 
मेरे मन के नुक्कड़ पर,
तुम भी तो लिखो कुछ नज़्में
जो मेरी पलकों के सिरे को
थामें और ले चलें कहीं और,
जहाँ चाँदनी हो, समंदर हो,
तितलियाँ हो, और हों मेरे सपने..
 
जाने क्यूँ,
उदास सा है मन,
बिना कुछ लिखे,
बिना कुछ पढ़े….

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मेरे बटुए में सबसे ज़्यादा
शनिवार के सिक्के हैं,
खनकते हैं और पुराना वक़्त
छितरा के गिर पड़ता है…
 
ये सिक्के बटोरते बटोरते
जाने कब मेरी ज़िंदगी
बुधवार हो गयी…

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सबने सोचा तो होगा कई बार न
कि काश पीछे जाकर
सही कर सकते कुछ चीज़ों को,
अब जब के पीछे नहीं जा सकते,

चलो आगे चलें…

Sunday, June 16, 2019

डेडलॉक...

ज़िन्दगी में कई सारे फेज होते हैं, बचपन में जब आप अपने पिता का सम्मान करते हैं, फिर एक वक़्त आता है जब दूरियां बढ़ जाती हैं, आपको आजादी चाहिए होती है और उनको अनुशासन, मन कड़वा होता है उन दिनों, नज़र बचाते फिरते हैं...  फिर एक वक़्त के बाद गर्व भाव आता है कि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में इतना कुछ किया, सबके लिए... सबका ख्याल रखा... और फिर धीरे धीरे जब उनपर प्यार आना शुरू होता है वो बूढ़े हो चुके होते हैं... फिर झिझक इतनी ज्यादा होती है कि प्यार जतला नहीं पाते... 

आज कल मैं आश्चर्य भाव में हूँ, हर बात पर गुस्सा करने वाले, अपनी जिद पूरी करवाने वाले आज मुझे कुछ नहीं कहते... वो बस चाहते हैं कि मैं जो चाहता हूँ वो मुझे मिले, उन्हें पता है कि अगर ये खुशियाँ मुझे आज नहीं मिलीं तो मैं कितना टूट जाऊँगा... मैं उनकी ख़ुशी के लिए अपनी ख़ुशी से मुहँ भी नहीं फेर सकता क्यूंकि उन्हें पता है इस तरह मैं कभी खुश नहीं हो पाऊंगा, और मैं खुश नहीं हुआ तो वो भी नहीं.... 

चारो तरफ डेडलॉक है, और इसमें सब फंसे हुए हैं... बस इस बात का गर्व है कि उन्होंने मेरी खुशियों की अहमियत समझी और आज मेरे हर निर्णय में मेरे साथ खड़े हैं, वो सिर्फ कहने को मेरे पिता नहीं हैं उन्होंने मेरे लिए सच में खुद को बदल लिया... अफ़सोस बस यही है कि इन खुशियों का महत्व हर कोई नहीं समझता, उनके लिए अजीब तरह की Priorities हैं, और मैं ये भी नहीं कह सकता कि वो अपनी जगह पर सही हैं...

खैर, पापाजी मुझे कई बार ऐसा लगा कि आप शायद भावनाओं को नहीं समझते, आज भी बहुत बार लगता है लेकिन आपने मुझे समझा और मेरी बदकिस्मती भी देखिये बदले में कुछ ख़ास नहीं है देने को... बस एक डेडलॉक दे दिया है मैंने उस भरोसे के बदले में... जब मेरी ख़ुशी में दूसरों को ख़ुशी मिलने लगे तो मैं बलिदान भी कैसे दूं, उससे भला कौन खुश होगा... जब मैं ही खुश नहीं...

काश हर पिता अपने बच्चों के साथ खड़े होते, उनपर उतना ही भरोसा करते, उसी तरह जिस तरह आप मेरे साथ खड़े हैं, मुझपर भरोसा किया है... 

मैं लड़ रहा हूँ, आगे भी लड़ना चाहता हूँ, बस हिम्मत नहीं मिलती....मैं आपको वो ख़ुशी देना चाहता हूँ जो आपको मुझे खुश देखकर मिलती हो... और मेरी ख़ुशी ऐसे पिंजरे में कैद हो गयी है जिसकी चाभी मेरे हाथ में है ही नहीं... 

Thursday, March 22, 2018

बस एक बेहतर कल की तलाश में...

मैं घिसता हूँ खुद को हर रोज,
खुद को खुद से आगे निकालना चाहता हूँ,
ये रगड़ एक आग पैदा करती है
मैं अकेला बैठ कर जल जाता हूँ हर शाम उसमें...
थक कर, घायल होकर
सवाल फिर खुद से ही करता हूँ
कि क्या ज़रुरत है इस संघर्ष की
दिल भी कन्धा उचका कर दे देता है जवाब,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

मैं निराश होता हूँ क्यूंकि
मैं वो नहीं बन पाया
जो शायद बनना ज़रूरी था मुझे,
फिर भी मैं हर रोज लड़ता हूँ
निराशा को दरकिनार करता हूँ,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

मेरे पास हर उस कल के सपने हैं,
जो कल नहीं आया अब तक
पता नहीं वो कल कभी आएगा भी या नहीं,
मेरे तले ज़मीं भी रहेगी या नहीं तब तक...

मेरा आज मुझे धिक्कारता है
क्यूंकि मेरा आज कभी आने वाला कल था
जिसकी फ़िक्र मैंने कभी नहीं की
और अब मैं अपना आज गंवा बैठा हूँ
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

ज़िन्दगी से कई सवाल हैं मेरे,
मैं नोटबुक में लिखता रहता हूँ
जो कभी उस दुनिया में कभी सामना हुआ तो
पूछ पाऊं उन सवालों को
फिलहाल तो आज बस मैं सवाल ही लिखता जा रहा हूँ
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

लगता है कि शायद कभी
किसी मोड़ पर गर
पर्दा गिराना हो इस ज़िन्दगी के नाटक से
तो क्या वो भी कर लूंगा मैं,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

Monday, February 27, 2017

ब्लॉग, ज़िन्दगी और मैं... पिछले कई गुज़रे सालों का सफ़र...

