Friday, September 18, 2026

मैं ज़िंदा हूँ...

मैं ज़िंदा हूँ, अगर सिर्फ ये जानना ज़रूरी है तो हाँ, ज़िन्दगी जी रहा हूँ, ज़िन्दगी में मिलने वाले सुख-दुःख के बीच अपना होना बचाये हुआ हूँ. 

कितना कुछ बदल जाता है, ज़िन्दगी में बदलते वक़्त के साथ... किसी भी पुरानी बात के साथ जब उसकी उम्र जोड़ता हूँ और हर बार साल बढ़ते जाते हैं तो लगता है वक़्त कितनी तेजी से फिसल जा रहा है, कुछ बाते २६ साल पुरानी हो गयीं तो कुछ १५... बस लोगों के मिलने और बिछड़ने की तारीखों के बीच खुद को धीरे-धीरे घिस रहा हूँ...

पहले कहीं भी, किसी रस्ते निकल जाय करता था तो ठोकरें भी बहुत लगती थीं, अब मैंने रास्ते कम कर दिए हैं तो ज़िन्दगी का सफर भी आसान सा हो गया, बोरिंग भी शायद ... हर संभावना हक़ीक़त बन जाए, यह ज़रूरी नहीं… कुछ सपने संभव ही इसलिए रहते हैं क्योंकि वे पूरे नहीं होते ... पूरे हो जाएँ तो वो सपने कहाँ रहे... मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया, ताकि हल्का रह सकूँ… कभी-कभी हल्कापन इतना ज्यादा हो जाता है कि मन गुब्बारे सा हवा में उड़ जाता है, पुरानी बातें याद आती हैं, बिना मतलब वाली पुरानी बातें ... कैसे सिर्फ एक खाली बैग और खली दिलोदिमाग  के साथ बैंगलोर आया था, और अब अगर बैंगलोर समेटना चाहूँ तो भी नहीं समेट सकता, बस इसलिए नहीं कि यहाँ  सामान जोड़ लिए, बल्कि यहां इतने लम्हें जोड़ लिए कि जाने कितने जन्म लग जाएँ ये सब समेटने में. 

अब कुछ बातें इतनी पुरानी हो गयी हैं, जिनको आपस में जोड़ नहीं सकते, बस टुकड़ा टुकड़ा बिखरा हुआ सा कुछ रह जाता है ख़यालों के बीचो बीच, विश्वास नहीं होता कि कब और कैसे लिखना छूट गया, पहले बस में, कैंटीन में, ऑफिस में कहीं भी लिख लिया करता था, हर वक़्त कई सारे ख्याल आते थे...  अब खाली सन्नाटे में भी कुछ नहीं आता. 

कभी-कभी मेरे हर अनकहे को समझने वाले लोग शायद ये पढ़ कर मुझे समझ सकें, कि मैं ज़िंदा हूँ. बस ज़िंदा हूँ. 

Tuesday, February 17, 2026

एक पाठक कम हुआ, एक भाषा दूर हो गई...

मैं अब हिंदी में बहुत कम लिखता हूँ। यह वाक्य लिखते हुए भी थोड़ा अजीब लगता है, जैसे किसी अपने के बारे में कुछ स्वीकार कर रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं था कि मुझे हिंदी से दूरी बनानी पड़ी हो या मैंने जानबूझकर उसे छोड़ने का फैसला किया हो। बस धीरे-धीरे ऐसा हुआ। बिना शोर के, बिना किसी बड़े कारण के।

इन दिनों ज़्यादातर लिखना अंग्रेज़ी में हो रहा है। मेरा तकनीकी ब्लॉग है, काम की भाषा वही है, पाठक भी वहीं हैं। वहाँ लिखना ज़रूरी है, उपयोगी है, और शायद सही भी। चीज़ें साफ़-सुथरी रहती हैं—विचार, तर्क, समाधान। वहाँ लिखते हुए मैं ज़्यादा व्यवस्थित रहता हूँ, ज़्यादा समझदार, ज़्यादा व्यावहारिक। सब कुछ ठीक-ठाक लगता है।

लेकिन हिंदी का मामला अलग था।

हिंदी में लिखना कभी “काम” नहीं रहा। वह एक आदत नहीं थी, एक ज़रूरत थी। हिंदी में मैं वो सब लिख देता था जो किसी और भाषा में कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता है। वहाँ शब्द मेरे नियंत्रण में नहीं होते थे; मैं शब्दों के भीतर चला जाता था। शायद इसीलिए हिंदी मेरे लिए किसी भाषा से ज़्यादा एक इंसान जैसी हो गई थी—जिससे बिना तैयारी के, बिना सजावट के बात हो जाती थी।

और सच यह है कि हिंदी का मतलब बस तुम थी।

जब तक तुम पढ़ती रहीं, तब तक लिखना स्वाभाविक था। यह कभी सवाल ही नहीं बना कि “किसके लिए लिख रहा हूँ?” लिखना अपने आप में पर्याप्त था। अब जब तुम नहीं पढ़तीं, तो यह सवाल हर बार उभर आता है। और यह सवाल बहुत बुनियादी है। हम चाहे जितना इनकार करें, लिखना हमेशा किसी एक चेहरे को ध्यान में रखकर ही होता है—भले वह चेहरा धीरे-धीरे धुंधला क्यों न हो जाए।

अब जब हिंदी में लिखता नहीं हूँ, तो खालीपन महसूस होता है। लेकिन यह खालीपन शोर नहीं करता। यह बस चुपचाप बैठा रहता है। जैसे कमरे में सब कुछ अपनी जगह पर हो, पर खिड़की बंद हो और हवा रुक गई हो। ज़िंदगी चल रही है, काम हो रहा है, दिन पूरे हो रहे हैं—पर भीतर कहीं कुछ ठहरा हुआ है।