आज से 17 साल पहले लिखना इसलिए शुरू हो गया कि किसी को मेरा लिखना बेइंतहा पसंद था, उस वक़्त तो मैं पता नहीं क्या क्या लिख देता था, और वो मुस्कुरा देती थी... जिद्दी थी और पागल भी... सोचता हूँ अगर वो इतनी जिद नहीं करती तो क्या मैं आज इतना सब कुछ लिख भी रहा होता या नहीं... उसका ये एहसान ही रह गया मुझपर, न चुका पाया और न ही भूल पाया... मेरा लिखा हर कुछ बस एक क़र्ज़ के नीचे रह गया.. अगर किसी को भी मेरे लिखे का एक कतरा भी पसंद आये तो मुझे अजीब सा लगता है... मुझे राइटर बनाने की उस एक जिद ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी... कहते हैं कि पहला प्यार सबसे हसीं होता है, लेकिन जब पहली बार दिल टूटे तो दर्द भी बड़ा होता है, इतना बड़ा कि उससे उबरने में सालों लग जाते हैं, सदियाँ भी कभी कभी... प्यार लिखते-लिखते अचानक से लिखने में बस दर्द ही बाकी रह गया... उस दौर का हर एक दिन पन्ने पन्ने में संजोया था, उस वक़्त शायद अगर ये ब्लॉग होता तो हर कोई पढ़ पाता... जितना प्यार मैंने उस वक़्त लिखा उतना फिर कभी नहीं लिख पाया, सोचता हूँ कि मैंने प्यार किया ज्यादा या लिखा ज्यादा.... पता नहीं... 

खैर उस डायरी के प्यार को एक दिन राख में तब्दील कर दिया... करीब 3 साल तक फिर कुछ नहीं लिखा एक शब्द भी नहीं... 

फिर 7 साल पहले 2010 में जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो सोचा भी नहीं था कि इतना कुछ लिख जाऊँगा... पहला ब्लॉग मज़े मज़े में बना लिया था, नाम रखा "Cyclone of Thoughts..." और पहली पोस्ट डाली "Who is Thakrey..."   :P 

फिर दो पोस्ट और डाली लेकिन ब्लॉग का पता बहुत लम्बा रख लिया था, तो अच्छा नहीं लगता था फिर हद से ज्यादा छोटा करके i555.blogspot.com कर लिया, उस वक़्त अंग्रेजी ब्लॉग्गिंग का भूत था लेकिन अंग्रेजी में कभी लिखा नहीं, हाँ ब्लॉग का नाम ज़रूर अंग्रेजी में था, अब तक हम 'Cyclone' से सीधा 'Whispers' पर आ गए थे... नाम था "Whispers from a Silent Heart... " अच्छी चल निकली थी दुकान, ब्लोगिंग का चस्का लग चुका था... उस वक़्त ब्लॉग पर पहेलियाँ भी खूब चलीं... "पहचान कौन" पहेली के नाम से लोगों को हमारा ब्लॉग पता चला... अच्छा दौर था, पहली बार मेरी पहचान उन लोगों के बीच हो रही थी जिनसे मैं कभी मिला नहीं था, हाँ फ़ोन फ्रेंड, लैटर फ्रेंड (उस वक़्त फेसबुक अब जैसा शक्तिशाली नहीं था.... ) बहुत थे पर अजनबियों के बीच खुद को खड़ा करने का मज़ा ले रहां था मैं... 

खैर वापस ब्लॉग पर आते हैं, मैं उन दिनों कुछ भी अपनी निजी ज़िन्दगी के बारे में नहीं लिखता था... सच कहूं तो डर लगता था कि लोग पढेंगे तो क्या सोचेंगे, वही डर जिसने पूरी दुनिया को अपंग बना रखा है.. इसी दौरान मेरा वो ब्लॉग एक दिन अचानक से गायब हो गया, उस वक़्त लगा था कि हैक हो गया है लेकिन अब जब मैं खुद साइबर सिक्यूरिटी में हूँ तो लगता है कुछ और ही हुआ होगा... सारी पुरानी पोस्ट गायब अचानक से ख़त्म हो गयी थी, और मैंने कुछ संजोया भी नहीं था... प्रशांत भैया ने कुछ पोस्ट्स अपने फीड रीडर से निकाल के दीं, हालाँकि जब मैंने उनको पढ़ा तो लगा जाने क्या बकवास लिखा था.... मेरे लिए शायद ये वेक अप कॉल था, मैं एक ब्लॉगर की तरह लिख रहा था जबकि मैं एक लेखक की तरह लिखना चाहता था... नया ब्लॉग बनाया और फिर से लिखना शुरू किया, पहले से कुछ अलग ये सोचे बिना कि कोई इसे पढ़ भी रहा होगा... 

पता नहीं, वो बेहद उदास शाम थी जब मैंने बेपरवाही के साथ अपनी ज़िन्दगी का एक पन्ना खोल के ब्लॉग पर लगा दिया... पता नहीं कितने लोगों ने पढ़ा, खुद से रिलेट किया लेकिन पहली बार मुझे ब्लॉग पर कुछ लिखकर अच्छा सा लग रहा था, फिर मैंने अपने बारे में, अपनी ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ लिखा... लोग क्या कहेंगे वाला डर निकल गया था, हालाँकि ये लगता था कि कोई घर से न पढ़ ले... बहुत कुछ लिखा उस दरमयान... 

2011-2012 मेरी ज़िन्दगी के सबसे उथल-पुथल वाले सालों में से रहा, उन दिनों मैंने बहुत कुछ पाया... ढेर सारा लिखा, उन दिनों ज्यादा लिखने की वजह भी बहुत ख़ास थी... जबकि आपको पता हो आपके ठीक पीछे बैठ के कोई ब्लॉग के पोस्ट होने का इंतज़ार कर रहा हो... सच में प्यार से ज्यादा खूबसूरत वो वक़्त होता है जब प्यार हो रहा होता है... प्यार किसी भी वक़्त हो, किसी भी उम्र में हो लेकिन जब ये हो रहा होता है न हम एक टीनएजर से ज्यादा कुछ नहीं होते... मैंने उस वक़्त अपनी ज़िन्दगी में जो भी सोचा, जो भी किया सब कुछ लिखा, शायद सिर्फ इसलिए कि मेरे पीछे बैठी अंशु पढ़ सके उसे... उसे पीछे से झाँकने में इसके लिए मैंने क्लास में अपनी सीट पीछे कर ली थी... कमाल है न, इसी ब्लॉग से उसने मुझे जाना, इसी ब्लॉग पर मैंने उससे बातें कीं, यहीं प्यार का इज़हार भी कर दिया... 

सच कहूं तो मैंने खुद के लिए बहुत कम ही लिखा, पहले किसी और के लिए लिखा करता था और फिर किसी और के लिए... हाँ लिखने के लिए कुछ "push" तो चाहिए ही होता है न...

आजकल यहाँ कम ही लिखता हूँ, मैं वापस उसी डर में चला गया हूँ कि लोग पढेंगे तो क्या कहेंगे... :)

Sunday, August 14, 2016

हर खाली दिन एक धीमा जहर है...