अंग्रेज़ी में लिखते हुए मैं सुरक्षित रहता हूँ। वहाँ भावनाएँ नियंत्रित रहती हैं, शब्द सीमित रहते हैं। वहाँ मैं खुद को ज़्यादा उजागर नहीं करता। हिंदी में ऐसा नहीं था। हिंदी में मेरी थकान दिखती थी, मेरी बेचैनी, मेरे अधूरे सवाल, मेरी बेवजह की उदासी। शायद इसलिए हिंदी से दूरी आसान नहीं थी, पर ज़रूरी हो गई।

कभी-कभी लगता है कि हिंदी छोड़ने से ज़िंदगी थोड़ी सरल हो गई है। कम आत्मसंघर्ष, कम भावनात्मक उलझन। पर उसी के साथ यह एहसास भी रहता है कि कुछ बहुत अपना पीछे छूट गया है—ऐसा कुछ, जिसे शब्दों में ठीक-ठीक समझाया नहीं जा सकता।

अब शायद यही ज़िंदगी का सच है। हर वो चीज़ जो हमारे सबसे क़रीब होती है, हमेशा हमारे साथ नहीं रहती। कुछ रिश्ते समय के साथ बदल जाते हैं, कुछ बिना झगड़े के खत्म हो जाते हैं। और हर दूरी का मतलब नाराज़गी नहीं होता—कभी-कभी बस हालात ही काफी होते हैं।

मुझे नहीं पता हिंदी फिर लौटेगी या नहीं। शायद किसी दिन, बिना चेतावनी के, फिर से लिखना शुरू कर दूँ। या शायद नहीं। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि मैंने हिंदी को छोड़ा नहीं है। बस फिलहाल उससे बात नहीं कर पा रहा हूँ।

और शायद कभी-कभी किसी भाषा से चुप रहना भी, उससे किया गया सबसे ईमानदार संवाद होता है।


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यहाँ भी 

Friday, January 23, 2026

कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने...

चित्र : AI 
कितना वक़्त ज़ाया कर दिया मैंने,
बस रूठे रहने के लिए।

ऐसे लोगों से रूठा रहा
जिन्हें मेरे मनाने की ज़रूरत ही नहीं थी,
और उनसे भी
जिन्हें एक आवाज़,
एक आधी सी मुस्कान
वापस ला सकती थी।

मैं अपने सही होने की ज़िद में
इतना उलझा रहा
कि ये देख ही नहीं पाया
कि वक़्त
किसी की सफ़ाई नहीं सुनता,
बस आगे बढ़ जाता है।

कुछ नाराज़गियाँ
इतनी छोटी थीं
कि आज याद करता हूँ
तो हैरानी होती है—
इनके लिए
हमने कितने त्यौहार,
कितनी शामें,
कितनी बातें कुर्बान कर दीं।

अब समझ आता है
रूठना अक्सर
दूसरे को सज़ा देना नहीं होता,
खुद को
अकेले छोड़ देना होता है।

काश थोड़ा पहले जान लिया होता
कि हर बात जीतने लायक नहीं होती,
और हर इंसान
हमेशा के लिए नहीं रुकता।

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नई पोस्ट्स अब इस पते पर लिख रहा हूँ....

Sunday, December 7, 2025

धूप अब जलाने लगी है...

कभी ये धूप माँ जैसी लगती थी,
जो आँगन में खेलते बच्चे को चूम लेती थी…
अब वही धूप चुभने लगी है,
जैसे कोई नाराज़ हो गई हो,
बहुत दिनों से बोले बिना, बस तप रही हो।

हवाएँ भी अब कहानी नहीं कहतीं,
बस थककर बहती हैं ...
जैसे किसी ने उनके रास्ते पर
बहुत बोझ रख दिया हो।

पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है,
पर अफसोस , दिलों की नहीं।
समंदर ऊँचे हो रहे हैं,
पर इंसान की नीयतें और नीची।

हमने तरक्की के नाम पर
धरती की साँसें गिरवी रख दीं,
पेड़ों की जगह टॉवर लगाए,
फूलों की जगह एसी की हवा सूँघी,
और अब हैरान हैं कि बारिश रूठी क्यों है।

कभी-कभी लगता है,
धरती अब बोलना चाहती है,
कहना चाहती है कि “बस करो,”
पर हम मीटिंग्स, डेडलाइन्स,
और प्रॉफिट ग्राफ़्स में इतने उलझे हैं
कि उसकी खामोशी भी
हमारे लिए बस background noise बन गई है।

शायद एक दिन,
जब धूप जलाने लगेगी,
जब समंदर निगल लेंगे किनारे,
जब पंछी लौटेंगे ही नहीं,
तब हम समझेंगे,
कि ये सज़ा नहीं,
सिर्फ़ धरती का बदला हुआ अंदाज़ है।

Wednesday, December 3, 2025

अंतरद्वंद्व...

कभी लगता है,

वो ज़िंदगी बेहतर थी,
जब जेब में पैसे कम थे,
पर वक़्त ज़्यादा था।
जब बातें लंबी थीं,
और मतलब छोटे।

अब सबकुछ है,
सुविधा, सुरक्षा, स्क्रीन पर मुस्कुराते चेहरे,
पर शायद वो “सच्ची मुस्कान”
कहीं पुराने दिनों की जेब में रह गई है।

कभी-कभी सोचता हूँ,
क्या हमने तरक़्क़ी की है,
या बस अपने सवालों को
महंगे पर्दों के पीछे टाँग दिया है?