इन दिनों ऐसा लगता है जैसे मैंने अपना वजूद एक बार फिर से खो दिया है, चाहे कितना भी खाली वक़्त मिल जाये समझ नहीं आता कि क्या करना है... कितनी ही बार पूरा दिन ऐसे ही बिस्तर पर पड़े पड़े ही गुज़ार दिया है... पता नहीं क्यूँ मुझे कोई इतना अच्छा नहीं लगता कि उससे बात की जाये, लगता है अकेले ही वक़्त बिता लिया जाये तो बेहतर है... इतने सालों की जद्दोजहद के बाद जमापूंजी के रूप में बस कुछ खूबसूरत यादें हैं, अब तो उनको याद करके भी आँसू ही आते हैं... "डैडी" फिल्म में एक संवाद था न कि "याद करने पर बीता हुआ सुख भी दु:ख ही देता है...." मैं शायद उम्र के ऐसे दौर पर हूँ जब मूड स्विंग्स होते हों, लेकिन जिस रंज और दर्द के शहर में अपना वजूद तलाश रहा हूँ वो मुझे अपने ब्लॉग या डायरी में ही मिलता है.... कितनी अजीब बात है मेरे ब्लॉग का पता हर किसी के पास है अलबत्ता यहाँ कोई अपना दर्द पढ़ने नहीं आता, शायद कुछ लोग ऐसे होंगे जो इस दर्द में अपना दर्द तलाश कर दो आँसू बहा लिया करते होंगे... मैं भी तो कितनी ही बार निकलता हूँ इधर उधर के बेरंग पते पर खुद का दर्द तलाशते हुये... गम के खजाने तो हर किसी के होते हैं न, बस सबके सन्दूक का रंग अलग अलग होता है... मेरी सन्दूक का रंग स्याह सा पड़ गया है... कल सुबह से मुझे एक ही खयाल आ रहा है कि मुझे एक स्वेटर बुनना चाहिए, माँ खाली होती थी तो यही करती थी पहले... पर वो भी बुनू तो किसके लिए... 
 
कहते हैं, रोने से जी हल्का हो जाता है पता नहीं मेरा क्यूँ नहीं होता... हाँ जब रो चुकता हूँ तो किसी से मिलने का दिल नहीं करता, आईने के पास से भी गुज़रता हूँ तो वो चीख चीख कर मुझसे मेरा पुराना चेहरा मांगता है... ऐसे में बस एक ही चेहरा है जो मुझे सुकून देता है, बस उसे न ही कभी इस बात का इल्म होता है न ही होगा कभी.... काश कभी जैसे मैंने ज़बरदस्ती उसकी उदासी में खलल डाल कर उन्हें अपना बनाया था वो भी इसी तरह ज़बरदस्ती मुझे मेरे होने की याद दिला दे पर उसकी बेखबरी मेरे हर खाली दिन के ऊपर लिपटी हुयी होती है... 

वक़्त से बड़ा शिकारी कोई नहीं होता... जो सबसे बेहतरीन लम्हें होते हैं न वो उसका शिकार करता है, फिर उसकी खाल को सफाई से उतार कर अपने ड्राइंग रूम में सज़ा लेता है... हम उस खाल को देखकर उसपर गर्व तो कर सकते हैं है लेकिन उस लम्हों की खाल के पीछे के तमाम अतृप्त इच्छाएँ नहीं देख पाते... मैंने तो कभी किसी चाँद-सितारे की मन्नत भी नहीं मांगी बस कुछ ख्वाब थे जो दर-दर टुकड़े हो चुके हैं... काश वो ख्वाब मैं दोबारा देख सकता तो उसके ऊपर दाहिनी ओर छोटा सा स्टार लगा देता 'टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई' वाला लेकिन वक़्त के पहियों में रिवर्स गियर जैसा कुछ नहीं होता... 

सुबह से मोबाइल सायलेंट करके उसे पलट कर रखा हुआ है लेकिन हर दो मिनट में पलट के देखता हूँ कि शायद उसके आने की आहट सुनाई दे जाये... लेकिन आज का दिन ऐसे गुज़रा जैसे किसी अंधे के हाथ की दूरबीन.... बेवजह, आज का दिन नहीं भी आता तो क्या फर्क पड़ता था....
बारिश का मौसम इस धरती के ज़ख़्मों पे मरहम सा लगता होता होगा न, लेकिन जलते हुये मांस पर पानी डाल दो तो उसके धुएँ में आस पास की सारी गंध खो जाती है... 


ऐसा लगता है जैसे ये ज़िंदगी कई करोड़ पन्नों का एक उपन्यास है जिसकी कहानी बस उसके आखिरी पन्ने पर लिखी है, बाकी सारे पन्ने खाली और हम सीधा आखिरी पन्ने तक नहीं जा सकते.... एक एक पन्ना पलटना ही होगा हमें.... 

Tuesday, January 19, 2016

मेरे शब्द जंगल से हैं...

हर एक शब्द एक जंगल सरीखा होता है,
अपने अंदर कितना कुछ समेटे हुये
कई सारे पेड़, लताएँ
सैकड़ों चिड़ियों की बातें
जो की गयी हों आपस में ही,
बहुत देर तक मैं किसी
जंगल में हस्तक्षेप नहीं करता
बढ्ने देता हूँ उसे यूं ही
फलते-फूलते जंगल कई बार
मुझे मेरी ज़िंदगी की
कहानियाँ दे जाते हैं....
हर तरह की प्राकृतिक और मानवनिर्मित
आपदाओं से
इस जंगल को बचाए रखने का
संघर्ष ही जीवन है.... 

Saturday, January 17, 2015

मैं तब भी यहीं मिलूंगा...

क्या तुमने सोचा है कभी
कोई ऐसा दिन
जब मैं कहानियाँ कहता हुआ
खुद कहानी बन कर रह जाऊंगा,
जब ये रेंगता हुआ वक़्त
मुझे फांक कर निगल जाएगा,
जब मेरी उन साँसो की गुल्लक से
ज़िंदगी के सिक्के बिखर रहे होंगे,
चेहरे पर बढ़ती
सफ़ेद दाढ़ियों के पीछे से
झांकेंगी कुछ ढुलकती झुर्रियां... 

शरीर की बची हुयी गर्मी से
मैं ताप रहा हूंगा
कुछ बचे हुये पल...

उस क्षण में भी
मैं लिखते रहना चाहता हूँ
बस एक आखिरी कहानी,
क्यूंकी मुझे यकीन है
कि जब तक मैं लिखता रहूँगा
वो कहानियाँ मेरा होना सँजोये रखेंगी...

मैं ज़िंदा रहूँगा
और सांस लेता रहूँगा
इन्हीं कहानियों के पीछे... 

Saturday, May 3, 2014

रंग बदलते रहते हैं....