वो ज़िंदगी जिसमें सपने
साइकिल के पैडल के साथ भागते थे,
और ये ज़िंदगी,
जहाँ कारें हैं, पर मंज़िल नहीं।

शायद हम बेहतर जी रहे हैं,
पर महसूस कम कर रहे हैं।
वो पुराने दिन सादे थे,
पर सुकूनदार,
ये आज के दिन चमकदार हैं,
पर थके हुए।

कौन सी ज़िंदगी बेहतर थी,
शायद दोनों ही नहीं।
बेहतर तो बस वो पल था,
जब हम सोच नहीं रहे थे
कि कौन-सी बेहतर है।

Thursday, November 6, 2025

जंगल जलते हैं…

जंगल जलते हैं,
तो सिर्फ़ पेड़ नहीं जलते —
किसी चिड़िया का घोंसला जलता है,
किसी हिरन का रास्ता,
किसी बूंद का सपना।

आग लगती है कहीं दूर,
पर राख हवा के साथ
हर इंसान की साँस तक चली आती है।
फिर भी,
हम उसे सिर्फ़ “न्यूज़” कहते हैं।

कभी उन पेड़ों की छाँव में
धरती ने भी चैन की साँस ली थी,
आज वही धरती धुआँ ओढ़े बैठी है —
जैसे किसी बूढ़ी माँ ने
अपने बच्चों को खुद से दूर जाते देखा हो।

आग सिर्फ़ जंगल नहीं खाती,
वो भरोसा भी जलाती है —
कि कल भी हवा में हरियाली होगी,
कि पंछी लौटेंगे अपने घर,
कि धरती अब भी ज़िंदा है।

और अजीब बात यह है —
ये आग पेड़ों ने नहीं लगाई,
हमने लगाई थी…
अपनी ज़रूरतों, अपनी जल्दी,
और अपने अहंकार की तीली से।

अब जो जल रहा है,
वो जंगल नहीं —
हमारी अपनी इंसानियत है।

Monday, November 3, 2025

बस इतने भर के लिए मिलना...

ना आँखों में पानी,
ना लफ्ज़ों में शिकवा…
बस एक ख़ामोश देख लेना है तुम्हें
जैसे रूह देखती है
अपना छूटा हुआ शरीर…

कभी वक्त ठहरे,
तो हवा को छू लेना —
शायद उसमें मेरी साँसों की कोई परछाई हो।
बारिश आए तो खिड़की खोल लेना —
कुछ नमी मेरी बातों की अब भी अटकी होगी वहाँ।

ना लौटना अब,
ना पुकारना मुझे,
हम बस यादों की दीवार पर
लटकी हुई तस्वीरें हैं —
जो मुस्कुराती भी हैं,
और थक जाती हैं मुस्कुराते-हुए।

मिलना है यूँ,
जैसे कोई पेड़
आख़िरी पत्ते के गिरने से पहले
एक बार और
आसमान को देखना चाहता हो...

मैं कुछ नहीं कहूँगा,
तुम भी मत कहना,
बस इतने भर के लिए मिलना —
कि मरने के बाद
कोई अफ़सोस न बचे
कि हम आख़िरी बार
ज़िंदा रहते हुए
एक-दूसरे को ज़िंदा न देख सके… 


Friday, October 31, 2025

थकान के उस पार...

थकान के उस पार एक ठहराव है,

जहाँ समय भी धीरे चलने लगता है।
न वहाँ सुबह की हड़बड़ी है,
न शाम की चिंता।
बस एक ख़ामोश हवा है —
जो माथे के पसीने को छूकर पूछती है,
"अब और कितना भागोगे?"

वहाँ न कोई लक्ष्य है,
न कोई इनाम की आस।
बस ज़मीन की ठंडक है,
जो याद दिलाती है
कि कभी तुम इसी मिट्टी से उठे थे —
और एक दिन यहीं लौटना है।

थकान के उस पार,
ज़िंदगी का मतलब बदल जाता है —
सफलता नहीं, सुकून असली मंज़िल लगती है।
लोग नहीं, लम्हे मायने रखते हैं।
और जो बात पहले बोझ लगती थी,
अब बस एक कहानी बनकर रह जाती है।

वहाँ कोई दौड़ नहीं है,
कोई प्रतिस्पर्धा नहीं —
बस एक शांत आत्मा है,
जो कहती है,
“अब बस रहो…
क्योंकि रुकना भी ज़रूरी है।” 

Monday, October 13, 2025

अक्टूबर की बारिश...

अक्टूबर की बारिश कुछ कहती नहीं,
बस धीरे-धीरे टपकती है छतों से,
जैसे कोई पुराना खत फिर से भीग गया हो।

हवा में नमी है, मगर बेचैनी नहीं,
जैसे मौसम ने खुद को समझा लिया हो

कि अब जाना भी है, पर अभी नहीं।

पेड़ों पर चिपकी पत्तियाँ
थोड़ी थकी-सी लगती हैं,
फिर भी हर बूँद को अपनाने से इंकार नहीं करतीं।

सड़कें चमक उठती हैं,
मानो उन्होंने भी किसी पुराने वक़्त को देखा हो,
जो लौटकर नहीं आएगा,
पर उसकी खुशबू अब भी मिट्टी में बसी है।

और मैं…
खिड़की के पास बैठा
कॉफ़ी की भाप में सुकून ढूँढता हूँ,
सोचता हूँ,
कितना अजीब होता है ये मौसम —
कुछ लौटाता नहीं,
पर सारे लम्हें
संजोये बैठा रहता है ... 

Thursday, October 9, 2025

सिगरेट पीती लड़की...

वो शहर की उस पुरानी बालकनी में खड़ी थी — वही बालकनी जहाँ से सड़क की लाइटें कभी पूरी नहीं दिखती थीं, और नीचे से आती गाड़ियों की आवाज़ें एक थकी हुई लोरी सी लगती थीं। रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे थे, हवा में अक्टूबर की ठंडी नमी थी, और दूर कहीं किसी पेड़ की शाखों से टपकती बारिश का पानी अब भी ज़मीन पर गुनगुना रहा था।

हाथ में सिगरेट थी — जली नहीं थी अभी तक। उसने उसे उंगलियों के बीच ऐसे थामा था जैसे कोई अपने ही दिल की धड़कन को पकड़ना चाहता हो।
थोड़ी देर तक वो उसे देखती रही — “कितना आसान है न किसी चीज़ को जला देना… पर मुश्किल तब होती है जब खुद में कुछ जलाना पड़े।”

उसने एक गहरी सांस ली, सिगरेट को होंठों तक लाया और एक धीमा सा कश लिया। धुआँ ऊपर उठा, फिर हवा में घुल गया — जैसे उसकी ज़िंदगी के वो सारे पल जो कभी लौटकर नहीं आने वाले थे।
कभी किसी ने कहा था उससे —
“लड़कियाँ सिगरेट नहीं पीतीं, ये अच्छी बात नहीं लगती।”
वो हँसी थी उस दिन —
“सिगरेट बुरी चीज़ है, पर लोगों के तंज़ उससे भी ज़्यादा जहरीले होते हैं।”

असल में, उसे सिगरेट पसंद नहीं थी — वो बस एक वजह थी खुद से मिलने की। दिनभर की हड़बड़ी, काम, रिश्तों के सवाल-जवाब, सब थम जाते थे उस छोटे से धुएँ में। जब तक सिगरेट जलती, उसे लगता, दुनिया रुक गई है थोड़ी देर के लिए।
वो धुएँ में अपने डरों को देखती थी — वो जो किसी ने नहीं देखे।
कभी किसी रिश्ते का टूटना, कभी अपने ऊपर बढ़ता सन्नाटा, कभी वो सवाल जो जवाब मांगते नहीं थे, बस चुभते रहते थे।

एक वक्त था जब उसे बारिश से प्यार था — भीगना अच्छा लगता था। पर अब, बारिश होते ही वो बस बालकनी में खड़ी हो जाती थी — जैसे डरती हो कि कहीं कोई याद फिर से भीग कर न लौट आए।
वो जानती थी कि ये सब गलत है — ये सिगरेट, ये देर रात की बातें, ये अपने आप से बहसें।
लेकिन उसे ये भी पता था कि जिंदगी की हर चीज़ सफ़ेद या काली नहीं होती। कुछ धुएँ के रंग की भी होती हैं, जो न पूरी साफ़ होती हैं, न पूरी गंदी — बस बीच में होती हैं, जैसे उसकी अपनी कहानी।

कभी-कभी सोचती — “काश कोई पूछे कि तुम क्यों पीती हो सिगरेट?”
वो कहती, “क्योंकि हर बार इसे बुझाते हुए मैं एक चिंता बुझाती हूँ, एक बोझ जलाती हूँ, और थोड़ी देर के लिए खुद को महसूस करती हूँ।”

उसने राख झटकते हुए देखा — रात और भी गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर दो बच्चे अपने स्कूटर से लौट रहे थे, हँसते हुए। वो मुस्कुरा दी — “अच्छा है, किसी की रात अब भी इतनी हल्की है।”

उसने सिगरेट का आखिरी कश लिया और धीरे से कहा —
“चलो, अब बस… आज के लिए इतना जलना काफी है।”

फिर उसने लाइट बंद की, पर्दा गिराया और खामोशी में लौट गई —
कभी की गई हर बात, हर मोह, हर शिकायत अब धुएँ की तरह उड़ चुकी थी,
बस एक खुशबू बाकी रह गई थी — राख की नहीं, खुद की पहचान की।

Saturday, October 4, 2025

रश्मि दी ... 💔

रश्मि दी से जान-पहचान ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में हुई थी। करीब पंद्रह साल पहले। उस समय ब्लॉग सिर्फ़ लिखने की जगह नहीं था, बल्कि नए-नए रिश्ते बनाने का एक ज़रिया भी था। उन्हीं रिश्तों में एक रिश्ता रश्मि दी का भी था।

धीरे-धीरे बातों का दायरा बढ़ता गया। लिखने-पढ़ने से शुरू हुआ रिश्ता हर विषय तक पहुँच गया। नौकरी की खोज पर चर्चा, शादी की बधाइयाँ, कोविड के दिनों की बातें, गार्डनिंग के अनुभव, यहाँ तक कि बिल्कुल निजी उलझनों तक। वो हमेशा सुनने और समझने वाली थीं। उनके साथ बातचीत में कभी औपचारिकता नहीं रही, हमेशा एक अपनापन रहा।

मुझे याद है कोविड के दिनों में जब दुनिया ठहर-सी गई थी, हम लोग बगीचे और पौधों को लेकर बहुत बातें करते थे। वो अपने गार्डन की तस्वीरें साझा करतीं और कहतीं कि “पौधे भी इंसान जैसी संगत चाहते हैं।” उनके शब्दों में हमेशा एक सुकून होता था, जैसे कोई थकी हुई साँस को ठहरने की जगह मिल गई हो।

जब मैं नौकरी के उतार-चढ़ाव से गुजर रहा था, तो उन्होंने सबसे पहले भरोसा दिलाया था कि “काम आते-जाते रहते हैं,” उस समय उनकी यह बात बहुत हिम्मत देने वाली थी। 

पिछले साल जब बीमारी की खबर मिली तो चिंता हुई। लेकिन उनकी हिम्मत देखकर लगा कि वो इस जंग को भी जीत लेंगी। धीरे-धीरे वो ठीक भी हो रही थीं। यहाँ तक कि बेंगलुरु भी आईं। हमने मिलने की योजना बनाई थी, पर हमेशा की तरह टालते रहे कि “अगली बार मिलेंगे।” अगली बार हमने तय किया था कि बर्ड फोटोग्राफी पर साथ चलेंगे।

दुर्भाग्य से वो अगली बार कभी नहीं आ पाई।

इस साल मैं सोशल मीडिया पर उतना सक्रिय नहीं था। कल अचानक उनकी वॉल पर गया और पता चला कि वो इस साल फरवरी में ही चली गईं। और मुझे अब जाकर खबर मिली। यह जानकर अंदर तक झटका लगा।

इतना लंबा रिश्ता, इतनी सारी बातें और यादें, और इतनी चुपचाप उनका जाना। यकीन करना मुश्किल है। मन बार-बार उसी अधूरे वादे पर अटक जाता है—एक मुलाक़ात, जो अब कभी नहीं हो पाएगी।

रश्मि दी सिर्फ़ बातचीत का हिस्सा नहीं थीं, वो हर उस छोटे-बड़े पल में मौजूद हैं जहाँ हमने कभी बात की थी। कभी नौकरी की चिंता में, कभी ब्लॉगिंग की चर्चाओं में, कभी बगीचे के फूलों की तस्वीरों में, तो कभी उन रंग-बिरंगे परिंदों की उड़ानों में।