मुद्दतों बाद ज़िंदगी की किताब के कुछ पन्ने तिलमिला से रहे हैं... कहते हैं आप अपने दर्द को कितना भी जला दें उसका धुआँ साथ ही चलता रहता है, कभी भी घुटन पैदा कर सकता है... ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है जब गाढ़ी रूमानियत में डूबे कुछ लफ्ज रोपता रहता था सूखी पड़ी अलमारियों पे... यूं डूब कर लिखना तब शुरू किया था जब मेरी किताब के कुछ पन्ने हमेशा-हमेशा के फाड़ दिये थे तुमने.... न जाने तुम्हारे लिए कैसे इतना आसान हो गया, यूं मुँह फेर लेना... न कुछ समझ आया और न ही तुमसे कोई जवाब ही मांगा आज तक, कई सालों तक मेरे कमरे की अधखुली अलमारी में से वो तोहफा झाँकता रहा जो खरीद रखा था किसी खास दिन के लिए... एक दिन यूं ही जब नाहन* की नारंगी शामों के साये में मेरे मकान के पास वाले नुक्कड़ पर कभी एक पहाड़ी गीत सुन लिया था, समझ तो कुछ नहीं आया लेकिन इतना दर्द जैसे कोई बादल फट पड़ा हो किसी अंजान खाई के ऊपर... बर्फ की चादर पर कई सारी यादें तना दर तना उखड़ती चली गईं... 
वक़्त अब बीत चुका है, मैं बहुत आगे निकल आया और शायद तुम भी... हाँ कुछ लम्हों से आज भी कुछ यादें झरती रहती हैं, लेकिन सच बताऊँ तो विश्वास नहीं होता कि कभी तुम्हारे जैसा भी कोई था मेरी ज़िंदगी में... अच्छा ही हुआ तुमने उतार लिया अपने अस्तित्व का बोझ मुझपर से...
आज जब कनखियों से अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो तुम कहीं नज़र नहीं आती, बस एक चेहरा दिखता है जिसने अचानक से आकर ज़िंदगी को करीने से सज़ा दिया है... तुम्हें पता है हम अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते रहते हैं, बिना मतलब ही यूं ही... लेकिन इसी झगड़े के बीच हमारा प्यार बूंद-बूंद पनपता रहता है, हथेलियों से समेटने की कोई कोशिश नहीं... मुस्कुराहटें आती रहती हैं और इसबार उन उसकुराहटों का रंग अलग सा दिखता है... मैं खुश हूँ सच में बहुत खुश... जब भी गौर से उसकी आखों में देखूँ न तो बस लगता है मानो कह रही हों.... मुझे तुमसे प्यार है....
शायद यही ज़िंदगी है... शुक्रिया ज़िंदगी.... शुक्रिया मुझे यूं जगाए रखने के लिए, मेरी दुआओं को हर उस जगह पहुंचाते रहना जहां से मेरे लिए दुआएं निकलती रहती हैं....
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*नाहन: एक खूबसूरत सा शहर हिमाचल का

Monday, January 6, 2014

तसव्वुर-ए-ज़िंदगी...

आपका यहाँ यूं होना और मेरा लिखा पढ़ना किसी संयोग से कम नहीं... इस 7 अरब की दुनिया में आप मुझे ही  क्यूँ पढ़ना चाहते हैं, ऐसा क्या है यहाँ... यहाँ तो सबकी ज़िंदगी ही एक कहानी है, अपनी कहानियों से इतर दूसरों की कहानियों में इतनी दिलचस्पी क्यूँ भला... 50 करोड़ स्क्वायर किलोमीटर की इस धरती पर मुश्किल से 20 स्क्वायर फीट की जगह घेरा एक इंसान कंप्यूटर पर बैठा कुछ खिटिर-पिटिर कर रहा है, अपनी ज़िंदगी के पन्नों को उलट पुलट कर देख रहा है, उसे इस इन्टरनेट की दीवार पर बैठे बैठे झांकना क्यूँ पसंद है आपको... यहाँ तो आलम ये है कि मेरे घर का आईना भी मेरी शक्ल से ऊब सा गया लगता है, दीवारों की सीलन भी आंसुओं के रंग में नहाई लगती है... मेरे कमरे तक आने वाली सीढ़ियाँ हर रोज़ संकरी सी होती जाती हैं, जैसे किसी दिन बस यहीं कैद कर लेंगी मुझे...

ज़िंदगी एक नदी है, अपनी नाव उतार दीजिये... 
अगर आपको लगता है मैं कुछ अच्छा लिखता हूँ या अलग लिखता हूँ तो ये आपका भ्रम मात्र है, मैं यहाँ एक मुखौटा सा लगा कर बैठा हूँ.... इस ब्लॉग पर पड़ी एक परत सी है, कभी जो हो सके तो इस परत को उघाड़कर इसके अंदर बैठे मेरे स्वयं को देखने की कोशिश कीजिएगा.... मैं भी आपका ही अक्स हूँ जो आपकी ही तरह लड़ रहा है ज़िंदगी से, कोयले की सिगड़ी पर ज़िंदगी को सेक कर कुछ लज़ीज़ बनाने की जुगत में है....अब कहीं ऐसा न समझ लीजिएगा मैं किसी अवसाद में हूँ, मैं तो पूरी तरह से ज़िंदगी में हूँ... डूबा हुआ... ज़ोर से सांस भी लेता हूँ तो ज़िंदगी दौड़ी मेरी बाहों में सिमट आती है... ज़िंदगी को आप कसी ड्राफ्ट में सेव करके नहीं रख सकते, किसी EMI स्कीम से खरीद नहीं सकते... बस इसकी आँखों में आँखें डालकर इसका लुत्फ उठा सकते हैं.... 

किसी बच्चे का सीक्रेट झोला देखा है आपने कभी, उसमे वो हर कुछ डालता जाता है जो उसे अलग लगती है, सड़क के किनारे पड़े किसी गोल चिकने पत्थर को भी उसी मोहब्बत से देखता है जैसे उसी में उसकी ज़िंदगी बसी हो... बस यही तो है हमारी-आपकी ये ज़िंदगी भी, जो भी पसंद आता समेटते जाते हैं, कई चीजों का कोई मोल नहीं होता... बस यूं ही खुद की खुशी के लिए, खुद के साथ के लिए....

अगर आप मेरा लिखा लिखा पसंद करते हैं तो इस लिखे के पीछे की बिताई गयी उन नाम शामों में से मुझे तलाश कर लाना होगा जब मैं अकेला था और उस दर्द को तनहाई को कागज पर उतार दिया था... आपको आकर मेरी उन खुशियों में शरीक होना पड़ेगा जिन्हें बांटने के लिए मेरा पास कभी कोई न था....  तकिये में सर गोतकर बिताई गयी उन भींगी रातों का हिसाब तो मैंने नहीं मांगा और न ही दोबारा उस आवाज़ का साया मांग रहा हूँ जिसके सहारे नींद के आगोश में चला गया था, लेकिन कभी जानिए के ये सब कुछ लिखता हुआ शक्स भी आपकी तरह ही है... आपके दिमाग में उमड़ती-घुमड़ती कुछ बेवजह की बातों को शब्दों की लकीरों में यहाँ उतार रहा हूँ.... मैं दरअसल मैं नहीं, आपका स्वयं हूँ... आप खुद को ही यहाँ पढ़ते हैं....

Sunday, October 20, 2013

अधूरे खत....

सर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है, लेकिन लिखना है... कुछ तो लिखना है ही... बाहर रात लगभग ठहर चुकी है, हाँ अंदर भले ही एक झंझावात से घिरा होकर लिख रहा हूँ... कई दिनों से ज़िंदगी के प्लेयर पर पौज़ बटन खोजने का दिल कर रहा है, आस-पास एक तरह का कान-फाड़ू संगीत बजता रहता है... इस सब से अलग मैं चाहता हूँ कि थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन मैं अतीतजीवी हो जाऊँ... या फिर बस थोड़ी देर ठहरकर उन बीती पगडंडियों को निहारूँ, कितना कुछ पीछे छूट गया... मैं कुछ भी पीछे नहीं छोडना चाहता था, लेकिन क्या कुछ समेट कर चलता... काश ऐसी कोई पोटली होती जहां सबको समेट लिए जाता... कई ऐसे लोग, ऐसी बातें हैं जो बहुत याद आती हैं... अब तो वहाँ नहीं लौट सकता कभी भी.... अतीत में जीए हुये लम्हें वर्तमान में आकर अरबी आयत में तब्दील हो जाते हैं, उससे पवित्र और कुछ भी नहीं लगता... 

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ज़िंदगी की कोई मंजिल नहीं होती, इन्फैक्ट मंजिल नाम की कोई वस्तु जीवन में होती ही नहीं... Exist ही नहीं करती, जो होता है बस रास्ता होता है, अगर आप ज़िंदगी के इन रास्तों पर हड़बड़ी मे गुज़र जाना चाहते हैं तो मंजिल पर पहुँचने के बाद उन रास्तों का हिसाब नहीं दिया जा सकेगा... बस इन्हीं रास्तों पर चलने का सुख लेना चाहता हूँ, सिर्फ तुम्हारे साथ... कोयले की धीमी धीमी आंच पर ज़िंदगी को पकाना चाहता हूँ... 

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कभी तुमसे वादा लिया था कि तुम साथ चलोगी हमेशा... बड़ी मिन्नत से वो प्यार का बीज इस रिश्ते की ज़मीन पे बोया था, आज तो ये इत्तू सा पौधा निकल आया है इश्क का... शायद अब इस पौधे को और ज्यादा खयाल की ज़रूरत होगी, यकीन मानों उस अतीत में जाकर झांक आया हूँ तुम्हारी आखों को, बला की सी खूबसूरत हैं.... वहीं अतीत के कुछ पन्ने पलटा तो ये नज़र आया कि कभी ये भी कहा था तुमसे... याद तो होगा ही तुम्हें न... 

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कभी कभी जी करता है, तुम्हें यहाँ इस भीड़ से कहीं दूर ले चलूँ, एक ऐसे जहाँ की तरफ जहाँ अक्सर तुम मेरे सपनों में आती हो.. एक ऐसी पगडण्डी पर जहाँ तुमने कितनी ही बार बेखयाली में मेरे हाथों में हाथ डालकर मुझे प्यार से देखा है... एक परिधि है जहाँ डूबते सूरज की आखिरी किरण मेरे इस प्यारे से चाँद को देखकर सकुचाते हुए दिन को अलविदा कर देती हैं, और एक हसीं सी शाम मेरे नाम कर जाती हैं... एक ऐसी आजादी है जब कलेंडर की तारीखें नहीं बदलती, जब दिन के गुज़र जाने का अफ़सोस नहीं होता... ये एक ऐसा जहाँ है जहाँ मुझे हमेशा से ही ये यकीन है कि मेरी इस गुज़ारिश का लिहाफ़ ओढ़े हुए एक दिन जरूर मेरे साथ चलोगी...

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कितना कुछ लिखने का सोचा तो था लेकिन, अभी बीते दिनों ही किसी ने मेरी इस तरह की पोस्ट्स को अधूरे खत का नाम दिया था, इसलिए इस पोस्ट को अधूरे खत की ही तरह अधलिखा छोड़ रहा हूँ.... ये पढ़ते हुये अपनी आखें बंद कर लेना, कई अनखुले-अधखुले जज़्बात तुम्हारी आखों पर मेरे होंठों के निशान छोड़े जाएँगे.. और हाँ परेशान मत होना ये पोस्ट लिखते-लिखते सर दर्द भी खत्म हो चुका है.... 

Sunday, September 15, 2013

तुम्हारे क़दमों के निशां...Some Random Drafts...

क्या करूँ, लिख दूं रोमांटिक सा कुछ !!! जबकि ये भी पता है कि तुम्हें भी उतनी ही बेसब्री से इंतज़ार रहता है... इंतज़ार किसी ऐसे लफ्ज़ का जो तार छेड़ जाए तुम्हारे दिल का... जानती हो इन दिनों एक सपना फिर देखने लगी हैं आखें... क्या कहूं, जाने दो.. इतना दिलनशीं सपना कागज़ पर उतारने का दिल नहीं कर रहा... किसी धुली हुए फ्रेश सी सुबह में मेरी आँखों में झाँक लेना... दिख जाएगा झांकता हुआ, वैसे उस ख्वाब को भी देखनी है तुम्हारी शक्ल, कमबख्त धुंधला दिखाता है तुम्हें...

ये रात है, सुबह है या फिर शाम... पता नहीं क्या है, जो भी है कुछ तो होगा ही... ज़िन्दगी के कई किनारों पे आकर खो सा जाता हूँ.... पर कितना भी उलझा रहूँ इन लहरों के बहाव में, तुम्हारे क़दमों के निशां मेरी ज़िन्दगी पे साफ़ दिखते हैं... तुमने तो मेरी ज़िन्दगी में रंग ही रंग बिखेर कर रख दिए... और मैं जाहिल, समेट ही नहीं पा रहा... सारी रंगीनियाँ देखता रहता हूँ... एक-टक... एक एहसान करोगी मुझपर ?? मैं ग़र कहीं भटक गया तुम्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तो मुझे बस इतना याद दिला देना कि ये रंग ही मेरी ज़िन्दगी हुआ करते थे कभी...

कभी सोचा नहीं था कि मेरी एक गुज़ारिश का लिहाफ़ तुमपर इतना फबेगा... मेरी ज़िन्दगी के पन्नों पर तुम्हारे क़दमों की चहलकदमी ने इसे इसे एक स्वप्न बाग़ सरीखा बना दिया है, जहाँ चारो तरफ गुलाबी-नीले-पीले फूलों की खुशबुएं तैरती रहती हैं... तुम्हारे साथ बीती हर शाम ज़िन्दगी में खुशनुमा एहसास के मोती पिरोती जा रही है... देखते ही देखते कितना वक़्त साथ गुज़र गया, बीती बातें किसी ख्वाब की तरह लगती हैं, एक खूबसूरत सा ख्वाब जिसे हमदोनों ने साथ साथ जीया है...