अब लगता है कि उनसे किया हुआ हर संवाद, हर सलाह, हर हँसी मेरे भीतर ही रह गई है। वो चली गई हैं, लेकिन उनका अपनापन और उनका असर हमेशा बना रहेगा।

विश्वास ही नहीं हो रहा कि अब उनसे कभी बात नहीं होगी।
इतने सालों तक जब-तब बात हो जाती थी। कभी किसी पोस्ट पर कमेंट, कभी किसी मैसेज में हालचाल। वो अक्सर पूछ लेतीं — “सब ठीक है न?” और मैं बेफिक्र होकर लिख देता था “हाँ, सब ठीक।” आज वही साधारण-सा सवाल भी कितना कीमती लग रहा है।

अब न वो मुझे किसी फेसबुक पोस्ट में टैग करेंगी, न किसी फोटो पर हँसते हुए इमोजी डालेंगी, न किसी छोटी-सी लाइन से हौसला देंगी। उनकी उपस्थिति हमेशा सहज थी, बिना शोर-शराबे के, पर इतनी गहरी कि अब उनकी अनुपस्थिति असहनीय लग रही है।

मन कहता है कि कुछ लिख दूँ, कुछ कह दूँ… पर कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ पर ख़त्म ?

Tuesday, September 23, 2025

"कैसे साबित करूँ प्रेम..."

मैंने आपको
हर उस क्षण में याद किया
जब याद करने का कोई कारण नहीं था।

आपके नाम से पहले
कभी इबादत की तरह
"आप" कहना सीखा—
जैसे कोई बच्चा
पहली बार
ईश्वर बोलना सीखता है।

मैंने आपकी मुस्कुराहट
अपने मन के खेत में बोई है,
और हर तन्हा शाम
उसे अपने अकेलेपन से सींचा है।

मैं हर कविता में
आपकी अनुपस्थिति को
इतने प्रेम से दर्ज करता हूँ
जैसे कोई
मंदिर में
किसी अनदेखे देवता के लिए
दीया जलाता हो।


अगर ये सब प्रेम नहीं है,
तो फिर प्रेम सिर्फ़ शब्द है—
और आप उस शब्द के पहले अर्थ।

Sunday, September 21, 2025

बैंगलोर की धरती पर छठ का उजाला...

बैंगलोर — आईटी सिटी, चमकती रोशनी, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी। पर इसी आधुनिक जीवन के बीच जब छठ का पर्व आता है, तो ऐसा लगता है मानो गाँव-घर की आत्मा यहाँ उतर आई हो। बिहार और यूपी की गली-कूचों में गूँजने वाले छठ गीत अब बैंगलोर के आसमान में भी गूंजते हैं।

गाँव की मिट्टी की महक, गंगा किनारे की ठंडी हवा, और घाट पर सूरज को अर्घ्य देने का नज़ारा — ये सब बैंगलोर में तो नहीं, पर दिल की गहराइयों में अब भी उतना ही जिंदा है। इसी याद और आस्था ने हमें यहाँ भी छठ की परंपरा को जीवित रखने की प्रेरणा दी है।

यहाँ अपार्टमेंट के मैदान नदी-तालाब का रूप ले लेते हैं। लोग मिलकर सजावट करते हैं, रंगोली बिछती है, दीप जलते हैं और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। महिलाएँ सिंदूर की लंबी रेखा सजाकर सूप में गन्ना, ठेकुआ, फल और दीया रखकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करती हैं। वह पल मानो गाँव के घाट पर खड़े होने जैसा ही पवित्र हो जाता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का पुल है, जो इस परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाता है।

बैंगलोर में छठ पूजा केवल पूजा नहीं है, यह एकता और भाईचारे का उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि चाहे हम कहीं भी रहें, अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने त्योहारों से रिश्ता कभी टूटता नहीं। 

ये पॉडकास्ट ज़रूर देखें और इंस्टाग्राम पर जुड़ें..  https://www.instagram.com/seg_arghya/ . हर लाइक, हर सहयोग हमें मदद करेगा इस परंपरा को जीवित रखने के लिए...  अगर आर्थिक सहयोग करना चाहें तो संपर्क करें... ..



 

Thursday, September 18, 2025

बेमानी बातों में...

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दिन भर की बेमानी बातों में

मैं अक्सर खो जाता हूँ—
कभी किसी प्रोजेक्ट की समयसीमा,
कभी अनगिनत ईमेल की भीड़,
कभी उन मुस्कानों की औपचारिकता
जिनसे आत्मा का कोई रिश्ता नहीं।

लेकिन जैसे ही शाम ढलती है,
एक खिंचाव सा महसूस होता है—
सिर्फ घर की चार दीवारों तक नहीं,
बल्कि अपने भीतर के उस कोने तक
जहाँ मैं असल में “मैं” हूँ।

वो कोना जहाँ
शब्द अब भी साँस लेते हैं,
जहाँ थकान के बीच
कुछ अनलिखे पन्नों की गंध बाकी है।
वो जगह, जहाँ लौटना
मतलब अपनी पहचान से मिलना है।

Monday, September 15, 2025

सच या झूठ…

कभी-कभी सच,
गले में अटका काँटा होता है।
निकालो तो लहू बहता है,
दबा दो तो साँसें छिलती हैं।

मैंने सीखा है,
कुछ सच्चाइयों को तहख़ाने में उतार देना चाहिए,
जहाँ उनकी आवाज़ें
सिर्फ़ रात के अंधेरे में गूंजें,
और दिन के उजाले में
कोई दरार से झाँक न पाए।

तुम जानती हो,
ख़ुशी हमेशा सच की साथी नहीं होती,
कभी झूठ की झिलमिल परत
ज़िन्दगी को बचा लेती है।
जैसे बुझते दीपक के आगे
हथेली फैलाकर
मैं दिखाता हूँ कि रोशनी है—
हालाँकि हथेली जल रही होती है।

मैं मुस्कुराता हूँ,
कि तुम यह न समझ सको
मेरे भीतर की हरियाली
दरअसल राख पर उगी हुई घास है।

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सच या झूठ…
दोनों ही अपने अपने वक़्त पर ज़रूरी लगते हैं।

सच कभी खंजर बनकर दिल चीर देता है,
तो झूठ कभी मरहम बनकर
उस ज़ख़्म को ढक देता है।

लोग कहते हैं—
सच से रिश्ते मज़बूत होते हैं,
मगर मैंने देखा है,
कई बार सच ही रिश्तों को चुपचाप तोड़ देता है।

झूठ बुरा है, ये सब मानते हैं,
पर वही झूठ कभी
किसी की आँखों की चमक बचा लेता है,
किसी की हँसी लौटा देता है।

तो आखिर सही कौन है?
सच?
या झूठ?