जब तुम मेरे पास होती ये वक़्त ठहर क्यूँ नहीं जाया करता... मैं बस तुम्हें ताउम्र देखते रहना चाहता हूँ, क्या इतनी सी ख्वाईश भी वाज़िब नहीं है... मेरी शामें आजकल खाली ही गुज़र जाती हैं, तेरी एक झलक पा लेने की चाहत करना किसी पहाड़ी मंदिर पर चढ़ने जैसा मुश्किल हो गया है...

मैं अचानक से जम्प लगा देना चाहता हूँ, उस सुबह के आँगन में जब तुम्हें अपनी बाहों में भर के फिर दो कप चाय बना लाऊंगा... तुम्हारे हाथों की लकीरों को निहारते हुए उसपर अपनी ज़िन्दगी की पटरियों को बढ़ते देखूँगा... लेकिन कमबख्त ये वक़्त की दीवार है न, जम्प ही नहीं लगाने देती... वो दिन आएगा न !!! कभी-कभी डर भी तो बहुत लगता है...

उछाल दी जो तस्वीर तुम्हारी, आसमां की तरफ,
जिद्दी थी तुम्हारी ही तरह, 


वक़्त बेवक्त दिख जाती है आसमां में भी....

Friday, September 6, 2013

मेरे मम्मी-पापा तो टीचर हैं... Happy Teacher's Life... :-)

करीब 7-8 साल पहले की बात है... पटना में रहता था, छुट्टियों में घर जा रहा था... उन दिनों पटना से कटिहार के लिए जनशताब्दी एक्सप्रेस चलती थी, चेयर यान होता था.. रिजर्वेशन काउंटर पर स्पेशल रिक्वेस्ट से विंडो सीट ली थी, बाहर के खूबसूरत मौसम का लुत्फ़ उठाने के इरादे से... बमुश्किल फतुहा स्टेशन क्रोस हुआ होगा कि सामने की सीट पर होते शोर से ध्यान भंग हुआ...
4-5 लड़के अपनी-अपनी डीगों की दूकान खोल कर बैठे थे... बात मोबाईल के टॉपिक से शुरू हुयी, उन दिनों किसी भी मोबाईल का होना अपने आप में ही स्टेटस सिम्बल था... 
दो शिक्षक मेरी ज़िन्दगी के...
"अरे हम नया मोबाईल खरीदे नोकिया 6600...."
"क्या बात कर रहा है ???? "
"हाँ बे इसमें कैमरा भी है, विडियो भी चलता है मस्त...."
"अबे दिखा न.."..
फिर एक-आध घंटे तक सब गाने और विडियो इंजॉय करते रहे... फिर उसके बाद सब अपने अपने खानदान के रुतबे के बारे में बात करने लगे.. किसी ने कहा मेरे पापा डॉक्टर हैं, कोई अपने चाचा को सरकारी अफसर बता रहा था तो कोई बैंक मनेजर... उनके सो काल्ड रिश्तेदारों की कितनी पहुँच और पहचान है वो भी बता रहे थे... किसी को पूरा गाँव जानता था तो किसी को पूरा जिला.. उन डीगों पे जाऊँगा तो पूरा पन्ना इसी में लग जाएगा... बस समझ लीजिये कि गुंडे-मवालियों से लेकर मंत्री तक से पहचान थी उनकी...
इसी बीच उनमें से  किसी लड़के ने दबी आवाज़ में कहा कि "मेरे पापा तो टीचर हैं... "
थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद एक लड़के ने कहा, मस्त है यार, जो भी हो यार मास्टरी में बहुत आराम है लेकिन... आराम से जाओ कोनो काम नहीं, दिन भर गप्पें मारो, स्वेटर बुनना है तो वो भी कर लो... बच्चों को दो-तीन ठो सवाल दे दो हल करने को और दिन खतम... 
फिर सिलसिला शुरू हुआ अपने अपने रिश्तेदारों के काम गिनाने का... 
"भई हमरे पापा को तो कभी कभी रात-रात को अस्पताल जाना पड़ता है..."
"अरे मत पूछ हमरे चाचा के घर में तो दिन भर कोई न कोई आता ही रहता है, रविवार को भी कोई छुट्टी नहीं..."
"अरे अभी क्लोजिंग चल रहा है न तो पापा तो बैंके में रहते हैं हमेशा..."
वो बेचारा लड़का चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था... और वो अपनी कहानियां सुनाये जा रहे थे... मेरा दिल किया मैं इस वार्तालाप में कुछ बोलूँ, लेकिन बेवजह फटे में टांग डालने का मन नहीं था मेरा...
इसी बीच बरौनी आ गया, उन दिनों वहां इंजन चेंज होता था तो करीब ४५ मिनट रूकती थी ट्रेन... सब नीचे उतरकर इधर उधर टहला करते थे... प्लेटफोर्म पर टहलते हुए मैंने उस लड़के को देखा, पता नहीं क्या मन हुआ उसके पास गया और बस इतना ही बोला...
"अरे टेंशन मत लीजिये, हमरे पापा भी टीचर हैं और ई सब लड़का लोग जानता नहीं है कि एकरा डॉक्टर, अफसर, मनेजर सब पढ़ा कोनो न कोनो टीचरे से है..."   
ये बोलकर मैं बिना उसका रिएक्शन देखे आगे बढ़ गया... जब ट्रेन में वापस आया तो वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था, शायद उसे अपने पापा की अहमियत समझ में आ गयी थी...

खैर ये तो था एक बीता किस्सा, लेकिन निजी तौर पर भी मुझे वाकई इस बात पर गर्व होता है कि मेरे माँ-पापा दोनों शिक्षक के रूप में सेवानिवृत हुए...

पता नहीं आपमें से कितने लोगों ने दो-दूनी चार फिल्म देखी हो... एक मिडल क्लास शिक्षक की कहानी है.. थोड़ी कॉमेडी भी है और थीम भी अच्छा है... आपको पसंद आएगी... :-)

चलते-चलते...
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ये पोस्ट देर से सिर्फ इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ क्यूंकि वो सिर्फ एक दिन याद करने लायक नहीं है... वो तो हमेशा आपके साथ हैं जब भी आप ज़िन्दगी में किसी भी दिन कुछ भी कुछ हासिल करते हैं... :-)
याद रखिये, दुनिया में सिर्फ और सिर्फ शिक्षक के पास ही ऐसी जादुई क्षमता है कि एक अच्छे खासे इंसान को मुर्गा बना सके... एंड ऑन अ सीरियस नोट, एक गधे को इंसान बना सके...