शायद असली जवाब यही है कि
ज़िंदगी इन दोनों की मिली-जुली कहानी है…
जहाँ सच और झूठ
दोनों ही अपने अपने किरदार निभाते रहते हैं।

Saturday, September 13, 2025

दूर हो तुम, पर पास भी हो...

दूर हो तुम पर पास भी हो,
साँसों की जैसी साँस भी हो।

महफ़िल में सब हैं, फिर भी जानाँ,
तुम ही मेरी तलाश भी हो।

पलकों पे तेरी ख़्वाब सजे हैं,
दिल में मेरे अरदास भी हो।

महक उठी है रूह की बगिया,
जैसे बदन की घास भी हो।

लब पे दुआ बनकर ठहरना,
आँखों की कोई प्यास भी हो।

Saturday, August 23, 2025

साँसों के भीतर छुपे मौसम...

मेरे फेफड़ों में

अब भी
बरसात ठहरी है —
धूप की गंध लिए
वो पहली फुहारें,
जो तुम्हारी हँसी से
भीग गई थीं।

हर साँस
एक अलग मौसम बन कर
गुज़रती है —
कभी पतझड़ की तरह
सारे शब्द झड़ जाते हैं,
कभी वसंत बनकर
तेरा नाम
अलसी की पंखुड़ी-सा
खिल उठता है।

दाएँ नथुने से
ठंडी हवाओं में
तेरा खोया हुआ लिफ़ाफ़ा
घुस आता है,
और बाएँ से
गुज़र जाती है
तेरी याद की वह दोपहर
जिसमें नींद भी
उलझी पड़ी थी।

मैं जब भी गहरी साँस लेता हूँ,
मेरे भीतर
कोई पुराना मौसम
दस्तक देता है —
कभी तुम्हारा बाँका जून
कभी उदास जनवरी,
कभी वो मई की दोपहर
जहाँ तुमने
किसी पसीने से
मेरा नाम लिखा था।

साँसों के भीतर
एक पूरा साल पल रहा है,
और बाहर का मौसम
बस एक बहाना है
भीतर के ताप को
छुपाने का।

Friday, August 22, 2025

बारिश का वो कोना... - 2

ऑफिस से निकलते ही अंशुल ने देखा कि आसमान काले बादलों से भरा है और हवा में मिट्टी की गंध फैली हुई है। बेंगलुरु की शामें वैसे भी अक्सर नमी से भरी रहती हैं, लेकिन उस दिन बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी। लोग दौड़ते हुए ऑटो पकड़ रहे थे, छतरियाँ सिर पर तानकर इधर-उधर भाग रहे थे, मगर अंशुल ने अपने कदम धीमे कर दिए। उसे न भीगने की जल्दी थी, न घर पहुँचने की। दरअसल, इन दिनों उसके भीतर इतनी बेचैनी जमा हो गई थी कि बाहर की बारिश उसे राहत-सी लग रही थी।

वो धीरे-धीरे कब्बन पार्क की तरफ़ बढ़ा। ये जगह उसके लिए हमेशा किसी दोस्त जैसी रही थी। बरगदों की लंबी जटाएँ, गीली मिट्टी की खुशबू, और बारिश के बाद पत्तों पर ठहर गए छोटे-छोटे पानी के कतरे — सब उसे खींचकर वहीं ले जाते थे।

बरगद के पास वाली पुरानी बेंच की ओर बढ़ते हुए अचानक उसकी नज़र उस पर बैठी एक लड़की पर पड़ी। भीगी हुई हवा के बीच उसने चेहरा साफ़ देखने की कोशिश की और ठिठक गया। वो रागिनी थी।

कितने साल बीत गए थे? शायद पाँच या छह। फिर भी उसकी आँखें उसी तरह पहचान में आ रही थीं। वही आँखें जिनमें कभी उसने अपना पूरा भविष्य देख लिया था।

अंशुल के होंठों पर हल्की मुस्कान आई, मगर दिल धड़कने लगा। उसने हिम्मत करके धीरे से पुकारा, "तुम?"
रागिनी ने सिर उठाया, और बिना हैरानी दिखाए मुस्कुरा दी — एक थकी, लेकिन गहरी मुस्कान। "हाँ, मैं," उसने कहा।

दोनों कुछ पलों तक चुपचाप खड़े रहे। बारिश उनके बीच ऐसे गिर रही थी जैसे शब्दों के रास्ते में कोई पर्दा डाल दिया हो। फिर अंशुल ने पास आकर धीरे से पूछा, "बैठूँ?"
रागिनी ने बस सिर हिलाया।

बेंच पर दोनों एक-दूसरे से थोड़ा फासला बनाकर बैठ गए। वही बेंच जिस पर कभी उन्होंने साथ बैठकर कॉफ़ी पी थी, किताबें साझा की थीं, और ख्वाबों के धागे बुने थे।

अंशुल ने एक टहनी उठाकर ज़मीन पर लकीरें खींचनी शुरू कीं। उसने देखा कि रागिनी की हथेलियाँ हल्की-सी कांप रही थीं। शायद ठंड से, शायद किसी दबे एहसास से।

"कभी सोचा नहीं था, यहाँ मिल जाओगी," अंशुल ने धीमे स्वर में कहा।
रागिनी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "ज़िंदगी हमें वहीं घुमाकर लाती है जहाँ से हम भागते हैं।"

फिर चुप्पी। बारिश धीरे-धीरे कम हो रही थी। बूंदें अब मोटी नहीं थीं, बस हल्की फुहार की तरह गिर रही थीं। पार्क के कोने से आती मिट्टी और घास की मिली-जुली खुशबू उन्हें किसी पुराने ज़माने में ले जा रही थी।

काफी देर बाद रागिनी ने कहा, "जानते हो, इन सालों में सबसे बड़ा डर किस बात का लगा?"
अंशुल ने उसकी तरफ़ देखा। "किस बात का?"
उसने नजरें झुकाते हुए कहा, "इस बात का कि क्या कभी कोई मुझे फिर से सच में टूटकर चाहेगा भी या नहीं।"

ये सुनते ही अंशुल के भीतर कुछ हिल गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल के सबसे छुपे कोने से उसके ही शब्द चुरा लिए हों। वही डर तो उसके भीतर भी था। वही सवाल कि क्या किसी दिन उसे भी वैसा प्यार मिलेगा, जैसा उसने कभी दिया था।

कुछ पलों तक दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। उस खामोशी में कोई शिकायत नहीं थी, न कोई गिला, बस एक गहरी थकान और अनकही चाहत थी।

आसमान अब साफ़ हो रहा था। पेड़ों से टपकती बूंदों की आवाज़ गूँज रही थी। रागिनी ने धीरे-धीरे उठते हुए कहा, "चलूँ?"
अंशुल चाहता था कि वो कह दे—"थोड़ी देर और बैठो, अभी मत जाओ।" लेकिन उसके होंठों पर शब्द नहीं आए। वो बस मुस्कुरा दिया।

रागिनी जाते-जाते एक बार मुड़ी। उसकी आँखों में सवाल था, और शायद थोड़ी उम्मीद भी। अंशुल ने हल्के से सिर हिलाया, मानो कहना चाहता हो कि हाँ, शायद ये आख़िरी मुलाक़ात हो।

रागिनी के जाने के बाद कई हफ़्तों तक अंशुल का वही हाल रहा—ऑफ़िस से लौटकर वो देर रात तक खाली स्क्रीन के सामने बैठा रहता, कोडिंग करता, लेकिन बीच-बीच में हाथ रुक जाते। उसकी डायरी में दो-तीन अधूरी लाइनें ही जुड़ीं, और फिर बैकस्पेस सब मिटा देता।

वक़्त बीतता गया। रागिनी की याद धीरे-धीरे दर्द से हटकर एक अजीब-सी खामोशी में बदलने लगी। जैसे ज़िंदगी ने उसके भीतर कहीं गहरी तह बना दी हो, जहाँ वो किसी को आने नहीं देता।

फिर भी, अंशुल ने महसूस किया कि अब हर चीज़ को देखने का उसका नज़रिया अलग हो गया है।
कब्बन पार्क से गुज़रते हुए उसने पहली बार उन बुज़ुर्गों पर ध्यान दिया जो रोज़ शाम को हँसते-खिलखिलाते एक गोल घेरे में इकट्ठा होते थे।
कॉफ़ी कैफ़े में बैठकर उसने देखा कि आसपास बैठे लोग कितनी आसानी से अपने-अपने दुख-सुख बाँट लेते हैं।
और एक दिन उसने खुद को किताबों की दुकान पर खड़े पाया, जहाँ न जाने क्यों उसने एक शायर की किताब उठा ली।

उस किताब के पहले ही पन्ने पर लिखा था—
"इश्क़ हमेशा मिलन का नाम नहीं होता, कभी-कभी ये तुम्हें अपनी असल पहचान दिलाने का रास्ता भी बन जाता है।"

वो लाइनें पढ़ते ही उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की गाँठ खोल दी हो।
रागिनी चली गई थी, हाँ। शायद कभी वापस न आए।
मगर उसने अंशुल को एक आईना दिखा दिया था—कि वो किस हद तक किसी से जुड़ सकता है, और साथ ही ये भी कि उसके भीतर टूटने के बाद भी खड़े रहने की ताक़त है।

धीरे-धीरे अंशुल फिर से लिखने लगा।
अब वो शब्द सिर्फ़ दर्द से नहीं निकलते थे, उनमें ठहराव था। उनमें ये एहसास था कि ज़िंदगी सिर्फ़ चाहतों की पूर्ति नहीं है, बल्कि अधूरेपन को अपनाना भी है।

और एक रोज़ उसने अपनी डायरी में लिखा—
"शायद मुझे कोई टूटकर चाहे या न चाहे... लेकिन मैं इतना ज़रूर करूँगा कि जब भी किसी को चाहूँ, वो पूरी सच्चाई और ईमानदारी से हो।"

उस शाम अंशुल को लगा कि उसने ज़िंदगी से कोई बड़ा हिसाब बराबर कर लिया है और वो ज़िन्दगी के अगले अध्याय के लिए तैयार है..... 

Tuesday, August 19, 2025

बारिश का वो कोना...

बैंगलोर की शामें हमेशा एक-सी नहीं होतीं।

कभी अचानक बादल उमड़ आते हैं, कभी हल्की-सी धूप लंबी सड़क पर बिखर जाती है। ऑफिस से लौटते वक्त अंशुल का सबसे प्यारा ठिकाना था — पार्क का एक कोना, जहाँ पुराने बरगद के नीचे लोहे की एक बेंच रखी थी।

उस बेंच पर बैठते ही शहर का शोर कुछ देर के लिए धुँधला हो जाता था। ट्रैफिक के हॉर्न, ऑटो वालों की आवाज़ें, और कॉफी की खुशबू से भरे ठेले — सब पीछे छूट जाते थे।

उस दिन भी अंशुल वहीँ आया था।
थकान उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी। नोटबुक खोली और वही पुरानी आदत — दो-चार लाइनें लिखना, फिर मिटा देना। उसके मन में एक ही सवाल चक्कर काट रहा था:

"क्या कोई इंसान मुझे सच में… टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

इसी सोच में डूबा था कि उसने देखा — पास वाली बेंच पर एक लड़की आकर बैठी। हल्की-सी बारिश शुरू हो चुकी थी, और वो लड़की छतरी न खोलकर बारिश को चेहरे पर पड़ने दे रही थी। बाल उसके गालों से चिपक रहे थे।

कुछ पल दोनों खामोश रहे।
फिर लड़की ने धीरे से पूछा —
“तुम्हें कभी डर लगता है… कि कोई तुम्हें पूरी तरह चाहेगा या नहीं?”