Happy Teacher's Day Life... :)

Friday, August 16, 2013

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी...

हर एक की ज़िन्दगी में पचीसियों अतीत के पन्ने होते हैं, लेकिन जैसी सुगमता बचपन के पन्ने वाली लिखावट में होती है, वैसी तो कहीं नहीं... वो नादान सी साफगोई, अपने उस कोमल, सौम्य वजूद को बचा के रहने की जद्दोजहद... एक ज़रा सी आह पर अपने आस-पास अपने चाहनेवालों की भीड़ देखना भला किसे पसंद नहीं होता... 

कई शामें मीठी सी होती थीं, जब बार-बार मिठाई की जिद करने पर, माँ हथेली पर गुड़ का एक ढेला डाल दिया करती थी... मन बल्लियों उछल जाता था... हर रोज़ स्कूल से लौटते समय जब मैं माँ से रिक्शा पर चलने की जिद करता था तो माँ मुझे हाथ में दो बिस्कुट पकड़ाती थी और कहती थीं चलो न खाते-खाते घर आ जाएगा...  कटिहार ब्लॉक के पास वाली गुमटी से खरीदे गए अठन्नी के दो मिलने वाले बिस्कुट महज अपने नन्हें छोटे हाथों में पकड़ लेने से जो सुख मिलता था, वैसे सुख की तलाश में आज कई-कई शामें बेज़ार होकर पिघलती जाती हैं...

इन सब के बीच कब हमारी त्वचा धीरे-धीरे खुरदरी हो जाती है और न जाने कब जॉनसन एंड जॉनसन से आगे बढ़के हम NIVEA और DOVE पर आ जाते हैं... ख्वाबों और खिलौनों की दुनिया से आगे आकर BHK खोजने में लग जाते हैं... जाने क्यूँ चवन्नी के लेमन्चूस से संतुष्ट हमारा मन 6 डिजिट की सैलरी मिलने के बाद भी रात को चैन से नहीं सो पाता... करवटें बदल-बदल के आयी हुई इन अधपकी नींद की झपकियों में आने वाले दिन की लहक होती है... ऐसा नहीं है कि हम दुखी हैं, हम दिल खोल कर अपनी ज़िन्दगी एन्जॉय करते हैं, लेकिन कभी किसी उदास शाम में अपने कमरे की बालकनी में बैठे हुए सोचते हैं तो दूर से बचपन की वो चमकीली हंसी, आवाज़ लगाती हुई सी लगती है...

मैंने आज सांझ से पूछा कि बचपन की वो कौन सी चीज है जो वो आज सबसे ज्यादा मिस करती है, तो उसने कहा चॉकलेट का स्वाद... पहले बड़ी मेहनत और जिद से मिलने वाली चॉकलेट आज वो जब जी चाहे खुद खरीद के खा सकती है लेकिन अब उसमे वो स्वाद ही नहीं रहा...
सही बात भी है, जो कभी-कभी बड़ी मासूमियत से मिलता है स्वाद बस उसी का रह जाता है जुबान पर, जो आसानी से मिल जाए उसका स्वाद जीभ को मामूली सा ही लगता है...

Sunday, March 17, 2013

जीवन झांकता है...

नवम्बर की सर्दी कुछ ख़ास नहीं और यहाँ कोलकाता में तो बिलकुल भी नहीं... सुबह के ९ बज रहे हैं, यूँ ही भटकने निकल पड़ा हूँ, बाकी के साथी आगे निकल चुके हैं... मुझे तेज़ चलने का कोई मोह नहीं... सड़क के किनारे कई टूटी-फूटी झोपड़ियां जैसे एक-दूसरे के ऊपर गिरने वाली हों... एक तरफ जहाँ हम 2BHK-3BHK की दौड़ में लगे हैं वहीँ एक 10 बाय 8 के कपडे के टेंटनुमा मकान में एक पूरा परिवार खुद को समेटने की कोशिश कर रहा है... साथ ही कोने में रखी माँ दुर्गा की मूर्ति इस बात का भी एहसास दिलाती है कि उन्हें अब भी भरोसा है उस शक्ति पर... मेरे अन्दर काफी देर तक एक सन्नाटा छा जाता है.. इन स्लम के खंडहरों के नेपथ्य में दिखता एक अन्डर कंस्ट्रक्शन एपार्टमेंट मुझपर थूकता हुआ जान पड़ता है...

किसी फुटपाथ पर
सड़क के किनारे बनी
कई झोपड़ियों के 
चूल्हे पर चढ़े
खाली हांडियों से, 
उन काली-मटमैली
काया पर लिपटे
फटे हुए चीथड़ों से,
वो मिटटी के फर्श पर
लेटा हुआ लाचार
जीवन झांकता है...

सूरज धीरे-धीरे अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहा है... हम भी धीरे थके क़दमों से उस तरफ बढ़ रहे हैं, जिधर से चांदनी भी बच कर निकल लेना चाहती है... ये वो बदनाम रास्ते हैं जिसके उसपार भी जीवन बसता है... खिडकियों और अधखुले दरवाजों के पीछे से कई सूनी आखें नज़र आती हैं... उन खिडकियों और दरवाजों की भी ज़रुरत बस इतनी है कि वहां से इशारे देकर खरीददारों को बुलाया जा सके... मिलता होगा सुकून यहाँ आकर कई लोगों को भी, जाने कैसे होंगे वो लोग जिनकी जवानियाँ मचलती होंगी ये देखकर, लेकिन ये नज़ारा मुझे तो जैसे टूटा खंडहर कर गया.. भले ही इन स्याह गलियों की रातें रंगीन होती हों लेकिन ये रंग मेरे अन्दर की सफेदी को तार तार कर गया... मुझे वो अधनंगा जिस्म कीचड़ में लिपटा जान पड़ता है... कहते हैं समाज को सभ्य बनाए रखने के लिए वेश्या का होना ज़रूरी है... जाने ये कैसी सफाई है जिसे बनाये रखने के लिए हर रात कई औरतें और लडकियां किसी अनजान भेड़िये का खाना बनती हैं... मैं फिर से अपने चेहरे पर थूक के कुछ छीटे महसूस करता हूँ...

लाल-नीली-पीली
चकमकाती बत्तियों के पीछे
उन अधखुली खिडकियों से
कुछ इशारे बुलाते
नज़र आते हैं,
सब देखते हैं
ललचाई आखों से
उन चिलमनों के पीछे
अधनंगे मांस की तरफ...
उन रंगीन कहे जाने वाले
रंडियों के कोठे से
एक नंगा-बेबस
जीवन झांकता है...

Sunday, February 24, 2013

यादों का अंधड़...