अंशुल ने किताब बंद कर दी।
ये वही सवाल था जो उसके भीतर महीनों से अटका पड़ा था।

“हाँ,” उसने कहा,
“डर हमेशा रहता है। लोग अक्सर कहते हैं ‘हम चाहेंगे’, पर जब टूटा-बिखरा इंसान सामने आता है, तो उनका प्यार भी काँच की तरह टूट जाता है।”

लड़की ने हल्की-सी मुस्कान दी। मुस्कान में दर्द था, जैसे वो जवाब सुनना चाहती भी थी और डरती भी।


अगले कई दिनों तक वो लड़की — रागिनी — उसी पार्क में मिलने लगी।
कभी दोनों बारिश से बचते हुए चायवाले के ठेले तक चले जाते। भाप उठते कपों के बीच उनकी बातचीत में भी एक गर्माहट घुलने लगी।
कभी वो पार्क के रास्तों पर देर तक चलते रहते। पेड़ों के नीचे गिरी पत्तियों पर कदम रखते हुए, खामोश रहते लेकिन भीतर बहुत कुछ कह जाते।

रागिनी बहुत बातें करती थी — अपने बचपन के बारे में, कॉलेज के दिनों के बारे में, और उस रिश्ते के बारे में जिससे वो बँधी हुई थी लेकिन खुश नहीं थी।
“वो इंसान मुझे चाहता तो है… पर टूट कर नहीं,” उसने एक बार कहा था।
“उसके प्यार में मजबूरी ज़्यादा है, गहराई कम।”

अंशुल सुनता रहा। हर शब्द उसके भीतर चोट करता, लेकिन वो समझता था कि प्यार का मतलब किसी को बाँधना नहीं, बल्कि उसे समझना है।


एक शाम की बात है।
बारिश बहुत तेज़ थी। बिजली चमक रही थी, और पार्क लगभग खाली था। रागिनी और अंशुल उसी बरगद के नीचे खड़े थे। हवा इतनी तेज़ थी कि उनकी छतरियाँ उलट रही थीं।

रागिनी ने अचानक कहा —
“तुम जानते हो न, कि शायद मैं कभी तुम्हारी नहीं हो पाऊँगी?”

अंशुल ने उसकी आँखों में देखा।
उन आँखों में सवाल भी थे और डर भी।
“जानता हूँ,” उसने धीरे से कहा।
“लेकिन ये भी जानता हूँ कि अगर कोई तुम्हें टूट कर चाहेगा… तो वो शायद मैं ही होऊँगा।”

कुछ पल खामोशी रही।
सिर्फ़ बारिश की बूँदें गिरती रहीं।


फिर एक दिन रागिनी नहीं आई।
ना उस शाम, ना अगले दिन।
पार्क की बेंच खाली थी, बरगद का कोना चुप था।

अंशुल कई हफ्ते इंतज़ार करता रहा।
उसकी नोटबुक में अब सिर्फ़ रागिनी से जुड़े शब्द भरते गए — बारिश, मुस्कान, डर, अधूरापन।

उसने कभी तलाशने की कोशिश नहीं की। शायद उसने समझ लिया था कि कुछ रिश्ते सिर्फ़ एक शहर, एक पार्क और एक मौसम तक के लिए आते हैं।

लेकिन आज भी जब बारिश होती है, अंशुल उसी बरगद के नीचे बैठ जाता है।
लोग दौड़कर शेल्टर में भागते हैं, लेकिन वो भीगता रहता है — जैसे किसी अदृश्य साथी के साथ खड़ा हो।

उसके मन में अब भी वही सवाल गूंजता है—
"क्या कोई इंसान मुझे टूटा हुआ देख कर भी चाहेगा?"

और उसके भीतर से जवाब आता है—
"हाँ, शायद… वो आई थी। बस हमारे बीच वक़्त सही नहीं था।"


उसी वक़्त कहीं दूर... 


आज भी जब बारिश होती है, रागिनी खिड़की पर खड़ी होकर बाहर देखती है।
उसकी हथेलियाँ भीग जाती हैं, और वो बरगद के नीचे खड़े उस लड़के को याद करती है, जिसने उसे पहली बार आईना दिखाया था।

वो जानती है कि अंशुल ने शायद उसे आज भी वहीं तलाशना बंद नहीं किया होगा।
और उसके मन में एक चुप सवाल गूँजता है:

"क्या कोई मुझे टूट कर चाहेगा?"

और फिर भीतर से जवाब आता है:
"हाँ… वो था। बस मैंने ही हिम्मत नहीं की।"

Monday, August 18, 2025

अव्यक्त प्रेम की डायरी

(पन्ना- 17)

आज फिर घर अजीब-सा खाली है।
पियू की हँसी खिड़की से झाँकती नहीं,
और शिवी की खिलखिलाहट
कमरे की दीवारों पर टकराकर
वापस नहीं आती।

मैं दोनों की दूरी को
अपनी साँसों में नापता हूँ।
आईना धुँधला है—
क्योंकि उस पर तुम्हारी मुस्कान
काफ़ी दिनों से नहीं उतरी।

इन खालीपन के बीच
मैं एक पुल बनाता हूँ,
जो शायद किसी नक्शे पर नहीं है।
वह बस मेरी धड़कनों में है—
धीरे-धीरे जुड़ता हुआ,
हवा की तरह फैला हुआ।

शायद यही दूरी की गवाही है—
कि प्रेम कहीं खोया नहीं,
बस और गहरा होकर
अदृश्य हो गया है।

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