मैं उदास हूँ, मन खंडित, तन निढाल... मैं इंसान की तरह नहीं, ठहरे हुए पानी की तरह नज़र आता हूँ.. जिसमे परछाईयाँ उभरती हैं फिर लहरों के साथ ओझल हो जाती हैं... अपनी दुनिया में खोया एक शख्स कितना अजीब लगता है.. इस दौर की दुनिया चाहती है सब एक जैसे हो जाएँ, सब एक जैसे सिपाहियों की तरह कदमताल करते रहे... वो भीड़ होकर खुद भीड़ में गुम हो जाएँ... इस दौर की दुनिया किसी को 'तथागत' नहीं होने देती, बाहर चकाचौंध बिछाती है और अन्दर वनवास...यह वर्तमान का दौर है, यहाँ स्मृतियों के लिए कोई जगह नहीं... अब लोग एल्बम नहीं देखते, एटलस देखते हैं और उनमे अपने कंक्रीट के जंगल बिछाने के लिए प्लाट देखते हैं... घर और मकान की परिभाशों से दूर उठकर फ़्लैट खोजने में व्यस्त इस भीड़ का शोर बढ़ता ही जा रहा है... अजीब बात है लोग वर्तमान के पीछे भागते हैं और उसी वर्तमान से डरते भी हैं... मुझे ये डर हर कहीं दिखता है.. मेरे कमरे के अकेलेपन में, मेरी बंद आखों की पुतलियों पर तैरता रहता है ये डर, मेरी जेबों में चिल्लर की तरह खनकता रहता है डर, डर मेरी सांस में भी मौजूद है तभी शायद सांस लेते समय मैं डरा हुआ लगता हूँ...
 
अकेले आदमीं की यही दिक्कत होती है... उसे समझ नहीं आता की खाली वक़्त का क्या करे ? यही दिक्कत मेरी भी है... अपने खालीपन से भाग निकलने की कोशिश में सड़कों पर भटकता रहता हूँ... ऐसे में सबसे मशरूफ़ दिखने वाला मैं, शहर का सबसे खाली इंसान होता हूँ... ये शहर वजूहात का शहर है, हर किसी के पास एक वजह है, ज़िन्दगी जीने की वजह... बस पकड़ने की मामूली सी वजह को लेकर भी लोग जीने का हुनर पैदा कर लेते हैं...
भटकते-भटकते एक दोराहे पर आकर खड़ा हो गया हूँ, सामने कबाड़ी की दुकान दिख रही है.... कबाड़ को देखकर मेरे चेहरे पर धीमी सी तिरछी मुस्कान उभर आती है... कबाड़ पता नहीं क्यूँ खराब लफ़्ज़ों में शुमार होने लगा, अगर आप कबाड़ को गौर से देखने लगें तो कबाड़खाने की एक एक शय, हमारी ज़िन्दगी का नक्श नज़र आती है... मैं खुद को यूँ सड़कों पर झोंक देना चाहता हूँ, लेकिन उस कमजोरी का क्या करूँ जो पैरों में चप्पल की तरह उतर आती है... फिर से अपने ऊपर लगायी सारी बंदिशों को तोड़कर उसी कमरे में दाखिल होता हूँ... कमरे में जाकर इस तरह खड़ा हो जाता हूँ जैसा किसी और का कमरा हो... चुपचाप !! बेआवाज़ !! हमेशा की तरह रौशनी आखों में चुभ रही है, बत्तियां बुझाकर मैं अँधेरे और ख़ामोशी का एहतराम करता हूँ...

स्मृतियों के संसार की खूबी ही तो यही है, न पासपोर्ट न वीजा, न प्रवेश शुल्क न टोलटैक्स... मेरा ये संसार ऐसा ही है, जो भी मुझे इसमें खोजने निकला वो खुद भी इसी में खो गया...

Wednesday, February 20, 2013

ज़िन्दगी की सुरंगों से झांकता एक दिन...

यूँ तो हर किसी की ज़िन्दगी एक कविता के सामान होती है... लेकिन हर कविता का रंग अलग अलग होता है, उनका छंद अलग होता है, उनका अंदाज़ अलग होता है... कुछ कवितायें आस-पास के थपेड़ों से ठोकर खाते-खाते अधूरी ही रह जाती हैं... यूँ बैठा सोचा के कभी अपनी आत्मकथा लिखूंगा, तो क्या लिखूंगा... कहाँ से शुरुआत होगी और किन पैरहनों को सीते हुए आगे बढूंगा.. और कहीं बीच में ही विचारों को कोई धागा चूक गया फिर... खैर इधर-उधर नज़र फेरने के बाद छत की और देखने लगता हूँ, और कुछ यूँ सोचता हूँ...

एक महल है बादलों का
उसी में रहता हूँ आजकल
उसमे कोई दरवाज़ा नहीं
खिड़की भी नहीं,
पिछली बारिश में
जो एक सीढ़ी बनायी थी तुमने
उसी पर बैठ के
बांसुरी बजाया करता हूँ...


कमरे में बैठा हूँ, हालांकि यहाँ ठण्ड नहीं है लेकिन शाम होते-होते इतनी हवा तो बहती ही है कि सीने में सिहरन पैदा कर सके... चुपचाप ब्लैंकेट के कोनों को पकडे खुद को उसमे ज्यादा से ज्यादा उतार लेने की जुगत कर रहा हूँ... आस-पास सन्नाटे गूँज रहे हैं, पता ही नहीं चलता कि शायद कोई बाहर पुकार रहा हो मुझे.. पता नहीं क्यूँ जब भी गुलज़ार को लगातार सुनने लगता हूँ मन किसी छल्ले में बंध कर उड़ान भरने लगता है, जैसे साबुन के बुलबुले बिना किसी मंजिल के आसमान की तरफ रुख करने लगते है... कई सारे बीती बातें याद आने लगती हैं, पुरानी तस्वीरें देखने का मन करता है... उन तस्वीरें में कई ऐसे लोग दिखते हैं जो समय के साथ-साथ कहीं खो गए... उनका कोई पता नहीं, कोई खबर नहीं...

कभी कभी
खुद के चारो तरफ
स्वतः ही
हो जाता है एक शून्य-निर्माण ...
शरीर दिखता भर है और
बस महसूस होती है उसकी गंध
गंध उन बासी साँसों की
जैसे बरसों से पड़े सीले कपड़ों को
दिखा दी हो किसी ने
धूप सूरज के पीठ की ...

बहुत आसान है उस गंध में
खो जाना जन्मों-जन्मों तक
और
भूल जाना अपने अस्तित्व को ,
गर अचानक से न उभर आये
ख्याल किसी खोह-खंदक से
कि कहाँ है उस शरीर की जान
कहाँ हैं आत्मा और मन,
पर व्यर्थ है उनको ढूँढना भी
वो दोनों तो हाथों में हाथ डाले
बीती रात ही निकल गए
हमेशा की ही तरह
किसी अज्ञातवास पर ...
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